अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 64 उहुद की लड़ाई पार्ट-7

तीरंदाज़ों की भयानक ग़लती

लेकिन ठीक उस वक़्त जबकि यह छोटी-सी इस्लामी फ़ौज मक्का वालों के खिलाफ़ इतिहास के पन्नों पर एक और शानदार जीत दर्ज करा रही थी जो अपनी चमक-दमक में बद्र की लड़ाई की जीत से किसी तरह कम न थी, तीरंदाज़ों की बड़ी संख्या ने एक भयानक ग़लती कर दी जिसकी वजह से लड़ाई का पांसा पलट गया। मुसलमानों को ज़बरदस्त नुक्सान उठाना पड़ा और खुद नबी करीम सल्ल० शहादत से बाल-बाल बचे और इसकी वजह से मुसलमानों की वह साख और वह रौब जाता रहा जो बद्र की लड़ाई के नतीजे में उन्हें हासिल हुआ था।

पिछले पन्नों में बीत चुका है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तीरंदाज़ों को हार या जीत हर हाल में अपने पहाड़ी मोर्चे पर डटे रहने की कितनी ज़बरदस्त ताकीद फ़रमाई थी, लेकिन इन सारे ताकीदी हुक्मों के बावजूद जब उन्होंने देखा कि मुसलमान दुश्मन का माले ग़नीमत लूट रहे हैं, तो उन पर दुनिया की मुहब्बत का कुछ असर ग़ालिब आ गया। चुनांचे किसी ने किसी से कहा, ग़नीमत ! ग़नीमत! तुम्हारे साथी जीत गए…! अब किस चीज़ का इन्तिज़ार है !

इस आवाज़ के उठते ही उनके कमांडर हज़रत अब्दुल्लाह बिन जुबैर ने उन्हें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सललम के आदेश याद दिलाए और फ़रमाया कि क्या तुम लोग भूल गए कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तुम्हें क्या आदेश दिया था ?

लेकिन उनकी बड़ी तायदाद ने इस याददेहानी पर कान न धरा और कहने

1. सहीह बुखारी 2/579

लगे, ख़ुदा की क़सम ! हम भी लोगों के पास ज़रूर जाएंगे और कुछ माले ग़नीमत ज़रूर हासिल करेंगे।

इसके बाद चालीस तीरंदाज़ों ने अपने मोर्चे छोड़ दिए और माले ग़नीमत समेटने के लिए आम फ़ौज में जा शामिल हुए। इस तरह मुसलमानों का पिछला भाग खाली हो गया और वहां सिर्फ़ अब्दुल्लाह बिन जुबैर और उनके नौ साथी बाक़ी रह गए जो इस संकल्प के साथ अपने मोर्चे पर डटे रहे कि या तो इन्हें इजाज़त दी जाएगी या वे अपनी जान दे देंगे।

इस्लामी फ़ौज मुश्रिकों के घेरे में

हज़रत खालिद बिन वलीद, जो इससे पहले तीन बार इस मोर्चे को क़ाबू में करने की कोशिश कर चुके थे, इस सुनहरे मौक़े से फ़ायदा उठाते हुए बड़ी तेज़ी से चक्कर काट कर इस्लामी फ़ौज के पिछले हिस्से में पहुंचे और कुछ क्षणों में अब्दुल्लाह बिन जुबैर और उनके साथियों का सफाया करके मुसलमानों पर पीछे से टूट पड़े। उनके घुड़सवारों ने एक नारा लगाया, जिससे हारे हुए मुश्किों को इस नई तब्दीली का पता लग गया और वे भी मुसलमानों पर टूट पड़े।

इधर क़बीला बनू हारिस की एक औरत उमरा बिन्त अलक़मा ने लपक कर ज़मीन पर पड़ा हुआ मुश्किों का झंडा उठा लिया। फिर क्या था ! बिखरे हुए मुश्कि उसके आस-पास सिमटने लगे और एक ने दूसरे को आवाज़ दी, जिसके नतीजे में वे मुसमलानों के खिलाफ़ इकट्ठा हो गए और जम कर लड़ाई शुरू कर दी।

