चौदह सितारे इमाम मेहदी- 5

अलामते ज़हूरे मेहदी (अ.स.) के मुताअल्लिक़ अरबाबे अस्मत के इरशादात

इमाम मेहदी (अ.स.) के ज़हूर से पहले बेशुमार अलामात ज़ाहिर होंगे। फिर आखि़र में आपका ज़हूर होगा। मग़रिब व मशरिक़ पर आपकी हुकूमत होगी। ज़मीन खुद ब खुद तमाम दफ़ाएन (ज़मीन के ख़ज़ाने) उगल देगी। दुनियां की कोई ऐसी ज़मीन न बाक़ी रहेगी जिसको आप आबाद न कर दें। अलामाते ज़हूर में यह चन्द हैं:

1. औरतें मरदों के मुशाबेह होगीं। 2. मर्द औरतों जैसे होगें। 3. औरतें ज़ीन जैसी चीज़ें , घोड़े , साईकिलों , स्कूटरों , करों वग़ैरा पर सवारी करने लगेंगी। 4. नमाज़ जान बूझ कर क़ज़ा की जाने लगेगी। 5. लोग ख़ाहिशाते नफ़सानी की पैरवी करने लगेंगे। 6. क़त्ल करना मामूली चीज़ समझा जायेगा। 7. सूद का ज़ोर होगा। 8. ज़िना आम होगा। 9. अच्छी अच्छी इमारतें बहुत बनेगीं। 10. झूठ बोलना हलाल समझा जायेगा। 11. रिश्वत आम होगी। 12. शहवते नफ़सानी की पैरवी की जायेगी। 13. दीन को दुनिया के बदले बेचा जायेगा। 14. अज़ीज़दारी की परवाह न होगी। 15. अहमक़ों को आमिल बनाया जायेगा। 16. बुर्दबारी को बुज़दिली व कमज़ोरी पर महमूल किया जायेगा। 17. ज़ुल्म फ़ख़्र के तौर पर किया जायेगा। 18. बादशाह व उमरा फ़ासिक़ो फ़ाजिर होंगे। 19. वज़ीर झूठ बोलेंगे। 20. अमानत दार ख़ाएन होंगे। 21. हर एक मद्दगार ज़ुल्म परवर होगा। 22. क़ारीयाने क़ुरआन फ़ासिक़ होंगे। 23. ज़ुल्म व जौर आम होगा। 24. तलाक़ बहुत ज़्यादा होंगी। 25. फ़िसक़ो फ़ुजूर नुमायाँ होंगे। 26. फ़रेबी की गवाही क़ुबूल की जायेगी। 27. शराब नोशी आम होगी। 28. इग़लाम बाज़ी का ज़ोर होगा। 29. सिहक़ , यानी औरतें , औरतों के ज़रिए शहवत की आग बुझाएंगी। 30. माले ख़ुदा व रसूल (स अ व व ) को माले ग़नीमत समझा जायेगा। 31. सदक़ा व ख़ैरात से नाजायज़ फ़ायदा उठाया जायेगा। 32. शरीरों की ज़बान के ख़ौफ़ से नेक बन्दे ख़ामोश रहेंगे। 33. शाम से सुफ़ियानी का ख़ुरूज होगा। 34. यमन से यमानी बरामद होगा। 35. मक्के और मदीने के दरमियान ब मक़ाम ‘‘ लुद ’’ ज़मीन धंस जायेगी। 36. रूकन और मक़ाम के दरमियान आले मोहम्मद की एक मोअजि़्ज़ज़ फ़र्द क़त्ल होगी।(नुरूल अबसार पृष्ठ 155 मुद्रित मिस्र) 37. बनी अब्बास में शदीद एख़्तेलाफ़ होगा। 38. 15 शाबान को सूरज गरहन और इसी माह के आखि़र में चाँद गरहन होगा। 39. ज़वाल के वक़्त आफ़ताब अस्र के वक़्त तक क़ाएम रहेगा। 40. मग़रिब से आफ़ताब निकलेगा। 41. नफ़से ज़किया और सत्तर (70) सालेहीन का क़त्ल। 42. मस्जिदे कूफ़ा की दीवार ख़राब व बरबाद कर दी जायेगी। 43. ख़ुरासान की जानिब से सियाह (काले) झंडे बरामद होंगे। 44. मिस्र में एक मग़रेबी का ज़हूर होगा। 45. तुर्क जज़ीरे में होंगे। 46. रोम रमले में पहुँच जायेंगे। 47. मशरिक़ में एक सितारा निकलेगा जिसकी रौशनी मग़रिब तक फ़ैलेगी। 48. एक सुरखी ज़ाहिर होगी जो आसमान और सूरज पर गा़लिब आ जायेगी। 49. मशरिक़ से एक ज़बरदस्त आग भड़केगी जो तीन या सात रोज़ बाक़ी रहेगी और बरवायत शिब्लन्जी पृष्ठ 21 , वह आग मग़रिब तक फैल कर आलम को तहस नहस कर देगी। 50. अरब मुख़तलिफ़ बलाद पर क़ाबू पा लेंगे और अजम के बादशाह को मग़लूब कर देगें। 51. मिस्री अपने बादशाह और हाकिम को क़त्ल कर देंगे। 52. शाम तबाह व बरबाद हो जायेगा। 53. क़ैस व अरब के झंड़े मिस्र पर लहराएगें। 54. ख़ुरासान पर बनी कन्दा का परचम लहरायेगा। 55. फ़रात का पानी इस दरजा चढ़ जायेगा कि कूफ़े के गली कूचों में पानी होगा। 56. 60 , अद्द मुद्दीयाने नबूवत ज़ाहिर होंगे। 57. 13 नफ़र औलादे अबू तालिब से दावाए इमामत करेंगे। 58. बनी अब्बास का एक अज़ीम शख़्स ब मुक़ाम हलवलाद ख़ानक़ैन नज़रे आतश किया जायेगा। 59. बग़दाद में ख़रक़ जैसा पुल बनाया जायेगा। 60. सियाह आंधी का आना। 61. ज़लज़लों का आना। 62. अकसर मक़ामात पर ज़मीन का धंस जाना। 63. नागहानी मौतों का ज़्यादा होना। 64. जानो माल व समरात (फ़लों) की तबाही। 65. चींटीयों और टिड्डियों की कसरत जो खेती को खा जायें। 66. ग़ल्ले का कम उगना। 67. आपसी कुश्तो ख़ून की कसरत। 68. अपने सरदारो से लोगों का नाफ़रमान होना। 69. अपने सरदारों को क़त्ल करना। 70. बाज़ गिरोह का सुअर और बन्दर की सूरत में मसख़ होना। 71. आसमान से एक आवाज़ का आना जिसे तमाम अहले ज़मीन सुनेंगे। 72. आसमानी आवाज़ का हर ज़बान बोलने वाले के कान में उसी की ज़बान में पहुँचना। 73. बाज़ सूरतों का मक़ामे ऐन अल शम्स में ज़ाहिर होना। 74. 24 , चौबीस बारीशों का पै दर पै होना। 75. ज़मीन का ज़िन्दा हो कर अपने तमाम मालूमात ज़ाहिर करना।(कशफ़ल ग़म्मा पृष्ठ 134 ) 76. अच्छाई और बुराई एक नज़र से देखी जायेगी। 77. बुराई का हुक्म अपनी औलाद को दिया जायेगा और अच्छाई से रोका जायेगा। 78. लालच की वजह से बातिन ख़राब हो जायेंगे। 79. ख़ौफ़े ख़ुदा दिल से निकल जायेगा। 80. क़ुरआन का सिर्फ़ निशान रह जायेगा। 81. मस्जिदें आबाद मगर हिदायत से ख़ाली होंगी। 82. फ़ोक़हा फ़ितना परवर होंगे। 83. औरतों से मशवेरा लिया जायेगा। 84. गुनाह खुल्लम खुल्ला किया जायेगा। 85. बद अहदी आम होगी। 86. औरतों को तिजारत में शरीक किया जायेगा। 87. ज़लील तरीन शख़्स क़ौम का सरदार होगा। 88. गाने वालियों का ज़ोर होगा। 89. उस ज़माने के लोग अगलों पर बिला वजह लानत करेंगे। 90. झूठी गवाही दी जायेगी। 91. हक़ ख़त्म हो जायेगा। 92. क़ुरआन एक कोहना (पुरानी) किताब समझी जायेगी। 93. दीन अन्धा कर दिया जायेगा। 94. बदकारी ऐलान के साथ की जायेगी। 95. फ़िसक़ो फ़ुजूर में जिसकी मदह की जायेगी ख़ुश होगा। 96. लड़के औरतों की तरह उजरत पर इस्तेमाल होंगे। 97. मासियत पर माल ख़र्च करने वालों को टोका न जायेगा। 98. हमसाया हमसाये को अज़ीयत देगा। 99. नेकी का हुक्म करने वाला ज़लील होगा। 100. नेकी के रास्ते छोड़ दिये जायेंगे। 101. बैतुल्लाह मोअत्तल कर दिया जायेगा। 102. औरतें अन्जुमनें क़ायम करेंगी। 103. मर्द औरतों की तरह कंघी करेंगे। 104. मर्दों को शर्मगाहों का मुआवज़ा मिलेगा। 105. मोमिन से ज़्यादा साहेबे माल की इज़्ज़त होगी। 106. औरतें अपने शौहरों को मर्दों के साथ बद फ़ेली पर मजबूर करेंगी। 107. औरतों की दलाली करने वाले मोअज़्ज़ज़ समझे जायेंगे। 108. मोमिन ग़मगीन और ज़लील होगा। 109. हराम को हलाल किया जायेगा। 110. दीन में खुदराई की जायेगी। 111. गुनाह के लिये परदाए शब की ज़रूरत न होगी। 112. बड़े बड़े माल ख़ुदा की मासियत में सर्फ़ होंगे। 113. हुक्काम दीनदारी से दूर होंगे। 114. जज फ़ैसले में रिश्वत लेंगे। 115. हराम औरतों से ज़िना किया जायेगा , जैसे माँ बहनें। 116. मर्द अपनी जौजा की हराम कमाई खायेगा। 117. औरतें अपने मर्दों पर हुकूमत करेंगी। 118. मर्द अपनी जोजा और लोंडी को किराये पर चढ़ायेगा। 119. शरीफ़ को ज़लील समझा जायेगा। 120. हुक्काम में उसकी इज़्ज़त होगी जो आले मोहम्मद (स अ व व ) को बुरा कहेगा। 121. कु़रआन पढ़ना और सुन्ना बार होगा। 122. चुग़लखोरी आम होगी। 123. ग़ीबत को अच्छा समझा जायेगा। 124. हज और जेहाद ख़ुदा के लिये नहीं दीगर मक़ासिद के लिये किया जायेगा। 125. बादशाह यानी बर सरे इक़्तेदार तबक़ा मोमिन को काफ़िर के लिये ज़लील करेगा। 126. वीराना आबादी से बदल जायेगा। 127. नाप तोल में कमी लोंगो का ज़रिए माश होगा। 128. लोग रियासत तलबी के लिये अपने को बदज़बानी में मशहूर करेंगे ताकि ख़ौफ़ के मारे हुकूमत उनके सिपुर्द कर दी जाये। 129. नमाज़ बिल्कुल हलकी और बेअहमियत कर दी जायेगी। 130. माले कसीर के बावजूद ज़कात न दी जायेगी। 131. मय्यत क़ब्र से निकालीं जायेगी। 132. क़ब्र से कफ़न चुरा कर बेचा जायेगा। 133. इन्सान सुबह शाम नशे में होगा। 134. चोपायो के साथ बदफ़ेली की जायेगी। 135. चौपाए चौपायों को फाड़ खायेंगे। 136. लोग जानमाज़ पर बरहैना जायेंगे। 137. लोगों के क़ुलूब सख़्त हो जायेंगे। 138. लोगों की आंखें बेहयाई करेंगी। 139. ज़िक्रे ख़ुदा लोगों पर बार होगा। 140. माले हराम आम होगा। 141. नमाज़ सिर्फ़ दिखावे के लिये पढ़ी जायेगी। 142. फ़क़ीह दीन के सिवा दूसरे कामों के लिये फ़िक़ा हासिल करेंगे। 143. लोग ग़ासिब का साथ देंगे। 144. हलाल रोज़ी कमाने वाले की मज़म्मत की जायेगी। 145. तालिबे हराम की मदाह की जायेगी। 146. हरमैन शरीफ़ैन में ऐसे अमल होंगे जो मन्शाए ख़ुदा वन्दी के खि़लाफ़ होंगे। 147. आलाते ग़िना (गाने बजाने की चीज़ें) मक्के व मदीने में आम हों जायेंगी। 