
Ashra e Zikr e Ahlaibat as |Day 1 Dr Ali Waqar Qadri



Hazrat Abdullah bin Yaqtar (also known as Abdullah ibn Yaqtur) was a devoted companion and the foster brother (Rida’i) of Imam Husayn. He served as Imam Husayn’s messenger to Kufa but was captured by Umayyad forces and martyred by the governor Ubaydullah ibn Ziyad shortly before the tragedy of Karbala. [1, 2, 3, 4, 5]
Lineage and Relationship
• Birth & Companionship: Born in Medina, he was a descendant of the Banu Layth ibn Bakr.
• Foster Brother: He was the milk-brother of Imam Husayn, as they were both nursed by the same wet-nurse (his mother, a devoted servant of the Ahl al-Bayt). This close bond earned him the status of a revered Companion of the Prophet’s household. [1, 6]
The Mission to Kufa
• Carrying the Message: Imam Husayn dispatched Abdullah bin Yaqtar from Mecca to Kufa with a letter addressed to his cousin and representative, Muslim ibn Aqil.
• Capture: Before he could reach Kufa, he was intercepted and arrested in the area of Qadisiyyah by Hasin ibn Tamim, a commander under the Umayyad governor Ubaydullah ibn Ziyad. [3, 9]
Martyrdom
• The Interrogation: Brought before Ibn Ziyad, Abdullah remained steadfast and refused to disclose the contents of the Imam’s letter or his mission.
• Final Stand: Ibn Ziyad ordered him to ascend the roof of the Dar al-Khilafa (the governor’s palace) in Kufa to publicly curse Imam Husayn.
• The Declaration: Abdullah climbed the palace but instead used the opportunity to address the crowds, loudly declaring himself as the messenger of Imam Husayn and urging the Kufans to support the grandson of the Prophet against the Umayyads.
• Death: Enraged by this defiance, Ibn Ziyad ordered his guards to throw him from the top of the palace, resulting in fatal injuries and his martyrdom. [3, 5]
The tragic news of his martyrdom reached Imam Husayn’s caravan while they were still en route to Karbala. [4, 5]
Would you like to know more about other messengers and companions of Imam Husayn, or the specific stops along the journey to Karbala?
AI responses may include mistakes.

*Maqaam e Ahle Baith*
Hazrat Abdullah Bin Abbas Razi Allahu Tala Anhu Se Marwi Hain Ke Huzoor Nabi e Kareem ﷺ Ne Farmaya :- Mere Ahle Baith Ki Misaal Hazrat Nuh Alahis Salam Ki Kashti Ki Si Hain Jo Usme Sawaar Ho Gaya Wo Najaat Pa Gaya Aur Jo Usse Peeche Reh Gaya Wo Gark Ho Gaya.
Aur Ek Riwayat Me Hain Hazrat Abdullah Bin Zubair Razi Allahu Tala Anhu Se Marwi Hain Ke Huzoor Nabi e Kareem ﷺ Ne Farmaya :- Mere Ahle Baith Ki Misaal Hazrat Nuh Alahis Salam Ki Kashti Ki Si Hain Jo Usme Sawaar Ho Gaya Wo Salamti Pa Gaya Aur Jisne Ise Chod Diya Wo Gark Ho Gaya.
📚 *Reference* 📚
*1.* Tabrani, Al Muajjam Al Kabeer, Jild 12, Safa 34, Hadees No 2388, 2638.
*2.* Tabrani, Al Muajjam Al Awsat, Jild 4, Safa 10, Hadees No 3478.
Jild 5, Safa 355, Hadees No 5536.
Jild 6, Safa 85, Hadees No 5870.
*3.* Tabrani, Al Muajjam As Sagheer, Jild 1, Safa 240, Hadees No 391.
Jild 2, Safa 84, Hadees No 825.
*4.* Hakim, Al Mustadrak, Jild 3, Safa 163, Hadees No 4720.
*5.* Bazzar, Al Musnad, Jild 9, Safa 343, Hadees No 3900.
*6.* Daylami, Musnad Al Firdaus, Jild 1, Safa 238, Hadees No 916.
*7.* Haythami, Majma uz Zawahid, Jild 9, Safa 168.