अब मुसलमान आगे और पीछे दोनों ओर से घेरे में आ चुके थे, मानो चक्की के दो पाटों के बीच में पड़ गए थे 1

अल्लाह के रसूल सल्ल० का ख़तरे से भरा फ़ैसला और वीरतापूर्ण क़दम

उस वक़्त अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सिर्फ़ नौ2 सहाबा की नफ़री के साथ पीछे तशरीफ़ रखते थे और मुसलमानों की मार-धाड़ और

1. यह बात सहीह बुखारी में हज़रत बरा बिन आज़िब रज़ि० से रिवायत की गई है। देखिए 1/426

2. सहीह मुस्लिम (2/107) में रिवायत है कि आप उहुद के दिन सिर्फ सात अंसार और दो कुरैशी साथियों के दर्मियान रह गए थे। 3. इसकी दलील अल्लाह का यह इर्शाद है कि ‘रसूल तुम्हारे पीछे
से तुम्हें बुला रहे थे।’

मुश्किों के खदेड़े जाने का दृश्य देख रहे थे कि आपको अचानक खालिद बिन वलीद के घुड़सवार दिखाई दिए।

इसके बाद आपके सामने दो ही रास्ते थे, या तो आप अपने नौ साथियों के साथ तेज़ी से भाग कर किसी सुरक्षित जगह चले जाते और अपनी फ़ौज को जो अब घेरे में आया ही चाहती थी, उसके भाग्य पर छोड़ देते या अपनी जान खतरे में डालकर अपने सहाबा को बुलाते और उनकी एक बड़ी तायदाद अपने पास जमा करके एक मज़बूत मोर्चा जमाते और उसके ज़रिए मुश्किों का घेरा तोड़ कर अपनी फ़ौज के लिए उहुद की ऊंचाई की ओर जाने का रास्ता बनाते ।

आज़माइश की इस सबसे नाजुक घड़ी में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ओर से विवेक और अपूर्व वीरता का प्रदर्शन हुआ, क्योंकि आपने जान बचाकर भागने के बजाए अपनी जान खतरे में डालकर सहाबा किराम की जान बचाने का फ़ैसला किया।

चुनांचे आपने खालिद बिन वलीद के घुड़सवारों को देखते ही बड़ी ऊंची आवाज़ में सहाबा को पुकारा, ‘अल्लाह के बन्दो, इधर….’

हालांकि आप जानते थे कि यह आवाज़ मुसलमानों से पहले मुश्किों तक पहुंच जाएगी और यही हुआ भी ।

चुनांचे यह आवाज़ सुनकर मुश्रिकों को मालूम हो गया कि आप यहीं मौजूद हैं। इसलिए उनका एक दस्ता मुसलमानों से पहले आपके पास पहुंच गया और बाक़ी घुड़सवारों ने तेज़ी के साथ मुसलमानों को घेरना शुरू कर दिया । अब हम दोनों मोर्चे का विवेचन अलग-अलग कर रहे हैं।

मुसलमानों में बिखराव

जब मुसलमान घेरे में आ गए, तो एक गिरोह तो होश खो बैठा। उसे सिर्फ अपनी जान की पड़ी थी। चुनांचे उसने लड़ाई का मैदान छोड़कर भागने का रास्ता अपनाया। उसे कुछ ख़बर न थी कि पीछे क्या हो रहा है? उनमें से कुछ तो भाग कर मदीने में जा घुसे और कुछ पहाड़ के ऊपर चढ़ गए।

एक और गिरोह पीछे की ओर पलटा तो मुश्किों में मिल गया। दोनों फ़ौजें गड्डमड्ड हो गईं और एक को दूसरे का पता न चल सका। इसके नतीजे में खुद मुसलमानों के हाथों कुछ मुसलमान मार डाले गए।

