चौदह सितारे हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स) पार्ट- 13

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हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की शहादत

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि जब हारून रशीद ने बसरे में एक साल क़ैद रखने के बाद ईसा इब्ने जाफ़र वालिये बसरा को लिखा कि मूसा बिन जाफ़र (इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को क़त्ल कर के बादशाह को उनके वुजूद से सुकून दे दे तो उसने अपने हमर्ददों से मशवेरे के बाद हारून रशीद को लिखा कि ऐ बादशाह इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) में मैं ने एक साल के अन्दर कोई बुराई नहीं देखी यह शबो रोज़ नमाज़ रोज़े में मसरूफ़ व मशग़ूल रहते हैं अवाम और हुकूमत के लिये दुआए ख़ैर किया करते हैं और मुल्क की फ़लाह व बहबूद के ख़्वाहिश मन्द हैं भला मुझ से क्यों कर हो सकता है कि मैं उन्हें क़त्ल कर के अपनी आक़ेबत बिगाड़ूं।

ऐ बादशाह ! मैं उनके क़त्ल करने में अपने अन्जाम और अपनी आक़ेबत की तबाही देख रहा हूँ और सख़्त हरज महसूस करता हूँ लेहाज़ा तू मुझे इस गुनाहे अज़ीम के इरतेक़ाब से माफ़ कर बल्कि मुझे हुक्म दे दे कि मैं उन्हें क़ैदे मशक़्क़त से रिहा करूं। इस ख़त को पाने के बाद हारून रशीद ने आखि़र में यह काम सन्दी बिन शाहक के हवाले किया और इसी से आपको ज़हर दिलवा कर शहीद करा दिया। ज़हर खाने के बाद आप तीन रोज़ तक तड़पते रहे , यहां तक कि वफ़ात पा गये।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 137 )

अल्लामा जामी लिखते हैं कि ज़हर खाते ही आपने फ़रमाया कि आज मुझे ज़हर दिया गया है कल मेरा बदन ज़र्द हो जायेगा और तीसरे रोज़ काला हो जायेगा और उसी दिन मैं इस दुनियां से रूख़सत हो जाऊँगा। चुनान्चे ऐसा ही हुआ।

(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 193 )

अल्लामा इब्ने हजरे मक्की लिखते हैं कि हारून रशीद ने आपको बग़दाद में क़ैद कर दिया और ता-हयात क़ैद रखा। आपकी वफ़ात के बाद हथकड़ी और बेड़ी कटवाई गई। आपकी वफ़ात हारून रशीद के ज़हर से हुई जो उसने सन्दी इब्ने शाहक के ज़रिये से दिलवाया था। जब आपको खाने या ख़ुरमा में ज़हर दिया गया तो आप तीन रोज़ तक तड़प ते रहे। यहां तक कि इन्तेक़ाल हो गया।

(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 132, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 454 )

अल्लामा इब्ने अल साई अली बिन अल नजब बग़दादी लिखते हैं कि आप को ज़हर से इन्तेहाई मज़लूमी की हालत में शहीद कर दिया गया।

(अख़बारूल ख़ुलफ़ा)

अल्लामा अबुल फि़दा लिखते हैं कि क़ैद खा़ने रशीद में आपने वफ़ात पाई।

(अबुल फि़दा जिल्द 2 पृष्ठ 151 )

अल्लामा दायरे बकरी लिखते हैं कि आपको हारून रशीद के हुक्म से यहीया इब्ने ख़ालिद बर मक्की वज़ीरे आज़म ने ख़ुरमे में ज़हर दे कर शहीद कर दिया।(तारीख़े ख़मीस जिल्द 2 पृष्ठ 320 )

अल्लामा जामी लिखते हैं कि आपको हारून रशीद ने बग़दाद में ला कर ता उम्र क़ैद रखा आखि़र में अपने वज़ीरे आज़म यहीया इब्ने ख़ालिद बर मक्की के ज़रिये से क़ैद ख़ाने में ज़हर दिलवा दिया और आप वफ़ात पा गये।

(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 193 )

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि आपको कई मरतबा ज़हर दिया गया लेकिन आप हर बार महफ़ूज़ रहे। एक मरतबा आपने वह ख़ुरमा उठा कर जिसमें ज़हर था ज़मीन पर फ़ेंक दिया जिसे हारून के कुत्ते ने खा लिया और वह मर गया कुत्ते के मरने की ख़बर से हारून रशीद को शदीद रंज हुआ और उसने ख़ादिम से सख़्त बाज़ पुर्स की।(जिलाउल उयून पृष्ठ 173 )