“𝗞𝗔𝗥𝗕𝗔𝗟𝗔: 𝗔 𝗦𝗧𝗢𝗥𝗬 𝗢𝗙 𝗧𝗘𝗔𝗥𝗦, 𝗖𝗢𝗨𝗥𝗔𝗚𝗘, 𝗔𝗡𝗗 𝗨𝗡𝗦𝗛𝗔𝗞𝗘𝗡 𝗙𝗔𝗜𝗧𝗛”.
Imam Hussain (RA), the beloved grandson of Prophet Muhammad ﷺ, was known for his piety, wisdom, and unwavering commitment to truth. When Yazid demanded his allegiance, Imam Hussain (RA) refused, believing that accepting injustice would compromise the values of Islam.
Invited by the people of Kufa, Imam Hussain (RA) set out with his family and loyal companions. However, they were intercepted on the plains of Karbala. There, they faced a massive army and were denied access to water under the scorching desert sun.
Despite hunger, thirst, and overwhelming odds, Imam Hussain (RA) and his small group remained steadfast. One by one, his companions and family members were martyred. Yet he never abandoned his principles, never surrendered to oppression, and never lost faith in Allah.
On the 10th of Muharram, known as Ashura, Imam Hussain (RA) was martyred. Though his enemies won the battle, they could not defeat the truth for which he stood. His sacrifice became a timeless symbol of courage, justice, patience, and faith.
(𝗟𝗘𝗦𝗦𝗢𝗡𝗦 𝗙𝗥𝗢𝗠 𝗞𝗔𝗥𝗕𝗔𝗟𝗔)
✦ Stand for truth, even when you stand alone.
✦ Never sacrifice your principles for worldly gain.
✦ Courage is doing what is right, even when it is difficult.
✦ Patience during trials brings spiritual strength.
✦ Oppression may appear powerful, but truth ultimately prevails.
✦ Faith in Allah can sustain a person through the greatest hardships.
“𝗧𝗛𝗘 𝗠𝗘𝗦𝗦𝗔𝗚𝗘 𝗢𝗙 𝗞𝗔𝗥𝗕𝗔𝗟𝗔”.
“You may lose everything in the path of truth, but if you remain faithful to your principles, you have lost nothing that truly matters.”
May Allah grant us the courage of Imam Hussain (RA), the patience of the people of Karbala, and the strength to stand for truth and justice in our own lives….!! Ameen.

☪️ *मोहर्रम में ग़म मनाना सुन्नत या बिदअत*☪️
(एक बार सुकून से पूरा ज़रूर पढ़ें)
मेरे तमाम मुसलमान भाईयों और बहनों को अस्सलामो अलैकुम !
मोहर्रम में कुछ लोग हज़रत मुहम्मद मुस्तुफा स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के लाल इमाम हुसैन (अस) की शहादत का ग़म मनाते हैं कर्बला के शहीदों की याद में मजलिस करते हैं रोते हैं पीटते हैं खाना खिलाते हैं और इमाम हुसैन व कर्बला वालों की याद को ताज़ा करते हैं और कोई सा भी ऐसा काम करने से परहेज़ करते हैं जिससे किसी भी तरह की ख़ुशी ज़ाहिर हो।
और कुछ लोग कहते हैं कि हमें ग़म नही मनाना चाहिए, न रोना पीटना चाहिए,न इमाम हुसैन की मजलिस करना चाहिए क्योंकि ये काम बिदअत है और इस्लाम मैं बिदअत जायज़ नही है।
*📌तो चलिए आईये देखते हैं कि क्या हक़ीक़त है क्या ग़म मनाना सही व जायज़ है या ये एक बिदअत है❓*
कुछ लोगों का कहना है कि इमाम हुसैन और कर्बला में जो लोग क़त्ल किये गए,वो शहीद हैं और शहीद का ग़म नही मनाया जाता न उन पर आँसू बहाए जाते हैं। *ठीक है फिर तारीख़ पर नज़र उठा कर देखते हैं कि क्या किसी इस्लामिक जंग में किसी के शहीद होने पर कोई रोया या नही ??*
➡️Sahih Bukhari Hadees # 1246
حَدَّثَنَا أَبُو مَعْمَرٍ ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَارِثِ ، حَدَّثَنَا أَيُّوبُ ، عَنْ حُمَيْدِ بْنِ هِلَالٍ ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ , قَالَ : قَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ : أَخَذَ الرَّايَةَ زَيْدٌ فَأُصِيبَ ، ثُمَّ أَخَذَهَا جَعْفَرٌ فَأُصِيبَ ، ثُمَّ أَخَذَهَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ رَوَاحَةَ فَأُصِيبَ ، وَإِنَّ عَيْنَيْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لَتَذْرِفَانِ ، ثُمَّ أَخَذَهَا خَالِدُ بْنُ الْوَلِيدِ مِنْ غَيْرِ إِمْرَةٍ فَفُتِحَ لَهُ .