चुनांचे सहीह बुखारी में हज़रत आइशा रज़ि० से रिवायत है कि उहुद के दिन (पहले) मुश्किों की ज़ोरदार हार हुई, इसके बाद इब्लीस ने आवाज़ लगाई

कि अल्लाह के बन्दो ! पीछे…! इससे अगली लाइन पलटी और पिछली लाइन से गुथ गई ।

हुज़ैफ़ा ने देखा कि उनके पिता यमान पर हमला हो रहा है, वह बोले, ‘अल्लाह के बन्दो ! मेरे पिता हैं।’ लेकिन खुदा की क़सम ! लोगों ने उनसे हाथ न रोका, यहां तक कि उन्हें मार ही डाला ।

हुज़ैफ़ा ने कहा, अल्लाह आप लोगों की मफ़िरत करे।

हज़रत उर्व: का बयान है कि खुदा की क़सम ! हज़रत हुज़ैफ़ा रज़ि० में हमेशा खैर बाक़ी रहा, यहां तक कि वह अल्लाह से जा मिले।

तात्पर्य यह कि इस गिरोह की सफ़ों में बिखराव और अफ़रा तफ़री पैदा हो गई थी। बहुत से लोग चकित और स्तब्ध थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि किधर जाएं। इसी बीच एक पुकारने वाले की पुकार सुनाई दी कि मुहम्मद क़त्ल कर दिए गए हैं। इससे रहा-सहा होश भी जाता रहा। अक्सर लोगों के हौसले टूट गए। कुछ ने लड़ाई से हाथ रोक लिया, और दुखी होकर हथियार फेंक दिए ।

कुछ और लोगों ने सोचा कि मुनाफ़िक़ों के सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई से मिलकर कहा जाए कि वह अबू सुफ़ियान से उनके लिए अमान तलब कर दे

कुछ क्षणों के बाद इन लोगों के पास से हज़रत अनस बिन नज्र रज़ियल्लाहु अन्हु का गुज़र हुआ। देखा कि हाथ पर हाथ धरे पड़े हैं। पूछा, किस बात का इन्तिज़ार ?

गए । जवाब दिया, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़त्ल कर दिए

हज़रत अनस बिन नज्र ने कहा, तो अब आपके बाद तुम लोग ज़िंदा रहकर क्या करोगे ? उठो और जिस चीज़ पर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जान दे दी, उस पर तुम भी जान दे दो।

इसके बाद कहा, ऐ अल्लाह ! इन लोगों ने (यानी मुसलमानों ने) जो कुछ किया

1. सहीह बुखारी 1/539, 2/581, फ़हुल बारी 7/351, 362, 363, बुखारी के अलावा कुछ रिवायतों में ज़िक्र किया गया है कि अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उनकी दिय देनी चाही, लेकिन हज़रत हुज़ैफ़ा रज़ि० ने कहा, मैंने उनकी दियत मुसलमानों प सदक़ा कर दी। इसकी वजह से नबी सल्लल्लाहु व सल्लम के नज़दीक हज़रत हुज़ैफ़ रज़ि० के ख़ैर में और बढ़ोत्तरी हो गई। देखिए मुख्तसरुस्सीरः, शेख अब्दुल्लाह नदी पृष्ठ 2461

है, उस पर मैं तेरे हुज़ूर माज़रत करता हूं और उन लोगों ने (यानी मुश्किों ने) जो कुछ किया है, उससे अलगाव अपनाता हूं और यह कहकर आगे बढ़ गए।

आगे हज़रत साद बिन मुआज़ रजि० से मुलाक़ात हो गई। उन्होंने मालूम किया, अबू उमर ! कहां जा रहे हो ?

