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अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 64 उहुद की लड़ाई पार्ट-5

लड़ाई का पहला ईंधन

इसके बाद दोनों फ़रीक़ बिल्कुल आमने-सामने और क़रीब आ गए और लड़ाई का मरहला शुरू हो गया।

लड़ाई का पहला ईंधन मुश्किों का झंडाबरदार तलहा बिन अबी तलहा अब्दरी बना। यह व्यक्ति क़ुरैश का अति वीर योद्धा था। उसे मुसलमान ‘कबशुल कतीबा’ (फ़ौज का मेंढा) कहते थे। यह ऊंट पर सवार होकर निकला और लड़ने के लिए ललकारा।

उसकी वीरता देखते हुए आम सहाबा कतरा गए। लेकिन हज़रत ज़ुबैर रज़ि० आगे बढ़े और एक क्षण देर किए बिना शेर की तरह छलांग लगा कर ऊंट पर जा चढ़े। फिर उसे अपनी पकड़ में लेकर ज़मीन में कूद गए और तलवार से उसका वध कर दिया।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह उत्साहवर्द्धक दृश्य देखा तो मारे खुशी के अल्लाहु अक्बर का नारा लगाया। मुसलमानों ने अल्लाहु अक्बर का नारा लगाया, फिर आपने हज़रत ज़ुबैर रज़ि० की प्रशंसा की और फ़रमाया कि हर नबी का एक हवारी होता है और मेरे हवारी जुबैर हैं।1

लड़ाई का केन्द्र-बिन्दु और झंडा बरदारों का सफ़ाया

इसके बाद हर ओर लड़ाई के शोले भड़क उठे और पूरे मैदान में जोरदार मार-धाड़ शुरू हो गई। मुश्किों का झंडा लड़ाई का केन्द्र-बिन्दु था । बनू अब्दुद्दार ने अपने कमांडर तलहा बिन अबी तलहा के क़त्ल के बाद एक-एक करके झंडा संभाला, लेकिन सबके सब मारे गए।

सबसे पहले तलहा के भाई उस्मान बिन अबी तलहा ने झंडा उठाया और यह

1. इसका उल्लेख साहिबे सीरत हलबीया ने किया है. वरना हदीसों में यह वाक्य दूसरे अवसर पर कहा गया मिलता है।

कहते हुए आगे बढ़ा- ‘झंडे वालों का कर्त्तव्य है कि नेजा (खून से) रंगीन हो जाए, या टूट जाए ।’

ने उस व्यक्ति पर हज़रत हमज़ा बिन अब्दुल मुत्तलिब रज़ियल्लाहु अन्हु हमला किया और उसके कंधे पर ऐसी तलवार मारी कि वह हाथ समेत कंधे को काटती और देह को चीरती हुई नाफ़ तक जा पहुंची, यहां तक कि फेफड़ा दिखाई देने लगा ।

इसके बाद अबू साद बिन अबी तलहा ने झंडा उठाया। उस पर हज़रत साद बिन अबी वक़्क़ास रज़ियल्लाहु अन्हु ने तीर चलाया और वह ठीक उसके गले पर लगा जिससे उसकी जीभ बाहर निकल आई और वह उसी वक़्त मर गया।

लेकिन कुछ सीरत लिखने वालों का कहना है कि अबू साद ने बाहर निकल कर लड़ने के लिए ललकारा और हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने आगे बढ़कर मुक़ाबला किया। दोनों ने एक दूसरे पर तलवार का एक-एक वार किया, लेकिन हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने अबू साद को मार लिया।

इसके बाद मुसाफ़िह बिन तलहा बिन अबी तलहा ने झंडा उठाया, लेकिन उसे आसिम बिन साबित बिन अबी अफ़्लह रज़ियल्लाहु अन्हु ने तीर मारकर क़त्ल कर दिया ।

इसके बाद उसके भाई किलाब बिन तलहा बिन अबी तलहा ने झंडा उठाया, पर उस पर हज़रत ज़ुबैर बिन अव्वाम रज़ियल्लाहु अन्हु टूट पड़े और लड़-भिड़कर उसका काम तमाम कर दिया, फिर इन दोनों के भाई जलास बिन तलहा बिन अबी तलहा ने झंडा उठाया, मगर उसे तलहा बिन उबैदुल्लाह रज़ि० ने नेज़ा मारकर ख़त्म कर दिया और कहा जाता है कि आसिम बिन साबित बिन अबी अफ्लह रज़ियल्लाहु अन्हु ने तीर मारकर खत्म कर दिया।

