अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 69

ग़ज़वा बनी नज़ीर

हम बता चुके हैं कि यहूदी इस्लाम और मुसलमानों से जलते-भुनते थे, मगर चूंकि वे मैदान के आदमी न थे, साज़िशी लोग थे, इसलिए लड़ाई के बजाए कीना और दुश्मनी का प्रदर्शन करते थे और मुसलमानों से वायदों और समझौतों के बावजूद पीड़ा पहुंचाने के लिए तरह-तरह के हीले और चालें चला करते थे । अलबत्ता बनू क़ैनुकाअ का देश निकाला और काब बिन अशरफ़ की हत्या की घटना घटी तो उनका मनोबल टूट गया और उन्होंने डरकर चुप्पी साध ली, लेकिन उहुद की लड़ाई के बाद उनकी हिम्मत फिर पलट आई। उन्होंने खुल्लम खुल्ला दुश्मनी की और वचन-भंग किया। मदीना के मुनाफ़िक़ों और मक्का के मुश्किों से परदे के पीछे सांठ-गांठ की गई और मुसलमानों के खिलाफ़ मुश्किों के समर्थन में काम किया 12

नबी सल्ल० ने सब कुछ जानते हुए सब्र से काम लिया, लेकिन रजीअ और मऊना की दुर्घटनाओं के बाद उनकी जुर्रात बहुत ज़्यादा बढ़ गई और उन्होंने नबी सल्ल० ही के खात्मे का प्रोग्राम बना लिया ।

इसका विवरण यह है कि नबी सल्ल० अपने कुछ साथियों के साथ यहूदियों के पास तशरीफ़ ले गए और उनसे बनू किलाब के इन दोनों मारे गए लोगों की दियत

अलैहि व सल्लम जितने बेरे मऊना वालों पर दुखी हुए, मैंने किसी और पर आपको इतना दुखी होते नहीं देखा। (2/54) 1.

सहीह बुखारी 2/586, 587, 588

2. सुनन अबू दाऊद, बाब ख़बरुन्नज़ीर की रिवायत से यह बात ली गई है, देखिए सुनने अबू दाऊद मय शरह औनुल माबूद 2/116, 117
में मदद के लिए बातचीत की। (जिन्हें हज़रत अम्र बिन उमैया जुमरी ने ग़लती से क़त्ल कर दिया था) उन पर समझौते के अनुसार यह मदद ज़रूरी थी।

उन्होंने कहा, अबुल क़ासिम ! हम ऐसा ही करेंगे। आप यहां तशरीफ़ रखिए। हम आपकी ज़रूरत पूरी किए देते हैं। आप उनके एक घर की दीवार से टेक लगाकर बैठ गए और उनके वायदे के पूरा करने का इन्तिज़ार करने लगे। आपके साथ हज़रत अबूबक्र रज़ि०, हज़रत उमर रजि०, हज़रत अली रजि० और सहाबा किराम रजि० की एक जमाअत भी थी ।

इधर यहूदी तंहाई में जमा हुए तो उन पर शैतान सवार हो गया और जो दुर्भाग्य उनका लिखा बन चुका था, उसे शैतान ने सुन्दर बनाकर पेश किया यानी इन यहूदियों ने आपस में मश्विरा किया कि क्यों न नबी सल्ल० ही को क़त्ल कर दिया जाए।

चुनांचे उन्होंने कहा, कौन है जो इस चक्की को लेकर ऊपर जाए और आपके सर पर गिराकर आपको कुचल ‘दे ?

