
Ilahi Nizam ka Pehla Difai Ghazwa | Dr Sadaqat Ali Faridi



हजरत जाबीर (रजी अल्लाह अन्हो) फरमाते है : रसूलल्लाह ﷺ ने ये आयत पढ़ी :
«وَ اِنَّہٗ لَعِلْمٌ لِّلسَّاعَۃِ» ( الزخرف : 61 )
फिर फरमाया : सितारे आसमान वालों के लिए ईमान है , जब ये खत्म हो जायेगे तो उन पर वो आयेगा जिसका उनसे वादा वादा किया गया और #मैं_अपने_असहाब_के_लिए_ईमान_हूं , जब तक इन मै मौजूद हूं , जब में चला जाऊंगा तो उन पर वो कुछ आयेगा जिसका उनसे वादा किया गया और मेरे #अहलेबैत_मेरी_उम्मत_के_लिए_ईमान_है , जब मेरे #अहलेबैत चले जाएंगे तो उनपर वो कुछ आयेगा जिसका उनसे वादा किया गया है (यानी कयामत आ जाएगी)
अल मुस्तद्रक आला सहिहैन जिल्द: 3 हदीस नं: 3676
Note= इस हदीस से पता चलता है कि औलाद ए रसूल ﷺ सारि दुनिया के लिए रहमत है यानी जबतक जमीन पर आल ए रसूल ﷺ मौजूद है तबतक क़यामत रुकी हुई है,🙏🏻


Ummul Mominin Hazrat Sayyeda Aaisha Siddiqa رضی اللہ عنہا Amirul Mominin Hazrat Sayyedna Abu Baqr Siddiq رضی اللہ عنہ Ki Sahabzadi He. Inki Walida Ka Naam ‘Umme Rooman’ He . Aapka Nikah Huzur E Aqdas صلی اللہ علیہ و سلم Se Hijrat Se Pehle Makka Mukarrama Me Hua Tha Lekin Kashana E Nubuwwat Me Ye Madina Munavvara Ke Andar Hijri 2 Me Aai . Aap Sarkar E Madina صلی اللہ علیہ و سلم Ki Mehbooba Aur Chahiti Biwi He .
Huzur E Sarvar E Qayenat صلی اللہ علیہ و سلم Ne Ummul Mominin Hazrat Sayyeda Aaisha Siddiqa رضی اللہ عنہا Ke Bare Me Irshad Farmaya Ke “Ae Umme Salma ! (رضی اللہ عنہا ) Mujhe Aaisha (رضی اللہ عنہا ) Ke Bare Me Koi Taklif Na Do . Allah Ki Qasam ! Mujh Par Aaisha (رضی اللہ عنہا ) Ke Siva Tum Me Se Kisi Biwi Ke Lihaaf Me Vahi Nazil Nahi Hui ”
Fiqah Va Hadees Ke Uloom Me Huzur صلی اللہ علیہ و سلم Ki Azvaaj Ke Darmiyan Sayyedna Aaisha Siddiqa رضی اللہ عنہا Ka Darja Bahot Uncha He . Bade Bade Sahaba E Kiram Aapse Masaail Pucha Karte The . Aapke Fazail O Manaqib Me Bahot Si Hadees e Aayi He .
Aapka Visal E Paak 17 Ramzan Ul Mubarak Ko Madina Munawara Me Hua . Hazrat Sayyedna Abu Huraira رضی اللہ عنہ Ne Aapki Namaz E Janaza Padhayi Aur Aapki Wasiyat Ke Mutabiq Raat Me Logo Ne Aapko Jannat Ul Baqi Sharif Ke Qabrastan Me Dusri Azvaaj E Mutahharat Ke Pehlu Me Dafn Kiya .
[Hawala Kitab – Faizane Aayesha Siddiqa]