हज़रत अनस रजि० ने जवाब दिया, आहा! जन्नत की खुशबू का क्या कहना, ऐ साद! मैं इसे उहुद के परे महसूस कर रहा हूं। इसके बाद और आगे बढ़े और मुश्टिकों से लड़ते हुए शहीद हो गए।

लड़ाई के अन्त में उन्हें पहचाना न जा सका, यहां तक कि उनकी बहन ने उन्हें सिर्फ़ उंगुलियों के पोर से पहचाना। उनको नेज़े, तलवार और तलवार के अस्सी से ज़्यादा घाव आए थे।’

इसी तरह साबित बिन ददाह रज़ि० ने अपनी क़ौम को पुकार कर कहा, अगर मुहम्मद सल्ल० क़त्ल कर दिए गए हैं, तो अल्लाह तो जिंदा है, वह तो नहीं मर सकता। तुम अपने दीन के लिए लड़ो। अल्लाह तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हें विजय भी देगा।

इस पर अंसार की एक जमाअत उठ खड़ी हुई और हज़रत साबित रज़ि० ने उनकी मदद से खालिद की टुकड़ी पर हमला कर दिया और लड़ते-लड़ते खालिद के हाथों नेज़े से शहीद हो गए।

उन्हीं की तरह उनके साथियों ने भी लड़ते-लड़ते शहादत का दर्जा हासिल कर लिया

एक मुहाजिर सहाबी एक अंसारी सहाबी के पास से गुज़रे, जो खून में लत-पत थे ।

मुहाजिर ने कहा, भाई फ्लां ! आपको मालूम हो चुका है कि मुहम्मद क़त्ल है कर दिए गए ?

अंसारी ने कहा, अगर मुहम्मद क़त्ल कर दिए गए, तो वह अल्लाह का दीन पहुंचा चुके हैं। अब तुम्हारा काम है कि उस दीन की हिफ़ाज़त के लिए लड़ो। 3

इस तरह की हौसला बढ़ाने वाली और मनोबल ऊंचा करने वाली बातों से इस्लामी फ़ौज के हौसले बहाल हो गए और उनके होश व हवास अपनी जगह आ

  1. ज़ादुल मआद, 2/93-96, सहीह बुखारी, 2/579 2. अस्सीरतुल हलबीया, 2/22 3. जादुल मआद, 2/96

गए। चुनांचे उन्होंने हथियार डालने या इब्ने उबई से मिलकर अमान की तलब की बात सोचने के बजाए हथियार उठा लिए और मुश्किों के तेज तूफ़ान से टकरा कर उनका घेरा तोड़ने और नेतृत्व-केन्द्र तक रास्ता बनाने की कोशिश में लग गए।

इसी बीच यह भी मालूम हो गया कि अल्लाह के रसूल सल्ल० के क़त्ल की खबर सिर्फ झूठ और गढ़ी हुई है, इससे उनकी ताक़त और बढ़ गई, उनका हौसला बढ़ा और मनोबल और ऊंचा हो गया, चुनांचे वे एक भयानक और खूनी लड़ाई के बाद घेरा तोड़कर निकलने और एक मज़बूत सेन्टर के क़रीब जमा होने में कामियाब हो गए।

इस्लामी फ़ौज का तीसरा गिरोह वह था जिसे सिर्फ़ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की चिन्ता थी। यह गिरोह घेराव की कार्रवाई को जानते ही अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ओर पलटा । उनमें कई आगे-आगे और सबसे पहले अबू बक्र सिद्दीक़, उमर बिन खत्ताब और अली बिन अबी तालिब जैसे सहाबा किराम रिज्वानुल्लाहि अलैहिम अजमईन थे ।

ये लोग लडने वालों में भी सबसे आगे थे और जब नबी सल्ल० की पवित्र हस्ती के लिए खतरा पैदा हुआ तो आपकी रक्षा और प्रतिरक्षा करने वालों में भी सबसे आगे आ गए।