चौदह सितारे हज़रत इमाम अली रज़ा(अ.स) पार्ट- 8

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ख़लीफ़ा मामून रशीद अब्बासी और हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के वालिदे माजिद हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) को 183 हिजरी में हारून रशीद अब्बासी ज़हर से शहीद कराने के बाद 193 हिजरी में फ़ौत हो गया। इसके मरने के बाद जमादील सानी 193 हिजरी में इसका बेटा अमीन ख़लीफ़ा हुआ। हारून चुंकि अपने बेटों में सलतनत तक़सीम कर चुका था और उसके उसूल मोअय्यन कर चुका था इस लिये एक के बजाय दो हुक्मरानें रशीदी हुदूदे सलतनत पर हुक्मरानी करने लगे। अमीन चुंकि निहायत ही लग़ों आदमी था इस लिये उसने अपने उसअते इख़्तेयार की वजह से मामून पर जबरो ताअद्दी शुरू कर दी बिल आखि़र दोनों भाईयों में जंग हुई और अमीन चार साल आठ माह सलतनत करने के बाद 23 मोहर्रम हराम 198 हिजरी में क़त्ल कर दिया गया।

अमीन के क़त्ल के बाद भी मामून चार साल तक मर्व में रहा। सलतनत का कारोबार तो फ़ज़ल बिन सुहेल के सुपुर्द कर रखा था और खुद आलमों फ़ाज़िलों से जो उसके दरबार में भरे रहते थे फ़लसफ़ी मुबाहिसों में मसरूफ़ रहता था। ईराक़ में फ़ज़ल का भाई , हसन बिन सुहेल गर्वनर बनाया गया था। अबूहज़ीरह में नसर बिन नशिस्त अक़ील ने बग़ावत की और वह पांच साल तक शाही फ़ौजों का मुक़ाबला करता रहा। ईराक़ में बद्दू , लुच्चों , बदमाशों को बुलाकर हसन बिन सुहेल के खि़लाफ़ अलमे बग़ावत बुलन्द कर दिया। यह हालत देख कर हज़रत अली (अ.स.) और हज़रत जाफ़र तैय्यार के बाज़ बुलन्द नज़र नौनिहालों ने शायद यह ख़्याल किया कि इनके हुकू़क़ वापस मिलने का वक़्त आ गया है। चुंनाचे जमादिल सानी 199 हिजरी मुताबिक़ 814 ई 0 में अबू अब्दुल्लाह बिन इब्राहीम बिन इस्माईल बिन इब्राहीम अल मारूफ़ बा तबा बिन हसन अली बिन अबी तालिब अलवी ने जो मज़हब ज़ैदिया रखते थे कूफ़े में ख़रूज किया और लोगों को आले रसूल की बैअत और मुताबेअत की दावत दी। इनकी मद्द पर बनी शैबान का मुअजि़्ज़ज़ सरदार अबुल सरयासरी बिय मन्सूर शैबानी जो हर समह के फ़ौजी सरदारों में से था उठ खड़ा हुआ उन्होंने अपनी मुत्तफ़ेक़ा अफ़वाज से हसन की फ़ौज को कूफ़े के बाहर शिकस्त दे कर तमाम जुनूबी ईराक़ पर क़ब्ज़ा कर लिया।

फ़तेह के दूसरे दिन मोहम्मद बिन इब्राहीम मर्गे मफ़ाजात से फ़ौत हो गये। अबू असराया ने इनकी जगह मोहम्मद निब ज़ैद शहीद को अमीर बना लिया। हसन ने फिर फ़ौज भेजी। अबुल सराया ने उसे भी मार कर फ़ना कर दिया। इसी दौरान अलवी हर चार जानिब से अबुल सरया की मद्द को जमा जो गए और जा बजा शहरों में फैल गये और अबुल सरया ने कूफ़े में इमाम रज़ा (अ.स.) के नाम दिरहम व दीनार ‘‘ मस्कूक ’’ कराए और बसरा वस्ता , मदाएन की तरफ़ फ़ौज रवाना की और ईराक़ के बहुत से शहरो क़रिए फ़तह कर लिये। अलवीयों की क़ूवत व शौकत बहुत बढ़ गई। उन्होंने अब्बासीयो के घर जो कूफ़े में थे फूंक दिये और जो अब्बासी मिला उसे क़त्ल कर डाला। इसके बाद मौसमे हज आया तो अबू असराया ने हुसैन बिन हसन इब्ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) को जिन्हें अफ़तस कहते हैं मक्का का गर्वनर मुक़र्रर किया और इब्राहीम बिन मूसा काज़िम को यमन का आमिल बनाया और फ़ारस पर इस्माईल बिन मूसा काफ़िम को गर्वनर किया और मदायन की तरफ़ मोहम्मद बिन सुलैमान बिन दाऊद हसन मुसन्ना को रवाना किया और हुक्म दिया कि जानिबे शरक़ी से बग़दाद पर हमला करें। इस तरह अबुल सरया की सलतनत बहुत वसी हो गई।