इस पर एक भाग्यहीन यहूदी अम्र बिन जहश ने कहा, ‘मैं’ ।

इन लोगों से सलाम बिन मुश्कम ने कहा भी कि ऐसा न करो, क्योंकि खुदा की क़सम ! इन्हें तुम्हारे इरादों की ख़बर दे दी जाएगी और फिर हमारे और उनके बीच जो वायदा – समझौता है, यह उसके खिलाफ़ भी है, लेकिन उन्होंने एक न सुनी और अपने मंसूबे को अमली जामा पहनाने पर उतर आए।

इधर अल्लाह की ओर से अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास हज़रत जिब्रील तशरीफ़ लाए और आपको यहूदियों के इरादे से ख़बरदार किया। आप तेज़ी से उठे और मदीने के लिए चल पड़े। बाद में सहाबा किराम भी आपसे आ मिले और कहने लगे आप उठ आए और हम समझ न सके।

आपने बताया कि यहूदियों का इरादा क्या था ।

मदीना वापस आकर आपने तुरन्त ही मुहम्मद बिन मस्लमा को बनी नज़ीर के पास रवाना फ़रमाया और उन्हें यह नोटिस दिया कि तुम लोग मदीने से निकल जाओ । अब यहां मेरे साथ नहीं रह सकते, तुम्हें दस दिन की मोहलत दी जाती है। इसके बाद जो व्यक्ति पाया जाएगा, उसकी गरदन मार दी जाएगी। इस नोटिस के बाद यहूदियों के देश निकाला के सिवा कोई रास्ता समझ में न आया ।

चुनांचे वे कुछ दिन तक सफ़र की तैयारी करते रहे। लेकिन इसी बीच अब्दुल्लाह बिन उबई, मुनाफ़िक़ों के सरदार ने कहला भेजा कि अपनी जगह बरक़रार रहो, डट जाओ और घर-बार न छोड़ो। मेरे पास दो हज़ार लड़ने वाले

मर्द हैं, जो तुम्हारे साथ क़िले में दाखिल होकर तुम्हारी हिफ़ाज़त में जान दे देंगे और अगर तुम्हें निकाला ही गया तो हम भी तुम्हारे साथ निकल जाएंगे और तुम्हारे बारे में हरगिज़ किसी से नहीं दवेंगे और अगर तुमसे लड़ाई की गई तो हम तुम्हारी मदद करेंगे और बनू कुरैज़ा और बनू ग़तफ़ान जो तुम्हारे मित्र हैं, वे भी तुम्हारी मदद करेंगे।

यह पैग़ाम सुनकर यहूदियों का आत्मविश्वास पलट आया और उन्होंने तै कर लिया कि देश निकाला लेने के बजाए टक्कर ली जाएगी। उनके सरदार हुइ बिन अखतब को उम्मीद थी कि मुनाफ़िक़ों के सरदार ने जो कुछ कहा है वह पूरा करेगा, इसलिए उसने रसूलुल्लाह सल्ल० के पास जवाबी सन्देश भेज दिया कि हम अपने घरों से नहीं निकलते। आपको जो करना हो कर लें।

इसमें सन्देह नहीं कि मुसलमानों की दृष्टि से यह स्थिति नाजुक थी, क्योंकि उनके लिए अपने इतिहास के इस नाज़ुक और पेचीदा मोड़ पर दुश्मनों से टकराव कुछ ज़्यादा सन्तोषजनक न था। अंजाम खतरनाक हो सकता था। सारा अरब मुसलमानों के खिलाफ़ था और मुसलमानों के दो प्रचार दल बड़ी बेदर्दी से मारे जा चुके थे।

फिर बनू नज़ीर के यहूदी इतने ताक़तवर थे कि उनका हथियार डालना आसान न था और उनसे लड़ाई मोल लेने में तरह-तरह की आशंकाएं थीं। पर बेरे मऊना की दुखद घटना से पहले और उसके बाद के हालात ने जो नई करवट ली थी, उसकी वजह से मुसलमान क़त्ल और वचन-भंग करने जैसे अपराधों के सिलसिले में ज़्यादा भावुक हो गए थे और इन अपराध के करने वालों के खिलाफ़ मुसलमानों की प्रतिशोध-भावना बढ़ गई थी, इसलिए उन्होंने तै कर लिया कि चूंकि बनू नज़ीर ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हत्या का प्रोग्राम बनाया था, इसलिए उनसे बहरहाल लड़ना है भले ही इसके कुछ भी नतीजे निकलें।

