अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 76


ग़ज़वा मुरीसीअ के बाद की फ़ौजी मुहिमें

1. सरीया दयारे बनी कल्ब, इलाक़ा दूमतुल जन्दल

यह सरीया हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ के नेतृत्व में शाबान सन् 06 हि० में भेजा गया । अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें अपने सामने बिठा कर खुद अपने मुबारक हाथों से पगड़ी बांधी और लड़ाई में सबसे अच्छी शक्ल अपनाने की वसीयत फ़रमाई और फ़रमाया कि अगर वे लोग तुम्हारी इताअत कर लें तो तुम उनके बादशाह की लड़की से शादी कर लेना ।

हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रज़ि० ने वहां पहुंचकर तीन दिन लगातार इस्लाम की दावत दी, आखिरकार क़ौम ने इस्लाम कुबूल कर लिया। फिर हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रज़ि० ने तमाज़र बिन्त असबग़ से शादी की। यही हज़रत अब्दुर्रहमान के सुपुत्र अबू सलमा की मां हैं। इनके बाप अपनी क़ौम के सरदार और बादशाह थे ।

2. सरीया दयार बनी साद, इलाक़ा फ़िदक

यह सरीया शाबान सन् 06 हि० में हज़रत अली रज़ि० के नेतृत्व में भेजा गया। इसकी वजह यह हुई कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को मालूम हुआ कि बनू साद का एक गिरोह यहूदियों को कुमक पहुंचाना चाहता है, इसलिए आपने हज़रत अली रज़ि० को दो सौ आदमी देकर रवाना फ़रमाया । ये लोग रात में सफ़र करते और दिन में छिपे रहते थे, आखिर एक जासूस पकड़ में आया और उसने इक़रार किया कि उन लोगों ने ख़ैबर की खजूर के बदले में सहायता जुटाने की बात कही है । जासूस ने यह भी बतलाया कि बनू साद ने किस जगह जत्थबन्दी की है।

चुनांचे हज़रत अली रजि० ने उन पर छापा मारकर पांच सौ ऊंट और दो हज़ार बकरियों पर क़ब्ज़ा कर लिया, अलबत्ता बनू साद अपनी औरतों-बच्चों समेत भाग निकले। उनका सरदार वब्र बिन अलीम था।

3. सरीया वादिल कुरा

यह सरीया हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि० या हज़रत ज़ैद बिन हारिसा रज़ि० के नेतृत्व में रमज़ान सन् 06 हि० में रवाना किया गया। इसकी वजह यह थी कि

बनू फ़ज़ारा की एक शाखा ने धोखे से अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को क़त्ल करने का प्रोग्राम बनाया था। इसलिए आपने अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि० को रवाना किया।

हज़रत सलमा बिन अकवअ रज़ि० का बयान है कि इस सरीए में मैं भी आपके साथ था। जब हम सुबह की नमाज़ पढ़ चुके तो आपके हुक्म से हम लोगों ने छापा मारा और चश्मे पर धावा बोल दिया। अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि० ने कुछ लोगों को क़त्ल किया। मैंने गिरोह को देखा जिसमें औरतें और बच्चे भी थे। मुझे डर हुआ कि कहीं ये लोग मुझसे पहले पहाड़ पर न पहुंच जाएं, इसलिए मैंने उनको जा लिया और उनके और पहाड़ के बीच एक तीर चलाया। तीर देखकर ये लोग ठहर गए। इनमें उम्मे क़रफ़ा नामी एक औरत थी, जिसके ऊपर एक पुरानी पोस्तीन थी। उसके साथ उसकी बेटी भी थी जो अरब की सबसे खूबसूरत औरतों में से थी। मैं इन सबको हांकता हुआ अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि० के पास ले आया। उन्होंने वह लड़की मुझे दी, लेकिन मैंने उसका कपड़ा न खोला। बाद में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह लड़की हज़रत सलमा बिन अकबअ से मांगकर मक्का भेज दी और उसके बदले में वहां के कई मुसलमान क़ैदियों को रिहा करा लिया। 1

उम्मे क़रफ़ा एक शैतान औरत थी, नबी सल्ल० के क़त्ल के उपाय किया करती थी और इस मक़सद के लिए उसने अपने खानदान के तीस सवार भी तैयार किए थे, इसलिए उसे ठीक बदला मिल गया और उसके तीसों सवार मारे गए।