नबी करीम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने फ़रमाया के ज़ैद ने अलम(झंडा) सँभाला लेकिन वो शहीद हो गए, फिर जाफ़र ने संभाला और वो भी शहीद हो गए फिर अब्दुल्ला बिन रवाह ने संभाला और वो भी शहीद हो गये, *उस वक़्त (उन सब की शहादत की वजह से) रसूलअल्लाह की आँखों से आँसू बह रहे थे !*
बुख़ारी शरीफ़ की इस हदीस 👆के मुताबिक जब दुष्मनाने इस्लाम से जंग हो रही थी और इस जंग में बा ज़ाते खुद रसूलअल्लाह स्वल्लल्लाहो अलयहे व आलेही व सल्लम भी मौजूद थे फिर उस जंग मे जब एक के बाद एक हज़रत ज़ैद,फिर हज़रत जाफ़र और फिर हज़रत अब्दुल्ला रज़ियल्लाहु अन्हुमा अजमईन शहीद हो गए तो उनकी शहादत पर खुद हुज़ूर पाक अलैहिस्सलाम गिरया फ़रमा रहे थे और उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। *हुज़ूर पाक अलैहिस्सलाम के इस अमल से ये बात तो ज़ाहिर हो गई के किसी शहीद की शहादत पर रोया जा सकता है।*
*📌क्या इमाम हुसैन और उनके घर के जवान,बच्चे और औरतें जो सब आले रसूल हैं उन सब पर हुए ज़ुल्म ओ सितम पर रोया जा सकता है या यूँ कहूँ के क्या उनकी शहादत पर रोना सुन्नत है या बिदअत ❓*
➡️Mishkat ul Masabeeh Hadees # 6180
وَعَن أمِّ
الْفضل بنت الْحَارِث أَنَّهَا دَخَلْتُ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَتْ: يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنِّي رَأَيْتُ حُلْمًا مُنْكَرًا اللَّيْلَةَ. قَالَ: «وَمَا هُوَ؟» قَالَتْ: إِنَّهُ شَدِيدٌ قَالَ: «وَمَا هُوَ؟» قَالَتْ: رَأَيْتُ كَأَنَّ قِطْعَةً مِنْ جَسَدِكَ قُطِعَتْ وَوُضِعَتْ فِي حِجْرِي. فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «رَأَيْتِ خَيْرًا تَلِدُ فَاطِمَةُ إِنْ شَاءَ اللَّهُ غُلَامًا يَكُونُ فِي حِجْرِكِ» . فَوَلَدَتْ فَاطِمَةُ الْحُسَيْنَ فَكَانَ فِي حِجْرِي كَمَا قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ. فَدَخَلْتُ يَوْمًا عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَوَضَعْتُهُ فِي حِجْرِهِ ثُمَّ كَانَتْ مِنِّي الْتِفَاتَةٌ فَإِذَا عَيْنَا رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ تَهْرِيقَانِ الدُّمُوعَ قَالَتْ: فَقُلْتُ: يَا نبيَّ الله بِأبي أَنْت وَأمي مَالك؟ قَالَ: أَتَانِي جِبْرِيل عَلَيْهِ السَّلَامُ فَأَخْبَرَنِي أَنَّ أُمَّتِي سَتَقْتُلُ ابْنِي هَذَا فَقُلْتُ: هَذَا؟ قَالَ: نَعَمْ وَأَتَانِي بِتُرْبَةٍ من تربته حَمْرَاء
