
वसीयत : इमाम अली इब्ने अबीतालिब अ०
19 रमज़ान सन 40 हिजरी :
अली इब्ने अबीतालिब अ० के सर पर, मस्जिद ए कूफा़ मे अब्दुल रहमान इब्ने मुल्जिम लानती ने ज़हर आलूद तलवार का वार किया और ज़ख़्मी अली इब्ने अबीतालिब अ० को उनके घर ले आया गया तो उसके बाद आप 21 रमज़ान तक हयात रहे और 21 को आपने इस दारे फ़ानी को अलविदा कहा। इस दौरान आपने अपनी औलाद और चाहने वालोंं को कुछ वसीयतें कीं । उनके कुछ ख़ास हिस्से –
ऐ मेरी औलादों, मेरे रिश्तेदारों, मेरे चाहने वालोंं और जहाँ तक मेरी ये बात जाए सुनो और इस पर अमल करो-
1) अल्लाह का तक़वा एख़्तियार करो और अपने दीन पर साबित क़दम रहो। इस दुनिया की चाहत ना करो और इसके जाल मे मत फँसना। कोई चीज़ ना हासिल होने का मलाल ना करना। सच पर क़ायम रहो और आख़िरत की तैयारी करो। ज़ालिम की मुख़ालिफ़त और मज़लूम की हिमायत करो।
2) अपने इख़्तेलाफ़ात को दूर करो और इत्तेहाद को मज़बूत करो। मैंने रसूल अल्लाह से सुना है, “सुलह तमाम नमाज़ और रोज़ो से बेहतर है।” (यहां फ़र्ज़ नमाज़ ओ रोज़े मुराद नहीं हैं बल्कि तमाम मुस्तहब नमाज़ ओ रोज़े की बात है)।
3) यतीमों के बारे मे अल्लाह का ख़ौफ़ करो, उनकी ज़रूरियात का ख़्याल रखो और अपने रोज़ाना ज़रूरियात मे उनको ना भूल जाना।
4) पड़ोसियों से रिश्ते के बारे मे अल्लाह का ख़ौफ़ करो, तुम्हारे रसूल आमतौर पर उनके बारे मे इरशाद करते रहते थे और यहाँ तक कहते थे कि हमें लगने लगा कि मीरास मे उनको हक़दार बना देंगे।
5) अपनी इबादत के बारे मे अल्लाह का ख़ौफ़ करो, ये तुम्हारे दीन का सुतून है।
6) क़ुरान से वाबस्तगी क़ायम रखो। कोई भी तुमसे ज़्यादा उससे वाबस्तगी मे आगे नहीं जाना चाहिए ना ही इस पर अमल के मामले मे।
7) ख़ाना ए काबा के बारे मे अल्लाह का ख़ौफ़ करो। इसको मत छोड़ना जब तक ज़िंदा रहना। अगर इसको छोड़ दिया तो गोया तुमने अपना वक़ार (प्रतिष्ठा) छोड़ दिया।
8) अल्लाह की राह मे जिहाद पर क़ायम रहना- अपनी ज़बान, माल और नफ्स के ज़रिये।
9) अपने दरम्यान बातचीत और तबादला ए ख़्याल जारी रखना । होशियार रहना, इख़्तेलाफ़ात और दुश्मनी से। अच्छे कामों को बढ़ाने, उनके करने वालों का हौसला बढ़ाने और बुराई से रोकने मे पीछे ना रहना। गर तुमने ऐसा नहीं किया तो बदतरीन तुम्हारे रहबर बन जाएंगे और तुम अल्लाह को आवाज़ दोगे लेकिन सुनवाई ना होगी।
10) ऐ औलाद ए अब्दुल मुत्तलिब इस परचम के नीचे मुसलमानो का ख़ून मत बहाना कि ” इमाम क़त्ल कर दिए गए, सिर्फ़ क़ातिल को क़त्ल किया जाए।” गर मैं, अली इब्ने अबीतालिब इस ज़ख़्म से शहीद हो जाऊँ तो क़ातिल को इसी तरह सिर्फ़ एक ज़रबत से क़त्ल करना और उसके जिस्म की बेअदबी ना करना (टुकड़ो मे ना बाँटना, तहक़ीर मत करना) क्योंकि मैंने रसूल अल्लाह से सुना है कि पागल कुत्ते के जिस्म की भी तहक़ीर नहीं करनी चाहिए।
तमाम दुश्मनाने अली पर अल्लाह की बेशुमार लानत