कर उसे उसके यहूदी दोस्तों तक पहुंचा दिया गया। अलबत्ता हज़रत साबित ने जुबैर बिन बाता के लड़के अब्दुर्रहमान को ज़िंदा रखा, चुनांचे वह इस्लाम लाकर सहाबी के रुत्बे को पहुंचे।
इसी तरह बनू नज्जार की एक महिला हज़रत उम्मुल मंज़िर सलमा बिन्त कैंस ने निवेदन किया समुवाल कुरजी के लड़के रिफ़ाआ को उनके लिए भेंट स्वरूप दे दिया जाए। उनका निवेदन भी मान लिया गया और रिफ़ाआ को उनके हवाले कर दिया गया। उन्होंने रिफ़ाआ को ज़िंदा रखा और वह भी इस्लाम लाकर सहाबी के रुत्बे को पहुंचे।
कुछ और लोगों ने भी उसी रात हथियार डालने की कार्रवाई से पहले इस्लाम अपना लिया था, इसलिए उनकी भी जान व माल और औलाद बची रही।
उसी रात अम्र नामी एक और व्यक्ति, जिसने बनू कुरैज़ा की बद- अदी में शिर्कत नहीं की थी, बाहर निकला। उसे पहरेदारों के कमांडर मुहम्मद बिन मस्लमा ने देख लिया, लेकिन पहचान कर छोड़ दिया, फिर मालूम नहीं वह कहां गया ?
बनू कुरैज़ा के माल को अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पांचवां भाग निकालकर बांट दिया। घुड़सवारों को तीन हिस्से दिए, एक हिस्सा उसका अपना, और दो हिस्सा घोड़ों का और पैदल को एक हिस्सा दिया। क़ैदियों और बच्चों को हज़रत साद बिन ज़ैद अंसारी रज़ि० की निगरानी में नज्द भेजकर उनके बदले घोड़े और हथियार खरीद लिए ।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने लिए बनू कुरैज़ा की औरतों में से हज़रत रैहाना बिन्त अम्र बिन खनाफ़ा को चुना। यह इब्ने इस्हाक़ के अनुसार आपकी वफ़ात तक आपकी मिल्कियत में रहीं। लेकिन कलबी का बयान है कि नबी सल्ल० ने उन्हें सन् 06 हि० में आज़ाद करके शादी कर ली थी। फिर जब हज्जतुल विदाअ से वापस तशरीफ़ लाए तो उनका देहान्त हो गया और आपने उन्हें बक़ीअ में दफन कर दिया ।2
जब बनू कुरैज़ा का काम पूरा हो चुका तो नेक बन्दे हज़रत साद बिन मुआज़ की उस दुआ के क़ुबूल होने का वक़्त आ गया, जिसका ज़िक्र ग़ज़वा अहज़ाब के दौरान आ चुका है। चुनांचे उनका घाव फूट गया। उस वक़्त वह मस्जिदे नबवी में थे। नबी सल्ल० ने उनके लिए वहीं खेमा लगवा दिया था, ताकि क़रीब ही से उनका पूछना कर लिया करें ।
1. इब्ने हिशाम 2/245
2. तलक्रीहुल फहूम, पृ० 12
हज़रत आइशा रज़ि० का बयान है कि घाव उनके लुब्बे से फूट कर बहा । मस्जिद में बनू ग़िफ़ार के भी कुछ खेमे थे। वे यह देखकर चौके कि उनकी ओर खून बहकर आ रहा है। उन्होंने कहा, खेमे वालो! यह क्या है जो तुम्हारी ओर से हमारी ओर आ रहा है ?
देखा तो हज़रत साद के घाव से खून की धार बह रही थी, फिर उसी से उनकी मौत हो गई।
सहीह मुस्लिम और सहीह बुखारी में हज़रत जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया गया है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया कि साद बिन मुआज़ रज़ि० की मौत से रहमान का अर्श हिल गया। 2
इमाम तिर्मिज़ी ने हज़रत अनस रजि० से एक हदीस रिवायत की है और उसे सही भी क़रार दिया है कि जब हज़रत साद बिन मुआज रज़ियल्लाहु अन्हु का जनाज़ा उठाया गया, तो मुनाफ़िक़ों ने कहा, इनका जनाज़ा कितना हल्का है।
रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया, उसे फ़रिश्ते उठाए हुए थे।
बनू कुरैज़ा के घेराव के दौरान एक मुसलमान शहीद हुए, जिनका नाम खल्लाद बिन सुवैद है। यह वही सहाबी हैं जिन पर बनू कुरैज़ा की एक औरत ने चक्की का पाट फेंक मारा था। इनके अलावा हज़रत उकाशा के भाई अबू सनान बिन मुहसिन ने घेराव के दौरान वफ़ात पाई।
जहां तक हज़रत अबू लुबाबा रज़ियल्लाहु अन्हु का मामला है, तो वह छः रात लगातार स्तून से बंधे रहे। उनकी बीवी हर नमाज़ के वक़्त आकर खोल देती थीं और वह नमाज़ से फ़ारिग़ होकर फिर उसी स्तून से बंध जाते थे ।
इसके बाद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर सुबह तड़के उनकी तौबा उतरी। उस वक़्त आप उम्मे सलमा रज़ि० के मकान में थे ।
हज़रत अबू लुबाबा का बयान है कि उम्मे सलमा ने अपने हुजरे के दरवाज़े पर खड़े होकर मुझसे कहा, ऐ अबू लुबाबा! खुश हो जाओ, अल्लाह ने तुम्हारी तौबा कुबूल कर ली ।
यह सुनकर सहाबा उनहें खोलने के लिए उछल पड़े, लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया कि उन्हें रसूलुल्लाह सल्ल० के अलावा कोई और न खोलेगा। चुनांचे
1. सहीह बुखारी 2/591 2. वही, 1/536, सहीह मुस्लिम 2/294, जामेअ तिर्मिज़ी 2/225 3. जामेअ तिर्मिज़ी 2/225
जब नबी सल्ल० फ़ज्र की नमाज़ के लिए निकले और वहां से गुज़रे तो उन्हें खोल दिया।
यह ग़ज़वा ज़ीकादा में पेश आया, पचीस दिन तक क़ायम रहा।’ अल्लाह ने इस ग़ज़वे और ग़ज़वा खंदक़ के बारे में सूरः अहज़ाब में बहुत-सी आयतें उतारीं और दोनों ग़ज़वों के अहम अंशों पर अपनी राय दी। मोमिनों और मुनाफ़िक़ों के हालात बयान फ़रमाए, दुश्मन के अलग-अलग गिरोहों में और पस्त हिम्मती का ज़िक्र किया और अहले किताब की बद-अहदी के नतीजों को स्पष्ट किया। फूट
इब्ने हिशाम 2/237, 238, ग़ज़वे के सविस्तार विवरण के लिए देखिए इब्ने हिशम 2/233-273, सहीह बुखारी 2/590-591, ज़ादुल मआद 2/72-73, 74 मुख्तसरुस्सीरः, शेख अब्दुल्लाह पृ० 287, 288, 289, 290