
अंबिया-ए-किराम (अलैहिमुस्सलाम) की दावत और उनकी उम्मतों के दरमियान रिश्ते की एक बुनियादी खूबी ये रही है कि उन्होंने अपनी खिदमते-ए-खुदा और तब्लीग के बदले कभी दुनियावी माल या उजरत की मांग नहीं की। कुरआन मजीद में हजरत नूह, हजरत हूद, हजरत सालेह, हजरत लूत और हजरत शुऐब (अलैहिमुस्सलाम) की जुबान से बार-बार यही अल्फाज दोहराए गए हैं:
“और मैं इस पर तुमसे कोई अज्र (बदला) नहीं मांगता, मेरा अज्र तो तमाम जहानों के रब के जिम्मे है।” (सूरह शूआरा)
तमाम अंबिया के मामले में ये उसूल आम रहा कि उनका अज्र सीधे अल्लाह तआला के सुपुर्द था। लेकिन जब बात खातिमुल अंबिया हजरत मुहम्मद मुस्तफा ﷺ की आती है, तो अल्लाह तआला ने नबूवत के इस सिलसिले में एक ऐसी मुनफरिद और खूबसूरत राह निकाली, जिसने उम्मत को अपने नबी के साथ मोहब्बत का एक अमली और अजीम पैमाना अता कर दिया।
अल्लाह तआला ने सूरा आ-शूआरा (आयत 23) में अपने महबूब नबी ﷺ की जुबान से उम्मत के सामने एक मुतालबा रखा, जो किसी और नबी की शान में नाजिल नहीं हुआ:
“कुल् ला अस्अलुकुम अलैहि अज्रन इल्लल मवद्दता फिल कुर्बा” (आप कह दीजिए कि मैं इस पर तुमसे कोई बदला नहीं मांगता, सिवाय इसके कि मेरे कराबत (खानदान व औलाद) से मोहब्बत रखो।)
ये आयत-ए-मुबारक अपने अंदर एक गहरा फिक्री और रूहानी पहलू समेटे हुए है। जहाँ तमाम अंबिया ने उम्मत से किसी किस्म के ताल्लुक या अज्र की शर्त नहीं रखी, वहीं हुजूर ﷺ की risalat (रिसालत) के साथ यह जोड़ दिया गया कि यदि तुम इस अजीम एहसान (हिदायत) का कोई बदला चुकाना चाहते हो, तो उसकी सूरत ये है कि मेरे अहले-बैत और मेरी औलाद के साथ मोहब्बत का ताल्लुक कायम रखो।
तारीख और तफसीर के मुतालिक ये हकीकत अपनी जगह बिल्कुल वाज़ेह है कि किसी भी दूसरे पैगंबर की औलाद या खानदान को ‘अज्रे-नबूवत’ (नबूवत के बदले के तौर पर) उम्मत के लिए मोहब्बत का मरकज नहीं बनाया गया।
हजरत नूह (अलैहिसलाम) का बेटा उनके दीन पर न रह सका, हजरत इब्राहिम (अलैहिसलाम) के वालिद और खानदान का कुछ हिस्सा हक से दूर रहा—यानि दीगर अंबिया के यहां औलाद या खानदान की मोहब्बत को दीन का हिस्सा या अज्र करार नहीं दिया गया।
ये सिर्फ और सिर्फ सैय्यदुल आलम हजरत मुहम्मद मुस्तफा ﷺ का खुसूसी एजाज (विशेष गौरव) है कि आप की औलाद, आपके और आपके खानदान से मोहब्बत को ईमान की अलामत और नबी के हक की अदायगी करार दिया गया।
अज्र का असल फायदा किसका है?
इस आयत के अगले हिस्से में अल्लाह तआला ने खुद ये वाजेह कर दिया कि अहले-बैत से मोहब्बत का ये हुक्म दरअसल नबी के फायदे के लिए नहीं, बल्कि खुद उम्मत की भलाई के लिए है:
“और जो कोई भलाई कमाएगा, हम उसके लिए उसमें खूबी और बढ़ा देंगे।” (सूरह शूआरा: 23)
यानि अहले-बैत से मोहब्बत करना, उनकी इज्जत करना और उनके नक्श-ए-कदम पर चलना, दरअसल उम्मत के लिए खुद जन्नत का रास्ता आसान करने और अपनी आखिरत को सँवारने का जरिया है।
नबी-ए-करीम ﷺ को अल्लाह ने खुद ही सब कुछ अता कर रखा है, लेकिन उम्मत को एक वसीला दे दिया गया कि वो अपनी नस्लों को नबी के घरवाने से जोड़कर ईमान की मिठास हासिल करें।
ये मुनफरिद मकाम इस बात की गवाही देता है कि हुजूर ﷺ का खानदान और आपकी औलाद सिर्फ खून का रिश्ता नहीं, बल्कि इस उम्मत के लिए हिदायत, तालीम और रूहानी सुकून का एक ऐसा दरिया है जो कयामत तक जारी रहेगा।