4. सरीया उरनी यीन

यह सरीया सन् 06 हि० में हज़रत कर्ज़ बिन जाबिर फ़हरी रज़ि०२ के नेतृत्व में भोजा गया। इसकी वजह यह हुई कि अक्ल और उरैना के कुछ लोगों ने मदीना आकर इस्लाम का इज़हार किया और मदीना ही में ठहर गए, लेकिन उनके लिए मदीना की जलवायु सही न साबित हुई और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें कुछ ऊंटों के साथ चरागाह भेज दिया और हुक्म दिया कि ऊंटों का दूध और पेशाब पिएं ।

जब ये लोग तन्दुरुस्त हो गए तो अल्लाह के रसूल सल्ल० के चरवाहे को

देखिए सहीह मुस्लिम 2/89। कहा जाता है कि यह सरीया सन् 07 में पेश आया । यह वही हज़रत कर्ज़ बिन जाबिर फहरी हैं जिन्होंने बद्र की लड़ाई से पहले ग़ज़वा सफ़वान में मदीना के जानवरों पर छापा मारा था। बाद में उन्होंने इस्लाम कुबूल किया और मक्का विजय के मौक़े पर शहादत के दर्जे को पहुंचे।

क़त्ल कर दिया। ऊंटों को हांक ले गए और इलाम ज़ाहिर करने के बाद अब फिर कुन अपना लिया, इसलिए अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उनकी खोज के लिए कर्ज़ बिन जाहिर फहरी को बीस सहावा के साथ रवाना किया और यह दुआ फ़रमाई कि ऐ अल्लाह ! उनींयों पर रास्ता अंधा कर दे और कंगन से भी ज्यादा तंग बना दे ।

अल्लाह ने दुआ कुबूल फरमाई। उन पर रास्ता अंधा कर दिया, चुनांचे वे पकड़ लिए गए और उन्होंने मुसलमान चरवाहों के साथ जो कुछ किया था, उसके बदले के तौर पर उनके हाथ-पांव काट दिए गए, आंखें दाग़ दी गईं और उन्हें हर्रा के एक कोने में छोड़ दिया गया, जहां वे ज़मीन कुरेदते-कुरेदते अपने नतीजे को पहुंच गए। इनकी घटना सहीह बुखारी वग़ैरह में हज़रत अनस रजि० से भी रिवायत की गई है। 2

सीरत लिखने वाले इसके बाद एक और सरीया का ज़िक्र करते हैं, जिसे हज़रत अम्र बिन उमैया ज़मरी रजि० ने हज़रत सलमा बिन अबी सलमा के साथ शव्वाल सन् 06 हि० में सफल बनाया था। इसका विस्तृत विवेचन यह है कि हज़रत अम्र बिन उमैया ज़मरी अबू सुफ़ियान को क़त्ल करने के लिए मक्का तशरीफ़ ले गए थे, क्योंकि अबू सुफ़ियान ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को क़त्ल करने के लिए एक देहाती बहू को मदीना भेजा था। अलबत्ता दोनों फ़रीक़ों में से कोई भी अपनी मुहिम में सफल न हो सका।

सीरत लिखने वाले यह भी कहते हैं कि इसी सफ़र में हज़रत अम्र बिन उमैया ज़ुमरी ने तीन काफ़िरों को क़त्ल किया और हज़रत खुबैब की लाश उठाई थी, हालांकि हज़रत खुबैब की शहादत की घटना रजीअ के कुछ दिन या कुछ महीने बाद की है और रजीअ की घटना सफ़र 04 हि० की है, इसलिए मैं यह समझने में असमर्थ हूं कि क्या ये दोनों दो-दो अलग-अलग सफ़र की घटनाएं हैं? मगर सीरत लिखने वाले गड़बड़ा गए और उन्होंने दोनों का एक ही सफ़र में उल्लेख कर दिया या यह कि सच में दोनों घटनाएं एक ही सफ़र में घटीं, लेकिन सीरत लिखने वालों से सन् तै करने में ग़लती हो गई और उन्होंने उसे 04 हिजरी के बजाए सन् 06 हि० में लिख दिया। हूं

हज़रत अल्लामा मंसूरपुरी रह० ने भी इस घटना को जंगी मुहिम या सरीया मानने से इंकार कर दिया है। (वल्लाहु आलम)