148. हक़ की हिदायत को मना किया जायेगा। 149. लोग एक दूसरे की तरफ़ देखेंगे और अहले शहर उनकी इक़्तेदा करेंगे चाहे वह कुछ करें। 150. नेकी के रास्ते ख़ाली हो जायेंगें। 151. मय्यत का मज़हका़ उड़ाया जायेगा। 152. हर साल बुराईयों मे ईज़ाफ़ा होगा। 153. मजलिस में सिर्फ़ माल दार की इज़्ज़त की जायेगी। 154. फ़क़ीरों को मज़हक़े के तौर पर माल दिया जायेगा। 155. आसमानी मख़ादफ़ से कोई ख़ौफ़ न खायेगा। 156. मर्द और औरतें सब के सामने ख़्वाहिशाते नफ़सानी की आग बुझायेंगे। 157. अपनी इज़्ज़त के ख़ौफ़ से कोई शरीफ़ किसी को रोक टोक न सकेगा। 158. मासियत में माल ख़ुशी से सर्फ़ किया जायेगा लेकिन ख़ुदा की राह में बिल्कुल न दिया जायेगा। 159. वालेदैन की तरफ़ से औलाद को आक़ करना आम हो जायेगा। 160. वालेदैन अपनी औलाद की निगाह में सुबुक़ होंगे। 161. औलाद अपने वालेदैन पर इफ़तेरा करने में ख़ुशी महसूस करेगी। 162. औरतें मुल्क व हुकूमत पर गा़लिब हो जायेंगी। 163. फ़रज़न्द अपने बाप पर बोहतान बांधेगा। 164. लड़का माँ बाप पर बद दुआ करेगा। 165. फ़रज़न्द माँ बा पके जल्द मरने की तमन्ना करेगा। 166. इंसान जिस दिन कोई गुनाह न करेगा उस दिन ग़मगीन रहेगा। 167. बादशाह गरानी के लिये ग़ल्ला रोकेगा। 168. आइज़्ज़ा का माल फ़रेब से तक़सीम किया जायेगा। 169. जुआ खेला जायेगा। 170. शराब के ज़रिये से मरीज़ों का इलाज किया जायेगा। 171. अच्छाई और बुराई दोनों की तलक़ीन बराबर हैसियत रखेगी। 172. मुनाफ़िक़ और दुश्मने ख़ुदा की हवा बंधेगी और अहले हक़ मक़हूर (बे इज़्ज़त) रहेंगे। 173. उजरत ले कर अज़ान कही जायेगी और ऐवज़ ले कर नमाज़ पढ़ाई जायेगी। 174. ख़ुदा से न डरने वाले मस्जिदों पर क़ाबिज़ होंगे। 175. मस्जिदों में न अहल जमा हो कर ग़िबतें करेंगे। 176. बद मस्त रसमी तौर पर जमाअत में खड़े हो कर नमाज़ पढ़ेंगे। 177. यतीमों का माल खाने वाले की मदह की जायेगी। 178. क़ाज़ी हुक्मे ख़ुदा के खि़लाफ़ फ़ैसला करेगा। 179. हुक्काम लालच की वजह से ख़ाइनों पर भरोसा करेंगे। 180. मीरास बदकारी में सर्फ़ की जायेगी। 181. मिम्बर पर तक़वे का ज़िक्र किया जायेगा लेकिन वाएज़ ख़ुद अमल नहीं करेगा। 182. नमाज़ के अवक़ात की परवाह न की जायेगी। 183. सदक़ा व ख़ैरात ख़ुशनूदिये ख़ुदा के लिये नहीं सिर्फ़ सिफ़ारिश पर दिया जायेगा। 184. इन्सान का मक़सूदे हयात सिर्फ़ पेट पालना और ऐश करना होगा। 185. हक़ की निशानियां मिट जायेंगी। 186. भाई भाई से हसद करेगा। 187. अपने दोस्तों के साथ ख़यानत की जायेगी। 188. दिलों में ज़हर की तरह तकब्बुर दौड़ जायेगा। 189. ज़ोहद ख़त्म हो जायेगा। 190. लोगों की शक्लें इन्सानी और दिल शैतानी हो जायेंगे। 191. उनकी उम्रें क़लील और उनकी तमन्नाएं कसीर होंगी।(बेहारूल अनवार जिल्द 13 पृष्ठ 174 मुद्रित ईरान) 192. कनीज़ों से मशविरे किये जायेंगे। 193. बच्चे मिम्बरों पर बैठेंगे। 194. ऐसे हाकिम होंगे कि जब उनसे कोई बात करेगा तो क़त्ल कर दिया जायेगा। 195. हुक्काम शुरफ़ा के माल को अपना माल समझेंगे। 196. औरतों की आबरू रेज़ी करेंगे। 197. कुछ चीज़ें मशरिक़ से और कुछ मग़रिब से लाई जायेंगी जिनसे उम्मत का इम्तेहान किया जायेगा। 198. मस्जिद नक़शों निगार से मुज़अय्यन की जायेगी। 199. कु़रआन मजीद सजाये जायेंगे। 200. मस्जिदों की मिनारें बलन्द बनाई जायेंगी। 201. मर्द सोना इस्तेमाल करेंगे। 202. रेशमी कपड़े पहनेगें। 203. चीते की खाल का फ़र्श बनायेंगे। 204. सूद ख़ोरी ज़ाहिर बज़ाहिर होगी। 205. हदे शरई न की जायेगी। 206. शरीर अफ़राद हाकिम होंगे। 207. मालदार तफ़रीह के लिये , ग़रीब दिखाने के लिये मुतवसित तिजारत के लिये हज करेंगे। 208. क़ुरआन मजीद सुर से पढ़ा जायेगा। 209. वल्द अज़ ज़ेना की कसरत होगी। 210. ख़ुशामद बहुत ज़्यादा राएज होगी। 211. लिबास पर फ़ख़रो मुबाहात किया जायेगा। 212. उमरा शतरन्ज खेलेंगे। 213. क़ारियाने क़ुरआन और अब्बाद एक दूसरे पर लानत करेंगे। 214. मालदार फ़ख़ीरों से दूर भागेंगे। 215. मुल्की नज़्म व नस्क़ में वह लोग दख़ील होंगे जिनको उससे हिस व मिस न होगा। 216. ज़मीने ऐतिराफ़ से धंस जायेंगी।(तफ़सीर अली बिन इब्राहीम क़ुम्मी पृष्ठ 229 ) 217. दरिन्दें इन्सानों से बाते करने लगेंगे। 218. लोंगो से उनके कोड़े और जूते कलाम करने लगेंगे। 219. इन्सान की राने बोलने लगेंगी और वह इसके घर के लोगों ने जो कुछ किया होगा घर के मालिक को बताने लगेगी।(नियाबुल मोवद्दता पृष्ठ 431 बहवाला तिरमिज़ी) 220. सुफ़यानी , ख़ुरासानी , यमानी का ख़ुरूज एक ही दिन , एक ही महीना , एक ही साल में होगा। 221. हुकूमते शाम , हमस महतसकीन , अरदन कफ़ससरीन पर ग़ालिब आ जायेगी। 222. तूफ़ान का ज़ोर होगा। 223. वादी याबिस से ‘‘ इब्ने आक़लातुल अकबाद ’’ खुरूज करेंगे। 224. मोमेनीन का इम्तेहान ख़ौफ़ , जू अन्कस अमवाल , नक़श , समरात से होगा। 225. शाम का ‘‘ क़रिया ’’ जाबीह ज़मीन में धंस जायेगा। 226. क़त्ले नफ़से ज़किया के 15 दिन बाद इमाम मेहदी (अ.स.) का ज़हूर होगा।(आलम अलवरा तबरसी पृष्ठ 262 मुद्रित बम्बई 1312 हिजरी) 227. दुनियां में झगड़े बखेड़े बेइन्तेहां होंगे। 228. नए नए फ़ितने पैदा होंगे। 229. आमदो रफ़्त के रास्ते बन्द हों जायेंगे। 230. लोग एक दूसरे को लूटने लगेगें।(अरजहुल मतालिब पृष्ठ 472 ) 231. मर्दों की कमी और औरतों की ज़्यादती होगी। 232. हेजाज़ से आग निकलेगी। 233. मस्जिदों से(लाऊड स्पीकर वग़ैरा के ज़रिये से) आवाज़ें बुलन्द होंगी। 234. रेशमी लिबास मर्द पहनने लगेगें। 235. मशरिक़ मग़रिब जज़ीराए अरब में ज़मीन धंस जायेंगी। 236. यमन और अदन से आग भड़कने लगेगी।(मिशक़ात पृष्ठ 461 ) 237. अच्छे लोग ख़त्म हो जायेंगे और बुरों की कसरत होगी। 238. मुक़द्देराते इलाही की मुख़ालेफ़त आम होगी। 239. माल के लाने ले जाने वाले चोरी करेंगे। 240. हराम ख़ोरी आम होगी। 241. गरानी हद से बढ़ जाएगी। 242. दरिया ख़ुश्क हो जायेंगे। 243. बारिश बन्द हो जायेगी। 244. अहले बरबर ज़र्द झंडे ले कर मिस्र पहुँच जायेंगे। 245. सख़र की औलाद से एक शख़्स खुरूज करेगा। 246. बर सरे आम औरतों की छातियों से खेला जायेगा। 247. सफ़ेद पिंडलियों की औरतें सड़कों पर बरैहना मिलेगी। 248. एक यमनी बादशाह हसन नामी यमन से खुरूज करेगा। 249. हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) फ़रमाते हैं क़ुरसे आफ़ताब (सूरज के गोले) के क़रीब आसमान पर एक हाथ ज़ाहिर होगा। 250. हज का रास्ता बन्द कर दिया जायेगा। 251. मर्दों से बदफ़ेली के लिये ताक़तवर ग़िजा़ए खाई जायेंगी। 252. दौलत के ज़ोर से हुकूमत हासिल की जायेगी। 253. झूठी क़सम खाना फ़ैशन में दाखि़ल होगा। 254. ज़ख़ीरा अन्दोज़ी होगी। 255. मस्जिदे बरासा जो जंगे नहरवान के बाद हज़रत अली (अ.स.) ने राहिब ज़रिये से बनाई थी , तबाह कर दी जायेगी। 256. क़ज़वैन में एक काफ़िर की अज़ीम हुकूमत होगी। 257. तकरीत से एक शख़्स ‘‘ औफ़ सलमा ’’ नामी ख़ुरूज करेगा। 258. मक़ामे क़रक़िया में जंगे अज़ीम होंगी। 259. तुर्क मैदाने जंग में उतर आयेंगे। 260. अहले नाक़ूस नसारा की हुकूमते आलम पर छा जायेंगे। 261. इस्लामी मुमालिक में बेशुमार कलीसे बनाये जायेंगे।(किताब अल वसाएल अलहाज मोहम्मद अली पृष्ठ 207 मुद्रित बम्बई 1329 हिजरी) 262. औरतें ऊंट के कोहान की तरह सर के बाल बनाएंगी। 263. औरतें ऐसे कपड़े पहनेंगी कि बरैहना मालूम होंगी। 264. औरतें ज़ीनत कर के बाहर निकला करेंगी।(बेहारूल अनवार) 265. लड़के लम्बे बाल रखेंगे। 266. बेवकूफ़ तफ़रीह के लिये इस्तेमाल किये जायेंगे। 267. मस्जिदें ख़ूबसूरत बनाई जायेंगी। 268. बड़ी बड़ी इमारतें बनाई जायेंगी। 269. क़हवे की मुख़्तलिफ़ क़िस्में इस्तेमाल होंगी। 270. लोग सवारियों से टकरा कर मरेंगे। 271. लोग रात में सोयेंगे और सुबह को मुर्दा होंगे। 272. रोयते हिलाल पर इख़्तेलाफ़ होंगे। 273. लोग आलाते ग़िना जेब में रख कर घूमा करेंगे। 274. हिन्द तिब्बत की वजह से तबाह होगा और तिब्बत की तबाही चीन की वजह से होगी।(मनाक़िब) 275. मिस्र में अमीर अल आमरा का क़याम होगा। 276. अरबो की हुकूमत छिन जायेगी।(कशफ़ुल ग़म्मा) 277. अदन की गहराई से आग निकलेगी।(रिसालाए ग़ैबत तूसी पृष्ठ 281 ) 278. दुनियां में हबशियों की हुकूमत क़ायम हो जायेंगी। 279. शाम में चीनी घुस जायेंगे तब ज़हूर होगा।(इलजा़म अल निसाब पृष्ठ 183 )

