❣️ “AYE ALI (ع) JO KOI TUJH KO DOST RAKHE – WO QAYAMAT KE DIN PAIGHAMBARON KE SATH UNKE DARAJAAT Me HOGA, AUR JO KOI TERI DUSHMANI PAR MAR JAYE PASS, KHUDA PARWAH NAHI KARTA- KE WO YAHOODI MARAY YA NASRANI.”
चुनांचे हज़रत आइशा रज़ि० की आंख लग गई और वह सो गई। फिर सफ़वान बिन मुअत्तल रज़ियल्लाहु अन्हु की यह आवाज़ सुनकर जागीं कि ‘इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन० अल्लाह के रसूल सल्ल० की बीवी…?
सफ़वान फ़ौज के पिछले हिस्से में सोए थे, उनकी आदत भी ज्यादा सोने की थी। उन्होंने जब हज़रत आइशा रज़ि० को देखा तो पहचान लिया, क्योंकि वह परदे का हुक्म आने से पहले भी उन्हें देख चुके थे। उन्होंने ‘इन्ना लिल्लाहि.. पढ़ी और अपनी सवारी बिठा कर हज़रत आइशा रज़ि० के क़रीब कर दी। हज़रत आइशा रज़ि० चुपचाप उस पर सवार हो गईं।
हज़रत सफ़वान ने इन्ना लिल्लाहि के सिवा जुबान से एक शब्द न निकाला। चुपचाप सवारी की नकेल थामी और पैदल चलते हुए फ़ौज में आ गए।
यह ठीक दोपहर का वक़्त था और फ़ौज पड़ाव डाल चुकी थी। उन्हें इस स्थिति में आता देखकर अलग-अलग लोगों ने अपने-अपने ढंग से समीक्षा की और अल्लाह के दुश्मन खबीस अब्दुल्लाह बिन उबई को भड़ास निकालने का एक ओर मौक़ा मिल गया।
चुनांचे उसके मन में निफ़ाक़ और जलन की जो चिंगारी सुलग रही थी, उसने उसके इस छिपे रोग को और उभार दिया, यानी बदकारी की तोहमत गढ़कर घटनाओं के ताने-बाने बुनना, तोहत के खाके में रंग भरना और उसे फैलाना, बढ़ाना और उधेड़ना और बुनना शुरू किया। उसके साथी भी इसी बात को बुनियाद बनाकर उसका क़रीबी आदमी बनने की कोशिश करने लगे और जब मदीना आए तो इन तोहमत तराशों ने खूब जमकर प्रचार किया। I
इधर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम चुप थे. कुछ बोल नहीं रहे थे, लेकिन जब लम्बे अर्से तक वह्य न आई, तो आपने हज़रत आइशा रज़ि० से अलग हो जाने के बारे में अपने खास सहाबा से मश्विरा किया।
हज़रत अली रज़ि० ने स्पष्ट शब्दों में कहे बग़ैर इशारों-इशारों में मश्विरा दिया कि आप उनसे अलगाव अपनाकर किसी और से शादी कर लें, लेकिन हज़रत उसामा रज़ि० वग़ैरह ने मश्विरा दिया कि आप उनसे अलग न हों और दुश्मनों की बात पर कान न धरें।
इसके बाद आपने मिंबर पर खड़े होकर अब्दुल्लाह बिन उबई की दी जा रही पीड़ाओं से निजात दिलाने की ओर तवज्जोह दिलाई। इस पर हज़रत साद बिन मुआज़ रज़ि० ने अपना रुझान बताया और कहा, इजाज़त दीजिए उसे क़त्ल कर दें, लेकिन हज़रत साद बिन उबादा रज़ि० में, जो अब्दुल्लाह बिन उबई के क़बीला
खज़रज के सरदार थे, कबीला गत अभिमान जाग गया और दोनों ओर से तेज-तेज बातें हो गई, जिसके नतीजे में दोनों क़बीले भड़क उठे ।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें बड़ी मुश्किल से चुप किया, फिर खुद भी चुप हो गए।