चुनांचे जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को हुइ बिन अखतब का जवाबी पैग़ाम मिला तो आपने और सहाबा किराम रज़ि० ने कहा, अल्लाहु अक्बर और फिर लड़ाई के लिए उठ खड़े हुए और हज़रत इब्ने उम्मे मक्तूम रज़ि० को मदीने का इन्तिज़ाम सौंप कर बनू नज़ीर के इलाक़े की ओर रवाना हो गए। हज़रत अली रज़ि० के हाथ में झंडा था। बनू नज़ीर के इलाक़े में पहुंचकर उन्हें घेर लिया गया।

इधर बनू नज़ीर ने अपने क़िलों और गढ़ियों में पनाह ली और क़िला बन्द के बाग़ उनके लिए रहकर फ़सील से तीर और पत्थर बरसाते रहे, चूंकि खजूर ढाल का काम दे रहे थे, इसलिए आपने हुक्म दिया कि इन पेड़ों को काट कर जला दिया जाए। बाद में इसी की तरफ़ इशारा करके हज़रत हस्सान रजि० ने फ़रमाया था—

‘बनी लुवी के सरदारों के लिए यह मामूली बात थी कि बुवैरा में आग के शोले भड़कें’ (बुवैरा बनू नज़ीर के मरुद्यान का नाम था) और उसी के बारे में अल्लाह का यह इर्शाद भी आया-

‘तुमने जो खजूर के पेड़ काटे या जिन्हें अपने तनों पर खड़ा रहने दिया वह सब अल्लाह ही के हुक्म से था और ऐसा इसलिए किया गया ताकि इन नाफ़रमानों को रुसवा करे ।’ (59/5)

बहरहाल जब उनका घेराव कर लिया गया, तो बनू कुरैज़ा उनसे अलग-थलग रहे। अब्दुल्लाह बिन उबई ने भी धोखा दिया और उनके मित्र ग़तफ़ान भी मदद को न आए। ग़रज़ कोई भी इन्हें मदद देने या इनकी मुसीबत टालने पर तैयार न हुआ, इसीलिए अल्लाह ने उनकी घटना की मिसाल यों बयान फ़रमाई-

‘जैसे शैतान उनसे कहता है, कुन करो और जब वह कुन कर बैठता है, तो शैतान कहता है, मैं तुमसे बरी हूं।’ (59/61)

घेराव कुछ ज़्यादा लम्बा नहीं हुआ, बल्कि सिर्फ़ छः रात, या कुछ लोगों के कहने के अनुसार पन्द्रह रात चला कि इस बीच अल्लाह ने उनके दिलों में रौब डाल दिया। उनका मनोबल टूट गया, वे हथियार डालने पर तैयार हो गए और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहलवा भेजा कि हम मदीने से निकलने को तैयार हैं। आपने उनके देश निकाला के प्रस्ताव को मान लिया और यह भी मान लिया कि वे हथियार के अलावा बाक़ी जितना साज़ व सामान ऊंटों पर लाद सकते हों, सब लेकर बाल-बच्चों समेत चले जाएं ।

बनू कुरैज़ा ने इस मंजूरी के बाद हथियार डाल दिए और अपने हाथों अपने मकान उजाड़ डाले, ताकि दरवाज़े और खिड़कियां भी लाद ले जाएं, बल्कि कुछ ने तो छत की कड़ियां और दीवारों की खूंटियां भी लाद लीं, फिर औरतों और बच्चों को सवार किया और छः सौ ऊंटों पर लद-लदा कर रवाना हो गए।