ज़हूर के वक़्त इमाम (अ.स.) की उम्र

यौमे विलादत से ता बा ज़हूर आपकी क्या उम्र होगी ? इसे तो ख़ुदा ही जाने , लेकिन यह मुसल्लेमात से है कि जिस वक़्त आप ज़हूर फ़रमायेंगे मिसले हज़रते ईसा (अ.स.) आप चालीस साला जवान की हैसियत में होंगे।(आलामुल वुरा पृष्ठ 265 व ग़ायतुल मक़सूद पृष्ठ 76 पृष्ठ 119 )


आपका अलम

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) के अलम पर ‘‘ अल बकीयतुल्लाह ’’ लिखा होगा और आप अपने हाथों पर ख़ुदा के लिये बैयत लेंगे और कायनात में सिर्फ़ दीने इस्लाम का परचम लहरायेगा।(यनाबिउल मोवद्दता पृष्ठ 434 )


ज़हूर के बाद

ज़हूर के बाद हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) काबे की दीवार से टेक लगा कर खडे होंगे। अब्र(बादल) का साया आपके सरे मुबारक पर होगा। आसमान से आवाज़ आती होगी ‘‘ यही इमाम मेहदी (अ.स.) हैं ’’ इसके बाद आप एक मिम्बर पर जलवा अफ़रोज़ होंगे। लोगो को ख़ुदा की तरफ़ दावत देंगे और दीने हक़ की तरफ़ आने की सब को हिदायत फ़रमायेंगे। आपकी तमाम सीरत पैग़म्बरे इस्लाम की सीरत होगी और उन्हीं के तरीक़े पर अमल पैरा होंगे। अभी आपका ख़ुत्बा जारी होगा कि आसमान से जिब्राईल और मीकाईल आ कर बैयत करेंगे। फिर मलाएक ए आसमानी की आम बैयत होगी। हज़ारों मलाएका की बैयत के बाद वह 313 मोमेनीन बैयत करेंगे जो आपकी खि़दमत में हाज़िर हो चुके होंगे। फिर आम बैयत का सिलसिला शुरू होगा। दस हज़ार अफ़राद की बैयत के बाद आप सब से पहले कूफ़े तशरीफ़ ले जायेंगे और दुश्मनाने आले मोहम्मद का गला क़मा करेंगे। आपके हाथ में असाए मूसा होगा। जो अज़दहे का काम करेगा और तलवार हेमाएल होगी।(अयनुल हयात मजलिसी पृष्ठ 92 )

तवारीख़ में है कि जब आप कूफ़े पहुँचेंगे तो कई हज़ार का एक गिरोह आपकी मुख़ालफ़त के लिये निकल पडे़गा और कहेगा हमें बनी फ़ात्मा की ज़रूरत नहीं , आप वापस जाइये , यह सुन कर तलवार से उनका क़िस्सा पाक कर देंगे और किसी को भी ज़िन्दा न छोड़ेंगे। जब कोई भी दुश्मनें आले मोहम्मद और मुनाफ़िक़ वहां बाकी़ न रहेगा तो आप एक मिम्बर पर तशरीफ़ ले जायेंगेक और वाक़िया ए करबला का ज़िक्र करेंगे यानी मजलिसे हुसैन (अ.स.) पढ़ेंगे। उस वक़्त लोग महवे गिरया हो जायेंगे और कई घंटे तक रोने का सिलसिला जारी रहेगा। फिर आप हुक्म देंगे कि मशहदे हुसैन (अ.स.) तक नहरे फ़ुरात काट कर लाई जाये और एक मस्जिद की तामीर की जाये , जिसके एक हज़ार दर हों चुनान्चे ऐसा ही किया जायेगा। इसके बाद आप ज़्यारते सरवरे कायनात के लिये मदीनए मुनव्वरा तशरीफ़ ले जायेंगे।

(आलामुल वुरा पृष्ठ 263 इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 532 नूरूल अबसार पृष्ठ 155 )

क़ुदवतुल मोहद्देसीन शाह रफ़ीउद्दीन रक़म तराज़ हैं कि हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) जो इल्मे लदुन्नी से भर पूर होंगे जब मक्के से आपका ज़हूर होगा और उस ज़हूर की शोहरत अतराफ़ व अकनाफ़े आलम में फैलेगी तो अफ़वाज़ मदीना व मक्का आपकी खि़दमत में हाज़िर होगी और शाम व ईराक़ व यमन के अब्दाल और औलिया खि़दमत शरीफ़ में हाज़िर होंगे और अरब की फ़ौजे जमा हो जायेंगी। आप उन तमाम लोगों को उस ख़ज़ाने से माल देंगे जो काबे से बरामद होगा और मुक़ामे ख़जा़ना को ‘‘ ताजुल काबा ’’ कहते होंगे। इसी असना में एक शख़्स ख़ुरासानी अज़ीम फ़ौज ले कर हज़रत की मदद के लिये मक्के मोअज़्ज़मा को रवाना होगा। रास्ते में इस लशकरे ख़ुरासानी के मुक़द्देमा अल जैश के कमान्डर मन्सूर से नसरानी फ़ौज की टक्कर होगी और ख़ुरासानी लशकर नसरानी फ़ौज को पसपा कर के हज़रत की खि़दमत में पहुँच जायेगा।

