चौदह सितारे हज़रत इमाम अली रज़ा(अ.स) पार्ट- 2

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नाम , कुन्नियत , अल्क़ाब

आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) ने लौहे महफ़ूज़ के मुताबिक़ और तइय्युने रसूल (स.अ.) के मुवाफ़िक़ आपको इस्मे अली से मौसूम फ़रमाया। आप आले मोहम्मद (स.अ.) में के तीसरे ‘‘ अली ’’ हैं। (आलामुल वुरा पृष्ठ 225 व मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 282) आपकी कुन्नीयत ‘‘अबुल हसन’’ थी और आपके अलक़ाब साबिर , ज़की , वली , रज़ी , वसी थे। ‘‘ वशहरहा अल रज़ा ’’ और मशहूर तरीन लक़ब रज़ा था। ( नूरूल अबसार पृष्ठ 128 व तज़किरा ए ख़वासुल उम्मता पृष्ठ 198)


लक़ब रज़ा की वजह

अल्लामा तबरेसी तहरीर फ़रमाते हैं कि आप को रज़ा इस लिये कहते हैं कि आसमानों ज़मीन में ख़ुदा वन्दे आलम , रसूले अकरम (स.अ.) और आइम्मा ए ताहेरीन (अ.स.) और तमाम मुख़ालेफ़ीन व मुवाफ़ेक़ीन आप से राज़ी थे। (आलमुल वुरा पृष्ठ 182)

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि बज़नती ने हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से लोगों की अफ़वाह का हवाला देते हुये कहा कि आपके वालिदे माजिद को लक़ब रज़ा मामून रशीद ने मुलक़्क़ब किया था। आपने फ़रमाया हरगिज़ नहीं। यह लक़ब ख़ुदा व रसूल (स.अ.) की ख़ुशनूदी का जलवा बरदार है और सच बात यह है कि आप से मुवाफ़िक़ व मुख़ा लिफ़ दोनों राज़ी और ख़ुशनूद थे।( जिलाउल उयून पृष्ठ 269 व रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 12)


आपकी तरबियत

आपकी नशोनुमा और तरबियत अपने वालिदे बुज़ुर्गवार हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) के ज़ेरे साया हुई और इसी मुक़द्दस माहौल में बचपना और जवानी की मुताअद्दिद मंज़िलें तय हुईं और 30 से 35 बरस की उम्र पूरी हुई। अगरचे आख़री चन्द साल इस मुद्दत के वह थे। जब इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) ईराक़ में क़ैदे ज़ुल्म की सख़्तियां बरदाश्त कर रहे थे , मगर उससे पहले 24 या 25 बरस आपको बराबर अपने पदरे बुज़ुर्गवार के साथ रहने का मौक़ा मिला।


बादशाहाने वक़्त

आपने अपनी ज़िन्दगी की पहली मंज़िल से ताबा अहदे वफ़ात बहुत से बादशाहों के दौर देखे। आप 153 ई 0 में अहदे मन्सूर दवानक़ी पैदा हुए। (तारीख़े ख़मीस) 158 हिजरी में मेहदी अब्बासी , 169 हिजरी में हादी अब्बासी , 170 हिजरी में हारून रशीद अब्बासी , 194 हिजरी में अमीन अब्बासी , 198 हिजरी में मामून रशीद अब्बासी अलत तरतीब ख़लीफ़ा ए वक़्त होते रहे।( इब्नुल वरदी , हबीब अल सियर , अबुल फ़िदा )

आपने हर एक का दौर बा चश्में खुद देखा और आप पदरे बुज़ुर्गवार नीज़ दीगर औलादे अली (अ.स.) व फ़ात्मा (स.अ.) के साथ जो कुछ होता रहा उसे आप मुलाहेज़ा फ़रमाते रहे यहां तक कि 230 हिजरी में आप दुनियां से रूख़सत हो गये और आपको ज़हर दे कर शहीद कर दिया।