Hazrat Abdullah Shah Ghazi

 The shrine of Abdullah Shah Ghazi in Karachi, Pakistan. Abdullah Shah Ghazi (Arabic: عبد الله شاه غازي‎) was an eighth century Muslimmystic whose shrine is located in the Clifton neighbourhood of Karachi, Pakistan.

हज़रतसैय्यदनाअब्दुल्लाहअलअशतरउर्फ़ (अब्दुल्लाहशाहग़ाज़ी) बिनसैय्यदनामोहम्मदज़िउन्नफ़्सअज़ज़कियारहमतउल्लाहअलैहपैदाइशऔरनामसन् (120) हिजरी मे हज़रत सैय्यदना अबु मोहम्मद अब्दुल्लाह अल अशतर रहमतउल्लाह अलैह ने हज़रत सैय्यदना मोहम्मद ज़िउन्नफ़्स अज़ ज़किया रज़िअल्लाह तआला अन्हु के यहाँ मदीना मुनव्वरा मे आँखे खोली! आपका नाम अब्दुल्लाह कुन्नियत अबु मोहम्मद और लक़ब अल अशतर पड़ा! तारीखों से पता चलता है कि आपकी तालीम व तरबियत आपके वालिद साहब हज़रत नफ़्से ज़किया और दादा हज़रत अब्दुल्लाह अल महज़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु के ज़ेरेसाया मदीना मुनव्वरा मे ही हुई और कुछ मुअर्रिख़ ये भी बयान करते हैं कि आपकी परवरिश हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ रज़िअल्लाह अन्हु के आग़ोशे रहमत मे हुई है! आप इल्मे हदीस पर उबूर रखते थे और मोहद्दिस थे!

नसबमुबारक हज़रत अबु मोहम्मद अब्दुल्लाह अल अशतर उर्फ़ अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी बिन हज़रत इमाम मोहम्मद नफ़्से ज़किया बिन हज़रत अब्दुल्लाह अल महज़ बिन हज़रत हसन मुसन्ना बिन हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम बिन हज़रत जनाब सैय्यदा फ़ातिमा रज़िअल्लाह तआला अन्हा बिन्त हुज़ूर पुर नूर जनाब मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम! जबकि आपकी वालिदा की तरफ़ से आपका शज्रह नसब इस तरह है- हज़रत अबु मोहम्मद अब्दुल्लाह अल अशतर उर्फ़ अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी बिन सैय्यदा सलमह बीबी बिन्त हज़रत मोहम्मद रज़िअल्लाह अन्हु बिन हज़रत हसन मुसन्ना अलैहिस्सलाम बिन हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम बिन हज़रत जनाब सैय्यदा फ़ातिमा रज़िअल्लाह तआला अन्हा बिन्त हुज़ूर पुर नूर जनाब मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम!

आपकीसिंधआमदआपके वालिद मोहतरम जनाब सैय्यदना मोहम्मद ज़िउन्नफ़्स अज़ ज़की रज़िअल्लाह तआला अंन्हु ने (138) हिजरी मे जब अलवी ख़िलाफ़त की तहरीक शुरु की तो आपको इसकी तरग़ीब और इस्लाम की तब्लीग़ के लिये सिन्ध के तरफ़ रवाना किया! हज़रत अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी रहमतउल्लाह अलैह पहले मदीना से बसरह तशरीफ़ ले गए और कुछ दिन अपने चचा सैय्यदना इब्राहीम के पास बसरह मे ठहरे, फिर वहाँ से होते हुए समंदर का दुशवार तरीन सफ़र तय करते हुए सिंध तशरीफ़ लाए! सरज़मीने सिंध भी इस्लाम के नाम पर क़ाबिज़ अब्बासी हुक्मरानों के ज़ेरे तसल्लुत थी! सैय्यदना अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी के आमद के वक़्त ख़लीफ़ा मंसूर अब्बासी के तरफ़ से अम्र बिन हफ़्स सिंध के गवर्नर थे, लिहाज़ा आपके लिये यहाँ भी तबलीग़ के ज़रिये दीन-ए-हक़ पहुचाना कोई आसान बात न थी और वो अब्बासी दौर-ए-हुकूमत मे इन्तेहाई मतलूब थे! लिहाज़ा हज़रत अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी रहमतउल्लाह अलैह पैग़ामे करबला को मोअस्सर तरीक़े से पहुँचाने के लिये बतौर घोड़े के ताजिर सिंध मे दाख़िल हुए (वो घोड़े आपने अपने कमोबेश बीस मुरीदों से ख़रीदे थे) और गवर्नर सिंध अम्र बिन हफ़्स से मुलाक़ात किया! अम्र बिन हफ्स जो मोहब्बत अहले बैत दिल मे रखते थे, ख़ानदाने अहले बैत की ख़िदमत को बाइसे अज्र समझते थे, उन्होंने आपको तिजारत के सिलसिले मे तमाम सहूलत मुहैया कराई! हज़रत अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी रहमतउल्लाह अलैह ने तिजारत के शक्ल मे अपना अस्ल काम शुरू कर दिया और पैग़ामे हुसैनी को पहुँचाने मे दिन रात कोशा रहे जिससे सिंध मे बहुत से मोहिब्बाने अहले बैत सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पैरोकारो मे इज़ाफ़ा होता चला गया!

