
सफ़ा पहाड़ी पर
जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अच्छी तरह इत्मीनान कर लिया कि अल्लाह के दीन के प्रचार के समय अबू तालिब उनका समर्थन करेंगे, तो एक दिन आप सफा पहाड़ी पर तशरीफ़ ले गए और सबसे ऊंचे पत्थर पर चढ़कर यह आवाज़ लगाई, या सबाहा (हाय सुबह !) (अरबों का चलन था कि दुश्मन के हमले या किसी संगीन ख़तरे से सूचित करने के लिए किसी ऊंची जगह पर चढ़कर इन्हीं शब्दों से पुकारते थे ।)
इसके बाद आपने कुरैश की एक-एक शाख और एक-एक खानदान को आवाज़ लगाई : ऐ बनी फ़ह ! ऐ बनी अदी ! ऐ बनी फ़्लां ! और ऐ बनी फ्लां ! ऐ बनी अब्दे मुनाफ़ ! ऐ बनी अब्दुल मुत्तलिब !
जब लोगों ने आवाज़ सुनी तो कहा, कौन पुकार रहा है? जवाब मिला, मुहम्मद हैं । इस पर लोग तेज़ी से आए। अगर कोई खुद न आ सका, तो अपना आदमी भेज दिया कि देखे क्या बात है ? यों कुरैश के लोग आ गए, उनमें अबू लहब भी था।
जब सब जमा हो गए, तो आपने फ़रमाया, यह बताओ, अगर मैं ख़बर दूं कि उधर इस पहाड़ के दामन में घाटी के अन्दर घोड़सवारों की एक जमाअत हैं जो तुम पर छापा मारना चाहती है, तो क्या तुम लोग मुझे सच्चा मानोगे ?
लोगों ने कहा, हां ! हां ! हमने आप पर कभी झूठ का तजुर्बा नहीं किया है, हमने आप पर सच ही का तजुर्बा किया है।
आपने फ़रमाया, अच्छा, तो मैं एक सख्त अज़ाब से पहले तुम्हें ख़बरदार करने के लिए भेजा गया हूं। मेरी और तुम्हारी मिसाल ऐसे ही है जैसे किसी आदमी ने दुश्मन को देखा, फिर उसने किसी ऊंची जगह पर चढ़कर अपने खानदान वालों पर नज़र डाली तो उसे डर हुआ कि दुश्मन उससे पहले पहुंच जाएगा, इसलिए उसने
1. फ्रिक्हुस्सीर: पृ० 77, 88; इब्नुल असीर से लिया गया।
वहीं से पुकार लगानी शुरू कर दी, या सबाहा ! (हाय सुबह !)
इसके बाद आपने लोगों को हक़ की दावत दी और अल्लाह के अज़ाब से डराया और हर ख़ास व आम को खिताब किया, चुनांचे फ़रमाया-
कुरैश के लोगो ! अपने आपको अल्लाह से खरीद लो, जहन्नम से बचा लो। मैं तुम्हारे लाभ-हानि का अधिकार नहीं रखता। तुम्हें अल्लाह की पकड़ से बचाने के लिए कुछ काम आ सकता हूं ।
बनू काब बिन लुई ! अपने आपको जहन्नम से बचा लो, क्योंकि तुम्हारे हानि-लाभ का अधिकार नहीं ।
बनू मुर्रा बिन ‘काब ! अपने आपको जहन्नम से बचा लो।
बनू कुसई ! अपने आपको जहन्नम से बचा लो, क्योंकि तुम्हारे हानि-लाभ का अधिकार नहीं ।
बनू अब्दे मुनाफ़ ! अपने आपको जहन्नम से बचा लो, क्योंकि मुझे तुम्हारे हानि-लाभ का कुछ अधिकार नहीं। मैं तुम्हें अल्लाह से बचाने में कुछ काम आ सकता हूं ।
बनू अब्दे शम्स ! अपने आपको जहन्नम से बचा लो ।
बनू हाशिम ! अपने आपको जहन्नम से बचा लो ।
बनू अब्दुल मुत्तलिब ! अपने आपको जहन्नम से बचा लो, क्योंकि मैं तुम्हारे लाभ-हानि का मालिक नहीं और न तुम्हें अल्लाह से बचाने के लिए कुछ काम आ सकता हूं। मेरे माल में से जो चाहो, मांग लो, मगर मैं तुम्हें अल्लाह से बचाने का कुछ अधिकार नहीं रखता।
अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब ! मैं तुम्हें भी अल्लाह से बचाने के लिए कुछ काम नहीं आ सकता ।