फ़ज़ल बिने सहल ने हरसमा को अबू सराया की सरकोबी के लिये रवाना किया और अबूल सराया नहरवान के क़रीब शिकस्त खा कर मारा गया और मोहम्मद बिने मोहम्मद बिने जै़द मामून के पास मर्व भेज दिये गये। अबू सराया का दौरा दौरा कुल दस माह रहा। अबू सराया के क़त्ल हो जाने के बाद हिजाज़ में लोेगों ने मोहम्मद बिने जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को अमीरल मोमेनीन बनाया। अफतस ने भी उनकी बैअत कर ली और यमन में इब्राहीम बिने मूसिए काज़िम (अ.स.) ने सर उठाया। इसी तरह ईरान की सरहद से यमन तक तमाम मुल्क में ख़ाना जंगी फैल गई। अबुल सराया के क़त्ल के बाद हरसमा मग़रिब के हालात बयान करने को बादशाह की खि़दमत में मर्व हाज़िर हुआ क्यों कि वज़ीर इन तमाम हालात को बादशाह से मख़फ़ी रखता था। हालात बयान कर के वह बादशाह के पास से वापस आ रहा था कि वज़ीर ने रास्ते में उसे क़त्ल करा दिया। यह वाक़ेया 200 हिजरी का है। हरसूमा के क़त्ल की ख़बर सुन कर बग़दाद के सिपाहीयों ने जो उसे दोस्त रखते थे बग़दादियों में बग़ावत कर के हसन बिने सहल को निकाल दिया और मन्सूर बिन मेहदी को अपना गर्वनर बना लिया।

मामून को बाग़ियों की कसरत और अलवियों की तलबे खि़लाफ़त में उठने की ख़बर पहुँची तो घबरा गया और उसने यही मसलहत देखी कि इमाम अली रज़ा (अ.स.) को वली अहद बना ले। चुनान्चे उनको मदीने से बुला कर 2 रमज़ान 201 हिजरी मुताबिक़ 816 ई 0 को बवजूद उनके सख़्त इंकार के अपना वली अहद बना लिया। उनसे अपनी बेटी उम्मे हबीबा की शादी कर दी। उनका नाम दिरहमों दीनार में मस्कूक कराया। शाही वर्दी से अब्बसीयों का सियाह रंग दूर कर के बनी फ़ात्मा का सब्ज़ रंग इख़्तियार किया।( तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 61) इस वाक़िए तफ़सील कसीर किताबों में मौजूद है। हम मुख़सर अलफ़ाज़ में तहरीर करते हैं।