गवर्नरेसिंधकीताज़ीमऔरआपसेबैअत गवर्नरे सिंध अम्र बिन हफ़्स को जब इस बात की ख़बर हुई तो वो इस काविश मे आपके साथ हो गए और आपके हाथो पर बैअत कर लिया, जिससे दिन ब दिन मोहिब्बाने अहले बैत मे इज़ाफ़ा होता चला गया! गवर्नरे सिंध आपका हद दर्जे एहतिराम बजा लाता और आपसे मोहब्बत का मुज़ाहिरा पेश करता रहता था! इसी दौरान आप रहमतउल्लाह अलैह को ये ख़बर मिली कि आपके वालिदे मोहतरम जनाब इमाम नफ्से ज़किया रज़िअल्लाह तआला अन्हु को 145 हिजरी मे मदीना मे और आपके चचा हज़रत इब्राहीम रज़िअल्लाह तआला अन्हु को बसरह मे सदा-ए-हक़ बुलन्द करने के जुर्म मे शहीद कर दिया गया! (जिसका तफ़्सीली ज़िक्र पहले हो चुका है )

अबुजाफ़रमंसूरकाआपकेगिरफ़्तारीकाहुक्मऔरआपकासाहिलीहुकूमतपरहिजरतकरना हज़रत अब्दुल्लाह शाह गाज़ी रहमतउल्लाह अलैह के वालिद साहब और चचा के शहादत के बाद अब्बासी ख़लाफ़त के मरकज़ (ख़लीफ़ा मंसूर) से आपकी गिरफ्तारी का अहकाम सादिर हुआ मगर आपके हिस्से मे भी मैदाने जंग मे शहादत लिखी जा चुकी थी लिहाज़ा आपकी गिरफ़्तरी तो अमल मे नही आ सकी! हज़रत अम्र बिन हफ़्स (गवर्नरे सिंध) आपकी गिरफ़्तारी के मामले को मुसलसल टालते रहे, इनका ख़्याल था कि इस तरह कुछ वक़्त गुज़र जाएगा और ख़लीफा मंसूर आपकी गिरफ्तारी को भूल जाएगा मगर मंसूर के दिल मे एक लम्हा के लिये हज़रत अब्दुल्लाह शाह गाज़ी रहमतउल्लाह अलैह कि गिरफ़्तारी का ख़्याल मानिंद नही पड़ा और वो मुसलसल गवर्नरे सिंध के पास आपके गिरफ़्तरी का अहकाम भेजता रहा!

हज़रत अब्दुल्लाह शाह अशतर रहमतउल्लाह अलैह की हिफ़ाज़त के लिये अम्र बिन हफ़्स ने अपने दानिस्त मे आपको साहिली हुकूमत मे पहुँचा दिया, वहाँ का राजा जो हिंदु था मगर नबी पाक सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से बहुत ज़्यादा अक़ीदत रखता था इसी सबब उसने हज़रत अब्दुल्लाह शाह अशतर रहमतउल्लाह अलैह को शहज़ादो के तरह रखा और वो आपकी बहुत इज़्ज़त और ऐहतिराम बजा लाता था!

हज़रत अम्र बिन हफ़्स अपने दानिस्त मे हज़रत अब्दुल्लाह शाह अशतर रहमतउल्लाह अलैह को एक महफ़ूज़ मुक़ाम पर पहुँचा चुके थे मगर मंसूर को किसी न किसी ज़रिये से इस बात की ख़बर लग गयी और उसने अम्र बिन हफ़्स से मुतालबा कर दिया कि अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी रहमतउल्लाह अलैह का सर या ख़ुद अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी रहमतउल्लाह अलैह को बग़दाद भेज दो!  