उम्मुल फ़ज़्ल बिन्ते हारिस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि वो रसूलअल्लाह स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की ख़िदमत मैं हाज़िर हुईं और अर्ज़ किया, अल्लाह के रसूल ! मैंने रात एक अजीब सा ख़्वाब देखा है, आप अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:वोह क्या है ? उन्होंने अर्ज़ किया :वह बहुत शदीद है,आप अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया वह क्या है ? उन्होंने अर्ज़ किया मैंने देखा कि गोया गोश्त का एक टुकड़ा है जो आप के जिस्म अतहर से काट कर मेरी गौद मैं रख दिया गया है, रसूलअल्लाह ने फ़रमाया:तुम ने ख़ैर देखी है, इंशाअल्लाह फ़ातिमा(स अ) बच्चे को जन्म देंगी और वोह तुम्हारी गौद मैं होगा।हज़रत फ़ातिमा ने हुसैन अलैहिस्सलाम को जन्म दिया और वोह मेरी गौद मैं था जैसे रसूलअल्लाह ने फ़रमाया था।एक रोज़ में रसूलअल्लाह की ख़िदमत मैं हाज़िर हुई तो मैंने हुसैन (अस) को आप अलैहिस्सलाम की गौद मैं रख दिया, फिर मैं किसी और जगह मुतवज्जह हो गई अचानक देखा तो *रसूलअल्लाह स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की आँखों से आँसू बह रहे थे,* वह बयान करती हैं, मेने अर्ज़ किया,अल्लाह के नबी ! मेरे वाल्दैन आप पर क़ुर्बान हों ! आप को क्या हुआ ? *आप स्वल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम नें फ़रमाया,:जिब्राईल(अलैहिस्सलाम)मेरे पास तशरीफ़ लाए और उन्होंने मुझे बताया कि मेरी उम्मत अनक़रीब मेरे इस बेटे को शहीद कर देगी* मैंने कहा इस (बच्चे) को ? उन्होंने कहा : हाँ ! *और उन्होंने मुझे उस जगह से उसकी तुर्बत की सुर्ख़ मिट्टी लाकर दी।*
अहलेसुन्नत की इस 👆मशहूर ओ मारूफ़ किताब मैं सही रिवायत को देखने के बाद पता चलता है कि *सिर्फ़ इमाम हुसैन की शहादत की ख़बर सुनकर (जबकि अभी वो शहीद ही नही हुए हैं अभी तो सही में भी इमाम हुसैन ज़िंदा व जावेद हैं बल्कि अभी तो एक छोटा सा बच्चा हैं) हुज़ूर अकरम ज़ारो क़तार रोने लगे,* और फिर इस वाक़ये की याद को ताज़ा रखने के लिए *हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम ने उस जगह की जहाँ पर इमाम हुसैन की क़ब्र मुबारक(तुर्बत) है वहाँ की सुर्ख़ मिट्टी भी लाकर दी।* अल्लाह हो अकबर। *फिर अगर कोई बादे शहादत इमाम हुसैन रोये और उनकी याद को ताज़ा करे तो ये कैसे बिदअत हो सकता है ?* बल्कि जो इस याद को ताज़ा नही करते और इमाम हुसैन की शहादत का ग़म नही मानते रोते नही हैं वो ज़रूर हुज़ूर की सुन्नत पर नही चल रहे।
*📌चलिये ये तो समझ में आ गया कि ग़मे हुसैन अलैहिस्सलाम मनाना सुन्नत ए नबवी है कोई बिदअत नही है और एक सवाब का अमल है जो खुद नबी करीम अलैहिस्सलाम से साबित है।लेकिन आशूर को यानी 10 मोहर्रम को हमें किस हाल में रहना चाहिए हमारा हुलिया कैसा होना चाहिये ये भी देख लेते हैं।*
➡️Mishkat ul Masabeeh Hadees # 6181
وَعَن
ابْن عَبَّاس قَالَ: رَأَيْت النَّبِي صلى الله عَلَيْهِ وسل فِيمَا يَرَى النَّائِمُ ذَاتَ يَوْمٍ بِنِصْفِ النَّهَارِ أَشْعَثَ أَغْبَرَ بِيَدِهِ قَارُورَةٌ فِيهَا دَمٌ فَقُلْتُ: بِأَبِي أَنْتَ وَأُمِّي مَا هَذَا؟ قَالَ: «هَذَا دَمُ الْحُسَيْنِ وَأَصْحَابِهِ وَلَمْ أَزَلْ أَلْتَقِطُهُ مُنْذُ الْيَوْم» فأحصي ذَلِك الْوَقْت فأجد قبل ذَلِكَ الْوَقْتِ. رَوَاهُمَا الْبَيْهَقِيُّ فِي «دَلَائِلِ النُّبُوَّةِ» وَأحمد الْأَخير
इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्होंने कहा: मैंने एक रोज़ निस्फ निहार के वक़्त हज़रत मोहम्मद मुस्तुफा स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को ख़्वाब मैं देखा कि *आप अलैहिस्सलाम के बाल बिखरे हुए हैं और जिस्म अतहर ग़ुबार आलूदह(जिस्म पर धूल मिट्टी पड़ी हुई ) है,* आप अलैहिस्सलाम के हाथ मैं ख़ून की बोतल है ,मैंने अर्ज़ किया मेरे वाल्दैन आप पर क़ुर्बान हों ये क्या है ? *आप अलैहिस्सलाम नें फ़रमाया:” ये हुसैन और उनके साथियों का ख़ून है, मैं आज सुबह से इसे इकट्ठा कर रहा हूँ-“* मैने उस वक़्त को याद रखा और बाद में मुझे मालूम हुआ कि उस वक़्त उन्हें शहीद किया गया था।(दोंनो अहादीस को बहकी ने दलाइल ए नुबूवत मैं रिवायत किया है और आख़री हदीस को इमाम अहमद ने भी रिवायत किया है।)
अहलेसुन्नत की ही इस👆 मोतबर किताब की इस रिवायत को पढ़ने के बाद तमाम मुसलमानों को ये समझ में आ जाना चाहिए कि *मोहर्रम की 10 तारीख़ को यानी आशूरा के दिन हमको किस हाल में रहना चाहिए मतलब हमारा हुलिया कैसा होना चाहिये,* ज़ाहिरी तौर से तो कर्बला के वाक़ये के वक़्त हुज़ूर पाक की वफ़ात हो चुकी थी बावजूद इसके *बरोज़े आशूरा एक बड़े सहाबा हज़रत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु के ख़्वाब में हुज़ूर का आना और ये इत्तेला देना के मेरा बेटा हुसैन और उसके तमाम साथी कर्बला में शहीद हो चुके हैं और मैं (रसूलअल्लाह) ख़ुद उन तमाम शोहदा ए कर्बला का ख़ून आज सुबह से जमा कर रहा हूँ ये बोलना इस बात की दलील है कि कर्बला के शोहदा की ख़बर दूसरों तक पहुंचाना उनका ज़िक्र करना उन पर रोना ये सब सुन्नत है* और सबसे अहम बात के आशूरा के दिन हमको नबी पाक अलैहिस्सलाम की ही तरह बाल बिखरे हुए और अपने जिस्मों को धूल मिट्टी में आलूदा किये हुए मतलब जिस तरह से कोई बेहद ग़मगीन इंसान जिसका सब कुछ लूट चुका हो पूरा घर बर्बाद हो चुका हो,इस हालत में रहना सुन्नते नबवी है।ताकि हम हुज़ूर पाक अलैहिस्सलाम को उनके अहलेबैत की शहादत व ज़ुल्म का पुरसा व ताज़ियत उन्ही के बताए हुए अंदाज़ से पेश कर सकें।
*📌क्या तारीख़ में किसी और कि भी वफ़ात पर किसी और मोतबर शख़्सियतों का ग़म मनाना उन पर नौहा करना(मय्यत पर रो कर कुछ बयान करना) या उन पर मर्सिया पढ़ना(बहुत ज़्यादा ग़म की हालत में कुछ बयान करना) या मातम करना(ग़म की वजह से अपने चेहरे को पीटना) ये सब अमल भी देखने को मिलते हैं ❓*
आईये मुलाहिज़ा फरमाइए–
*मय्यत पर ग़म की वजह से मर्सिया पढ़ना*➡️
Musnad Ahmed Hadees # 24530