अल्लाह के रसूल सल्ल० की फूफी, सफ़िया बिन्त अब्दुल मुत्तलिब ! मैं तुम्हें भी अल्लाह से बचाने के लिए कुछ काम नहीं आ सकता ।
फ़ातिमा बिन्त मुहम्मद रसूलुल्लाह ! मेरे माल में से जो चाहो, मांग लो, मगर अपने आपको जहन्नम से बचाओ, क्योंकि मैं तुम्हारे भी लाभ-हानि का मालिक नहीं, और न तुम्हें अल्लाह से बचाने के लिए कुछ काम आ सकता हूं।
जब यह डरावा खत्म हुआ तो लोग बिखर गए। उनके किसी तत्काल प्रतिक्रिया का कोई उल्लेख नहीं मितला। अलबत्ता अबू लहब ने बद-तमीज़ी की, कहने लगा, तूं सारे दिन ग़ारत हो, तूने हमें इसीलिए जमा किया था। इस पर सूरः तब्बत यदा अबी ल-ह-बिं-व तब्ब उतरी कि अबू लब के दोनों हाथ ग़ारत हो
गए और वह खुद ग़ारत हो ।
यह पुकार प्रचार की इंतिहा थी। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सबसे क़रीबी लोगों पर स्पष्ट कर दिया था कि अब इस रिसालत की पुष्टि ही पर ताल्लुक़ात तोड़े-जोड़े जा सकते हैं और जिस नस्ली और क़बीलेवार पक्षपात पर अरब क़ायम हैं, वह अल्लाह के डरावे की गर्मी में पिघलकर खत्म हो चुकी है।
इस आवाज़ की गूंज अभी मक्का के आस-पास ही सुनाई दे रही थी कि अल्लाह का एक और हुक्म आया-
‘आपको जो हुक्म दिया जा रहा है, उसे खोलकर बयान कर दीजिए और मुश्किरों से रुख फेर लीजिए।’ (15:94)
चुनांचे इसके बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुश्रिकों के मज्मों और उनकी महिफ़लों में खुलेआम दावत देनी शुरू कर दी। आप लोगों को अल्लाह की किताब पढ़कर सुनाते और उनसे वही फ़रमाते जो पिछले पैग़म्बरों ने अपनी क़ौमों से फ़रमाया था कि ‘ऐ मेरी क़ौम के लोगो ! अल्लाह की इबादत करो। तुम्हारे लिए उसके सिवा कोई और इबादत के लायक़ नहीं।’ इसके साथ आपने लोगों की आंखों के सामने दिन घाड़े आम मज्मे के रूबरू अल्लाह की इबादत भी शुरू कर दी।
आपकी दावत लोकप्रिय होने लगी और लोग अल्लाह के दीन में दाखिल होने लगे। जो इस्लाम अपनाता, उसमें और उसके घर वालों में द्वेष, दूरी और विरोध शुरू हो जाता। कुरैश इस स्थिति से तंग होने लगे और जो कुछ उनकी निगाहों के सामने आ रहा था, उन्हें नागवार महसूस होने लगा।
हक़ को रोकने के लिए मज्लिसे शूरा
उन्हीं दिनों कुरैश के सामने एक और कठिनाई आ खड़ी हुई यानी अभी खुल्लम खुल्ला प्रचार में कुछ महीने ही बीते थे कि हज का मौसम क़रीब आ गया। कुरैश को मालूम था कि अब अरब की मंडलियों का आना शुरू होगा, इसलिए वे ज़रूरी समझते थे कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में कोई बात कहें कि जिसकी वजह से अरबों पर आपकी तब्लीग़ का असर न हो।
1. सहीह बुखारी 1/285, 2/702, 743, सहीह मुस्लिम 1/114, फ़हुल बारी 5/449, 6/937, 8/361, हदीस न० 2753, 3525, 3526, 3527, 2077 तिर्मिज़ी, तफ़्सीर सूरः शुअरा वग़ैरह ।
चुनांचे वे इस बात पर बातचीत के लिए वलीद बिन मुग़ीरह के पास इकट्ठा हुए। वलीद ने कहा, इस बारे में तुम सब लोग एक राय अपना लो, तुम में आपस में कोई मतभेद नहीं होना चाहिए कि खुद तुम्हारा ही एक आदमी दूसरे आदमी को झुठला दे और एक की बात दूसरे की बात को काट दे। लोगों ने कहा, आप ही कहिए। उसने कहा, नहीं तुम लोग कहो, मैं सुनूंगा। इस पर कुछ लोगों ने कहा, हम कहेंगे कि वह काहिन है।
