
Imam Baqir aur 2 Choron ka Dilchasp Waqiya | امام محمد باقر اور دو چوروں…





वाक़िए क़हत
इमाम हसन असकरी (अ.स.) क़ैद ख़ाने ही में थे कि सामरा में जो तीन साल से क़हत पड़ा हुआ था उसने शिद्दत इख़्तेयार कर ली और लोगों का हाल यह हो गया कि मरने के क़रीब पहुँच गए। भूख और प्यास की शिद्दत ने ज़िन्दगी से आजिज़ कर दिया। यह हाल देख कर ख़लीफ़ा मोतमिद अब्बासी ने लोगों को हुक्म दिया कि तीन दिन तक बाहर निकल कर नमाज़े इसतेस्क़ा पढ़ें। चुनान्चे सब ने ऐसा किया , मगर पानी न बरसा। चौथे रोज़ बग़दाद के लसारा की जमाअत सहरा में आई और इनमें से एक राहिब ने आसमान की जानिब अपना हाथ बुलन्द किया , उसका हाथ बुलन्द होना था कि बादल छा गए और पानी बरसना शुरू हुआ। इसी तरह उस राहिब ने दूसरे दिन भी अमल किया और बदस्तूर उस दिन भी बाराने रहमत का नुज़ूल हुआ। यह हालत देख कर सब को निहायत ताअज्जुब हुआ। हत्ता कि बाज़ जाहिलों के दिलों में शक पैदा हो गया। बल्कि बाज़ उनमें से इसी वक़्त मुरतिद हो गए।
यह वाक़िया ख़लीफ़ा पर बहुत शाक गुज़रा और उसने इमाम हसन असकरी (अ.स.) को तलब कर के कहा , अबू मोहम्मद अपने जद के कलमे गोयों की ख़बर लो और उनको हलाकत यानी गुमराही से बचाओ। हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने फ़रमाया कि अच्छा राहिबों को हुक्म दिया जाए कि कल फिर वह मैदान में आ कर दोआए बारान करें , इन्शा अल्लाह ताला मैं लोगों के शकूक ज़ाएल कर दूँगा। फिर जब दूसरे दिन वह लोग मैदान में तलबे बारां के लिये जमा हुए तो इस राहिब ने मामूल के मुताबिक़ आसमान की तरफ़ हाथ बुलन्द किया नागाह आसमान पर अब्र नमूदार हुआ और मेह बरसने लगा। यह देख कर इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने एक शख़्स से कहा कि राहिब के हाथ पकड़ कर जो चीज़ राहिब के हाथ में मिले ले ले , उस शख़्स ने राहिब के हाथ में एक हड्डी दबी हुई पाई और उससे ले कर हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) की खि़दमत में पेश की। उन्होंने राहिब से फ़रमाया कि तू हाथ उठा कर बारिश की दुआ कर उसने हाथ उठाया तो बजाए बारिश होने के मतला साफ़ हो गया और धूप निकल आई , लोग कमाले मुताअज्जिब हुए और ख़लीफ़ा मोतमिद ने हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) से पूछा कि ऐ अबू मोहम्मद यह क्या चीज़ है ? आपने फ़रमाया कि यह एक नबी की हड्डी है जिसकी वजह से राहिब अपनी मुद्दोआ में कामयाब होता रहा। क्यों कि नबी की हड्डी का यह असर है कि जब जब वह ज़ेरे आसमान खोल दी जायेगी तो बाराने रहमत ज़रूर नाज़िल होगा। यह सुन कर लोगों ने इस हड्डी का इम्तेहान किया तो उसकी वही तासीर देखी जो हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने की थी। इस वाक़िये से लोगों के दिलों के शकूक ज़ाएल हो गए जो पहले पैदा हो गए थे। फिर इमाम हसन असकरी (अ.स.) इस हड्डी को ले कर अपनी क़याम गाह पर तशरीफ़ लाए।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 124 व कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 129 ) फिर आपने इस हड्डी को कपड़े मे लपेट कर दफ़्न कर दिया।(अख़बार अल दवल पृष्ठ 117 )
