Sehri aur iftaar ka sahi waqt??

*रोज़ा इफ़्तार करने का सही वक़्त कौनसा है❓*

क्या सूरज ग़ुरूब (अस्त) होने के साथ मग़रिब की अज़ान शुरू होते से ही रोज़ा इफ़्तार कर लेना चाहिए जैसा कि बहुत से लोग करते हैं जबकि उस वक़्त इतना उजाला होता है कि ज़मीन पर पड़ी सुई भी आसानी से उठा सकते हैं, और उस वक़्त को आम ज़बान में शाम (Evening) बोला जाता है।

अब हम यहाँ अल्लाह तआला की किताब क़ुरआन मजीद से ये पता करते हैं कि उसमें रोज़ा पूरा होने का वक़्त कौनसा बताया गया है ?

وَكُلُوا وَاشْرَبُوا حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَكُمُ الْخَيْطُ الْأَبْيَضُ مِنَ الْخَيْطِ الْأَسْوَدِ مِنَ الْفَجْرِ ۖ *ثُمَّ أَتِمُّوا الصِّيَامَ إِلَى اللَّيْلِ ۚ*
(अल-बक़रा – 187)
और खाओ और पियो यहाँ तक कि सुबह की सफेद धारी (रात की) काली धारी से आसमान पर पूरब की तरफ़ तक तुम्हें साफ नज़र आने लगे फिर *रात तक रोज़ा पूरा करो*

👆यहाँ सूरए बक़रा की आयत नम्बर 187 में रौज़े के अहकाम के मुताबिक ज़िक्र हुआ है इसमें साफ़ साफ़ बताया गया है कि *रात तक रौज़ा पूरा करो*, और मुसलमान जिस वक़्त रोज़ा इफ़्तार करते हैं वो वक़्त रात नही होती बल्कि *शाम* होती है।

जबकि क़ुरआन में रोज़ा मुकम्मल करने का अरेबिक लफ्ज़ *लैल* आया है जिसका मतलब *रात* होता है शाम नही।

शाम के लिए क़ुरआन में जो लफ़्ज़ आया है वो *असील* आया है मुलाहिज़ा फरमाइए-

وَاذْكُرِ اسْمَ رَبِّكَ بُكْرَةً وَ *أَصِيلًا*

[ अल-इंसान – २५ ]
सुबह *शाम* अपने परवरदिगार का नाम लेते रहो

एक जगह और देखिए-

وَقَالُوا أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ اكْتَتَبَهَا فَهِيَ تُمْلَىٰ عَلَيْهِ بُكْرَةً وَ *أَصِيلًا*

[ अल-फुरकान – ५ ]
तो यक़ीनन ख़ुद उन ही लोगों ने ज़ुल्म व फरेब किया है और (ये भी) कहा कि (ये तो) अगले लोगों के ढकोसले हैं जिसे उसने किसी से लिखवा लिया है पस वही सुबह व *शाम* उसके सामने पढ़ा जाता है


👆देखिए क़ुरआन मैं अरेबिक में शाम(Evening) के लिए अलग और रात(Night) के लिए अलग लफ़्ज़ इस्तेमाल किये गए हैं।और मुसलमान रोज़ा मुकम्मल करता है शाम को न कि रात के शुरू वाले हिस्से में। और रात का शुरू वाला हिस्सा वो कहलाता है जब आसमान पर तारे नज़र आने लगते हैं जब इंसान मग़रिब की नमाज़ पढ़ लेता है जब वो वक़्त शुरू हो जाता है।

*आईये अब हम अहादीस के ज़रिए भी इस मस’अले को समझने की कोशिश करते हैं*👉

حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ يَحْيَى، وَأَبُو كُرَيْبٍ، وَابْنُ نُمَيْرٍ، وَاتَّفَقُوا فِي اللَّفْظِ قَالَ يَحْيَى: أَخْبَرَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، وَقَالَ ابْنُ نُمَيْرٍ: حَدَّثَنَا أَبِي، وقَالَ أَبُو كُرَيْبٍ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، جَمِيعًا عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَاصِمِ بْنِ عُمَرَ، عَنْ عُمَرَ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «إِذَا أَقْبَلَ اللَّيْلُ وَأَدْبَرَ النَّهَارُ، وَغَابَتِ الشَّمْسُ فَقَدْ أَفْطَرَ الصَّائِمُ» لَمْ يَذْكُرْ ابْنُ نُمَيْرٍ: «فَقَدْ»

