Blog

सब्र और सलात

॥ सब्र और सलात ॥
(सब्र, सलात, हिदायत और इमामत का ताल्लुक़)

بسم اللہ الرحمٰن الرحیم و الصلوۃ و السلامُ علٰی سید الانبیاء و المرسلین و علٰی آلہ اجمعین

नीचे सूरह बक़रह की आयत 45 और 153 के स्क्रीनशॉट हैं!

आयत 45 में #अल्लाह बनी इसराईल को नसीहत फरमा रहा है कि “सब्र और सलात से इस्तेआ़नत हासिल करो”, और आगे #सब्र और सलात को उनके लिये “कबीरा” यानी बहुत बड़ा बता रहा है सिवाये उनके जो अल्लाह की #ख़शिय्यत रखने वाले हैं!

दूसरी तरफ़ #आयत 153 में ईमान वालों को अल्लाह नसीहत फरमा रहा है कि “सब्र और #सलात से इस्तेआ़नत हासिल करो” और आगे यह फरमाया कि बेशक अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है, यानि यहाँ भी यह बता दिया कि सब्र और सलात कोई मामूली #शै नहीं बल्कि गिरांक़द्र चीज़ है जिससे वाबस्तगी के लिये आपको सब्र ओ तहम्मुल और ख़शिय्यत ए इलाही दरकार है!
गोया अल्लाह यहाँ #ईमान वालों को तसल्ली दे रहा है कि मैं सब्र और सलात से इस्तेआ़नत चाहने वाले आली हिम्मत साबिरों के साथ हूँ।

दिलचस्प बात यह है कि सूरह सजदा कि आयत 24 में अल्लाह बनी #इसराईल के बारे में फरमा रहा है कि “हमने उन (बनी इसराईल) में से जब वो सब्र करते रहे तो कुछ #इमाम बनाये जो हमारे हुक्म से हिदायत करते थे…

यानी #मूसा अलैहिस्सलाम के बाद हिदायत का ज़िम्मा मिनजानिबिल्लाह बनी इसराईल के इमामों के सुपुर्द किया गया ना कि मुल्लाओं के।

मालूम हुआ #अंबिया के बाद हिदायत का ज़िम्मा वक़्त के इमाम के सुपुर्द होता है और उनसे #हिदायत सब्र और सलात से वाबस्तगी रखने वालों को बतौर इनाम मिलती है!

अब आप पढ़ते रहिये नमाज़ की हर रकात में कि “ऐ अल्लाह हम तेरी #इबादत करते हैं और तुझ ही से इस्तेआ़नत चाहते हैं तू हमें सिराते #मुस्तक़ीम की हिदायत फरमा”

अल्लाह ने बता दिया कि उससे इस्तेआ़नत सब्र और सलात के ज़रिये हिदायत इमाम ए वक़्त के वास्ते से मिलेगी!

ना मुल्लाजी किसी काम आयेंगे न टाइटलधारी #सहाबा!

क्योंकि अल्लाह की यह नसीहत जिन लोगों को पहुंची वो जमात सहाबियों की थी!
और अल्लाह के हबीब सरवरे कायनात ने #ग़दीर ए ख़ुम पर हदीसे #सक़लैन का ऐलाने आम फरमा कर तमाम सहाबा ओ मुस्लिमीन को नसीहत फरमा दी थी कि अल्लाह की #किताब और मेरी इतरत #अहलेबैत से मज़बूती के साथ वाबस्ता रहोगे तो कभी गुमराह नहीं होगे!

वाज़ेह रहे अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम के बाद इमाम बनी इसराईल में से बनाये थे ना कि सहाबा ए मूसा या #उम्मत ए मूसा से!

तो यह मुल्ला बनी #इस्माईल के इमाम सहाबा ए मुस्तफ़ा या उम्मत ए मुस्तफ़ा में कहाँ ढूंढते फिर रहे हैं?