ज़्यादातर यहूदियों और उनके सरदारों ने जैसे, हुइ बिन अख़तब और सलाम बिन अबी हुक़ैक़ ने ख़ैबर का रुख किया। एक जमाअत शामदेश रवाना सिर्फ़ दो आदमियों यानी यामीन बिन अम्र और अबू सईद बिन वहब ने इस्लाम क़ुबूल किया। इसलिए उनके माल को हाथ नहीं लगाया गया।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने शर्त के मुताबिक़ बनू
नजीर के हथियार, ज़मीन, घर और बाग़ अपने क़ब्ज़े में ले लिए। हथियार में पचास ज़िरहें (कवच), पचास खूद और तीन सौ चालीस तलवारें थीं।

बनू नज़ीर के ये बाग़, ज़मीन और मकान, खालिस अल्लाह के रसूल सल्ल० का हक़ था। आपको अधिकार था कि आप इसे अपने लिए बचा के रखें या जिसे चाहें दे दें। चुनांचे आपने (ग़नीमत के माल की तरह) इन मालों का पांचवां हिस्सा नहीं निकाला, क्योंकि अल्लाह ने इसे आपको फ़ै के तौर पर दिया था। मुसलमानों ने इस पर घोड़े और ऊंट दौड़ा कर इसे (तलवार के बल पर) नहीं हासिल किया था । इसलिए आपने अपने इस विशेषाधिकार के तहत इस पूरे माल को सिर्फ़ शुरू के मुहाजिरों में बांट दिया, अलबत्ता दो अंसारी सहाबा यानी अबू दुजाना और सहल बिन हुनैफ़ रज़ि० को उनकी तंगदस्ती की वजह से उसमें कुछ दे दिया। से

इसके अलावा आपने अपने लिए (एक छोटा सा टुकड़ा बचा लिया, जिसमें से आप अपनी बीवियों का साल भर का खर्च निकालते थे और इसके बाद जो कुछ बचता था, उसे जिहाद की तैयारी के लिए हथियार और घोड़ों के जुटाने में लगा दिया करते थे ।

ग़ज़वा बनी नज़ीर रबीउल अव्वल 04 हि०, तद० अगस्त सन् 625 ई० में पेश आया और अल्लाह ने इस ताल्लुक़ से पूरी सूरः हश्र उतारी, जिसमें यहूदियों को देश निकाला दिए जाने का चित्र खींचते हुए मुनाफ़िक़ों की रीति-नीति पर से परदा उठा दिया गया है और फ़ै माल के हुक्मों का बयान फ़रमाते हुए मुहाजिर और अंसार की सराहना की गई है और यह भी बताया गया है कि लड़ाई की मस्लहतों को देखते हुए दुश्मन के पेड़ काटे जा सकते हैं और उनमें आग लगाई जा सकती है। ऐसा करना ‘धरती में बिगाड़ पैदा करना’ नहीं है।

फिर ईमान वालों को तक़्वा अपनाने और आखिरत की तैयारी की ताकीद की गई है।

इन सब के बाद अल्लाह ने अपना गुणगान करते हुए अपने गुणों का बखान करते हुए सूरः खत्म फ़रमा दी है।

इब्ने अब्बास रज़ि० इस सूर: (हश्र) के बारे में फ़रमाया करते थे कि इसे सूरः बनी नज़ीर कहो ।

यह उस लड़ाई के बारे में इब्ने इस्हाक़ और सीरत पर लिखने वाले आम विद्वानों के बयान का सार है। इमाम अबू दाऊद और अब्दुर्रज़्ज़ाक आदि ने इस