उधर हज़रत आइशा रज़ि० का हाल यह था कि वह ग़ज़वे से वापस आते ही बीमार पड़ गईं और एक महीने तक बराबर बीमार रहीं। उन्हें इस तोहमत के बारे में कुछ भी मालूम न था। अलबत्ता उन्हें यह बात खटकती रहती थी कि बीमारी की हालत में अल्लाह के रसूल सल्ल० की ओर जो मेहरबानी होनी चाहिए थी, अब वह नज़र नहीं आ रही है।
बीमारी ख़त्म हुई, तो वह एक रात उम्मे मिस्तह के साथ ज़रूरत पूरी करने के लिए मैदान में गईं। संयोग कि उम्मे मिस्तह अपनी चादर में फंसकर फिसल गईं, इस पर उन्होंने अपने बेटे को बद-दुआ दी ।
हज़रत आइशा रज़ि० ने इस हरकत पर उन्हें टोका, तो उन्होंने हज़रत आइशा रज़ि० को यह बतलाने के लिए कि मेरा बेटा भी प्रोपगंडे के जुर्म में शरीक है, तोहमत की पूरी घटना कह सुनाई।
हज़रत आइशा रज़ि० ने वापस आकर इस ख़बर का ठीक-ठीक पता लगाने के उद्देश्य से अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मां-बाप के पास जाने की इजाज़त चाही, फिर इजाज़त पाकर मां-बाप के पास तशरीफ़ ले गईं और स्थिति स्पष्ट रूप से मालूम हो गई, तो बे-अख्तियार रोने लगीं और फिर दो दिन और एक रात रोते-रोते गुज़र गए। इस बीच न नींद का सुर्मा लगाया, न आंसू की झड़ी रुकी।
वह महसूस करती थीं कि रोते-रोते कलेजा फट जाएगा। इसी हालत में रसूलुल्लाह सल्ल० तशरीफ़ लाए। कलिमा शहादत के बाद खुत्बा दिया और इसके बाद यह फ़रमाया, ऐ आइशा रज़ि० ! मुझे तुम्हारे बारे में ऐसी और ऐसी बात का पता लगा है। अगर तुम इससे बरी हो, तो अल्लाह बहुत जल्द तुम्हारे बरी होने का एलान फ़रमा देगा और अगर खुदा न करे तुमसे कोई गुनाह हो गया है, तो तुम अल्लाह से माफ़ी मांगो और तौबा करो, क्योंकि बन्दा जब अपने गुनाह का इक़रार करके अल्लाह के हुज़ूर तौबा करता है, तो अल्लाह उसकी तौबा कुबूल कर लेता है।
उस वक़्त हज़रत आइशा रज़ि० के आंसू एकदम थम गए और अब उन्हें आंसू की एक बूंद भी महसूस न हो रही थी।
उन्होंने अपने मां-बाप से कहा कि वे आपको जवाब दें। लेकिन उनकी समझ में न आया कि क्या जवाब दें। इसके बाद हज़रत आइशा रज़ि० ने खुद ही कहा, अल्लाह की क़सम ! मैं जानती हूं कि यह बात सुनते-सुनते आप लोगों के दिलों में अच्छी तरह बैठ गई है और आप लोगों ने इसे बिल्कुल सच समझ लिया है, इसलिए अगर मैं यह कहूं कि मैं बरी हूं—और अल्लाह खूब जानता है कि मैं बरी हूं-तो आप लोग मेरी बात सच न समझेंगे और अगर मैं किसी बात को मान लूं, हालांकि अल्लाह खूब जानता है कि मैं उससे बरी हूं, तो आप लोग सही मान लेंगे। ऐसी स्थिति में, खुदा की क़सम ! मेरे लिए और आप लोगों के लिए वही मसल है कि जिसे हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के वालिद (पिता) ने कहा था कि-
‘सब्र ही बेहतर है और तुम लोग जो बनाते हो, इस पर अल्लाह की मदद चाहिए।’