Sahih Muslim#2558

तर्जुमा- हिशाम ने अबु इस्हाक़ से,उन्होंने ह अब्दुल्लाह बिन अबी उफ़ा र अ से रिवायत की,कहा : हम रमज़ान के महीने में रसूलअल्लाह स अ व स के साथ एक सफ़र में थे,जब सूरज ग़ुरूब हो गया तो आपने फ़रमाया:”ए फ़लाँ !नीचे उतर कर हमारे लिए पानी मैं सत्तू मिलाओ”-उस आदमी ने कहा: ए अल्लाह के रसूल!अभी तो आप पर दिन मौजूद है!आप ने फ़रमाया:नीचे उतर कर हमारे लिए सत्तू बनाओ-उसने उतर कर सत्तू बनाए,फिर वो आप की ख़िदमत में पेश किए तो नबी ने नोश फ़रमाया, फिर आप अलैहिस्सलाम ने हाथ से इशारा करते हुए फ़रमाया :”जब सूरज इधर ग़ुरूब हो जाए *और रात इधर से आ जाए* तो हक़ीक़तन रोज़ेदार ने इफ़्तार कर लिया”.

👆यहाँ अहलेसुन्नत की सबसे बड़ी किताब सही मुस्लिम की इस रिवायत से ये बात साबित हो जाती है कि हुज़ूर पाक अलैहिस्सलाम का फ़रमान भी है कि *रात आ जाये तो इफ़्तार कर लेना चाहिए* और आम तौर पर जब लोग रोज़ा खोलते हैं तो वो वक़्त रात का नही बल्कि शाम का होता है जिसका हुक्म न क़ुरआन में है ना हदीस मैं।

*एक जगह और मुलाहिज़ा फरमाईये👉*

وحَدَّثَنَا أَبُو كُرَيْبٍ، أَخْبَرَنَا ابْنُ أَبِي زَائِدَةَ، عَنِ الْأَعْمَشِ، عَنْ عُمَارَةَ، عَنْ أَبِي عَطِيَّةَ، قَالَ: دَخَلْتُ أَنَا وَمَسْرُوقٌ، عَلَى عَائِشَةَ رَضِيَ اللهُ عَنْهَا، فَقَالَ لَهَا مَسْرُوقٌ: رَجُلَانِ مِنْ أَصْحَابِ مُحَمَّدٍ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، كِلَاهُمَا لَا يَأْلُو عَنِ الْخَيْرِ، أَحَدُهُمَا «يُعَجِّلُ الْمَغْرِبَ وَالْإِفْطَارَ»، وَالْآخَرُ يُؤَخِّرُ الْمَغْرِبَ وَالْإِفْطَارَ، فَقَالَتْ: مَنْ يُعَجِّلُ الْمَغْرِبَ وَالْإِفْطَارَ؟ قَالَ: عَبْدُ اللهِ، فَقَالَتْ: «هَكَذَا كَانَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَصْنَعُ»
Sahi Muslim #2557

तर्जुमा- हज़रत आएशा र अ के पास सहाबी तशरीफ़ लाये और उन्होंने हज़रत आएशा र अ से सवाल किया  कि मोहम्मद स अ व स के सहाबा मै से दो आदमी हैं उनमें से एक *मग़रिब की नमाज़ अदा करने फिर रोज़ा खोलने में जल्दी करता है* और दूसरा मग़रिब की नमाज़ और रोज़ा खोलने में ताख़ीर करता है।उस पर उन्होंने पूछा:*मग़रिब की नमाज़ और फिर इफ़्तार कौन करता है?* उन्होंने जवाब दिया अब्दुल्लाह र अ।तो *हज़रत आएशा र अ ने फ़रमाया : रसूलअल्लाह सअ व स भी इस ही तरह(मग़रिब की नमाज़ फिर इफ़्तार)किया करते थे।*

*👆यहाँ अल्हम्दुलिल्लाह क़ुरआन व अहादीस से हमें अब ये बात साबित हो गयी है कि हमें रोज़ा इफ़्तार शाम में नही बल्कि रात की शुरुआत में करना चाहिए, और इसका सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि पहले सिर्फ़ मग़रिब की नमाज़ अदा की जाए और फिर फ़ौरन रोज़ा इफ़्तार करना चाहिए।*

Sayeda Fatima Al zehra (S.a) ki Rooh e Mubarak ko kisne Qabz Kiya ?

*Sayyeda Fatima Ki Rooh e Paak Khud Allah Paak Ne Qabz Farmayi*

Hazrat Allama Ismaile Haqqi Rehmatullah Alaih Likhte Hain Ki :- Jab Khuda Ta’ala Ne Malkul Maut Ko Hazrat Sayyeda Fatima Zahra Salamullah Alaiha Ki Rooh Kabz Karne Ke Liye Bheja To Wo Is Par Razi Na Hui Toh Fir Khuda Ta’ala Ne Hazrat e Fatima Zahra Salamullah Alaiha Ki Rooh e Paak Khud Kabz Farmayi.

📚 *Reference* 📚
Tafseer Roohul Bayan, Jild 3, Safa 403.