अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 74 सलाम बिन अबी हुक़ैक़ का क़त्ल



1. सलाम बिन अबी हुक़ैक़ का क़त्ल

सलाम बिन अबी हुक़ैक़ का उपनाम अबू राफ़ेअ था, यहूदियों के उन बड़े अपराधियों में था, जिन्होंने मुसलमानों के खिलाफ मुश्रिकों को भड़काने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था और माल और रसद से उनकी मदद की थी।

इसके अलावा रसूलुल्लाह सल्ल० को कष्ट भी पहुंचाया था, इसलिए जब मुसलमान बनू कुरैज़ा से फ्रारिग़ हो चुके, तो क़बीला खज़रज के लोगों ने रसूलुल्लाह सल्ल० से उसके क़त्ल की इजाज़त चाही। चूंकि इससे पहले काब बिन अशरफ का क़त्ल क़बीला औस के कुछ सहाबियों के हाथों हो चुका था, इसलिए क़बीला खज़रज की ख्वाहिश थी कि ऐसा ही कोई कारनामा हम भी अंजाम दें। इसलिए उन्होंने इजाज़त मांगने में जल्दी की।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें इजाज़त दे दी, लेकिन ताकीद फ़रमा दी कि औरतों और बच्चों को क़त्ल न किया जाए। इसके बाद पांच आदमियों पर आधारित एक छोटी से टुकड़ी अपनी मुहिम पर रवाना हुई। ये सबके सब क़बीला खज़रज की शाखा बनू सलमा से ताल्लुक रखते थे और उनके कमांडर हज़रत अब्दुल्लाह बिन अतीक थे ।

इस टुकड़ी ने सीधे ख़ैबर का रुख किया, क्योंकि अबू राफ़ेअ का क़िला वहीं था। जब क़रीब पहुंचे तो सूरज डूब चुका था और लोग अपने ढोर-डंगर लेकर वापस हो चुके थे। अब्दुल्लाह बिन अतीक ने कहा, तुम लोग यहीं ठहरो, मैं जाता हूं और दरवाज़े के पहरेदार के साथ कोई चुभता बहाना अपनाता हूं, मुम्किन है अन्दर हो जाऊं ।

इसके बाद वह तशरीफ़ ले गए और दरवाज़े के क़रीब जाकर सर पर कपड़ा डालकर यों बैठ गए, जैसे ज़रूरत पूरी कर रहे हैं। पहरेदार ने ज़ोर से पुकारकर कहा, ओ ऐ अल्लाह के बन्दे ! अगर अन्दर आना हो तो आ जाओ, वरना मैं दरवाजा बन्द करने जा रहा हूं।

अब्दुल्लाह बिन अतीक कहते हैं मैं अन्दर घुस गया और छिप गया। जब सब

1. देखिए फत्हुल बारी 7/343

लोग अन्दर आ गए तो पहरेदार ने दरवाजा बन्द करके एक खूंटी पर चाबियां हो गया तो मैंने उठकर चाबियां लीं लटका दीं। (कुछ देर बाद जब हर ओर सुकून और दरवाज़ा खोल दिया। अबू राफ़ेअ ऊपर छत पर रहता था और वहां मज्लिस जमा करती थी। जब मज्लिस के लोग चले गए तो मैं उसके कोठे की ओर चढ़ा । मैं जो कोई भी दरवाज़ा खोलता था, उसे अन्दर की ओर से बन्द कर लेता था ।

मैंने सोचा कि अगर लोगों को मेरा पता लग भी गया, तो अपने पास उनके पहुंचने से पहले पहले अबू राफ़ेअ को क़त्ल कर लूंगा। इस तरह मैं उसके पास पहुंच तो गया (लेकिन) वह अपने बाल-बच्चों के बीच एक अंधेरे कमरे में था और मुझे मालूम न था कि वह उस कमरे में किस जगह है |

इसलिए मैंने कहा अबू राफ़ेअ !

उसने कहा, यह कौन है ?

मैंने झट आवाज़ की तरफ़ लपक कर उस पर तलवार की एक चोट लगाई, लेकिन मैं उस वक़्त हड़बड़ाया हुआ था, इसलिए कुछ न कर सका। इधर उसने ज़ोर की चीख मारी। मैं झट कमरे से बाहर निकल गया और ज़रा दूर ठहरकर फिर आ गया और (आवाज़ बदलकर बोला-

अबू राफ़ेअ ! यह कैसी आवाज़ थी ?