इसके बाद हज़रत आइशा रज़ि० दूसरी ओर पलटकर लेट गईं और उसी वक़्त अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर वह्य उतरने का सिलसिला शुरू हो गया।
फिर जब यह सिलसिला बन्द हुआ, तो आप मुस्करा रहे थे और आपने पहली बात जो फ़रमाई, वह यह थी कि ‘ऐ आइशा ! अल्लाह ने तुम्हें बरी कर दिया।’ इस पर (खुशी से) उनकी मां बोली (आइशा !) हुज़ूर सल्ल० की जानिब उठो (शुक्रिया अदा करो)।
उन्होंने अपने बरी होने पर और अल्लाह के रसूल सल्ल० की मुहब्बत पर पूरा भरोसा करते हुए नाज़ भरे अन्दाज़ में कहा, ‘अल्लाह की क़सम ! मैं तो उनकी ओर न उठूंगी और सिर्फ़ अल्लाह का गुणगान करूंगी।’
इस मौक़े पर इफ़्क की घटना से मुताल्लिक़ जो आयतें अल्लाह ने उतारी, वे सूर: नूर की दस आयतें हैं जो ‘इन्नल्लज़ी-न जाअ बिल इफ़्कि से शुरू होती हैं ।
इसके बाद तोहमत लगाने के जुर्म में मिस्तह बिन असासा, हस्सान बिन साबित और हम्ना बिन्त जहश को अस्सी-अस्सी कोड़े मारे गए’, अलबत्ता खबीस अब्दुल्लाह बिन उबई की पीठ इस सज़ा से बच गई, हालांकि तोहमत लगाने वालों में वही सूची में सबसे ऊपर था और उसने इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण
1. इस्लामी कानून यही है कि जो व्यक्ति किसी पर ज़िना की तोहमत लगाए और सबूत न पेश करे, उसे अस्सी कोड़े मारे जाएं।
भूमिका निभाई थी।
उसे सज़ा न देने की वजह या तो यह थी कि जिन लोगों पर हदें क़ायम कर दी जाती हैं (यानी शरई सज़ा दे दी जाती है), वह उनके लिए आखिरत के अज़ाब में कमी और गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाती हैं और अब्दुल्लाह बिन उबई को अल्लाह ने आखिरत में बड़ा अज़ाब देने का एलान फ़रमा दिया था, या फिर वही मस्लहत काम कर रही थी, जिसकी वजह से उसे क़त्ल नहीं किया गया।
इस तरह एक महीने के बाद मदीने का वातावरण शंका-संदेह, और दुख-बेचैनी के बादलों से साफ़ हो गया और अब्दुल्लाह बिन उबई इस तरह रुसवा हुआ कि दोबारा सर न उठा सका।
इब्ने इस्हाक़ कहते हैं कि इसके बाद जब वह कोई गड़बड़ करता, तो खुद उसकी क़ौम के लोग उस पर गुस्सा होते, उसकी पकड़ करते और उसे सख्त सुस्त कहते । इस स्थिति को देखकर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज़रत उमर रज़ि० से कहा, ऐ उमर ! क्या ख्याल है ? अल्लाह की क़सम ! अगर तुमने उस व्यक्ति को उस दिन क़त्ल कर दिया होता, जिस दिन तुमने मुझसे उसे क़त्ल करने की बात कही थी, तो उस पर बहुत सी नाकें फड़क उठती, लेकिन अगर आज उन्हीं नाकों को उसके क़त्ल का हुक्म दिया जाए, तो वे उसे क़त्ल कर देंगी।
हज़रत उमर ने कहा, अल्लाह की क़सम ! मेरी समझ में खूब आ गया है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्ल्लाहु अलैहि व सल्लम का मामला मेरे मामले से ज़्यादा बरकतों वाला है। 2