ये एक ही घर के छ: लोग थे। यानी सबके सब अबू तलहा अब्दुल्लाह बिन उस्मान बिन अब्दुद्दार के बेटे या पोते थे, जो मुश्रिकों के झंडे की हिफ़ाज़त करते हुए मारे गए। इसके बाद क़बीला अब्दुद्दार के एक और व्यक्ति अरतात बिन शुरहबील ने झंडा संभाला, लेकिन उसे हज़रत अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु ने, और कहा जाता है कि हज़रत हमज़ा बिन अब्दुल मुत्तलिब रज़ियल्लाहु अन्हु ने क़त्ल कर दिया।

इसके बाद शुरैह बिन क़ारिज़ ने झंडा उठाया, पर उसे कुज़मान ने क़त्ल कर दिया। कुज़मान मुनाफ़िक़ था और इस्लाम के बजाए क़बीले की हमीयत के जोश में मुसलमानों के साथ लड़ने आया था।शुरैह के बाद अबू जैद अम्र बिन अब्दे मुनाफ़ अब्दरी ने झंडा उठाया, पर उसे भी कुज़मान ने ठिकाने लगा दिया।

फिर शुरहबील बिन हाशिम अब्दरी के एक लड़के ने झंडा उठाया, पर वह भी कुज़मान के हाथों मारा गया ।

यह बनू अब्दुद्दार के दस लोग हुए, जिन्होंने मुश्किों का झंडा उठाया और सबके सब मारे गए। इसके बाद उस क़बीले का कोई आदमी न बचा, जो झंडा उठाता, लेकिन इस मौक़े पर उनके एक हबशी गुलाम ने, जिसका नाम सवाब था, लपक कर झंडा उठा लिया और ऐसी बहादुरी से लड़ा कि अपने से पहले झंडा उठाने वाले अपने आकाओं से भी बाज़ी ले गया, यानी यह व्यक्ति बराबर लड़ता रहा, यहां तक कि उसके दोनों हाथ एक-एक करके काट दिए गए, लेकिन इसके बाद भी उसने झंडा न गिरने दिया, बल्कि घुटने के बल बैठ कर सीने और गरदन की मदद से खड़ा रखा, यहां तक कि जान से मार डाला गया और उस वक़्त भी यह कह रहा था कि ऐ अल्लाह ! अब तो मैंने कोई उज्र बाक़ी न छोड़ा ?

उस दास (सवाब) की हत्या के बाद झंडा ज़मीन पर गिर गया और उसे कोई उठाने वाला न बचा, इसलिए वह गिरा ही रहा।

बाक़ी हिस्सों में लड़ाई की स्थिति

एक ओर मुश्किों का झंडा लड़ाई का केन्द्र-बिन्दु था, तो दूसरी ओर मैदान के दूसरे बाक़ी हिस्सों में तेज़ लड़ाई चल रही थी। मुसलमानों की सनों पर ईमान की रूह छाई हुई थी, इसलिए वे शिर्क और कुन की फ़ौज पर उस बाढ़ की तरह टूटे पड़ रहे थे, जिसके सामने कोई बांध ठहर नहीं पाता। मुसलमान इस मौक़े पर ‘अमित-अमित’ कह रहे थे और इस लड़ाई में यही उनकी पहचान थी।

इधर अबू दुजाना रज़ियल्लाहु अन्हु ने अपनी लाल पट्टी बांध अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की तलवार थामे और उसका हक़ अदा करने का संकल्प लिए आगे बढ़ते रहे और लड़ते हुए दूर जा घुसे। वह जिस किसी मुश्रिक से टकराते, उसका सफाया कर देते थे। उन्होंने मुश्किों की सफ़ों की सफें उलट दीं।

हज़रत ज़ुबैर बिन अव्वाम रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि जब मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से तलवार मांगी और आपने मुझे न दी, तो मेरे दिल पर उसका असर हुआ और मैंने अपने जी में सोचा कि आपकी फूफी हज़रत सफ़िया का बेटा हूं, कुरैशी हूं और मैंने आपके पास जाकर अब दुजाना से पहले तलवार मांगी, लेकिन आपने मुझे न दी और उन्हें दे दी,

इसलिए ख़ुदा की क़सम ! मैं देखूंगा कि वह इससे क्या काम लेते हैं?
चुनांचे मैं उनके पीछे लग गया। उन्होंने यह किया कि पहले अपनी लाल पट्टी निकाली, और सर पर बांधी। इस पर अंसार ने कहा, अबू दुजाना ने मौत की पट्टी निकाल ली है। फिर वह यह कहते हुए मैदान की ओर बढ़े-

‘मैंने इस मरुद्यान में अपने ख़लील (मित्र, सल्ल०) को वचन दिया है कि कभी सफ़ों के पीछे न रहूंगा, (बल्कि आगे बढ़कर) अल्लाह और उसके रसूल की तलवार चलाऊंगा।’