ख़बरदार अल्लाह ने इमामत, #नबुव्वत और किताब आले #इब्राहीम के सालेहीन में रखी है जिन्होंने कभी #शिर्क ओ कुफ्र ना किया हो!
और यह शर्फ फक़त आले #मुहम्मद को हासिल है!

मगर यह उम्मत इस #अम्र पर आज तक सब्र ओ तहम्मुल का मुज़ाहिरा करने के बजाये ज़ुल्म ओ जबर का ही मुज़ाहिरा करती रही है!

तो कहाँ से मिलेगी हिदायत?
और कहां से मिलेगी मदद ओ इस्तेआ़नत?

तो लौट आओ क़ुरआन ओ अहलेबैत की तरफ़
इसलिये कि 👇

#हक़ ओ हिदायत का बस एक #उसूल!
#किताबुल्लाह और आले #रसूल !!

मौला अली अलैहिस्सलाम ने इसी हक़ीक़त को बहुत पहले बयान फ़रमा दिया था 👇

🔹 फ़रमान-ए-मौला अली अलैहिस्सलाम:

> “इस्लाम सिर्फ़ सजदों और रुकूओं का नाम नहीं, बल्कि अमल, इंसाफ़ और सच्चाई का नाम है।”
(ग़ुररुल हिकम, हिकमत 1056)


> “जब लोग दीन को सिर्फ़ ज़बान तक रखेंगे और दुनियावी कामों में झूठ और धोखा आम होगा, तब अल्लाह उनका रुतबा गिरा देगा।”
(नहजुल बलाग़ा, ख़ुतबा 131 का मफ़हूम)


🔹 ज़वाल की असली वजहें:

1. दुनियावी मुआमलात में बेईमानी:

सौदे में धोखा, रिश्वत, झूठ, अमानत में ख़यानत — ये सब मुसलमान को ज़वाल की तरफ़ ले जाते हैं।

मौला अली ने फ़रमाया:

> “जिसने अमानत में ख़यानत की, उसने अपना ईमान खो दिया।”
(ग़ुररुल हिकम, हिकमत 3009)


2. इस्लाम को सिर्फ़ इबादत तक सीमित कर देना:

यानी नमाज़ पढ़ी, रोज़ा रखा, लेकिन अख़लाक़, इंसाफ़, और इंसानियत में गिरावट।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

> “जो नमाज़ पढ़े मगर झूठ बोले, धोखा दे, और ज़ुल्म करे — उसकी नमाज़ उसका चेहरा भी नहीं बचाएगी।”
(कनज़ुल उम्माल, हदीस 18869)


3. अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से बुग़ज़ (दुश्मनी):

यही तो ईमान की जड़ को काट देता है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

> “अली से मुहब्बत ईमान की निशानी है, और अली से बुग़ज़ (नफ़रत) निफ़ाक़ की निशानी है।”
(सहीह मुस्लिम, हदीस 78)



🌿 ख़ुलासा:

> मुसलमानों का ज़वाल इसलिए है कि उन्होंने दीन को मस्जिद तक महदूद कर दिया,
और मौला अली व अहलेबैत की तालीमात को सिर्फ़ महफ़िलों तक सीमित कर दिया।
जबकि असल इस्लाम — अमल, इंसाफ़, अमानतदारी और अहलेबैत से मुहब्बत

हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह की वो रहस्यमयी प्लेट और दरवाजा, जो इतिहास और ईमान को जोड़ती है

*हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह की वो रहस्यमयी प्लेट और दरवाजा, जो इतिहास और ईमान को जोड़ती है* 🕌

*कभी आपने हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह के सामने मौजूद जामा’त खाना मस्जिद (खिलजी मस्जिद) के दरवाज़े को ध्यान से देखा है*?