हज़रतअम्रबिनहफ़्सकागवर्नरीसेमाज़ूलीहज़रत अम्र बिन हफ़्स का मुसलसल अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी रहमतउल्लाह अलैह के गिरफ़्तारी को टालने के वजह से मंसूर ने बिल आख़िर अम्र बिन हफ़्स को सिंध की गवर्नरी से माज़ूल करके अफ़रीक़ा भेज दिया और आपके जगह 146 हिजरी मे हिश्शाम को सिंध का गवर्नर बना दिया! ख़लीफ़ा मंसूर ने हिश्शाम को भी वही ताक़ीद की कि अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी रहमतउल्लाह अलैह को ज़िन्दा या मुर्दा फ़ौरन पेश किया जाए अगर सिंध का कोई राजा इन्कार करे तो उसपर हमला करके उसके इलाक़े पर कब्ज़ा कर लिया जाए! दूसरी तरफ़ सैय्यदना अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी रहमतउल्लाह अलैह राजा की पनाह मे मुकम्मल आज़ादी के साथ अपना काम करते रहे ज़ैदिया फ़िर्क़े के लोग भी सैय्यद के ताबे थे उन्होंने भी यहीं पनाह ली! ‘ड़ा. मिर्ज़ा इमाम अली बेग’ अपनी किताब ‘सिंध जी अज़ादारी’ मे लिखते है कि हिश्शाम जब सिंध मे दाख़िल हुआ तो उसने हिंदु राजा को तलब करके अब्दुल्लाह शाह अशतर रहमतउल्लाह अलैह के हवाल्गी का मुतालबा किया मगर राजा ने इन्कार कर दिया! हिश्शाम इस सोच मे था कि मंसूर के हुक्म पर किस तरह अमल किया जाए चूंकि हिश्शाम ख़ुद भी ख़ानदाने अहले बैत के मुहिब थे वो इस बात को गवारा नही कर सकते थे कि सैय्यदुन्निसा आलमीन सलामउल्लाह अलैहा की ज़िंदा जावेद निशानी को मौत के हवाले किया जाए काफ़ी सोच और फ़िक़्र के बाद सिंध के तमाम शहरों और फ़ौजी हलकों मे मशहूर कर दिया गया कि अब्दुल्लाह शाह अशतर रहमतउल्लाह अलैह के बारे मे राजा से मुज़ाकरात जारी है और ख़लीफ़ा मंसूर को भी यही पैग़ाम भेज दिया गया!

सिंधमेइस्लामकीतबलीग़जैसा की पहले सिन्ध की तारीख़ मे ज़िक्र हो चुका है कि सहाबाकिराम के बाद कोई इस्लाम की तालीम देने या तबलीग़ करने सिंध नही आया था (उमवी और अब्बासी हुक्मरानों के तरफ़ से जो गवर्नर यहाँ नामज़द हुए भी तो उनका काम इस ख़ित्ते पर अपनी मुकम्मल हुकूमत क़ायम करना था) सिवाए हज़रत सैय्यदना अब्दुल्लाह शाह अशतर रहमतउल्लाह अलैह के कि जिन्होंने सिंधियो के बंजर दिल के ज़मीन मे सबसे पहले इस्लामी बीज बोया फिर इसकी आबयारी की और मोहब्बत और बुर्दबारी से दिलों को गरमाया और ईमान की ज़रख़ेज़ी से रोशनास कराया इसलिये जो काम इनके ज़िम्मे था वो सिर्फ़ ज़ाहिर से नही होसकता था तारीख़ को रुख़ अता करने वाले ज़ाहिर के साथ बातिन के दुनिया के शहसवार भी होते है जिनकी ज़ाहिर पर कम और बातिन पर ज़्यादा ज़ोरावर तवज्जो होती है!

असबाबग़ैबदरअस्ल इन हस्तियों के लिये इस दारुल अमल मे जिस जगह का इन्तख़ाब होता है वहाँ इनके लिये असबाब भी मुहैया होते है (गवर्नरे सिंध हज़रत अम्र बिन हफ़्स का मतीअ होना और आप रहमतउल्लाह अलैह की गिरफ़्तारी के ख़लीफ़ा मंसूर के अहकमात टालना, आपको बहिफ़ाज़त दूसरी रियासत मे भेजना ये सब ग़ैबी अआनत थी और आपके अमल की ताएद थी) अगर्चे अब्बासी ख़लीफ़ा मंसूर आप समेत तमाम सादात के क़त्ल के साज़िश मे था इसे आपकी इत्तिला मिलने पर आपको बारहा गिरफ़्तार करने के अहकमात दिये लेकिन क़ुदरत को जो काम आपसे लेने थे इसके लिये पूरा पूरा ऐहतिमाम किया हुआ था! एक ऐसा गवर्नर सिंध मे मौजूद था जो आपकी ताज़ीम और ख़्याल करता था और किसी क़ीमत पर आपको तकलीफ़ न पहुँचाता था बल्कि इन नेक बख़्त गवर्नर यानी अम्र बिन हफ़्स ने आपके हाथ पर बैअत भी करली थी और दरपर्दाह आपकी हिमायत करता था!