इसके बाद उन्हें जो भी मिल जाता, उसको क़त्ल कर देते। इधर मुश्किों में एक व्यक्ति था जो हमारे किसी भी घायल को पा जाता, तो उसका अन्त कर देता था। ये दोनों धीरे-धीरे क़रीब हो रहे थे। मैंने अल्लाह से दुआ की कि दोनों में टक्कर हो जाए और सच में टक्कर हो गई। दोनों ने एक दूसरे पर एक-एक वार किया। पहले मुश्कि ने अबू दुजाना पर तलवार चलाई, लेकिन अबु दुजाना ने यह हमला ढाल पर रोक लिया और मुश्कि की तलवार ढाल में फंस कर रह गई। इसके बाद अबू दुजाना ने तलवार चलाई और मुश्कि को वहीं ढेर कर दिया। 1

इसके बाद अबू दुजाना सफ़ों पर सफ़्रें चीरते हुए आगे बढ़े, यहां तक कि कुरैशी औरतों की कमांडर तक जा पहुंचे। उन्हें मालूम था कि यह औरत है। चुनांचे उनका बयान है कि मैंने एक इंसान को देखा, वह लोगों को बड़े जोर व शोर से जोश और वलवला दिला रहा है। इसलिए मैंने उसको निशाने पर ले लिया, लेकिन जब तलवार से हमला करना चाहा तो उसने हाय-पुकार मचाई और पता चला कि औरत है। मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की तलवार को बट्टा न लगने दिया कि उससे किसी औरत को मारूं ।

यह औरत हिन्द बिन उत्बा थी। चुनांचे हज़रत जुबैर बिन अव्वाम रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि मैंने अबू दुजाना को देखा, उन्होंने हिन्द बिन उत्बा के सर के बीचों बीच तलवार बुलन्द की और फिर हटा ली। (किसी ने कारण जानना चाहा, तो) मैंने कहा, अल्लाह और उसके रसूल सल्ल० बेहतर जानते हैं। 2

इधर हज़रत हमज़ा रज़ि० भी बिफरे हुए शेर की तरह लड़ाई लड़ रहे थे और अपूर्व मार-धाड़ के साथ सेना के बीच के हिस्से की ओर बढ़े और चढ़े जा रहे थे। उनके सामने से बड़े-बड़े बहादुर इस तरह बिखर जाते थे, जैसे चौमुखी

1. इब्ने हिशाम, 2/68-69 2. इने हिशाम, 2/69

हवा में पत्ते उड़ रहे हों। उन्होंने मुश्किों के झंडा बरदारों के सफाए में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के अलावा उनके बड़े-बड़े योद्धाओं का भी हाल खराब कर रखा था, लेकिन अफ़सोस कि इसी हाल में उनकी शहादत हो गई, मगर उन्हें बहादुरों की तरह आमने-सामने लड़ कर शहीद नहीं किया गया, बल्कि डरपोकों की तरह छिप-छिपाकर बेखबरी की हालत में मारा गया ।

Ahle Bait ع Ki Muhabbat Aur Shafaqat.

*_Sayyeduna Imam Hassan Alaihissalam Apne Nanajaan Se Riwayat Karte Hai ke Huzoor SallAllahu Alaihi wa Aalihi Wa Sallam Ne Farmaya:_*

*_“Hum Ahle Bait ع Ki Muhabbat Aur Shafaqat Paane Keliye Mehnat Karo Aur Isko Apne Upar Hamesha Farz Jaano._*
_Haqiqat Ye Hai ke Jo Bhi Allah ﷻ Se Mile is Haal Me Ke Wo Hamse Muhabbat karta Ho, To Wo Meri Shafa’at Se Jannat Me jayega._
_Us Zaat ki Qasam Jiske Qabza-e-Qudrat me Meri Jaan Hai, kisi shakhs ko uski koi Neki kaam Nahi Aayegi Agar Wo Hamara Haq Ada Na Kare!”_

*_📚[Imam Jalaluddin Siyuti رض Ne Apni_*
*_📙Kitab Ihya Al Mayyit Bee Fazail-e-Ahle Bait Me Is Hadees ko Riwayat kiya Aur Farmaya ke Is Hadees ko_*
*_Imam Tabrani Ne Bhi 📚Mujam al Awsat Me Riwayat kiya Hai.]_*

*_Allahumma Salle Ala Sayyedina wa Maulana Muhammadi Nin Nabiyyil Ummiyyil Habibil Aalil Qadril Azeemil Jaahi wa Ala Aalihi wa Sahbihi wa Baarik wa Sallim_*