शेख़ शहाबुद्दीन क़लदूनी ने किताब ग़राएब व अजाएब में इस वाक़िये को सूफ़ियों की करामत के सिलसिले में लिखा है बाज़ किताबों ंमें है कि हड्डी की गिरफ़्त के बाद आपने नमाज़ अदा की और दुआ फ़रमाई। ख़ुदा वन्दे आलम ने इतनी बारिश की कि जल थल हो गया और क़हत जाता रहा। यह भी मरक़ूम है कि इमाम (अ.स.) ने क़ैद से निकलते वक़्त अपने साथियों की रिहाई का मुतालेबा फ़रमाया था जो मंज़ूर हो गया था और वह लोग भी राहिब की हवा उखाड़ने के लिये हमराह थे।(नूरूल अबसार पृष्ठ 151 )
एक रवायत में है कि जब आपने दुआ ए बारान की और अब्र आया तो आपने फ़रमाया कि फ़लां मुल्क के लिये है और वह वहीं चला गया। इसी तरह कई बार हुआ फिर वहां बरसा।
वाक़ीयाए क़हत के बाद
256 हिजरी के आखि़र में वाक़िए क़हत के बाद हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) का चर्चा तमाम आलम में फैल गया। अब क्या था मुवाफ़िक़ व मुख़ालिफ़ सब ही का मैलान व रूझान आपकी तरफ़ होने लगा। आपके वह नए मानने वाले जिनके दिलों में आले मोहम्मद (स अ व व ) की मोअद्दत कमाल को पहुँची हुई थी वह यह चाहते थे कि किसी सूरत से इमाम (अ.स.) की खि़दमत में इमाम मेहदी (अ.स.) की विलादत की मुबारक बाद पेश करें लेकिन इसका मौक़ा न मिलता था क्यों कि या इमाम क़ैद में होते या हिरासत में। उनसे मिलने की किसी को इजाज़त न होती थी लेकिन क़हत के वाक़िये से इतना हुआ कि आप तक़रीबन एक साल क़ैद ख़ाने से बाहर रहे। इसी दौरान में लोगों ने मसाएल वग़ैरा दरयाफ़्त किये और जो लोग ज़्यारत के मुश्ताक़ थे उन्होंने ज़ियारत की और जो ख़ुफ़िया तहनियते विलादत हज़रते हज़रत हुज्जत (अ.स.) अदा करना चाहते थे उन्होंने तहनियत अदा की।
अल्लामा मोहम्मद बाक़र लिखते हैं कि 257 हिजरी में तक़रीबन 70 आदमी मदाएन से करबला होते हुए सामरा पहुँचे और हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हो कर तहनियत गुज़ार हुए। हज़रत ने फ़रते मसर्रत से आंखों में आंसू भर कर उनका इस्तेक़बाल किया और उनके सवालात के जवाबात दिये।(दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 172 )
अक़ीदत मंदों की आमद का चुंकि तांता बंध गया था इस लिये ख़लीफ़ा मोतमिद ने आपके हालात की निगरानी के लिये बेशुमार जासूस मुक़र्रर कर दिये। इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने जिन्हें हुकूमत की नियत का बहुत अच्छी तरह इल्म था ख़ामोशी और ंगोशा नशीनी की ज़िन्दगी बसर करने लगे और आपने इसकी एहतीयात बरती कि मुल्की मामेलात पर कोई तबसेरा न किया जाय और सिर्फ़ दीनी उमूर से बहस की जाय। चुनान्चे 257 हिजरी के आखि़र तक यही कुछ होता रहा लेकिन ख़लीफ़ा मुतमईन न हुआ और उसने हसबे आदत रोक टोक शुरू की और सब से पहले उसने ख़ुम्स की आमद की बन्दिश कर दी।