वलीद ने कहा, नहीं, खुदा की क़सम ! वह काहिन नहीं है। हमने काहिनों को देखा है। उसमें न काहिनों जैसी गुनगुनाहट है, न उनके जैसी तुकबन्दी । इस पर लोगों ने कहा, तब हम कहेंगे कि वह पागल है।
वलीद ने कहा, नहीं, वह पागल भी नहीं। हमने पागल भी देखा है और उसकी दशा भी। उस व्यक्ति में न पागलों जैसी दम घुटने की स्थिति है और न उलटी-सीधी हरकतें हैं और न उनके जैसी बहकी-बहकी बातें।
लोगों ने कहा, तब हम कहेंगे कि वह कवि है।
वलीद ने कहा, वह कवि भी नहीं है। हमें रजज़, हजज़, कुरैज़, मक़बूज़, मब्सूत, काव्य के सारे ही प्रकार मालूम हैं। उसकी बात बहरहाल काव्य नहीं है। लोगों ने कहा, तब हम कहेंगे कि वह जादूगर है।
वलीद ने कहा, यह आदमी जादूगर भी नहीं। हमने जादूगर और उनका जादू भी देखा है। यह आदमी न तो उनकी तरह झाड़-फूंक करता है, न गिरह लगाता है। लोगों ने कहा, तब हम क्या कहेंगे?
वलीद ने कहा, ख़ुदा की क़सम ! उसकी बात बहुत मीठी है, उसकी जड़ मज़बूत है और उसकी शाखा फलदार है। तुम जो बात भी कहोगे, लोग उसे झूठ समझेंगे, अलबत्ता उसके बारे में सबसे मुनासिब बात यह कह सकते हो कि वह जादूगर है। उसने ऐसा कलाम पेश किया है, जो जादू है। उससे बाप-बेटे, भाई-भाई, पति-पत्नी और कुंबे-क़बीले में फूट पड़ जाती है।
आखिर में लोग इसी बात से सहमत होकर वहां से विदा हुए।
कुछ रिवायतों में यह विस्तार भी मिलता है जब वलीद ने लोगों की सारी बातें रद्द कर दी, तो लोगों ने कहा कि फिर आप अपनी बे-लाग राय पेश कीजिए। इस पर वलीद ने कहा, तनिक सोच लेने दो। इसके बाद वह सोचता रहा, सोचता रहा, यहां तक कि अपनी उपरोक्त राय रखी।
1. इब्ने हिशाम 1/271
इसी मामले में वलीद के बारे में सूरः मुद्दस्सिर की सोलह आयतें (11-26) उतरी, जिनमें से कुछ आयतों में उसकी सोच की रूप-रेखा भी दी गई, चुनांचे कहा गया-
‘उसने सोचा और अन्दाज़ा लगाया। वह बर्बाद हो, उसने कैसा अन्दाज़ा लगाया ? फिर बर्बाद हो, उसने कैसा अन्दाज़ा लगाया, फिर नज़र दौडाई, फिर माथा सिकोड़ा और मुंह बिसोरा, फिर पलटा और घमंड किया, आखिरकार कहा कि यह निराला जादू है जो पहले से नक़ल होता आ रहा है। यह सिर्फ़ इंसान का कलाम है।’ (74/18-25)
बहरहाल यह प्रस्ताव पास हो गया तो उसे अमली जामा पहनाने की कार्रवाई शुरू हुई। मक्का के कुछ विरोधी हज के लिए आने वालों के अलग-अलग रास्तों पर बैठ गए और वहां से हर गुज़रने वाले को आपके ‘खतरे’ से आगाह करते हुए आपके बारे में विस्तार से बताने लगे।’
जहां तक अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का ताल्लुक़ है तो आप हज के दिनों में लोगों के डेरों और उकाज़, मजना और ज़ुल मजाज़ के बाज़ारों में तशरीफ़ ले जाते और लोगों को इस्लाम की दावत देते। उधर अबू लहब आपके पीछे-पीछे लगा रहता। और यह कहता कि इसकी बात न मानना, यह झूठा बद-दीन (विधर्मी) है 12
इस दौड़-धूप का नतीजा यह हुआ कि लोग इस हज से अपने घरों को वापस हुए तो उन्हें यह बात मालूम हो चुकी थी कि आपने नबी होने का दावा किया है और यों उनके ज़रिए पूरे अरब में आपकी चर्चा फैल गई।