۔ (۱۱۰۴۱)۔ عَنْ عَائِشَۃَ، أَنَّ أَبَا بَکْرٍ دَخَلَ عَلَی النَّبِیِّ صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم بَعْدَ وَفَاتِہِ فَوَضَعَ فَمَہُ بَیْنَ عَیْنَیْہِ، وَوَضَعَ یَدَیْہِ عَلَی صُدْغَیْہِ، وَقَالَ وَا نَبِیَّاہْ، وَا خَلِیلَاہْ، وَا صَفِیَّاہْ۔ (مسند احمد: ۲۴۵۳۰)
सय्यदा आयशा रज़ियल्लाहु अन्हू से मरवी है कि नबी करीम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की वफ़ात के बाद हज़रत अबूबकर रज़ियल्लाहु अन्हू आप अलैहिस्सलाम के पास आए और अपना मुँह आप अलैहिस्सलाम की दोनों आँखों के दरमियान और अपने हाथ आप अलैहिस्सलाम की कनपटियों पर रखे और कहा: *हाय मेरे नबी ! हाय मेरे ख़लील !हाय अल्लाह के मुन्तख़ब नबी!*
👆इस रिवायत में रसूलअल्लाह स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की वफ़ात का ज़िक्र है कि जब आप की वफ़ात की ख़बर हज़रत अबूबकर को पहुँची तो हज़रत अबूबकर हुज़ूर पाक के जिस्म मुबारक के पास आये और अपने हाथों से *हुज़ूर के चेहरा ए मुबारक को पकड़ कर जिस तरह से लोग हाय हाय बोल कर मय्यत की अच्छी खूबियाँ बयान कर कर के मर्सिया पढ़ते हैं उस ही अंदाज़ में बोलने लगे के हाय मेरे ख़लील ! हाय मेरे नबी ! हाय अल्लाह के मुन्तख़ब नबी।वगैरह।*
*मय्यत पर ग़म की वजह से नोहा पढ़ना*➡️
Musnad Ahmed Hadees # 13062
۔ (۱۱۰۳۸)۔ عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِکٍ، أَنَّ فَاطِمَۃَ بَکَتْ رَسُولَ اللّٰہِ صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم فَقَالَتْ: یَا أَبَتَاہُ! مِنْ رَبِّہِ مَا أَدْنَاہُ، یَا أَبَتَاہُ! إِلٰی جِبْرِیلَ اَنْعَاہُ، یَا أَبَتَاہُ! جَنَّۃُ الْفِرْدَوْسِ مَأْوَاہُ۔ (مسند احمد: ۱۳۰۶۲)
हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलअल्लाह स्वल्लल्लाहो अलयहे व आलेही व सल्लम की वफ़ात पर सय्यदा फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा रोते हुए यूँ कह रही थीं: *ए मेरे अब्बा जान ! आप अपने रब्ब के किस क़दर क़रीब पहुँच गए, ए मेरे अब्बा जान ! मैं जिब्राईल को आप की मौत की ख़बर दूँगी, ए मेरे अब्बा जान ! जन्नतुल फिरदौस आप का ठिकाना है।*
इस रिवायत 👆में भी रसूलअल्लाह की वफ़ात का ही ज़िक्र है जिसमे बयान हुआ है कि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा जो कि नबी की प्यारी बेटी और जन्नत की औरतों की सरदार भी हैं जिनसे किसी ग़लत अमल की तवक़्क़ो भी नही की जा सकती, *वो अपने प्यारे बाबा नबियों के सरदार की वफ़ात पर बेपनाह रोते हुए जैसे नोहा पढ़ा जाता है उस ही अंदाज़ में फ़रमा रही हैं कि ए मेरे अब्बा जान ! आप अपने रब्ब के किस क़दर क़रीब पहुँच गए,ए मेरे अब्बा जान ! में जिब्राईल को आप की मौत की ख़बर दूँगी, ए मेरे अब्बा जान ! जन्नतुल फ़िरदौस आप का ठिकाना है।*
*मय्यत पर बेपनाह ग़म की वजह से मातम होना*➡️
Musnad Ahmed Hadees # 26880