1. इब्ने हिशाम 2/190, 191, 192, ज़ादुल मआद 2/71, 110, सहीह बुखारी 2/574, 575

लड़ाई की एक दूसरी वजह रिवायत की है और वह यह है कि जब बद्र की लड़ाई पेश आई तो उस बद्र की लड़ाई के बाद कुरैश ने यहूदियों को लिखा कि तुम लोगों के पास कवच और क़िले हैं, इसलिए तुम लोग हमारे साहब (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से लड़ाई करो वरना हम तुम्हारे साथ ऐसा और ऐसा करेंगे और हमारे और तुम्हारे पाज़ेब के दर्मियान कोई चीज़ रुकावट न बन सकेगी। जब यहूदियों को यह ख़त मिला तो बनू नज़ीर ने ग़दर का फ़ैसला कर लिया, चुनांचे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहला भेजा कि आप अपने साथियों में से तीस आदमी को साथ लेकर हमारी ओर तशरीफ़ लाएं और हमारी ओर से भी तीस आमिल निकलें, फ़्लां जगह जो हमारे और आपके बीच है, मुलाक़ात हो और वे आपकी बात सुनें। इसके बाद अगर वह आपको सच्चा मान लें और आप पर ईमान ले आएं तो हम सब आप पर ईमान ले आएंगे।

इस प्रस्ताव के अनुसार नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तीस सहाबा रज़ि० के साथ तशरीफ़ ले गए और यहूदियों के भी तीस आलिम आए। एक खुली जगह पहुंचकर कुछ यहूदियों ने कुछ से कहा, देखो, इनके साथ तीस आदमी होंगे, जिनमें से हर एक इनसे पहले मरना पसन्द करेगा। ऐसी स्थिति में तुम उन तक कैसे पहुंच सकते हो ? इसके बाद उन्होंने कहला भेजा कि हम साठ आदमी होंगे, तो आप कैसे समझाएंगे और हम कैसे समझेंगे ? बेहतर है कि आप अपने तीन साथियों के साथ आएं और हमारे भी तीन आलिम के पास जाएं। और वे आपकी बात सुनें। अगर वे ईमान लाएंगे तो हम सब ईमान लाएंगे और आपकी पुष्टि करेंगे। चुनांचे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने तीन सहाबा के साथ तशरीफ़ ले गए। उधर यहूदी नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के क़त्ल के इरादे से खंजर छिपाकर लाए, लेकिन बनू नज़ीर की एक हितैषी औरत ने अपने भतीजे के पास, जो एक अंसारी मुसलमान था— अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ बनू नज़ीर के ग़द्र के इरादे की ख़बर भेजी। वह तेज़ रफ़्तारी से आया और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को उन तक पहुंचने से पहले ही पा लिया और कानों में उनकी खबर सुनाई। आप वहीं से वापस आ गए और दूसरे दिन सहाबा किराम के दस्ते लेकर तशरीफ़ ले गए और उनका घेराव कर लिया और फ़रमाया कि तुम लोग जब तक मुझे अद व पैमान न दे दो, भरोसे योग्य नहीं। उन्होंने किसी भी प्रकार का अहद देने से इन्कार कर दिया। इस पर आपने और मुसलमानों ने उस दिन उनसे लड़ाई की। दूसरे दिन घोड़े और दस्ते लेकर आप बनू कुरैज़ा के पास तशरीफ़ ले गए और बनू नज़ीर को उनके हाल पर छोड़ दिया। बनू कुरैज़ा को अहद व पैमान करने की दावत दी। उन्होंने समझौता कर लिया, इसलिए आप उनसे पलट

आए और दूसरे दिन दस्तों के साथ फिर बनू नज़ीर का रुख किया और उनसे लड़ाई लड़ी। आखिर में उन्होंने इस शर्त पर देश निकाला मंजूर कर लिया कि हथियारों के सिवा जो कुछ ऊंटों पर लादा जा सकता है, उसे हम ले जा सकेंगे । चुनांचे बनू नज़ीर आए और अपने साज़ व सामान, घरों के दरवाज़े और लकड़ियां, ग़रज़ यह कि जो कुछ भी ऊंटों से उठ सकता था, उसे लाद लिया, इसके लिए उन्होंने खुद अपने हाथों अपने घर बर्बाद किए और उन्हें ढाया और जो लकड़ियां काम की हुईं, उन्हें लाद लिया। यह देश निकाला शाम देश की तरफ़ उन लोगों का पहला जमाव या पहला हांका और जमाव था ।

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