इसके बाद एक शख़्स सुफ़ियानी जो बनी कल्ब से होगा हज़रत से मुक़ाबले के लिये लशकरे अज़ीम इरसाल करेगा लेकिन बहुक्मे ख़ुदा जब वह लशकरे मक्काए मोअज़्ज़मा और काबाए मुनव्वरा के दरमियान पहुँचेगा और पहाड़ में क़याम करेंगा जो ज़मीन में वहीं धंस जायेगा। फिर सुफ़ियानी जो दुशमनों आले मोहम्मद होगा नसारा से साज़ बाज़ कर के इमाम मेहदी (अ.स.) से मुक़ाबले के लिये ज़बर दस्त फ़ौज फ़राहम करेगा। नसरानी और सुफ़ियानी फ़ौज के अस्सी निशान होंगे और निशान के नीचे 12000 की फ़ौज होगी। उनका दारूल खि़लाफ़ा शाम होगा। इमाम मेहदी (अ.स.) भी मदीनाए मुनव्वरा होते हुए जल्द से जल्द शाम पहुँचेंगे। जब आप का वरूदे मसऊद दमिशक़ में होगा तो दुश्मने आले मोहम्मद और सुफ़ियानी और दुशमने इस्लाम नसरानी आप से मुक़ाबले के लिये सफ़ आरा होंगे। इस जंग में फ़रीक़ैन के बे शुमार अफ़राद क़त्ल होंगे। बिल आखि़र इमाम (अ.स.) का फ़तेह कामिल होगी और एक नसरानी भी ज़मीने शाम पर बाक़ी न रहेगा। उसके बाद इमाम (अ.स.) अपने लशकरियों में इनाम तक़सीम करेंगे और उन मुसलमानों को मदीनए मुनव्वरा से वापस बुला लेगे जो नसरानी बादशाह के ज़ुल्म व जौर से आजिज़ आ कर शाम से हिजरत कर गये थे।(क़यामत नामा पृष्ठ 4 )

इसके बाद आप मक्काए मोअज़्ज़मा वापस तशरीफ़ ले जायेंगे और मस्जिदे सहला में क़याम फ़रमायेंगे।(इरशाद पृष्ठ 533 )

इसके बाद मस्जिदुल हराम को अज़ सरे नो बनायेंगे और दुनिया की तमाम मसाजिद को शरई उसूल पर कर देंगे , हर बिदअत को ख़त्म कर देंगे और हर सुन्नत को क़ायम करेंगे। निज़ामे आलम दुरूस्त करेंगे और शहरों में फ़ौजें इरसाल करेंगे। इन्सेराम व इन्तेज़ाम के लिये वज़रा रवाना होंगे।(आलामुल वुरा पृष्ठ 262 पृष्ठ 264 )

इसके बाद आप मोमेनीन , कामेलीन और काफ़रीन को ज़िन्दा करेंगे और इस ज़िन्दगी का मक़सद यह होगा कि मोमेनीन इस्लामी उरूज से ख़ुश हों और काफ़ेरीन से बदला लिया जाये। इन ज़िन्दा किये जाने वालों में का़बिल से ले कर उम्मते मोहम्मदिया के फ़राना तक ज़िन्दा किये जायेंगे और उनके किये का पूरा पूरा बदला उन्हें दिया जायेगा। जो जो ज़ुल्म उन्हीं ने किये उनका मज़ा चखेंगे। ग़रीबों मज़लूमों और बे कसों पर जो ज़ुल्म हुआ है उसकी , ज़ालिम को सज़ा दी जायेगी। सब से पहले जो वापस लाया जायेगा वह यज़ीद बिन माविया मलऊन होगा और इमाम हुसैन (अ.स.) तशरीफ़ लायेंगे।(ग़ायत अल मक़सूद)


दज्जाल और उसका ख़ुरूज

दज्जाल दजल से मुश्तक़ है (बना है) जिसके मानी फ़रेब के हैं। इसका असल नाम साएफ़ , बाप का नाम साएद , माँ का नाम काहेता उर्फ़ क़तामा है। यह अहदे रिसालत माआब (स अ व व ) में बमक़ामे तौहा जो मदीना ए मुनव्वरा से तीन मील के फ़ासले पर वाक़े है चहार शम्बे के दिन बवक़्ते ग़ुरूबे आफ़ताब पैदा हुआ है। पैदाईश के बाद आन्न फ़ान्न बढ़ रहा था उसकी दाहिनी आँख फूटी थी और बाई आँख पेशानी पर चमक रही थी। वह चन्द दिनों में काफ़ी बढ़ कर दावाए ख़ुदाई करने लगा। सरवरे कायनात (स अ व व ) जो हालात से बराबर मुत्तला हो रहे थे उन्होंने सलमाने फ़ारसी और चन्द असहाब को लिया और बमक़ामे तीहा जा कर उसको तबलीग़ करना चाही , उसने बहुत बुरा भला कहा और चाहा कि हज़रत पर हमला कर दे , लेकिन आप के असहाब ने मदाफ़ेअत की , आपने उससे यह फ़रमाया था कि ख़ुदाई का दावा छोड़ दे और मेरी नबूवत को मान ले। उलेमा ने लिखा है कि दज्जाल की पेशानी पर ब ख़त्ते यज़दानी ‘‘ अल काफ़िर बिल्लाह ’’ लिखा हुआ था और आँख के ढेले पर भी (काफ़ , फ़े , रे) मरक़ूम था। ग़रज़ कि आपने वहां से मदीना ए मुनव्वरा वापस तशरीफ़ लाने का इरादा किया। दज्जाल ने एक संगे गरां (बहुत बड़ा पत्थर) जो पहाड़ के मानिन्द था हज़रत की राह में रख दिया। यह देख कर हज़रत जिब्राईल (अ.स.) आसमान से आये और उसे हटा दिया। अभी आप मदीने पहुँचे ही थे कि दज्जाल लशकरे अज़ीम ले कर मदीने के क़रीब जा पहुँचा। हज़रत ने बारगाहे अहदियत में अर्ज़ की , ख़ुदाया इसे उस वक़्त तक के लिये महबूस कर दे , जब तक इसे ज़िन्दा रखना मक़सूद है। इसी दौरान में जनाबे जिब्राईल आये और उन्होंने दज्जाल की गरदन को पुश्त की तरफ़ से पकड़ कर उठा लिया और उसे ले जा कर जज़ीरा ए तबरिस्तान में महबूस (क़ैद) कर दिया। लतीफ़ा यह है कि जिब्राईल उसे ले कर जाने लगे तो उसने ज़मीन पर दोनो हाथ मार कर तहतुल शरह तक की दो मुठ्ठी खा़क ले ली और उसे तबरिस्तान में डाल दिया। जिब्राईल (अ.स.) ने सरवरे कायनात (स अ व व ) के जवाब में कहा कि आपकी वफ़ात से 960 साल बाद यह खा़क आलम मे फैले गी और उसी वक़्त से आसारे क़यामत शुरू हो जायेंगे।(ग़ायतल मक़सूद पृष्ठ 64, इरशाद अल तालेबैन पृष्ठ 394 )

पैग़म्बरे इस्लाम का इरशाद है कि दज्जाल को मबहूस होने के बाद तमीम दारमी ने जो पहले नसरानी था जज़ीरा ए तबरिस्तान में ब चश्मे खुद देखा है। उसकी मुलाक़ात की तफ़सील किताब सियाह अल मसाबिह , ज़हरतुल रियाज़ , सही बुख़ारी , सही मुस्लिम में मौजूद है।

