
History Of Zaidi Sect ( Firqa ) | Yemen Kay Zaidi Shia Kay Aqeeday | Muf…





अल्लामा तबरसी लिखते हैं कि हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के मदीने से सामरा तशरीफ़ ले जाने के बाद एक दिन अबू हाशिम ने कहाः मौला मेरा दिल नहीं मानता कि मैं एक दिन भी आपकी जियारत से महरूम हूं , बल्कि जी चाहता है कि हर रोज़ आपकी खि़दमत में हाजि़र हुआ करूं। हज़रत ने पूछा इसके लिए तुम्हें कौन सी रूकावट है ? उन्होने अर्ज़ की मेरा क़याम बग़दाद है और मेरी सवारी कमज़ोर है। हज़रत ने फ़रमायाः जाओ अब तुम्हारी सवारी का जानवर ताक़तवर हो जाऐगा और इसकी रफ़्तार बहुत तेज़ हो जाएगी। अबू हाशिम का बयान है कि हज़रत के इस इरशाद के बाद से ऐसा हो गया कि मैं रोज़ाना नमाज़े सुब्ह व नमाज़े ज़ोहर सामरा के असकर महल्ले में और नमाज़े मग़रिब इशा बग़दाद में पढ़ने लगा।
(आलामुलवुरा सफ़ा 208 )
अल्लामा जामी रहमतुर अल्लाह तहरीर फ़रमाते हैं कि आप से एक मानने वाले ने अपनी तकलीफ़ बयान करते हुए बग़दाद के काज़ी शहर की शिकायत की और कहा कि मौला वह बड़ा ज़ालिम है हम लोगों को बेहद सताता है आपने फ़रमाया घबराओ नहीं वह दो माह बाद बग़दाद में न रहेगा। रावी का बयान है कि ज्योंही दो माद पूरे हुए काज़ी अपने मनसब से माज़ूल हो कर अपने घर बैठ गया।(शवाहेदुन नबूवा)
अल्लामा मौसूफ़ यह भी लिखते हैं कि मुतावक्किल के मकान में बहुत सी बतख़े पली हुईं थीं जब कोई वहां जाता तो वह इतना शोर मचाया करती थीं कि कान पड़े बात सुनाई न देती थी लेकिन जब इमाम (अ.स.) तशरीफ़ ले जाते थे तो वह सब ख़ामोश हो जाती थीं और जब तक आप वहां तशरीफ़ रखते थे , वह चुप रहती थीं।
(शवाहेदुन नबूअत सफ़ा 209 )
अहमद बिन ईसा अल कातिब का बयान है कि मैंने एक शब ख़्वाब में देखा कि हज़रत मौहम्मद मुस्तफ़ा स. तशरीफ़ फ़रमा हैं और मैं उनकी खि़दमत में हाजि़र हूं। हज़रत ने मेरी तरफ़ नज़र उठा कर देखा और अपने दस्ते मुबारक से एक मुठ्ठी ख़ुरमा इस तश्त से अता फ़रमाया जो आपके सामने रखा हुआ था। मैंने उन्हें गिना तो वह पच्चीस थे। इस ख़्वाब को अभी ज़्यादा दिन न गुज़रे थे कि मुझे मालूम हुआ कि हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) सामरा तशरीफ़ लाए हैं। मैं उनकी ज़्यारत के लिए हाजि़र हुआ तो मैंने देखा कि उनके सामने एक तश्त रखा है जिसमें ख़ुरमें है। मैंने हज़रत को सलाम किया। हज़रत ने जवाबे सलाम देने के बाद एक मुठ्ठी ख़ुरमा मुझे अता फ़रमाया , मैंने इन ख़ुरमों का शुमार किया तो वह भी पच्चीस थे। मैंने अर्ज़ की मौला क्या कुछ ख़ुरमा और मिल सकता है ? जवाब में फ़रमाया ! अगर ख़्वाब में तुम्हें रसूले ख़ुदा स. ने इससे ज़्यादा दिया होता तो मैं भी इज़ाफ़ा कर देता। दमतुस् साकेबा जिल्द 3 सफ़ा 124 इसी कि़स्म का वाकि़या इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और इमाम अली रज़ा (अ.स.) के लिए भी गुज़रा है।