सैरोशिकारतारीख़ से साबित है कि उस ज़माने मे जब सैय्यदना शाह अब्दुल्लाह अल अशतर सैरो-शिकार के ग़रज़ से कही जाते थे तो शान व शौक़त और कारोफ़र से जाते और साज़ो सामान भी साथ होता था जिससे आपकी शान व शौक़त का इज़हार होता था और ये ग़ालिबन इस लिये भी था कि आपके दरवेशी पर अमारत का पर्दा पड़ा रहे और जो अमानत आपके सुपुर्द थी आपके सीने मे महफूज़ रहे!

शहादतहिश्शाम का भाई सफ़ीह बिन अमरू जो कि मंसूर का ख़ास ताबेदार था उसने सैय्यदना शाह अब्दुल्लाह अल अशतर पर जो कि अपने कुछ साथियों के साथ थे हमला कर दिया! आप रहमतउल्लाह अलैह ने भागने के बजाए मर्दानावार मुक़ाबला किया! ”तारीख़ शियाने अली” मे ”सैय्यद अली हुसैन रिज़्वी” लिखते है कि सैय्यदना अब्दुल्लाह अल अशतर रहमतउल्लाह अलैह ने लाशों के अम्बार लगा दिये और इनके साथी हक़ सरफरोशी अदा करते रहे मगर आख़िरकार इनके तमाम साथी एक एक करके लहू लुहान होकर गिर गए और वो भी ज़ख़्मी होकर लाशों के दर्मियान गिर गए और शहीद हो गए, ज़ख़्मी हमराहियों ने आपके जिस्म अनवर को करवट बदल बदल कर अपने कटे-फटे जिस्म के नीचे छुपा दिया ताकि आपका सर मुबारक ख़लीफ़ा मंसूर के पास जाने से बच जाए और वही हुआ सफ़ीह बिन अमरू आपको पहचान भी न सका और ऐसे ही वापस लौट गया!

मज़ारपुरअनवारआपका मज़ार पुर अनवार क्लिफ़्टन (clifton) कराँची पाकिस्तान मे समुन्द्र के किनारे है और आज तक आपके मज़ार पर अक़ीदतमंदो का रश लगा रहता है और ज़ायरीन पूरे दुनिया से हाज़िरी देते हैं जहां पर समुन्द्र के किनारे होने के बावजूद आपके करामात के बाइस मीठे पानी का चश्मा जारी और सारी है और जो तक़रीबन बारह सौ अस्सी (1280) साल से मुसलसल जारी और सारी है और आज तक न सूखा और न कम पड़ा!

बिलावलभुट्टोज़रदारीऔरआसिफ़ज़रदारीहज़रतअब्दुल्लाहशाहग़ाज़ीरहमतउल्लाहअलैहकीमज़ारमुबारकपरचादरचढ़ातेहुए!

इनसेभीफ़ैज़याबहुएंलोगबेशतर

कहतेहैइन्हेंसबअहलेज़माँअब्दुल्लाहअलअशतर

हुक्मरानीहुकूमत दो क़िस्म की होती है एक ख़ित्ते पर और दूसरी हुकूमत जो हक़ीक़ी हुकूमत है वो क़ुलूब पर होती है! हज़रत सैय्यदना अब्दुल्लाह शाह अल अशतर रहमतउल्लाह अलैह की हुकूमत दोनो पर क़ायम है सारे दफ़्तरान इन्हीं के यहाँ है जहाँ तमाम ज़ाएरीन कि अरज़ियां मौसूल की जाती है और फिर इनपर अहकमात सादिर होते हैं इसका सबूत इनके यहाँ होने वाले उस जम-ग़फ़ीर से है जो हर आने वाले दिन के साथ बढ़ रहा है जुमेरात को तो आप रहमतउल्लाह अलैह के मज़ार की सीढ़ियां भी चढ़ना दुशवार होती है आम अय्याम मे भी ज़ायरीन का ताँता लगा रहता है! अहले पाकिस्तान इस बात को तस्लीम करते हैं कि सरज़मीने सिंध और सरज़मीने कराँची आप रहमतउल्लाह अलैह के रूहानी फ़ैज़ के बदौलत कई समुन्द्री तूफ़ानों से महफ़ूज़ रहे हैं!