ग़रज़ कि अकसर रवायात के मुताबिक़ दज्जाल हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) के ज़हूर फ़रमाने के 18 यौम बाद ख़ुरूज करेगा।(मजमऊल बहरैन पृष्ठ 560 व ग़ायतल मक़ूसद जिल्द 2 पृष्ठ 69 ) ज़हूरे इमाम (अ.स.) और खुरूजे दज्जाल से पहले तीन साल तक सख़्त कहत पडे़गा। पहले साल एक बटे तीन बारिश और एक बटे तीन ज़राएत ख़त्म हो जायेगी। दूसरे साल आसमान व ज़मीन की बरकत व रहमत ख़त्म हो जायेगी। तीसरे साल बिल्कुल बारिश न होगी और सारी दुनियां वाले मौत की आग़ोश में पहुँचने के क़रीब हो जायेंगे। दुनियां ज़ुल्म व जौर , इज़तेराब व परेशानी से बिल्कुल पुर होगी। इमाम मेहदी (अ.स.) के ज़हूर के बाद 18 दिन में कायनात निहायत अच्छी सहत पर पहुँची हो गी कि नागाह दज्जाल मलऊन के खुरूज का गुलग़ुला उठेगा। वह बरवायत अखवन्द दरवीज़ा हिन्दोस्तान के एक पहाड़ पर नमूदार होगा और वहां से ब आवाज़े बलन्द कहेगा ‘‘ मैं खुदाए बुज़ुर्ग हू ’’ मेरी इताअत करो। यह आवाज़ मशरिक़ व मग़रिब में पहुँचेगी। उसके बाद तीन यौम या बरवायत 40 यौम इसी मुक़ाम पर रह कर लश्कर तैयार करेगा। फिर शाम व ईराक़ होता हुआ अस्फ़ाहान के एक क़रये ‘‘ यहूदिया ’’ से ख़ुरूज करेगा। उसके हमराह बहुत बड़ा लश्कर होगा जिसकी तादाद 70 ,00 ,000 (सत्तर लाख) मरक़ूम है। जिन , देव , परी , शैतान इनके अलावा होंगे। वह एह गधे पर सवार होगा। जो अबलक़ रंग का होगा। उसके जिस्म का बालाई हिस्सा सुर्ख़ , हाथ पाँव ताज़ा नौ सियाह उसके बाद से सुम तक सफ़ैद होगा। उसके दोनों कानों के दरमियान 40 मील का फ़ासला होगा। वह 21 मील ऊँचा और 90 मील लम्बा होगा। उसका हर क़दम एक मील का होगा। उसके दोनों कानों में ख़ल्के़ कसीर बैठी होगी। चलने में उसके बालों से हर क़िस्म के बाजों की आवाज़ आयेगी। वह उसी गधे पर सवार होगा। सवारी के बाद जब वह रवाना होगा तो उसके दाहिने तरफ़ एक पहाड़ होगा जो हमराह चलता रहेगा। उसमें नहरें , मेवा जात और हर क़िस्म की नेमते होंगी , और बाईं जानिब एक पहाड़ होगा जिसमें हर क़िस्म के सांप बिच्छू होंगे। वह लोगों को उन्हीं चीज़ों के ज़रिये से बहकायेगा और कहेगा कि मैं खु़दा हूँ। जो मेरा हुक्म मानेगा जन्नत में रखूगा जो न मानेगा उसे जहन्नुम में डाल दूंगा। इसी तरह चालीस दिन में सारी दुनियां का चक्कर लगा कर और सब को बहका कर इमाम मेहदी (अ.स.) की इस्कीम को नाकामयाब बनाने की सई कोशिश में ख़ानाए काबा को गिराना चाहेगा और एक अज़ीम लश्कर भेज कर काबे और मदीने को तबाह करने पर मामूर करेगा और खुद कूफ़े के लिये रवाना होगा। उसका मक़सद यह होगा कि कूफ़ा जो इमाम मेहदी (अ.स.) की आमाजगाह है उसे तबाह कर दे। ‘‘ चूँ आन लईन नज़दीक़ कूफ़ा बरसदे इमाम मोहम्मद मेहदी (अ.स.) बइसतेसाले ओ बरसद ’’ लेकिन ख़ुदा का करना देखिये कि जब वह कूफ़े के क़रीब पहुँचेगा जो हज़रत इमाम मोहम्मद मेहदी (अ.स.) ख़ुद वहां पहुँच जायेंगे और उसे ब हुक्मे खुदा जड़ से उखाड़ देंगे। ग़रज़ कि घमासान की जंग होगी और शाम तक फैले हुए लश्कर पर इमाम मेहदी (अ.स.) ज़बरदस्त हम ले करेंगे बिल आखि़र वह मलऊन आपकी ज़रबों की ताब न ला कर शाम के मक़ामे ‘‘ उक़बाए रफ़ीक़ ’’ या बमक़ाम ‘‘ लुद ’’ जुमे के दिन तीन घड़ी दिन चढे़ मारा जायेगा। उसके मरने के बाद दस मील तक दज्जाल और उसके गधे और लश्कर का ख़ून ज़मीन पर जारी रहेगा। उलेमा का कहना है कि क़त्ले दज्जाल के बाद इमाम (अ.स.) उसके लशकरियों पर एक ज़बरदस्त हमला करेंगे और सब को क़त्ल कर डालेंगे। उसे जो काफ़िर ज़मीन के किसी हिस्से में छुपे गा , वह आवाज़ देगा कि फ़लां काफ़िर यहां छुपा हुआ है इमाम (अ.स.) उसे क़त्ल कर देंगे। आखि़र कार ज़मीन पर कोई दज्जाल का मानने वाला न रहेगा।(इरशाद अल तालेबीन पृष्ठ 397 ) ग़ायतल मक़सूद जिल्द 2 पृष्ठ 71 , ऐनुल हयात पृष्ठ 126 , किताब अल वसाएल पृष्ठ 181 , क़यामत नामा पृष्ठ 7 , माअरफ़ुल मिल्लता पृष्ठ 328 , सही मुस्लिम , लम्आते शरह मिशक़ात अब्दुल हक़ , मरक़ात , शरह मिशक़ात मजमउल बेहार)

बाज़ रवायात में है कि दज्जाल को हज़रते ईसा (अ.स.) बहुक्मे हज़रते इमाम मेहदी (अ.स.) क़त्ल करेंगे।


नुज़ूले हज़रते ईसा(अ स )

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) सुन्नत के का़यम करने और बिदअत के मिटाने नीज़ इनसेराम व इन्तेज़ामे आलम में मशग़ूल व मसरूफ़ होंगे कि एक दिन नमाज़े सुबह के वक़्त बरवायते नमाज़े अस्र के वक़्त हज़रते ईसा (अ.स.) दो फ़रिश्तों के कंधो पर हाथ रखे हुए दमिश्क़ की जामे मस्जिद के मिनारए शरक़ी पर नुज़ूल फ़रमायेगें। हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) उनका इस्तेक़बाल करेंगे और फ़रमायेंगे कि आप नमाज़ पढ़ाइये हज़रते ईसा कहेंगे कि यह नामुम्किन है नमाज़ आपको पढ़ानी होगी चुनान्चे हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) इमामत करेंगे और हज़रत ईसा (अ.स.) उनके पीछे नमाज़ पढ़ेंगे और उनकी तसदीक़ करेंगे।(नूरूल अबसार पृष्ठ 154 ग़ायत अल मक़सूद पृष्ठ 104 से 154, बहवालाए मुस्लिम व इब्ने माजा , मिशक़ात पृष्ठ 458 ) उस वक़्त हज़रते ईसा (अ.स.) की उम्र चालीस साला नौजवान जैसी होगी। वह इस दुनियां में शादी करेंगे और उनके दो लड़के पैदा होंगे एक नाम अहमद और दूसरे का नाम मूसा होगा।(असआफ़ुल राग़ीबैन , बर हाशिया नूरूल अबसार पृष्ठ 135, क़यामत नामा , पृष्ठ 9, बहवालाए किताबुल वफ़ा इब्ने जोज़ी व मिशक़ात पृष्ठ 465 व सिराजुल कु़लूब पृष्ठ 77 )


इमाम मेहदी (अ.स.) और ईसा इब्ने मरियम का दौरा

इसके बाद हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) और हज़रते ईसा (अ.स.) बलाद मुमालिक का दौरा करने और हालात का जायज़ा लेने के लिये बरामद होंगे और दज्जाल मलऊन के पहुँचाये हुये नुक़सानात और उसके पैदा किये हुये बदतरीन हालात को बेहतरीन सतह पर लायेंगे। हज़रते ईसा (अ.स.) ख़न्जीर के क़त्ल करने , सलीबों को तोड़ने और लोगों के इस्लाम क़ुबूल करने का इन्सेराम व बन्दोबस्त फ़रमायेंगे। अदले मेहदवी से बलादे आलम में इस्लाम का डंका बजेगा और ज़ुल्म व सित्म का तख़्ता तबाह हो जायेगा।(क़यामत नामा क़ुदवतुल मोहद्देसीन पृष्ठ 8 बहवाला सही मुस्लिम)


हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) का कुस्तुनतुनया को फ़तेह करना

रवायत में है कि इमाम मेहदी (अ.स.) कुसतुनतुनया , चीन और जबले देलम को फ़तेह करेंगे। यह वही कु़सतुनतुनया है जिसे अस्तम्बोल कहते हैं और जिस पर उस ज़माने में नसारा का क़ब्ज़ा होगा और उनका क़ब्ज़ा भी मुसलमान बादशाह को क़त्ल करने के बाद होगा। चीन और जबले देलम पर भी नसारा का क़ब्ज़ा होगा और वह हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) से मुक़ाबले का पूरा इन्तेज़ामात करेंगे। ‘‘ चीन ’’ जिसको अरबी में ‘‘ सीन ’’ कहते हैं इसके बारे में रवायत के हवाले से अल्लामा तरही ने मजमउल बहरैन के पृष्ठ 615 में लिखा है कि सीन (1) एक पहाड़ी है। (2) मशरिक़ में एक ममलेकत है। (3) कूफ़े में एक मौजा है। पता यह चलता है कि सारी चीज़ें फ़तेह की जायेंगी। इनके अलावा सिन्ध और हिन्द के मकानात की तरफ़ भी इशारा है। बहर हाल इमाम मेहदी (अ.स.) शहरे कुस्तुनतुनया को फ़तह करने के लिये रवाना होंगे और उनके हमराह सत्तर हज़ार बनू इस्हाक़ के नौजवान होंगे उन्हें दरियाये रोम के किनारे शहर में जाकर उसे फ़तेह करने का हुक्म होगा। ज बवह वहां पहुँच कर फ़सील के किनारे नाराए तकबीर लगायेंगे तो खुद ब खुद रास्ता पैदा हो जायेगा और यह दाखि़ल हो कर उसे फ़तेह कर लेंगे। कुफ़्फ़ार क़त्ल होंगे और उस पर पूरा पूरा क़ब्ज़ा हो जायेगा। (नूरूल अबसार पृष्ठ 155 बहवालाए तबरानी , ग़ाएतल मक़सूद जिल्द 1 पृष्ठ 152 , बहवालाए अबू नईम , आलामुल वुरा , बहवालए इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) पृष्ठ 264 क़यामत नामा बहवालाए सही मुस्लिम)


याजूज माजूज और उनका ख़ुरूज

क़यामते सुग़रा यानी ज़हूरे आले मोहम्मद और क़यामते कुबरा के दरमियान दज्जाल के बाद याजूज और माजूज का ख़ुरूज होगा यह सद्दे सिकन्दरी से निकल कर सारे आलम में फ़ैल जायेंगे और दुनिया के अमनो अमान को तबाह व बरबाद कर देने में पूरी कोशिश करेंगे।