ज़ादुल मआद 2/122, (कुछ इज़ाफ़ों के साथ) सहीह बुखारी 2/602 वग़ैर

ये हैं वे सरीए और ग़ज़वे जो ग़ज़वा अहज़ाब और बनी कुरैज़ा के बाद पेश आए। इनमें से किसी भी सरीए या ग़ज़वे में कोई तेज़ लड़ाई नहीं हुई, सिर्फ़ कुछ-कुछ में मामूली क़िस्म की झड़पें हुईं, इसलिए इन मुहिमों को लड़ाई के बाजए झड़पें, फ़ौजी गश्त और ‘सिखाने वाली’ गतिविधियां कहा जा सकता है, जिसका मक़सद ढीठ बहुओं और अकड़े हुए दुश्मनों को डराना-धमकाना था । हालात पर विचार करने से मालूम होता है कि ग़ज़वा अहज़ाब के बाद स्थिति बदलनी शुरू हो गई थी और इस्लाम दुश्मनों के हौसले टूटते जा रहे थे। अब उन्हें यह उम्मीद बाक़ी न रह गई थी कि इस्लाम की दावत को तोड़ा और उसकी शौकत को पामाल किया जा सकता है, पर यह तब्दीली तनिक अच्छी तरह खुलकर उस वक़्त सामने आई जब मुसलमान हुदैबिया समझौते से फ़ारिग़ हो चुके। यह समझौता असल में इस्लामी ताक़त का मान लेना था और इस बात की पुष्टि थी कि अब इस ताक़त को अरब प्रायद्वीप में बाक़ी और बरक़रार रखने से कोई ताक़त नहीं रोक सकती।

हक़ और बातिल के बीच लकीर – जंग-ए-सिफ्फीन

हदीस-ए-रसूल के आईने में इस्लामी इतिहास का वह मोड़ जहाँ हक़ और बातिल के बीच लकीर खिंच गई, वह जंग-ए-सिफ्फीन थी।

इस जंग के बारे में अल्लाह के रसूल ﷺ की एक पेशीनगोई (भविष्यवाणी) ने कयामत तक के लिए फैसला कर दिया था।

सहीह बुखारी में साफ अल्फाज मैं दर्ज हैं कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने हजरत अम्मार बिन यासिर  के बारे में फरमाया:
“अफ़सोस! अम्मार को एक बागी गिरोह (फ़िआ-ए-बाग़िया) कत्ल करेगा। अम्मार उन्हें जन्नत की तरफ बुला रहा होगा और वह गिरोह अम्मार को जहन्नुम की तरफ बुला रहा होगा।”

यह 👆हदीस ‘मुतवातिर’ है, यानी इसे इतने सहाबा ने रिवायत किया है कि इसकी सच्चाई पर शक की कोई गुंजाइश ही नहीं।

1) बागी कौन? फैसला रसूलल्लाह का है.👇

जब जंग-ए-सिफ्फीन में हजरत अम्मार बिन यासिर  शहीद हुए, तो यह साबित हो गया कि जिस लश्कर की तलवार से उनकी शहादत हुई, वही लश्कर ‘बागी गिरोह’ है।
●हजरत अम्मार  हजरत अली के साथ थे।
●उन्हें शहीद करने वाला लश्कर मुआविया का था।

लिहाजा, खुद रसूलल्लाह ﷺ के फैसले के मुताबिक, उस वक्त का बागी गिरोह वही था जिसने हजरत अली  (जो वक्त के जायज खलीफा थे) के खिलाफ खरुज (बगावत) किया था।

जब अल्लाह के नबी ﷺ ने हक और बातिल के दरमियान लकीर खींच दी और साफ लफ्जों में “बागी” गिरोह की निशानदेही फरमा दी, तो फिर किसी भी शख्स या मौलवी की क्या हैसियत कि वह अपनी तरफ से तावीलें (explanations) पेश करके उस गिरोह के सरदार को “साफ-सुथरा” साबित करने की कोशिश करे?

2) मौलवियों की ‘सफेदी’ और असलियत.👇

आज के दौर में कुछ लोग ‘सियासी मफाद या अपनी खास विचारधारा को बचाने के लिए उस बागी गिरोह के सरदारों मुआविया को “साफ-सुथरा” दिखाने की कोशिश करते हैं। उनके लिए कुछ कड़वे सवाल और हकियाक:

●अदालत-ए-सहाबा का गलत इस्तेमाल:
सहाबा का एहतराम अपनी जगह, लेकिन जब रसूलल्लाह ﷺ खुद किसी को ‘बागी’ और ‘जहन्नुम की तरफ बुलाने वाला’ कह दें, तो फिर किसी मौलवी की क्या मजाल कि वह उन्हें ‘मुजतहिद’ कहकर उनकी खताओं को ढके?
●इल्मी दयानतदारी:
अगर हम बागी को बागी नहीं कहेंगे, तो हम रसूलल्लाह ﷺ के फरमान की तकजीब (झुठलाना) करेंगे। क्या किसी शख्स की मोहब्बत रसूलल्लाह के फरमान से बड़ी हो सकती है?