۔ (۱۱۰۴۰)۔ عَنْ یَحْیَ بْنِ عَبَّادِ بْنِ عَبْدِ اللّٰہِ بْنِ الزُّبَیْرِ عَنْ اَبِیْہِ عَبَّادٍ قَالَ: سَمِعْتُ عَائِشَۃَ تَقُوْلُ: مَاتَ رَسُوْلُ اللّٰہِ صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم بَیْنَ سَحْرِیْ وَنَحْرِیْ وَفِیْ دَوْلَتِیْ لَمْ اَظْلِمْ فِیْہِ اَحَدًا، فَمِنْ سَفَہِیْ وَحَدَاثَۃِ سِنِّیْ اَنَّ رَسُوْلَ اللّٰہِ صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم قُبِضَ وَھُوَ فِیْ حِجْرِیْ، ثُمَّ وَضَعْتُ رَاْسَہٗعَلٰی وِسَادَۃٍ، وَقُمْتُ اَلْتَدِمُ مَعَ النِّسَائِ وَاَضْرِبُ وَجْہِیْ۔ (مسند احمد: ۲۶۸۸۰)
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है,उन्होंने कहा:अल्लाह के रसूल स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का इंतेक़ाल मेरी गर्दन और सीने के दरमियान मेरी ही बारी के दिन हुआ, मैंने उस दिन किसी से कुछ भी ज़्यादती नही की,ये मेरी नासमझी और नौ उमरी थी कि मेरी गौद मैं रसूलअल्लाह अलैहिस्सलाम फौत हुए।फिर मैंने आप अलैहिस्सलाम का सर ए मुबारक तकिया पर रख दिया और *मैं औरतों के साथ मिलकर रोने लगी और अपने चेहरों पर हाथ मारने लगीं।*
इस मोतबर रिवायत में उम्मुल मोमेनीन हज़रत आएशा रज़ियल्लाहू अन्हु से ख़ुद रिवायत मिलती हैं कि जब रसूलअल्लाह की वफ़ात हो गई तो हज़रत आएशा ने रसूलअल्लाह का सर ए मुबारक को तकिए पर रख दिया *और दूसरी तमाम औरतों के साथ मिलकर रोने लगीं और हुज़ूर से बेपनाह मोहब्बत और लगाव के ग़म की वजह से अपने अपने चेहरों पर हाथ मारकर मातम करती हुई रोने और पीटने लगीं।*
*📌यहीँ पर ग़म और बेचैनी की हालत की वजह से अपने चेहरे को पीटने और मातम की मिसाल क़ुरआन पाक में भी एक और नबी की बीवी से मिलती है➡️*
فَأَوْجَسَ مِنْهُمْ خِيفَةً ۖ قَالُوا لَا تَخَفْ ۖ وَبَشَّرُوهُ بِغُلَامٍ عَلِيمٍ
(अध-धारियात – 28)
(इस पर भी न खाया) तो इबराहीम उनसे जो ही जी में डरे वह लोग बोले आप अन्देशा न करें और उनको एक दानिशमन्द लड़के की ख़ुशख़बरी दी
فَأَقْبَلَتِ امْرَأَتُهُ فِي صَرَّةٍ فَصَكَّتْ وَجْهَهَا وَقَالَتْ عَجُوزٌ عَقِيمٌ
(अध-धारियात – 29)
*तो (ये सुनते ही) इबराहीम की बीवी (सारा) चिल्लाती हुई उनके सामने आयीं और अपना मुँह पीट लिया कहने लगीं (ऐ है) एक तो (मैं) बुढ़िया (उस पर) बांझ*
قَالُوا كَذَٰلِكِ قَالَ رَبُّكِ ۖ إِنَّهُ هُوَ الْحَكِيمُ الْعَلِيمُ
(अध-धारियात – 30)
लड़का क्यों कर होगा फ़रिश्ते बोले तुम्हारे परवरदिगार ने यूँ ही फरमाया है वह बेशक हिकमत वाला वाक़िफ़कार है
*ऊपर 👆दी हुई क़ुरआन की आयात को देखने पर पता चलता है कि जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को उनके बेटे होने के लिए फरिश्तों ने ख़बर दी तो ये सुनते ही हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की बीवी हज़रत सारा जो कि बहुत बुज़ुर्ग हो चुकी थी और जो बांझ भी थी वो ग़म में चीखने लगी और अपने चेहरे को पीटने लगीं और बोलने लगीं मेरी ऐसी हालत में लड़का कैसे होगा? लेकिन उन के इस मुँह को पीटने के अमल के बावजूद वहाँ मौजूद नबी अलैहिस्सलाम और उनके साथ फरिश्तों का भी कुछ न बोलना इस बात का सबूत है कि ये नाजायज़ अमल नहीं है बल्कि एक फ़ितरी अमल है।नही तो एक नाजायज़ अमल पर एक इतने बड़े नबी और फ़रिश्ते ज़रूर तम्बीह करते और उन्हें इस अमल से रोकते।*