उर्समुबारकहज़रत अब्दुल्लाह शाह अल अशतर उर्फ़ अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी रहमतउल्लाह अलैह का विसाल मुबारक 20 ज़िलहिज्ज सन् 153 हिजरी मे हुआ था इसीलिये आपका उर्स मुबारक ज़िलहिज्ज की 20,21,22 तारीख़ को हर साल बहुत शानो शौक़त के साथ मनाया जाता है! (तारीख़ सिंध, तारीख़ इब्ने ख़लदून,मजालिस मोमिनीन,आर्टिकल शहीद फ़ाउण्डेशन आफ़ पाकिस्तान)

औलादमुबारकतारीख़ी मुताला से पता चलता है कि आपने दो शादियां फ़रमाई थी! पहली शादी तो आपकी मदीना मुनव्वरा मे सैय्यदा क़ुरैशा बीबी से हुई जिनसे आपके फ़रज़न्द हज़रत सैय्यदना मोहम्मद अल असग़र सानी रहमतउल्लाह अलैह पैदा हुएं (जो तमाम सादात-ए-क़ुत्बिया के जद् आला हैं) दूसरी शादी आपकी सिंध के राजा की बेटी से हुई थी जो आपके ख़िदमत मे रहती थीं जिनके बत्न से आपके एक फ़रज़न्द हज़रत सैय्यदना हसन अल अशतर रहमतउल्लाह अलैह पैदा हुएं (लेकिन आपसे नस्ल आगे नही चली)

हज़रत अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी रहमतउल्लाह अलैह की नस्ल सिर्फ़ आपके फ़र्ज़न्दे अकबर हज़रत सैय्यदना मोहम्मद अल असग़र सानी रहमतउल्लाह अलैह से दुनिया मे क़ायम है!

 

 

Shajra e nasab Aulad Hazrat sarkar Abdullah shah ghazi r.a Ameer kabeer Syed Shah Qutubuddin Muhammad Aquib Qutbi Ashtari Sajjada nasheen Aastana e Aaliya Suherwardia Firdausia kubriwiya Qutbia kabeeriya kada shareef Zila kaushambi u.p India

bismillah

(1) Janab Abi Muhammad Abdullah al ashtar urf abdullah shah ghazi sarkar [r.a.] (cliffton Karachi Pakistan.)
(2).Janab Muhammad al Asghar saani [r.a.] (jannatul baqi shareef Arab)
(3).Janab Hasan Al Abdul Jawwad naqeeb e ashraaf e koofa [r.a.] (koofa.Arab)
(4).Janab Abi muhammad abdullah [r.a.] (jannatul baqi shareef Arab)
(5).Janab Syedna Qasim (r.a.) (jannatul baqi shareef Arab)
(6).Janab Syedna Abu jaafar [r.a.] (jannatul baqi shareef Arab)
(7).Janab Syedna Hasan Al Makni bab ul hasan [r.a.] (jannatul baqi shareef Arab)
(8).Janab Syedna Hussain [r.a.] (jannatul baqi shareef Arab)
(9).Janab Syedna Eisa [r.a.] (jannatul baqi shareef Arab)
(10).Janab Syedna Usuf [r.a.] (jannatul baqi shareef Arab)
(11).Janab Syedna Rasheed Al Deen Ahmad Al Madni Al Gaznavi [r.a.] (Baghdad shareef)
(12).Janab Qutub al aqtaab ghausul aalmeen Ameer Kabeer Syed Shah Qutub Al Deen Muhammad Al Madni Al Hasni Al Husaini [r.a.] fateh kada jadd e aala sadaat e Qutbia Fi Hindustan (kada shareef u.p India)
(13).Janab Syedna Ameer Nizam uddin hasan [r.a.] (kada shareef)
(14).Janab Syedna Ameer Ruqhnuddin [r.a.] (kada shareef)
(15).Janab Syedna Ameer Shah Sadruddin [r.a] (kada shareef)
(16).Janab Syedna Shah Qayamuddin [r.a.] (kada shareef)
(17).Janab Syedna Shah Ziyauddin [ r.a ] (kada shareef)
(18).Janab Syedna Shah Musa [ r.a.] (kada shareef)
(19).Janab Syedna shah Syed miya [ r.a.] (kada shareef)
(20).Janab Syedna Raje Shah [ r.a.] (kada shareef)
(21).Janab Syedna Shah Laad [r.a.] (kada shareef)
(22).Janab Syedna Ameer Shah Muhammad Ismaiel [r.a.] (kurra sadaat fatehpur)
(23).Janab Syedna Ameer Shah Jalaluddin Jalal [ r.a.] (kurra sadaat fatehpur)
(24).Janab Syedna Shah Hamza [ r.a.] (kurra sadaat fatehpur)
(25).Janab Syedna Shah Abdul Rasool [r.a ] (rasoola baad Allahabad)
(26).Janab Syedna Shah Peer muhammad [r.a] (Teele wali masjid Lucknow)
(27).Janab Syedna Muhammad [r.a] (kurra sadaat fatehpur)
(28).Janab Syedna Shah ghulam meer [R.A.] (kurra sadaat)
(29).Janab Syedna Shah Fateh Muhammad [r.a] (kurra sadaat fatehpur)
(30).Janab Syedna Shah Muhammad Hashim [r.a] (kurra sadaat fatehpur)
(31).Janab Syedna Shah Kareem Bakhsh Kurra sadaat Fatehpur)
(32).Janab Syedna Mehdi Bakhsh [r.a] (kurra sadaat fatehpur)
(33).Janab Syedna Shah Abul Hassan Hasni Qutbi shaheed [ r.a] [Writer Tareekh Aaine Awadh] (khankah shareef manikpur u.p India)
(34).Janab Syedna Ahmad Zakiuddin Qutbi [r.a.] (khankah shareef manikpur u.p)
(35).Janab Syed Shah Mohiuddin Qutbi (r.a) (khankah shareef manikpur u.p)
(36). Janab Hakeem Syed Shah Shamsuddin Qutbi Quddasirrahul Aali.(Allahabad U. P India)
(36).Janab Syed Shah Najamuddin Qutbi .(Lucknow U. P India)
(37)Syed shah Ahmed Shafai Qutbi (Phone 8004974849)(S/O Janab Syed Shah Najamuddin Qutbi .(Lucknow U. P India))
(38) Syed Shah Ahmed Zaki Qutbi (Husain) and Syed Shah Ahmed Zain Qutbi (Hamza)(S/O  Syed shah Ahmed Shafai Qutbi)