याजूज , माजूज हज़रते नूह (अ.स.) के बेटे याफ़िस की औलाद से हैं। यह दोनो चार सौ क़बीलों और उम्मतों के सरदार और सरबर आवुरदा हैं। उनकी कसरत का कोई अन्दाज़ा नहीं लगाया जा सकता। मख़लूक़ात में मलाएका के बाद उन्हें कसरत दी गई है। इनमें कोई ऐसा नहीं जिसके एक एक हज़ार औलाद न हो। यानी यह उस वक़्त मरते ही नहीं जब तक एक हज़ार बहादुर पैदा न कर लें। यह तीन क़िस्म के लोग हैं , एक वह जो ताड़ से ज़्यादा लम्बे हैं , दूसरे वह जो लम्बे और चौड़े बराबर हैं जिनकी मिसाल बहुत बड़े हाथी से दी जाती है। तीसरे वह जो अपना एक कान बिछाते हैं और दूसरा ओढ़ते हैं। इनके सामने लोहा , पत्थर , पहाड़ तो कोई चीज़ नहीं है। यह हज़रते नूह (अ.स.) के ज़माने में दुनिया के आखि़र में उस जगह पैदा हुये हैं जहां से पहले पहल सूरज ने तुलउ किया था। ज़मानए फ़ितरत से पहले यह लोग अपनी जगह से निकल पड़ते थे और अपने क़रीब की सारी दुनियां को खा पी जाते थे यानी हाथी , घोड़ा , ऊँट इंसान , जानवर , खेती बाड़ी ग़रज़ कि जो कुछ सामने आता था सब को हज़म कर जाते थे। वहां के लोग उन से सख़्त तंग आ कर आजिज़ थे। यहां तक कि ज़मानए फ़ितरत में हज़रते ईसा (अ.स.) के बाद बरवायते जब ‘‘ ज़ुलक़रनैन ’’ उस मंज़िल तक पहुँचे तो उन्हें वहां का सारा वाक़िया मालूम हुआ और वहां की मख़्लूक़ ने उनसे दरख़्वास्त की कि हमे इस बलाए बे दरमा याजूज , माजूज से बचाइये चुनान्चे उन्होंने दो पहाड़ों के उस दरमियानी रास्ते को जिससे वह आया करते थे बहुक्मे ख़ुदा लौहे की दीवार से जो दौ सौ (200) गज़ ऊँची और पचास सा साठ (50 या 60) ग़ज़ चौड़ी थी बन्द कर दिया। इसी दीवार को ‘‘ सद्दे सिकन्दरी ’’ कहते हैं क्यो कि ‘‘ जु़लक़रनैन ’’ का असल नाम सिकन्दरे आज़म था। सद्दे सिकन्दरी के लग जाने के बाद उनकी ख़ुराक सांप क़रार दी गई जो आसमान से बरसते हैं। यह ता बा ज़हूर इमाम मेहदी (अ.स.) इसी में महसूर रहेंगे। उनका उसूल और तरीक़ा यह है कि यह लोग अपनी ज़बान से सद्दे सिकन्दरी को सारी रात चाट कर काटते हैं जब सुबह होती है और धूप लगती है तो हट जाते हैं फिर दूसरी रात कटी हुई दीवार भी पुर हो जाती है और वह फिर उसे काटने में लग जाते हैं। बहुक्मे ख़ुदा यह लोग इमाम मेहदी (अ.स.) के ज़माने में खु़रूज करेंगे दीवार कट जायेगी और यह निकल पड़ेंगे। उस वक़्त का आलम यह होगा कि यह लोग अपनी सारी तादाद समैत सारी दुनियां में फैल कर निज़ामे आलम को दरहम बरहम करना शुरू कर देंगे। लाखों जाने जा़या होंगी और दुनियां की कोई चीज़ ऐसी बाक़ी न रहेगी जो खाई और पी जा सके और यह उस पर तसर्रूफ़ न करें। यह बला के जंगजू लोग होंगे। दुनिया को मार कर खा जायेंगे और अपने तीर आसमान की तरफ़ फेंक कर आसमानी मख़लूक़ को मारने का हौसला करेंगे और जब उधर से बहुक्मे ख़ुदा तीर ख़ून आलूद आयेगा तो यह बहुत खुश होंगे और आपस में कहेंगे कि अब हमारा इक़तेदार ज़मीन से बुलन्द हो कर आसमान तक पहुँच गया है। इसी दौरान में हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की बरकत और हज़रते ईसा (अ.स.) की दुआ की वजह से ख़ुदा वन्दे आलम एक बीमारी भेज देगा जिसको अरबी में ‘‘ नग़फ़ ’’ कहते हैं। यह बीमारी नाक से शूरू हो कर ताऊन की तरह एक ही शब में उन सब का काम तमाम कर देगी। फिर उनके मुरदार को खाने के लिये ‘‘ उन्क़ा ’’ नामी परिन्दा पैदा होगा जो ज़मीन को उनकी गंदगी से साफ़ कर देगा और इंसान उनके तीरो कमान और जल सकने वाली चीज़ो और आलाते हर्ब (लड़ाई के असलहों) को सात साल तक जलायेंगे।(तफ़सीरे साफ़ी पृष्ठ 278, मिशकात पृष्ठ 366, सही मुस्लिम , तिरमिज़ी , इरशाद अल तालेबैन , पृष्ठ 398, ग़ायतुल मक़सूद जिल्द 2 पृष्ठ 76, मजमुअल बहरैन पृष्ठ 466, क़यामत नामा पृष्ठ 8 )


इमाम मेहदी (अ.स.) की मुद्दते हुकूमत और ख़ातमाए दुनिया

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) का पाए तख़्त शहरे कूफ़ा होगा। मक्के में आपके नाएब का तक़र्रूर होगा। आपका दीवान ख़ाना और आपके इजराए हुक्म की जगह मस्जिदे कूफ़ा होगी। बैतुल माल मस्जिदे सहला क़रार दी जायेगी और खि़लवत कदा नजफ़े अशरफ़ होगा।(हक़्क़ुल यक़ीन पृष्ठ 145 )

आपके अहदे हुकूमत में मुकम्मल अमनो सुकून होगा। बकरी और भेड़ , गाय और शेर , इंसान और सांप , ज़म्बील और चूहें सब एक दूसरे से बे खौ़फ़ होंगे।(दुर्रे मनशूर , स्यूती जिल्द 3 पृष्ठ 23 ) गुनाह का इरतेक़ाब बिल्कुल बन्द होगा। तमाम लोग पाक बाज़ हो जायेंगे। जेहल , जबन , बुखल काफ़ुर हो जायेंगे। आजिजो , ज़ईफ़ों की दाद रसी होगी जु़ल्म दुनियां से मिट जायेगा। इस्लाम के का़लिब बे जान में रूहे ताज़ा पैदा हो जायेगी। दुनियां के तमाम मज़ाहिब ख़त्म हो जायेंगे , न ईसाई होंगे न यहूदी न और कोई मसलक होगा सिर्फ़ इस्लाम होगा और उसी का डंका बजता होगा। आप दावत बिल सैफ़ देंगे जो आपके खि़लाफ़ होगा क़त्ल कर दिया जायेगा। जज़िया मौक़ूफ़ होगा। ख़ुदा की जानिब से शहर अकाके हरे भरे मैदान में मेहमानी होगी। सारी कायनात मसर्रतों से ममलूह होगी। ग़रज़ कि अदलो इंसाफ़ से दुनिया भर जायेगी दुनियां के तमाम मज़लूम बुलाये जायेंगे और उन पर ज़ुल्म करने वाले हाज़िर किये जायेंगे। हत्ता की आले मोहम्मद (स अ व व ) तशरीफ़ लायेंगे और उन पर ज़ुल्म के पहाड़ तोड़ने वाले बुलाये जायेंगे। हज़रत इमाम (अ.स.) मज़लूम की दाद रसी फ़रमायेंगे और ज़ालिम को कैफ़रो किरदार तक पहुँचायेंगे। हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) इन तमाम उमूर में निगरानी का फ़रीज़ा अदा फ़रमाने के लिये जलवा अफ़रोज़ होंगे। इसी दौरान में हज़रते ईसा (अ.स.) अपनी साबेक़ा अरज़ी 33 साला ज़िन्दगी में 7 साला मौजूदा अरज़ी ज़िन्दगी का इज़ाफ़ा कर के चालीस साल की उम्र में इन्तेक़ाल कर जायेंगे और आपको रौज़ाए हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) में दफ़्न कर दिया जायेगा।(हाशिए मिशक़ात , पृष्ठ 463, सिराज अल क़ुलूब पृष्ठ 77, अजाएबुल क़सस पृष्ठ 23 )

इसके बाद हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की हुकूमत का ख़ात्मा हो जायेगा और हज़रत अमीरूल मोमेनीन निज़ामे कायनात पर हुक्म रानी करेंगे जिसकी तरफ़ कु़रआने मजीद में ‘‘ दाबतुल अर्ज़ ’’ से इशारा किया गया है। अब रह गया यह कि हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की मुद्दते हुकूमत क्या होगी ? इसके बारे मे सख़्त इख़्तेलाफ़ है। इरशाद मुफ़िद के पृष्ठ 533 में सात साल और पृष्ठ 537 में 19 साल और आलामुल वुरा के पृष्ठ 364 में 19 साल , मिशक़ात के पृष्ठ 462 में 7 , 8 , 9 साल , नूरूल अबसार के पृष्ठ 154 में 7 , 8 , 9 , 10 साल और नेयाबुल मोअद्दता शेख़ सुलेमान क़न्दूज़ी बलखी़ के पृष्ठ 433 में 20 साल मरक़ूम है। मैंने हालात हदीस , अक़वाले उलेमा से इस्तेम्बात कर के बीस साल को तरजीह दी है। हो सकता है कि एक साल दस साल के बराबर हों।

(इरशाद मुफ़िद पृष्ठ 533, नूरूल अबसार पृष्ठ 155 )

अर-रहीकुल मख़्तूम पार्ट 2

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम, हज़रत सारा और हज़रत हाजरा को साथ लेकर फ़लस्तीन वापस तशरीफ़ लाए, फिर अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को हाजरा अलैहस्सलाम के पेट से एक बेटा-इस्माईल – अता फ़रमाया, लेकिन इस पर हज़रत सारा को जो निःसन्तान थीं, बड़ी शर्म आई और उन्होंने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को मजबूर किया कि हज़रत हाजरा को उनके नए बच्चे सहित देश निकाला दे दें। हालात ने ऐसा रुख अपनाया कि उन्हें हज़रत सारा की बात माननी पड़ी और हज़रत हाजरा और बच्चे हज़रत इस्माईल को साथ लेकर हिजाज़ तशरीफ़ ले गए और वहां एक चटयल घाटी में बैतुल्लाह शरीफ़ के क़रीब ठहरा दिया। उस वक़्त बैतुल्लाह शरीफ़ न था, सिर्फ़ टीले की तरह उभरी हुई ज़मीन थी। बाढ़ आती थी तो पानी दाहिने-बाएं से कतरा कर निकल जाता था। वहीं मस्जिदे हराम के ऊपरी भाग में ज़मज़म के पास एक बहुत बड़ा पेड़ था । आपने उसी पेड़ के पास हज़रत हाजरा और हज़रत इस्माईल अलै० को छोड़ा था । उस वक़्त न मक्का में पानी था, न आदम, न आदमज़ाद । इसलिए हज़रत इब्राहीम ने एक तोशेदान में खजूर और एक मश्केज़े में पानी रख दिया। इसके बाद फ़लस्तीन वापस चले गए, लेकिन कुछ ही दिनों में खजूर और पानी खत्म हो गया और बड़ी कठिन घड़ी का सामना करना पड़ा, पर ऐसी कठिन घड़ी में अल्लाह की मेहरबानी से ज़मज़म का सोता फूट पड़ा और एक मुद्दत तक के लिए रोज़ी का सामान और जीवन की पूंजी बन गया। ये बातें आम तौर से लोगों को मालूम हैं।

