
🔥 मरवान ने अहले बैत को गाली देकर अहले बैत की तौहीन किया।
✍️ इमाम जलालुद्दीन श्यूती रह० ने ‘तारीखे खुलफा’ में इस बात की वजाहत की है कि मरवान मलून जब हाकिम बना तो खुलेआम ऐलानिया तौर पर हजरत अली अलैहिस्सलाम पर लान-तान यानि सब्बो-सितम करने लगा और मरवान के इस लान-तान को सुनकर इमाम हसन सब्र करते रहे और खामोश रहे।
इमाम हसन अलैहिस्सलाम के सब्र की इंतेहा देखते हुए मरवान ने एक दिन एक शख्स को इमाम हसन अलैहिस्सलाम के पास यह कहलवाकर भेजा कि तू और तेरे बाप यानि अली की मिशाल एक खच्चर सी है, और उससे यानि इमाम हसन अलैहिस्सलाम से उसके मां के बारे में पूछना और कहना कि उसकी मां घोड़ी है.!!
(माजअल्लाह, लानत हो मलून मरवान पर और इसके बाप व औलाद पर)
बड़े अफसोस और हैरत की बात है कि कुछ नासबी उलेमा लोग धीरे-धीरे सारे बनी उमैया को सय्यद का लकब देते हुए हजरत अमीरुल-मोमिनीन कहने लगे, चाहे वह यजीद या मरवान ही क्यों ना हो।
आजकल के कुछ नासबी खारजी उलेमा लोग आने वाले नस्लों के जेहन को यजीदियत की ओर मोड़ने की जी-तोड़ कोशिश करते नजर आ रहे हैं..
इसका सबसे पहला सबूत है कि चौदह सौ साल से आजतक कोई भी कभी भी मस्जिदों में नमाज़ के खुतबों में आले मुहम्मद की मजलूमियत और बनी उमैया के सितम को बयां नहीं करता और तारीख के किसी भी मसले को अगर बयां करता भी है तो अहले बैत के मुजरिमों पर अपनी मुहब्बत जाहिर करते हुए तारीख को तोड़-मरोड़ कर बयां करतें हैं।
क्या ये नासबी खारजी उलेमा लोग जानबूझकर ऐसा करते हैं या सचमुच नहीं जानते या तारीख ही अहले बैत को मुजरिम मानती है कि आज इनके दुश्मनों को इज्जत दिया जा रहा है.??
ऐसा कुछ नहीं है !! खुतबा देने वाले मस्जिद के इमाम से लेकर मदरसे में चंदा करने वाले मोलवी बेचारे करे तो क्या करे..ये वही जानेंगे और कहेंगे जो खुद बनी उमैया के फैक्ट्री से इल्म हासिल करके आए होंगे.., दूसरी चीज कुछ लोग जानबूझकर अपनी मुनाफिकत से मजबूर होकर ऐसा करते हैं कि जैसा कि दौरे खिलाफत में लोग अली से बुग्ज रखने की वजह से पहचान लेते थे कि कौन मुनाफिक है और कौन नहीं.!!
मुनाफिक कल थे, आज भी हैं और कमामत तक रहेगें क्योंकि दीन में इनके वजूद पर कुरान गवाह है।
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