(37). Ameer kabeer Syed Shah Qutubuddin Muhammad Aquib Qutbi Ashtari Sajjada nasheen Aastana e Aaliya Suherwardia Firdausia kubriwiya Qutbia kabeeriya kada shareef Zila kaushambi u.p India.  (Ba hawala Tareekh Aine awadh, Ansabul Ashraaf, Tazkirah Sadaat e Qutbia,Tasawwuf sindh Abdullah-Shah-Ghazi.) (S/O Janab Hakeem Syed Shah Shamsuddin Qutbi Quddasirrahul Aali.(Allahabad U. P India))

Abdullah Shah Ghazi was the great grandson of the Prophet Muhammad from the linage of Hasan Ibne Ali Ibne Abu Talib[citation needed], making him a member of the Ahl al-Bayt.

The growing popularity of Abdullah Shah caused concern amongst the Ummayyad dynasty who dispatched an army to Sindh. The Ummayyads, and their successors the Abbasids, were known for their hatred of the Banu Hashim (the tribe of Prophet Muhammad and Hadrat Ali ibn Abu Talib) and mercilessly tracked and killed thousands of members of this tribe.

Abdullah Shah was on a hunt in what is now present day Karachi, when the Ummayyad army intercepted his party. Out numbered, Abdullah Shah still chose to fight rather than submit to the Umayyad army. It is because of his display of valor in the face of the Ummayyad army that Abdullah Shah was given the honorable title of “Ghazi” meaning “victorious”.

His shrine in Karachi is dated back to 1400 years ago, his brother, Misry Shah, who is also buried along the coastline in Karachi, is also remembered as a saint.

Many people claim to have been granted their wishes at the shrine and it is the center for people who throng the shrine all year round. Every year marks the Urs (festival) at the shrine for 3 days (dates: 20-22 Dhu al-Hijjah – 12th month of the Islamic calendar), marking the anniversery of Abdullah Shah Ghazi.A famous myth about the mazar is that Karachi never had a tropical disaster in a thousand year because of the shrine’s blessing.

Abdullah Shah Ghazi is revered by both Sunni and Shia alike, however his blood line gives him a special status in the Shia community by some. Muhammad bin Qasim was sent for Abdullah Shah Ghazi in his hunt, however that time Raja Dahir, the ruler of Karachi had hosted Abdullah Shah Ghazi and had denied to turn him over to Qasim. Where Qasim revolted against him, massacring the army of Dahir and martyring Abdullah Shah Ghazi.

 

A VERY FAMOUS AND GREAT MIRACLE AT DARGAH SHAREEF’S WELL : The Dargah Shareef of Hazrat Abdullah Shah Ghazi (RA) is adjacent to sea ( Arbia sea ). The sea water and water of other wells in this area are salty. But the water in Dargah shareef of Hazrat Abdullah Shah Ghazi (RA) is very sweet, which is a great miracle and many people say the holy water of this dargah shareef is a great tabaruk and many people get cure by drinking this water.