📌क़ुरआन में ही एक और जगह ग़म मनाने के मुताल्लिक़ ज़िक्र आया है➡️
إِنَّهُ كَانَ لَا يُؤْمِنُ بِاللَّهِ الْعَظِيمِ
(अल-हाक्का – 33)
(क्यों कि) ये न तो बुज़ुर्ग ख़ुदा ही पर ईमान लाता था और न मोहताज के खिलाने पर आमादा (लोगों को) करता था
وَلَا يَحُضُّ عَلَىٰ طَعَامِ الْمِسْكِينِ
(अल-हाक्का – 34)
*तो आज न उसका कोई ग़मख्वार है*
فَلَيْسَ لَهُ الْيَوْمَ هَاهُنَا حَمِ
(अल-हाक्का – 35)
और न पीप के सिवा (उसके लिए) कुछ खाना है
وَلَا طَعَامٌ إِلَّا مِنْ غِسْلِينٍ
(अल-हाक्का – 36)
जिसको गुनेहगारों के सिवा कोई नहीं खाएगा
क़ुरआन की 👆इन आयतों का ज़िक्र ऐसे गुनाहगार शक़्स के बारे में आया है जो अल्लाह पर ईमान नही रखता था और फिर उसके ऊपर नाज़िल होने वाले अज़ाब का भी ज़िक्र आया है लेकिन एक बात बड़ी दिलचस्प है कि आयत नम्बर 34 में ऐसे गुनाहगार के बारे मैं आया है कि *तो आज न उसका कोई ग़मख़्वार है, मतलब गुनहगारों का कोई गमख़्वार नही होता है, लेकिन अल्लाह के मेहबूब और ईमानवालों का गमख़्वार होता है।जो उसकी मुसीबत पर ग़म का इज़हार करता है।*
🙏 *में वक़्त की कमी और पोस्ट के लंबे होने के लिए माज़ेरत ख्वां हूँ आप तमाम लोगों से,पर क्या करूँ मौज़ू है ही ऐसा के बात पर बात निकले जा रही है और दलाइल भी मौजूद हैं हर चीज़ के।फिर भी में वक़्त के इख़्तेसार को मद्देनज़र रखते हुए अपनी बात को यहीं ख़त्म करता हूँ कि “अब और झूठ न फैलाया जाए,न ही एक दूसरे को नफ़रत की नज़रों से देखा जाए,और न ही ये सोचा जाए कि हम इमाम हुसैन और शोहदा ए कर्बला जो नबी अलैहिस्सलाम के नवासे उनके लख्ते जिगर भी हैं अगर इनका ग़म मनाने लगेंगे या इनकी शहादत की मजलिसें बपा करने लगेंगे तो लोग हमें भी शिया कहने लगेंगे।वो सब छोड़िए,बस ये देखिए के इस मौज़ू पर रसूल अलैहिस्सलाम और आले रसूल का क्या अमल रहा है क्यों इमाम हुसैन के बेटे इमाम ज़ैनुलआब्दीन अलैहिस्सलाम करबला के वाक़ये को याद कर कर के अपनी पूरी ज़िंदगी भर रोते रहे ❓ क्या वो नही जानते थे कि इमाम हुसैन या शोहदा पर रोना जायज़ नही है❓ क्या हम उनसे ज़्यादा दीन को और शरीअत को जानते हैं ❓अरे शर्म करो मुसलमानों, खुद को उम्मते मोहम्मदी भी कहते हो और आले मोहम्मद अलैहिस्सलाम के साथ ये अमल अंजाम देते हैं आज के कम इल्म लोगों के बहकावे में आकर,जबकि हमारी अहलेसुन्नत की बड़ी बड़ी सही किताबें भरी पड़ी हैं जिनमे हुज़ूर के ग़म मनाने के तज़किरा भी आया है।और क्या चाहिए आपको? अभी भी वक़्त है सही सुन्नत पर अमल कीजिए।*🙏
*🖋️अबु मोहम्मद*👳♂️