इसी ज़माने में एक दिन हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) मुतवक्किल के वज़ीर फ़तेह इब्ने ख़ाकान के बेटे अबीदुल्लाह इब्ने ख़ाक़ान जो कि मोतमिद का वज़ीर था मिलने के लिये तशरीफ़ ले गए। उसने आपकी बेइन्तेहां ताज़ीम की और आपसे इस तरह महवे गुफ़्तुगू रहा कि मोतमिद का भाई मौक़फ़ दरबार में आया तो उसने कोई परवाह न की। यह हज़रत की जलालत और ख़ुदा की दी हुई इज़्ज़त का नतीजा था। हम इस वाक़िये को अबीदुल्लाह के बेटे अहमद ख़ाक़ान की ज़बानी बयान करते हैं। कुतुबे मोतबरा में है कि जिस ज़माने में अहमद ख़ाक़ान क़ुम का वाली था , उसके दरबार में एक दिन अलवियों का तज़किरा छिड़ गया। वह अगरचे दुशमने आले मोहम्मद होने में मिसाली अहमियत रखता था लेकिन यह कहने पर मजबूर हो गया कि मेरी नज़र में इमाम हसन असकरी (अ.स.) से बेहतर कोई नहीं। उनकी जो वक़अत उनके मानने वालों और अराकीने दौलत की नज़र में थी वह उनके अहद में किसी को भी नसीब नहीं हुई। सुनो! एक मरतबा मैं अपने वालिद अबीदुल्लाह इब्ने ख़ाक़ान के पास खड़ा हुआ था कि नागाह दरबान ने आ कर इत्तेला दी कि इमाम हसन असकरी (अ.स.) तशरीफ़ लाए हुए हैं , वह इजाज़ते दाखि़ला चाहते हैं। यह सुन कर मेरे वालिद ने पुकार कर कहा कि हज़रत इब्नुब रज़ा को आने दो। वालिद ने चूंकि कुन्नियत के साथ नाम लिया था इस लिये मुझे सख़्त ताअज्जुब हुआ क्यो कि इस तरह ख़लीफ़ा या वली अहद के अलावा किसी का नाम नहीं लिया जाता था। इसके बाद ही मैंने देखा कि एक साहब जो सब्ज़ रंग , ख़ुश क़ामत , ख़ूब सूरत , नाज़ुक अन्दाम जवान थे , दाखि़ल हुए। जिनके चहरे से रोबो जलाल हुवेदा था। मेरे वालिद की नज़र ज्यों ही उनके ऊपर पड़ी वह उठ खड़े हुए और उनके इस्तेक़बाल के लिये आगे बढ़े और उन्हें सीने से लगा कर उनके चेहरे और सीने का बोसा दिया और अपने मुसल्ले पर उनको बिठा लिया और कमाले अदब से उनकी तरफ़ मुख़ातिब रहे और थोड़ी थोड़ी देर के बाद कहते थे , मेरी जान आप पर क़ुरबान ऐ फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व )। इसी असना में दरबान ने आ कर इत्तेला दी कि ख़लीफ़ा का भाई मौफ़िक़ आया है। मेरे वालिद ने कोई तवज्जो न की हालांकि उसका उमूमन यह एज़ाज़ रहता था कि जब तक वापस न चला जाए , दरबार के लोग दो रोया सर झुकाय खड़े रहते थे। यहां तक कि मौफ़ि़क़ के ग़ुलामे ख़ास को उसने अपनी नज़रों से देख लिया। उन्हें देखने के बाद मेरे वालिद ने कहा या इब्ने रसूल अल्लाह (स अ व व ) अगर इजाज़त हो तो मौफ़िक़ से कुछ बातें कर लूं। हज़रत ने वहां से उठ कर रवाना हो जाने का इरादा किया। मेरे वालिद ने उन्हें सीने से लगाया और दरबानों को हुक्म दिया कि उन्हें दो मुकम्मल सफ़ों के दरमियान से ले जाओ कि मौफ़िक़ की नज़र आप पर न पड़े। चुनान्चे हज़रत इसी अन्दाज़ से वापस तशरीफ़ ले गए। आप के जाने के बाद मैंने ख़ादिमों और ग़ुलामों से कहा कि वाए हो तुमने कुन्नियत के साथ किस का नाम ले कर उसे मेरे वालिद के सामने पेश किया था , जिसकी उसने इस दर्जा ताज़ीम की जिसकी मुझे तवक़्क़ो न थी। उन लोगों ने फिर कहा कि यह