 

 

KARAMAT  HAZRAT ABDULLAH SHAH GHAZI ( RAHMATULLAH ALLAIH )

HAZRAT ABDULLAH SHAH GHAZI ( RAHMATULLAH ALLAIH ) is one of the Greatest and Famous Sufi saint. Hazrat Abdullah Shah Ghazi (RA). Belongs to the 4th generation of Hazrat Amir ul Momineen Hazrat Ali Karam Allahu Wajhu. Hazrat Abdullah Shah Ghazi (RA) migrated from Arab to Karachi area and took wisal here.

A VERY FAMOUS AND GREAT MIRACLE AT DARGAH SHAREEF’S WELL : The Dargah Shareef of Hazrat Abdullah Shah Ghazi (RA) is adjacent to sea ( Arbia sea ). The sea water and water of other wells in this area are salty. But the water in Dargah shareef of Hazrat Abdullah Shah Ghazi (RA) is very sweet, which is a great miracle and many people say the holy water of
this dargah shareef is a great tabaruk and many people get cure by drinking this water.

SUCH KARAMATS & FAIZS OF AULIYA ALLAH EXISTS EVEN TODAY :-
It is places of Auliyas ( Great friends of Allah ) where you will find Such Miracles. Below is list of Other Dargah Shareefs where you will find such karmats of Water.

Well at Dargah of Hazrat Daata Ganj Baksh Ali Hajveri (RA), Lahore.

Sweet Water Well at Dargah Hazrat Syed Shareef-ul-Madani ( Qad das Allahu Sirra ul Azeez ) , Ullal Shareef in Karnataka ( where you will find arbian sea adjacent to dargah shareef ) and 10 Lakhs people witnessed the miracle of this well during the urs e shareef when there was shortage of water in the entire ullal. Also there are also many other great miracles of this great Tabayee Hazrat Syed Shareef-ul-Madni ( Qaddas allahu sirra ul azeez ) who came from Madina Shareef.

 

Image may contain: sky and outdoor

Abdullaah Shah Ghazi is one such revered personality who is not only very close to a Holy Masoom lineage wise (he is the fourth descendent of Imam Hasan (AS) and his tree is as follows: Abdullaah Al-Ashtar Ibn-e-Mohammad Nafs-e-Zakayya Ibn-e-Abdullaah Al-Mahaz – Ibn-e-Hasan Al-Muthanna Ibne Imam Hasan (AS).

He is the grand son of Abdullaah al Mahaz.
Abdullaah al- Mahaz s maternal grandfather was Imam Hussain (AS)
Abdullaah al-Mahazs paternal grandfather was Imam Hasan (AS)
Abdullaah al- Mahazs mother was Bibi Fatima Sughra binte Imam Hussain AS.
Abdullaah al -Mahazs father was Hazrat Hasan Muthanna Ibn-e-Imam Hasan (AS)
Abdullaah al-Ashtar was born in 98 Hijra (716 AD) in Madina-tu-Rrasool (SAWW).
In 138 Hijra , Abdullaah al-Ashtar undertook a perilous journey by sea to reach Sindh.

Like some other areas Sindh too was under the dominion of so-called muslim rulers of Abbasid dynasty.

When Syed arrived in Sindh , the area was under the governorship of one Omar Ibn Hafs who was the hand-picked man of Mansoor Abbasi.

Abdullaah Al-Ashtar was among the most wanted men during the reign of Mansoor Abbasi. Hence it was a great challenge for him to preach the message of Hussainiyat in Sindh- an area under the rulership of Abbasids.

However Syed entered Sind as a merchant of horses so that he raises no eyebrows and continued his mission in this guise for a while.

He met the governor , Omar , who also had a considerable love and respect for Ahl-e-Bayt AS unlike other representatives of a normal Abbasid setup. Omar extended great facilitation to Syed and when he formally started preaching Omar also did Syed s Baiyaat.

When he started formal propagation the fertile land of Sindh started to produce devout disciples of Syed filled with the love of Ahlul Bayt (AS) – Something which could be testified even to this date.

In the mean time it was 145 Hijra when Syed learnt that back home in Madina his revered father Hazrat Mohammad Nafs-e-Zakayya Ibne Abdullaah Al- Mahaz has been martyred for raising his voice against the tyranny and for launching a movement against the cursed regime of Abbasid dynasty. Syed s uncle , Ibrahim Ibn-e-Abdullaah Al-Mahaz was also martyred in Basra in the backdrop of same movement.

Now syed became much alarmed and so did the respecting governor Omar Al Hafs. Omar advised Syed to move to one of the Hindu Rajas having his small rulership in one of the frontier(boundary) regions of Sindh.This raja had a special love for Ahlul Bayt AS. Syed ,did early written correspondence with the Raja ,after which Raja invited him over and treated him as princes ,taking care of him very well.

This shows that not only common muslims but hindus of Sindh too ,revered Saadat very much . This raja repeated the history of raja Dahir ,who took the wrath of Ommayyads for protecting Saadat and for denying to hand them over to Ommayyads.