उसने कहा, तेरी मां बर्बाद हो। एक आदमी ने अभी मुझे इस कमरे में तलवार मारी है।

अब्दुल्लाह बिन अतीक कहते हैं कि अब मैंने एक जोरदार चोट लगाई, जिससे वह खून में लत-पत हो गया, लेकिन अब भी मैं उसे क़त्ल न कर सका था, इसलिए मैंने तलवार की नोक उसके पेट पर रखकर दबा दिया और वह उसकी पीठ तक जा रहा। मैं समझ गया कि मैंने उसे क़त्ल कर दिया है, इसलिए अब मैं एक-एक दरवाजा खोलता हुआ वापस हुआ और एक सीढ़ी के पास पहुंचकर यह समझते हुए कि ज़मीन तक पहुंच चुका हूं, पांव रखा, तो नीचे गिर पड़ा। चांदनी रात थी, पिंडुली सरक गई। मैंने पगड़ी से उसे कस कर बांधा, और दरवाज़े पर आकर बैठ गया और जी ही जी में कहा कि आज जब तक यह मालूम न हो जाए कि मैंने उसे क़त्ल कर दिया है, यहां से नहीं निकलूंगा ।

चुनांचे मुर्ग ने जब बांग दी तो मौत की ख़बर देनेवाला क़िले की दीवार पर चढ़ा और ऊंची आवाज़ से पुकारा कि मैं हिजाज़ वालों के ताजिर (व्यापारी) अबू राफ़ेअ की मौत की ख़बर दे रहा हूं।

अब मैं अपने साथियों के पास पहुंचा और कहा, भाग चलो। अल्लाह ने अबू

अर-रहीकुल मख़्तूम

राफ़ेअ का काम तमाम कर दिया। चुनांचे मैं नबी सल्ल० की खिदमत में हाज़िर हुआ और आपको पूरी बात बताई, तो आपने फ़रमाया, अपना पांव फैलाओ ।

मैंने अपना पांव फैलाया। आपने उस पर अपना मुबारक हाथ फेरा, फिर ऐसा लगा, जैसे कोई पीड़ा थी ही नहीं।

यही सहीह बुखारी की रिवायत है। इब्ने इस्हाक़ की रिवायत यह है कि अबू राफ़ेअ के घर में पांचों सहाबी घुसे थे और सबने उसके क़त्ल में शिर्कत की थी और जिस सहावी ने उसके ऊपर तलवार का बोझ डालकर क़त्ल किया था, वह हज़रत अब्दुल्लाह बिन उनैस थे 1

उस रिवायत में यह भी बताया गया है कि उन लोगों ने अबू राफ़ेअ को रात में क़त्ल कर दिया और अब्दुल्लाह बिन अतीक की पिंडुली टूट गई तो उन्हें उठा लाए और क़िले की दीवार के आर-पार एक जगह चश्मे की नहर गई हुई थी, उसी में घुस गए।

उधर यहूदियों ने आग जलाई और हर ओर दौड़-दौड़कर देखा, जब निराश हो गए तो मक्तूल के पास वापस पलट आए।

सहाबा किराम रजि० वापस हुए तो हज़रत अब्दुल्लाह बिन अतीक को लादकर रसूलुल्लाह सल्ल० की खिदमत में ले आए। 2

इस सरीया (फ़ौजी मुहिम) की रवानगी ज़ीक़ादा या जिलहिज्जा सन् 05 हि० में अमल में आई थी

जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अहज़ाब और कुरैज़ा की लड़ाइयों से फ़ारिग़ हो गए और जंगी अपराधियों से निमट चुके तो उन क़बीलों और बहुओं को सिखाने के लिए हमले शुरू किए जो सुख-शान्ति स्थापित नहीं होने दे रहे थे और ताक़त के इस्तेमाल के बग़ैर शांत नहीं रह सकते थे ।

नीचे इसी सिलसिले की लड़ाइयों और मुहिमों का थोड़े में ज़िक्र किया जा रहा है।

1. सहीह बुखारी 2/577

2. इब्ने हिशाम 2/274, 275 3. रहमतुल लिल आलमीन 2/223, और ग़ज़वा अहज़ाब में बताये गए दूसरे स्रोत

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