3) बागियों का अंजाम: कुरान की रोशनी में.👇

कुरान करीम (सूरतुल हुजुरात, आयत 9) में साफ हुक्म है:
“अगर मुसलमानों के दो गिरोह आपस में लड़ें… तो उस गिरोह से लड़ो जो बगावत (बगी) करे, यहाँ तक कि वह अल्लाह के हुक्म की तरफ लौट आए।”

हजरत अली  उस वक्त हक पर थे, और उनके खिलाफ तलवार उठाना सरासर बगावत थी। हजरत अम्मार की शहादत ने उस बगावत पर मोहर लगा दी।

हासिल-ए-कलाम (निष्कर्ष)

किसी भी शख्सियत को बचाने के लिए हदीस के मायनों को तोड़ना-मरोड़ना दीन के साथ खिलवाड़ है। हजरत अम्मार बिन यासिर  की शहादत कोई मामूली वाकया नहीं था, यह हक और बातिल का पैमाना था।
जो गिरोह अम्मार को शहीद करे, वो बागी है। यह मेरा फैसला नहीं, यह मौलवियों का फैसला नहीं, बल्कि यह तजदार-ए-मदीना ﷺ का फैसला है। और जिसके खिलाफ अल्लाह के रसूल गवाही दे दें, उसे दुनिया का कोई मुफ्ती या मौलवी “साफ-सुथरा” नहीं कर सकता।

इस्लाम हमें सच बोलने और हक का साथ देने का हुक्म देता है। चापलूसी और गलत तावीलों से तारीख नहीं बदली जा सकती। जो नबी ﷺ की नजर में बागी है, उसे दुनिया का कोई भी मौलवी “पाक-साफ” नहीं कर सकता।

“हक अली के साथ है, और अली हक के साथ हैं।”

“तारीख के पन्नों को ज़रा गौर से पढ़ो,
हक और बातिल का फर्क साफ नज़र आएगा।
अम्मार की शहादत ने वो लकीर खींच दी,
जिसे कयामत तक कोई मिटा न पाएगा।”

Do You Know Who “The Martyr Sultan” Was?

Do You Know Who “The Martyr Sultan” Was?

He was Nur ad-Din Mahmud Zengi — may Allah have mercy upon him — one of the greatest sultans in Islamic history, a man who combined the sword with justice, and asceticism with leadership.

Ibn Kathir said about him:
“May Allah have mercy on him—he had beautiful handwriting, was devoted to reading religious books, followed the Prophetic traditions, was diligent in performing prayers in congregation, recited the Qur’an frequently, loved doing good deeds, was chaste in body and character, and was moderate in spending on himself and his family in food and clothing. It was even said that the poorest person in his time spent more on himself than he did. He neither hoarded wealth nor sought worldly gains, and not a single obscene word was ever heard from him, whether in anger or in contentment. He was quiet, dignified, and composed.”

Why Was He Called “The Martyr Sultan”?
Nur ad-Din Mahmud Zengi was not killed on the battlefield by a sword or spear, yet scholars and historians honored him with the title of martyr because he embodied the true meanings of martyrdom. This was for several reasons:

First: Sincerity of Intention and Constant Struggle

Nur ad-Din lived in continuous vigilance against the Crusader enemy. He knew neither luxury nor comfort. His entire life was devoted to preparing for jihad, building the Ummah, and strengthening the religion of Allah.

The Prophet ﷺ authentically said:
“Whoever sincerely asks Allah for martyrdom, Allah will grant him the rank of the martyrs, even if he dies in his bed.”
Second: He Died While Guarding the Frontiers of Islam

He passed away in Damascus, which at that time was one of the frontier strongholds of the Muslims. He remained occupied with the affairs of jihad and the unity of the Ummah. He did not die in comfort or negligence, but in constant concern for the victory of Islam.

Third: His Legacy Paved the Way for Victory

Nur ad-Din was the true architect of the project to liberate Jerusalem.

He united شام (Greater Syria), ended the Fatimid state in Egypt, and trained great leaders—foremost among them Salah ad-Din al-Ayyubi—until historians said:
“The liberation of Jerusalem was the fruit of the seeds planted by Nur ad-Din.”
Fourth: His Justice, Asceticism, and Sincerity

He ruled according to Islamic law and feared Allah in how he governed his people. Scholars said that his justice, piety, and sincerity during times of trial are among the reasons one may hope he receives the reward of the martyrs.

Nur ad-Din Mahmud did not die as a martyr by the strike of a sword…
But he lived as a martyr in intention,
A martyr in vigilance,
A martyr in vision and mission.
And he died with his heart attached to the liberation of Al-Aqsa Mosque.
So Allah honored him with a title reserved for the truly great:

The Martyr Sultan
If you have finished reading, send blessings upon the Prophet Muhammad ﷺ.