*वहीं लगी हुई है एक गोल धातु की प्लेट*…

*जिस पर अरबी में ऐसे नाम खुदे हैं, जो सिर्फ़ नाम नहीं — बल्कि इस्लामी इतिहास की रूह हैं*

*बीच में लिखा है — “अल्लाह”*
*और उसके चारों तरफ़ ये पाक नाम दर्ज हैं*:
☪️ *मुहम्मद* ﷺ
☪️ *अली*
☪️ *फ़ातिमा*
☪️ *हसन*
☪️ *हुसैन*
*ये सभी नाम पैगंबर मुहम्मद ﷺ और उनके अहले-बैत से जुड़े हैं* —
*यानी नुबूवत, रिसालत, इमान और कुर्बानी का पूरा सिलसिला एक ही प्लेट पर* ✨

*🪔 इतिहास + आस्था + रूहानियत का संगम*

*ये प्लेट सिर्फ़ एक सजावट नहीं है*…
*ये इस बात की गवाही है कि*
*दिल्ली की सरज़मीन सिर्फ़* *सल्तनतों की नहीं*,
*औलिया, सूफिया और इमान *की भी राजधानी रही है* 🕌
*खिलजी दौर की ये मस्जिद*
*सिर्फ़ इबादत की जगह नहीं थी*,
*बल्कि*:

*दीन की तालीम का मरकज़*

*सूफी तहज़ीब का निशान*

*अहले-बैत से मोहब्बत की मिसाल*

*और इस्लामी पहचान का जीता-जागता सबूत थी* ❤️

*उस दौर में ऐसी निशानियां बनाना*
*एक साफ़ पैग़ाम था — 👉 “हमारी पहचान ताक़त से नहीं, आस्था से है*।”
👉 *“हमारी जड़ें सल्तनत में *नहीं, रसूल ﷺ से जुड़ी हैं*।

*ज़्यादातर लोग रोज़ वहाँ से गुज़र जाते हैं*…
*लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि*
👉 *ये प्लेट क्या है*
👉 *किस दौर की है*
*👉 *और इसका मतलब क्या है*
*अगले पोस्ट में बताएँगे — इस प्लेट का ऐतिहासिक रहस्य और किसने इसे बनवाया था*… 👑

*अगर आपके दिल में भी*
*अल्लाह, रसूल ﷺ और अहले-बैत से मोहब्बत है*…

Kya Islam mein mard ko khassi karna jaiz hai?

Amir-e-Shaam Muawiya pehla shakhs the jisne khassi (eunuch) ghulam rakhe. Kya Islam mein mard ko khassi karna jaiz hai?

Darul Uloom Deoband ka fatwa number 603171 baghair kisi istisna ke yeh kehta hai ke Islam mein khassi hona qat‘an haram, najaiz aur bahut bada gunaah hai.

Lekin Tareekh-ul-Khulafa mein Imam Suyuti likhte hain ke Muawiya pehle shakhs the jinhone khassi ghulam rakhe. Ab pehli baat to yeh hai ke itne azeem gunaah ke murtakib shakhs ko apni ma‘iyyat (saath) mein rakhna taqwa ke khilaf baat hai.

Jabke Imam Ibn-e-Kathir likhte hain ke: “Ek din Muawiya apne us khassi ghulam ke saath apni biwi ke paas gaye. Biwi ne parda kar liya aur poocha: aapke saath yeh kaun shakhs hai?
Muawiya ne kaha: yeh khassi hai, tum iske saamne aa jao (parda na karo).
Is par biwi ne kaha: jis cheez ko Allah ne haram kiya hai, aapka usko mutilate (khassi) kar dena us amal ko harگز halal nahi kar deta.”

Is se maloom hota hai ke Muawiya ke hukm se woh shakhs khassi kiya gaya tha. Mazeed yeh ke Muawiya ne apni biwi se kaha ke woh us shakhs se parda na kare.

To kya Muawiya ke nazdeek khassi ke saath saath ajnabi mard ke saamne be-parda hona bhi jaiz tha?

Hawalay:

Tareekh-ul-Khulafa — Imam Suyuti, Kitab Ahd-e-Bani Umayya, Muawiya bin Abi Sufyan, Maktaba Shamila, safha 153

Al-Bidaya wan-Nihaya — Imam Ibn-e-Kathir, sanah 60 ka bab, jild 8, safha 145