कुछ दिनों के बाद यमन से एक क़बीला आया, जिसे इतिहास में जुरहुम द्वितीय कहा जाता है। यह क़बीला इस्माईल अलैहिस्सलाम की मां से इजाज़त लेकर मक्का में ठहर गया। कहा जाता है कि यह क़बीला पहले मक्का के आस-पास की घाटियों में ठहरा हुआ था। सहीह बुखारी में इतना स्पष्टीकरण मौजूद है कि (रहने के उद्देश्य से ये लोग मक्का में हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के आने के बाद और उनके जवान होने से पहले आये थे, लेकिन इस घाटी से उनका गुज़र इससे पहले भी हुआ करता था ।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने छोड़े हुओं की निगरानी के लिए कभी-कभी मक्का तशरीफ़ लाया करते थे, लेकिन यह मालमू न हो सका कि इस तरह उनका कितनी बार आना हुआ, हां, ऐतिहासिक स्रोतों से उनका चार बार

1. देखिए सहीह बुखारी, किताबुल अंबिया, 1/474, 475 2. सहीह बुखारी 1/475


आना साबित है, जो इस तरह है-

1. कुरआन मजीद में बयान किया गया है कि अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को सपने में दिखलाया कि वह अपने सुपुत्र (हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम) को ज़िब्ह कर रहे हैं। यह सपना एक प्रकार से अल्लाह का हुक्म था। बाप-बेटे दोनों जब अल्लाह के इस हुक्म को पूरा करने के लिए तैयार हो गये और बाप ने बेटे को माथे के बल लिटा दिया, तो अल्लाह ने पुकारा, ऐ इब्राहीम ! तुमने सपने को सच कर दिखाया। हम अच्छे लोगों को इसी तरह बदला देते हैं। निश्चय ही यह खुली परीक्षा थी और अल्लाह ने उन्हें फ़िदए (प्रतिदान) में एक बड़ा, ज़िब्ह के लायक़ जीव अता कर दिया। 1

बाइबिल की किताब पैदाइश में उल्लिखित है कि हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम, हज़रत इसहाक़ अलैहिस्सलाम से तेरह साल बड़े थे और कुरआन से मालूम होता है कि यह घटना हज़रत इसहाक़ अलैहिस्सलाम के जन्म से पहले घटी थी, क्योंकि पूरी घटना का उल्लेख कर चुकने के बाद हज़रत इसहाक़ अलैहिस्सलाम के जन्म की शुभ-सूचना दी गई है।

इस घटना से सिद्ध होता है कि हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के जवान होने से पहले कम से कम एक बार हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने मक्के का सफ़र ज़रूर किया था। बाक़ी तीन सफ़रों का विवरण सहीह बुखारी की एक लंबी रिवायत में है, जो इब्ने अब्बास रजि० से मरफूअन रिवायत की गई है। उसका सार यह हैं-

2. हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम जब जवान हो गये, जुरहुम से अरबी सीख ली और उनकी निगाहों में जंचने लगे, तो उन लोगों ने अपने परिवार की एक महिला से आपका विवाह कर दिया। उसी बीच हज़रत हाजरा का देहान्त हो गया। उधर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को ख्याल हुआ कि अपने छोड़े हुओं को देखना चाहिए। चुनांचे वह मक्का तशरीफ़ ले गये। लेकिन हज़रत इस्माईल से मुलाक़त न हुई। बहू से हालात मालूम किए। उसने तंगदस्ती की शिकायत की। आपने वसीयत की कि इस्माईल अलैहिस्सलाम आएं तो कहना, अपने दरवाज़े की चौखट बदल दें। इस वसीयत का मतलब हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम समझ गए। बीवी को तलाक़ दे दी और एक दूसरी औरत से शादी कर ली, जो अधिकतर इतिहासकारों के कथनानुसार जुरहुम के सरदार

1. सूरः साफ्फ़ात 103-107 2. सहीह बुखारी 1/475-476,

बुखारी का भी झुकाव है। चुनांचे अपनी सहीह में उन्होंने एक बाब (अध्याय) बांधा है, जिसका शीर्षक है ‘इस्माईल अलैहिस्सलाम की ओर यमन की निस्बत’ और इस पर कुछ हदीसों से तर्क जुटाया है। हाफ़िज़ इब्ने हजर ने उसकी व्याख्या में इस बात को प्रमुखता दी है कि क़स्तान, नाबित बिन इस्माईल अलैहिस्सलाम की नस्ल से थे।

क़ीदार बिन इस्माईल अलैहिस्सलाम की नस्ल मक्का ही में फलती-फूलती रही, यहां तक कि अदनान और फिर उनके बेटे मअद का ज़माना आ गया। अदनानी अरब का वंश-क्रम सही तौर पर यहीं तक सुरक्षित है।

अदनान नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के वंश-क्रम की 21वीं पीढ़ी पर पड़ते हैं। कुछ रिवायतों में बयान किया गया है कि आप जब अपने वंश-क्रम का उल्लेख करते तो अदनान पर पहुंच कर रुक जाते और आगे न बढ़ते, फ़रमाते कि वंश -क्रम के विशेषज्ञ ग़लत कहते हैं। मगर विद्वानों का एक गिरोह कहता है कि अदनान से आगे भी वंश-क्रम बताया जा सकता है। उन्होंने इस रिवायत को कमज़ोर कहा है। लेकिन उनके नज़दीक नसब के इस हिस्से में बड़ा मतभेद है, मिलाप संभव नहीं । अल्लामा मंसूरपुरी ने इब्ने साद की रिवायत को प्रमुखता है जिसे तबरी और मसऊदी आदि ने भी दूसरे कथनों और रिवायतों के साथ ज़िक्र किया है। इस रिवायत के अनुसार अदनान और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बीच चालीस पीढ़ियां हैं। 3 दी

बहरहाल मअद के बेटे नज़ार से—जिनके बारे में कहा जाता है कि इनके अलावा मअद की कोई सन्तान न थी— कई परिवार अस्तित्व में आए। वास्तव में नज़ार के चार बेटे थे और हर बेटा एक बड़े क़बीले की बुनियाद बना । चारों के नाम ये हैं-

1. इयाद, 2. अनमार, 3. रबीआ और 4. मुज़र ।

इनमें से अन्तिम दो क़बीलों की शाखाएं और उपशाखाएं बहुत ज़्यादा हुईं।

1. सहीह बुखारी, किताबुल मनाक़िब हदीस न० 3507, फ़हुल बारी 6/621-623, तारीख इब्ने खल्लदून 2/1/46, 2/2/241, 242, साथ ही देखिए नसबे माद, अलयमनुल कबीर लिल कलबी 1/131

2. तबरी : तारीखुल उमम वल मुलूक 2/191-194, अल-आलाम 5/6

3. तबक़ाते इब्ने साद 1/56, तारीखे तबरी 2/272, मसऊदी की मुरव्वजुज़्ज़हब 2/273, 274, तारीखे इब्ने खल्लदून 2/2/298, फ़हुल बारी 6/622 रहमतुल्लिल आलमीन 27-8, 14-17

चुनांचे रबीआ से असद बिन रबीआ, अन्ना, अब्दुल क़ैस, वाइल, बिक्र, तग़लब और बनू हनीफ़ा वग़ैरह अस्तित्व में आए।

मुज़र की सन्तान दो बड़े क़बीलों में विभाजित हुई—

1. क़ैस ईलान बिन मुज़र,

2. इलयास बिन मुज़र

क़ैस ईलान से बनू सुलैम, बनू हवाजिन, बनू ग़तफ़ान, ग़तफ़ान से अबस, ज़ुबियान, अशजअ और ग़नी बिन आसुर क़बीले अस्तित्व में आए।

इलयास बिन मुज़र से तमीम बिन मुर्रा, बुज़ैल बिन मुदरका, बनू असद बिन खुज़ैमा और किनाना बिन खुज़ैमा के क़बीले अस्तित्व में आए। फिर किनाना से कुरैश का क़बीला अस्तित्व में आया। यह क़बीला फ्रिह बिन मालिक बिन नज्र बिन किनाना की सन्तान है ।

फिर कुरैश भी विभिन्न शाखाओं में बंटे मशहूर कुरैशी शाखाओं के नाम ये हैं – जम्ह, सम, अदी, मख्ज़ूम, तैम, ज़ोहरा और कुसई बिन किलाब के परिवार, यानी अब्दुद्दार, असद बिन अब्दुल उज़्ज़ा और अब्दे मुनाफ़, ये तीनों कुसई के बेटे थे। इनमें से अब्द मुनाफ के चार बेटे हुए, जिनसे चार उप क़बीले अस्तित्व में आए, यानी अब्द शम्स, नौफ़ल, मुत्तलिब और हाशिम । इन्हीं हाशिम की नस्ल से अल्लाह ने हमारे हुज़ूर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को चुना । ।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इर्शाद है कि अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सन्तान में से इस्माईल अलैहिस्सलाम को चुना, फिर इस्माईल अलैहिस्सलाम की औलाद में से किनाना को चुना और किनाना की नस्ल से कुरैश को चुना, फिर कुरैश में से बनू हाशिम को चुना और बनू हाशिम में से मुझे चुना। 1

इब्ने अब्बास रज़ि० का बयान है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया, अल्लाह ने तमाम जीवों को पैदा किया, तो मुझे सबसे अच्छे गिरोह में बनाया, फिर इनके भी दो गिरोहों में से ज़्यादा अच्छे गिरोह के अन्दर रखा, फिर क़बीलों को चुना, तो मुझे सबसे अच्छे क़बीले के अन्दर बनाया, फिर घरानों को चुना तो मुझे सबसे अच्छे घरानों में बनाया, इसलिए मैं अपनी जात (निज) के एतबार से भी सबसे अच्छा हूं और अपने घराने के एतबार से भी सबसे बेहतर हूं।2

1. सहीह मुस्लिम 2/245, जामे तिर्मिज़ी 2/201 2.