मामून रशीद की मजलिसे मुशाविरत

हालात से मुतासिर हो कर मामून रशीद ने एक मजलिसे मुशाविरत तलब की जिसमें उलमा , फ़ुज़ला , जुमआ और उमरा सभी को मदऊ किया। जब सब जमा हो गए तो असल राज़ दिल में रखते हुए उनसे यह कहा कि चूंकि शहरे ख़ुरासान में हमारी तरफ़ से कोई हाकिम नहीं है और इमाम रज़ा (अ.स.) से ज़्यादा लाएक़ कोई नहीं है इस लिये हम चाहते हैं कि इमाम रज़ा (अ.स.) को बुला कर वहां की ज़िम्मेदारी उनके सुपुर्द कर दें। मामून का मक़सद तो यह था कि उनको ख़लीफ़ा बना कर अलवियों की बग़ावत और उनकी चाबुक दस्ती को रोक दे लेकिन यह बात उसने मजलिसे मुशाविरत में ज़ाहिर नहीं कि बल्कि मुल्की ज़रूरत का हवाला दे कर उन्हें ख़ुरासान का हाकिम बनाना ज़ाहिर किया और लोगों ने तो इस पर जो भी राय दी हो लेकिन हसन बिने सहल और वज़ीरे आज़म फ़ज़ल बिने सहल इस पर राज़ी न हुए और यह कहा कि इस तरह खि़लाफ़त बनी अब्बास से आले मोहम्मद (अ.स.) की तरफ़ मुन्तक़िल हो जायेगी। मामून ने कहा मैंने जो कुछ सोचा है वह यही है और उस पर अमल करूंगा यह सुन कर वह लोग ख़ामोश हो गए। इतने में हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) के एक मोअजि़्ज़ज़ सहाबी , सुलेमान बिने इब्राहीम बिने मोहम्मद बिने दाऊद बिने क़ासिम बिने हैबत बिने अब्दुल्लाह बिने हबीब बिने शैख़ान बिने अरक़म खड़े हो गए और कहने लगे ऐ मामून रशीद ‘‘ रास्त मी गोई इमामी तरसम कि तू हज़रते इमाम रज़ा हमाना कुनी कि कूफ़ियान बा हज़रते इमाम हुसैन करदन्द ’’ तू सच कहता है लेकिन मैं डरता हूँ कि तू कहीं इनके साथ वही सुलूक न करे जो कूफ़ियों ने इमाम हुसैन (अ.स.) के साथ किया है। मामून रशीद ने कहा , ऐ सुलेमान ! तुम यह क्या सोच रहे हो ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता मैं उनकी अज़मत से वाक़िफ़ हूँ जो उन्हें सताएगा क़यामत में हज़रते रसूले करीम (स.अ.) हज़रते अली हकीम (अ.स.) को क्यों कर मुंह दिखाएगा तुम मुतमईन रहो इन्शा अल्लाह इनका एक बाल बीका न होगा। यह कह कर बा रवाएते अबू मख़नफ़ मामून रशीद ने क़ुराने मजीद पर हाथ रखा और क़सम खा कर कहा मैं हरगिज़ औलादे पैग़म्बर पर कोई ज़ुल्म न करूंगा। इसके बाद सुलेमान ने तमाम लोगों को कसम दे कर बैअत ले ली फिर उन्होंने एक बैअत नामा तैयार किया और उस पर अहले ख़ुरासान के दस्तख़त लिये। दस्तख़त करने वालों की तादाद चालीस हज़ार थी। बैअत नामा तैय्यार होने के बाद मामून रशीद ने सुलैमान को बैअत नामा समेत मदीने भेज दिया। सुलेमान क़ता मराहिल व तै मनाज़िल करते हुए मदीने मुनव्वरा पहुँचे और हज़रते इमाम रज़ा (अ.स.) से मुलाक़ात की। उनकी खि़दमत में मामून का पैग़ाम पहुँचाया और मजलिसे मशाविरत के सारे वाक़ियात बयान किये और बैअत नामा हज़रत की खि़दमत में पेश किया। हज़रत ने ज्यों ही उसको खोला और उसका सर नामा देखा सरे मुबारक हिला कर फ़रमाया कि यह मेरे लिये किसी तरह मुफ़ीद नहीं है। इस वक़्त आप आब दीदा थे। फिर आपने फ़रमाया कि मुझे जद्दे नाम दार ने ख़्वाब में नतीजा व अवाक़िब से आग़ाह कर दिया है। सुलैमान ने कहा मौला यह तो ख़ुशी का मौक़ा है। आप इस दर्जा परेशान क्यों हैं ? इरशाद फ़रमाया कि मैं इस दावत में अपनी मौत देख रहा हूँ। उन्होंने कहा मौला मैंने सब से बैअत ले ली है। कहा दुरूस्त है , लेकिन जद्दे नाम दार ने जो फ़रमाया है वह ग़लत नहीं हो सकता। मैं मामून के हाथों शहीद किया जाऊंगा।

बिल आखि़र आप पर कुछ दबाव पड़ा कि आप मर्व ख़ुरासान के लिये आज़िम हो गए। जब आप के अज़ीज़ों और वतन वालों को आपकी रवानगी का हाल मालूम हुआ बेपनाह रोए।

ग़रज़ कि आप रवाना हो गए। रास्ते में एक चश्मा ए आब के किनारे चन्द आहुओं को देखा कि वह बैठे हुए हैं , जब उनकी नज़रे हज़रत पर पड़ी सब दौड़ पड़े और ब चश्मे तर कहने लगे कि हुज़ूर ख़ुरासान न जायें कि दुश्मन बा लिबासे दोस्ती आपकी ताक में है और मलकुल मौत इस्तेग़बाल के लिये तैय्यार है। हज़रत ने फ़रमाया कि अगर मौत आनी है तो हर हाल में आयेगी। (कन्जु़ल अन्साब अबू मख़नफ़ 807 प्रकाशित बम्बई 1302 हिजरी )

एक रवायत में है कि मामून रशीद ने अपनी ग़रज़ के लिये जब हज़रत को ख़लीफ़ा ए वक़्त बनाने के लिये लिखा तो आपने इनकार कर दिया। फिर उसने तहरीर किया कि आप मेरी वली अहदी को क़ुबूल कीजिए। आपने इसे भी इन्कार कर दिया। जब वह आपकी तरफ़ से मायूस हो गया तो उसने 300 अफ़राद पर मुश्तमिल फ़ौज भेज दी और हुक्म दे दिया कि वह जिस हालत में हो और जहां हो उनको गिरफ़्तार कर के लाया जाए और उन्हें इतनी मोहलत न दी जाए कि वह किसी से मिल सकें। चुनान्चे फ़ौज ग़ालेबन फ़ज़ल बिने सहल वज़ीरे आज़म की क़यादत में मदीने पहुँची और इमाम (अ.स.) मस्जिद से गिरफ़्तार कर के मर्व ख़ुरासान के लिये रवाना हो गये। इतना मौक़ा न दिया कि इमाम (अ.स.) अपने अहलो अयाल से रूख़सत हो लेते।

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