Although Omar ibne Hafs felt contented that the arrangement would work fine ,somehow , Mansoor Abbasi learnt of something going wrong somewhere. He demanded of the governor to either hand over Abdullaah Ashtar to him alive or kill him and send his head to Mansoor in Baghdad.

When mansoor couldnt get any result of his liking he , axed Omar Ibn-e-Hafs and sent him to Africa.

In 146 Hijra hasham was sent to Sind as governor on behalf of Mansoor. The same demand was made by Mansoor to Hasham.

In the meantime Syed continued his services to Islam un-hindered ,many people belonging to Zaidiyaah sect also became devotees of Syed ,inspired by his character.

Hasham called on the Hindu raja and put forth the demand regarding Abdullaah al-Ashtar ,but Raja plainly refused.

Since Hasham himself had considerable fear of the family of Prophet (PBUH) ,he wanted to find an excuse so that ,he may not have to committ a grave sin by handing over this revered personality or killing him.

So it was deliberately propagated by him that discussions and dialogue for getting hold of Abdullaah al-Ashtar are under way and Caliph was also updated with the same information.

But one Safeeh Ibne Amrv who was a special loyal to Mansoor Abbasi learnt and attacked Syed Abdullaah Al-Ashtar along with his army.

Abdullaaah Ashtar was a brave men ,a descendant of Imam Hasan and a flag bearer of the golden traditions of Karbala. He and his companions chose to fight the attacking army. Out-numbered, he preferred to fight rather than submitting and it is because of this display of valor he was given the title of “Ghazi” meaning “victorious”.

Ali Hussain Rizvi writes in Tareekh-e-Shiyaan-e-Ali that Abdullaah fought really bravely. One after the other his companions ,embraced Shahadat . Similarly Abdullaah Al-Ashtar attained innumerable injuries and fell down from his source . His companions hid him under their own bodies so that his head may not be cut and may not be sent over to Baghdad. The plan worked well . His body was never recognized . Afterwards some native Sindhis who had recently embraced Islam took pains and the bodies were all flown in the Sea.

The Mazaar of Syed in Clifton reminds of the sacrifice offered by yet another generation of Saadat and speaks volumes of the bravery of the noble Syed and his noble companions who embraced Shahadat alongside him.

Every year his URS is commemorated during the days of his Shahadat from 20th to 22nd Zilhajj in which devotees from all over the countries participate. According to one tradition it was the year 773 AD when he embraced Shahadat.

Last year many devotees embraced Shahadat when yazidi terrorists attacked the devotees on the eve of URS. Likewise this year too , a near suicide attempt has been foiled the vicinity of Syeds Mausoleum only yesterday when his URS traditions were beginning to get underway.

There are a countless numbers of karaamaat and miracles associated with him . The most obvious is a sweet water fountain (chashma). The Shrine of Syed in Clifton Karachi is dated back to 1400 years ago . A well-known and most oft repeated thing seen by most people living in this southern town of Pakistan ,many times during their lifetimes, is that the worst cyclones,which are expected to hit this coastal city of Karachi die down miraculously before ever hitting and its historically said that karachi never had a tropical disaster in a thousand year because of the shrines blessing.

His brother Syed Misri Shah is also said to have been buried along the southern coastal line of Pakistan.

Prophet PBUH said:
” Jisne meri aulad mein kisi ki ziyarat ki mein qayamat mein uski ziyarat karunga aur tanha na chorhun ga ”

Whoseover visited any one from my descendants , I shall visit him on Qiyamah and will not leave him alone.

It is greatly desirable for Millat-e-Jaffaria Pakistan to carry out organized and detailed research on the revered personalities of this area as they are our religious stalwarts and noble ancestors and it is the greatest binding on us to recognize their sincere services and let everybody know of the true message of Islam. It is a right (haq) of these personalities on us that at least we should offer to them pursa of their Masoomeen ancestors by visiting them during our days of mourning i.e

Shahadat Anniversaries of Masoomeen (AS).

Maqdoor ho to khaak se poochun ke ay layeem
Tu ne wo ganj haye giran maya kia kiye!

Please recite a fateha for Shohada-e-Millat-e-Jaffaria

Assalaamu Alaaika Ya Abaa Abdillaaah (AS)
Assalaamu Alaaika Ya Ansaara Deenillaah
Assalaamu Alaaika Jamee-in Ibadillaah Isswaliheen

 

Hazrat Syed Misri Shah Ghazi رحمتہ اللہ علیہ  Descendant of Imam Hasan ibn Ali. Brother of Abdullah Shah Ghazi.

Ba hawala Tareekh e Sindh by Allama Syed Sulemaan Nadvi r.a

 

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