बहरहाल अदनान की नस्ल जब ज़्यादा बढ़ गई तो वह रोजी-रोटी की खोज में अरब के विभिन्न भू-भाग में फैल गई, चुनांचे क़बीला अब्दुल क़ैस ने, बिक्र बिन वाइल की कई शाखाओं ने और बनू तमीम के परिवारों ने बहरैन का रुख किया और उसी क्षेत्र में जा बसे ।

बनू हनीफा बिन साब बिन अली बिन बिक्र ने यमामा का रुख किया और उसके केन्द्र हिज्र में आबाद हो गये।

बिक्र बिन वाइल की बाक़ी शाखाओं ने, यमामा से लेकर बहरैन, काज़िमा तट, खाड़ी, सवादे इराक़, उबुल्ला और हय्यत तक के इलाक़ों में रहना सहना शुरू कर दिया।

बनू तग़लब फ़रातिया द्वीप में जा बसे, अलबत्ता उनकी कुछ शाखाओं ने बनूं बिक्र के साथ रहना-सहना पसन्द किया ।

बनू तमीम बादिया बसरा में जाकर आबाद हो गए ।

बनू सुलैम ने मदीना के क़रीब डेरे डाले। उनकी आबादी वादिल कुरा से शुरू होकर ख़ैबर और मदीना के पूरब से गुज़रती हुई हर्रा बनू सुलैम से मिले दो पहाड़ों तक फैली हुई थी ।

बनू सक़ीफ़ तायफ़ में रहने-सहने लगे और बनू हवाज़िन ने मक्का के पूरब में औतास घाटी के आस-पास डेरे डाले। उनकी आबादी मक्का-बसरा राजमार्ग पर स्थित थी ।

बनू असद तैमा के पूरब और कूफ़ा के पश्चिम में आबाद हो गए थे। उनके और तैमा के बीच बनू तै का एक परिवार बहतर आबाद था । बनू असद की आबादी और कूफ़े के बीच पांच दिन की दूरी थी ।

बनू ज़िबयान तैमा के क़रीब हौरान के आस-पास आबाद हो गये थे।

तिहामा में बनू किनाना के परिवार रह गये थे। इनमें से कुरैशी परिवारों का रहना-सहना मक्का और उसके आस-पास था। ये लोग बिखरे हुए थे, ये आपस में बंधे हुए न थे, यहां तक कि कुसई बिन किलाब उभरा और कुरैशियों को एक बनाकर उन्हें मान-सम्मान और उच्च व श्रेष्ठ स्थान दिलाया।

1. विस्तार में जानने के लिए देखिए जमहरतुन्नसब, नसब साद वल यमनुल कबीर, अंसाबुल कुरशीयीन, निहायतुल अदब व कलाइदुल जमान, सबाइकुज़्ज़हब आदि ।

ख़िदमत का ज़ामिन कौन ?

ख़िदमत का ज़ामिन कौन ?

(1) हुज़ूर पुर नूर सैयद आलम ने फ़रमाया:

जो शख़्स मेरे एहले बैत से नेकी करेगी, वह कृयमात के दिन उसका अज्र 100 गुना ज़्यादा पाएगा। मैं ( मुहम्मद ) कयामत के दिन इस नेकी का जामिन हूंगा।’

(शर्फ नबी, शैख अबु सईद अब्दबुल मलिक बिन
उसमान नीशापुरी (स. 407 हि.) स. 239

जो हज़रात सादाते किराम को खुशी के मोके पर नज़र अंदाज़ करते हैं, वह इन रिवायात करीमा से सबक हासिल करें।

(2) रहुल मुख्तार बाब गुस्ल मय्यत में बहवाला हदीस शरीफ़

फ़रमायाः

كل سبب و نسب منقطع الاسببى و نسبى

यानी कयामत के दिन हर नसबी और सुसराली रिश्ते कट जाऐंगे और काम न आऐंगे मगर मेरा नसब और सुसराली रिश्ता काम
आएगा।

( रुद्दुल मुख़्तार किताबुल सलात बाब सलातुल जनाज़ा )

Emergence of Mankind from One Man

Emergence of Mankind from One Man

According to the theory of evolution it is impossible for thousands of species to give birth to only one human being. On the other hand this theory thinks it possible that a lot of people may born simultaneously. While the holy Qur’an categorically states that the appearance of mankind is from one man and not many. God Almighty, first of all, created a single person, then from him created his mate and from them spread may men and women. The Qur’an says:

O people! fear your Lord who performed (the first act of your) creation from a single soul, and from it created its mate, then from

the pair of them scatted (the creation of) countless men and women’ This statement does not validate the evolutionary theory at any case. Here the Arabic word nafs wāhidah means one single person. It is not applicable to amoeba or other unicellular organisms as some people try to interpret it. It is illogical from scientific point of view. It is so because e the unicellular organisms do not have any conjugal system. They divide into two parts without any sexual process. This natural phenomenon is existing from millions of years and no change in this system is noted till date. So these unicellular organisms do not have any male or female.

1. Qur’an (an-Nisa) 4:1.

Special Creation of Adam

The Divine declaration that ‘innija ‘elun fil ardhe khalifah’ is refuting the evolutionary theory altogether. Many other Qur’ānic verses validate this statement.

And (call to the mind) when your Lord said to the angels: “I am about to create a human being from old (and) black stinking, sounding clay.

Here the interpretation of ‘innija ‘elun fil ardhe khalifah’ is being made with the words ‘inni Khaliq un basharan’. In g made with this way the creation of that particular ‘vicegerent’ is narrated. The word ‘bashar’ is used for both singular and plural in the Qur’an. For plural it is used as:

But (the fact is that) the (creatures) whom Allah has created, you (too) are a mortal creature from (among) them (that is, you are like other human classes). 2

http://www.MinhajBooks.com Their messengers said to them: though, we are (in our mortal self) only but human like yourselves.³ 3

Qur’an (Hijr) 15:28. Qur’an (Ma’idah) 5:18. Qur’an (Ibrāhīm) 14:11.

And for singular the word ‘bashar’ is used as:
And they (after seeing instantly) said: Allāh preserve us! No mortal is this.

For they said: what! A man; a solitary one from among ourselves! Shall we follow such a one?²

Thus one single man is inferred from the Qur’ānic words inni Khāliqun basharan’. The forthcoming verse confirms this statement:

So when I have fashioned his (outward) form in perfect proportion and breathed into (the innermost nature of this mortal) frame my own (light-diffusing) spirit, fall you down before him in prostration.³

Here both the pronouns used in sawwaituhū and nafakhtu fihi are singular and masculine which confirm the statement that only one person is being mentioned and not many. The following verses of surah Sa’ad reinfo same statement: the

1. Qur’an (Yousuf) 12:31. 2. Qur’an (Qamar) 54:24. 3. Qur’an (Hijr) 15:29.

And (call to the mind) when your Lord said to the angels: I am about to create man from clay. So when I have fashioned his (outward) form in perfect proportion and breathed into (the innermost nature of this mortal) frame my own (light diffusing) spirit, fall you down before him in prostration.” This Qur’anic statement is, therefore, rejecting the theory of evolution altogether. It is pointing out the creation of man from clay and not from unicellular organisms or other animals. Otherwise, the word dabbah would be used instead of tin. Another noteworthy point is that the aforesaid Qur’ānic statement is a dialogue between God Almighty and the angels in the occasion of Adam’s creation. And all the species of the world had been emerged till that time as is clear from the following Qur’anic verse.

And He taught Adam the nature of all things.² 2

So on the occasion when all the animals and vegetables had been appeared, the Divine statement is a clear substantiation of Adam’s creation from clay.

Qur’ān (Sa’ad) 38:71-72. Qur’an (al-Baqarah) 2:31.
Summing up

If we summarize the aforesaid whole discussion, we may get the following points relating the creation of the first man i.e. Adam:

1. Adam’s creation was especially made under the personal supervision of God Almighty and this is really a great honour for him.

2. God Almighty created him after kneading the clay and in various stages as is explicit from the following verse:

(Allah) said: O Iblis! What prevents you from prostrating yourself to one whom I have created with My hands. 3. Nearly 4.5 billions years ago, at the time of creation of the solar system, the temperature of the earth was too hot to the survival of any creature on it. It was just a hot ball of fire. It cooled down gradually and took 2 billion years to become suitable for the habitation of the initial species of life on it. Then Almighty Allah started life on it. The atmosphere of the earth was made convenient for the survival of various biological species. The primary phases of life were quite simple, the animals and vegetables who emerged first on the earth, they decreased the densities of it and made it appropriate to the habitation of superior species. However, the atmosphere of the earth became unsuitable for those initial animals and vegetables. So they gradually disappeared from the earth. The mighty

1. Qur’ān (Sa’ad) 38:75.
Dinosaurs were one of them. When the earthly temperature became suitable for the residence of mankind, Almighty Allah sent down Adam (the father of mankind) on the earth as His vicegerent. The descent of Adam clearly manifest the fact that man was not created from any inferior creature through evolution. His creation was rather made in the heaven much before his descent on the earth. The natural atmospheric evolution of the earth cannot be mixblended to the special creation of man.

JACOB (YA’QUB) Alahissalam

JACOB (YA’QUB)

Jacob (Ya qub) was one of the twin sons of Isaac. He was appointed prophet of his people after the death of his father. His popular name was Israel and his progeny is called Bani Israel (the children of Israel).

He had twelve sons and one daughter. The twelve tribes of the children of Israel are named after his twelve sons. Joseph (Yusuf) was one of his sons. He was extremely handsome and was dearly loved by his father. His brothers were jealous of him and they always looked for an excuse to get him away from their father. Finally they took him away at the pretext of hunting and threw him in a well. Jacob cried so much at the separation of his beloved son that he lost his eyesight.

As will be seen in the narrative on the life of Joseph. God rescued Joseph from the well and made him the king of Egypt. There was famine in the land of Canaan and his brothers came to get grain from the king. Joseph recognised them because they were the same fellows who had thrown him in the well. He forgave them and had them move, along with or his father, to Egypt.

The children of Israel remained in Egypt for about four hundred and thirty years until Moses (Musa) ultimately rescued them from the ill treatment rendered by King Ramsis III.

References: The Qur’an: Sura Baqarah. An’am. Ale Imran. Yusuf, Anbiya, Jinn and Mo’min.