शख़्स सादाते अलविया में से था। उसका नाम हसन बिन अली और कुन्नियत इब्नुल रज़ा है। यह सुन कर मेरे ग़म व ग़ुस्से की कोई इन्तेहां न रही और मैं दिन भर इसी ग़ुस्से में भुनता रहा कि अलवी सादात की मेरे वालिद ने इतनी इज़्ज़त व तौक़िर क्यो कि , यहां तक कि रात आ गई। मेरे वालिद नमाज़ में मशग़ूल थे। जब वह फ़रीज़ा ए इशा से फ़ारिग़ हुए तो मैं उनकी खि़दमत में हाज़िर हुआ। उन्होंने पूछा , ऐ अहमद ! इस वक़्त आने का क्या सबब है ? मैंने अर्ज़ की कि इजाज़त दीजिए तो कुछ पूछूं। उन्होंने फ़रमाया कि जो जी चाहे पूछो। मैंने कहा यह कौन शख़्स था , जो सुबह आपके पास आया था ? जिसकी आपने ज़बर दस्त ताज़ीम की और हर बात में अपने को और अपने बाप को उस पर से फ़िदा करते थे। उन्होंने फ़रमाया कि ऐ फ़रज़न्द यह राफ़ज़ियों के इमाम हैं। उनका नाम हसन बिन अली और उनकी मशहूर कुन्नियत इब्नुल रज़ा है। यह फ़रमा कर वह थोड़ी देर चुप रहे। फिर बोले ऐ फ़रज़न्द यह वह कामिल इंसान हैं कि अगर अब्बासीयों से सलतन चली जाए तो इस वक़्त दुनियां में इससे ज़्यादा इस हुकूमत का मुस्तहक़ कोई नहीं। यह शख़्स इफ़्फ़त , ज़ोहद , कसरते इबादत , हुस्ने इख़लाक़ , सलाह , तक़वा वग़ैरा में तमाम बनी हाशिम से अफ़ज़ल और आला हैं , और ऐ फ़रज़न्द अगर तू उनके बाप को देखता तो हैरान रह जाता , वह इतने साहबे करम और फ़ाज़िल थे कि उनकी मिसाल भी नहीं थी। यह सब बातें सुन कर मैं ख़ामोश तो हो गया लेकिन वालिद से हद दर्जा नाख़ुश रहने लगा और साथ ही साथ इब्नुल रज़ा के हालात को मालूम करना अपना शेवा बना लिया। इस सिलसिले में मैंने बनी हाशिम , उमरा , लशकर , मुन्शियाने दफ़्तरे क़ज़्ज़ाता और फ़ुक़हा और अवामुन नास से हज़रत के हालात का इस्तेफ़सार किया। सब के नज़दीक हज़रत इब्नुल रज़ा को जलील उल क़द्र और अज़ीम पाया और सबने बिल इत्तेफ़ाक़ यही बयान किया कि इस मरतबे और खू़बियों का कोई शख़्स किसी ख़ानदान में नहीं है। जब मैंने हर दोस्त और दुश्मन को हज़रत के बयाने इख़्लाक़ और इज़हारे मकारमे इख़्लाक़ में मुत्तफ़िक़ पाया तो मैं भी उनका दिल से मानने वाला हो गया और अब उनकी क़द्रो मंज़िलत मेरे नज़दीक़ बे इन्तेहा है। यह सुन कर तमाम अहले दरबार ख़ामोश हो गए। अलबत्ता एक शख़्स बोल उठा कि ऐ अहमद तुम्हारी नज़र में उनके बरादर जाफ़र की क्या हैसियत है ? अहमद ने कहा उनके मुक़ाबले में उसका क्या ज़िक्र करते हो वह तो ऐलानिया फ़िस्क़ व फ़ुजूर का इरतेक़ाब करता था। दाएमुल ख़ुमर था , ख़फ़ीफ़ उल अक़्ल था , अनवाए मलाही व मनाही का मुरतक़िब होता था। इब्नुल रज़ा के बाद जब ख़लीफ़ा मोतमिद से उसने उनकी जा नशीनी का सवाल किया तो उसने उसके किरदार की वजह से दरबार से निकलवा दिया था।(मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 124 व इरशादे मुफ़ीद पृष्ठ 505 ) बाज़ उलेमा ने लिखा है कि यह गुफ़्तुगू इमाम हसन असकरी (अ.स.) की शहादत के 18 साल बाद माहे शाबान 278 हिजरी की है।(दमए साकेबा पृष्ठ 192 जिल्द 3 प्रकाशित नजफ़े अशरफ़)