आपकी तारीख़े वफ़ात

आप की वफ़ात हसरत आयात बतारीख़ 25 रजबुल मुरज्जब 183 हिजरी यौमें जुमा वाक़े हुई। आपकी उम्र उस वक़्त 55 साल की थी।

(मतालेबुल सुऊल पृष्ठ 282, अलाम अल वरा पृष्ठ 171 व शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 192, नूरूल अबसार पृष्ठ 137 वगै़रह) अपने 14 साल हारून रशीद के क़ैद ख़ाने में गुज़ारे।

मिर्ज़ा दबीर कहते हैं

मौला पर इन्तेहाए असीरी गुज़र गई।

जि़न्दान में जवानी व पीरी गुज़र गई।।

वफ़ात के बाद आपकी नाअशे मुबारक क़ैद ख़ाने से हथकड़ी और बेड़ी समेत निकाल कर बग़दाद के पुल पर डाल दी गई और नेहायत तौहीन आमेज़ अलफ़ाज़ में आपके और आपके मानने वालों को याद किया गया लोग अगरचे बादशाह के ख़ौफ़ से नुमाया तौर पर मज़हमत की जुरअत ना करते थे ताहम एक गिरोह ने जिसके सरदार सुलेमान बिन जाफ़र इब्ने अबी जाफ़र थे हिम्मत की और नाअशे मुबारक दुश्मनों से छीन कर ग़ुस्लों कफ़न का बन्दो बस्त किया। ढ़ाई हज़ार का कि़मती कफ़न दिया , जिस पर पूरा क़ुरआन लिखा हुआ था। नेहायत तुज़ुक व एहतिशाम से जनाज़ा ले कर चले इन लोगों के गरेबान ग़में इमामे मज़लूम में चाक थे यह इन्तेहाई ग़म व अलम के साथ जनाज़े को ले कर मक़बरा क़ुरैश में पहुँचे। हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) नमाज़ व दफ़न के लिये मदीना से ब ऐजाज़ पहुँच चुके थे। आपने नमाज़ पढ़ाई और अपने वालिदे माजिद को सुपुर्दे ख़ाक फ़रमाया।

(आलामुल वुरा पृष्ठ 170 अनवारे नोमानिया पृष्ठ 127 जिन्नात अल ख़लूद पृष्ठ 130 जिलाउल उयून पृष्ठ 275 )

तदफ़ीन के बाद हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) वापस मदीना तशरीफ़ ले गए। मदीने वालों को जब आपकी शहादत की इत्तिला मिली तो कोहराम बरपा हो गया। मातम और अदाए ताज़ीयत का सिलसिला मुद्दतों जारी रहा।

(जिलाउल उयून पृष्ठ 276 )

अल्लामा मोहम्मद बिन तलह शाफ़ेई लिखते हैं कि आप की तदफ़ीन के एक अर्से बाद अयान मुल्क से एक शख़्स ने वफ़ात की , लोगों की ख़्वाहिश पर उसे आप ही के मक़बरे में दफ़न कर दिया गया। एक शब उसने अपने ख़ादिम को ख़्वाब में आगाह किया। उसने देखा कि मक़बरे में आग लगी हुई है और इससे धुआं फ़ैल रहा है और बदबू फैल रही है , सुबह को उसने बादशाहे वक़्त को बाख़बर किया , बादशाह ने क़ब्र ख़ुदवाई तो आग के आसार मौजूद थे और क़ब्र में मैय्यत का वजूद ना था वह जल कर ख़ाक स्तर हो गई थी।

(मतालिबुल सुऊल पृष्ठ 281 )


तादादे औलाद

सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122 में है कि आपके 37 औलाद थीं। अल्लामा तबरसी , अल्लामा अरबली और हज़रत शैख़ मुफ़ीद लिखते हैं कि आप के 19 लड़के 18 लड़कियाँ थी जिनके नाम यह हैं।

1.हज़रत इमाम रज़ा (अ स ) , 2. इब्राहीम , 3. अब्बास , 4. क़ासिम , 5. इस्माईल , 6. जाफ़र , 7. हारून , 8. हसन , 9.अहमद , 10. मोहम्मद , 11. हमज़ा , 12. अब्दुल्लाह , 13. इस्हाक़ , 14. अबीद अल्लाह , 15. ज़ैद , 16. हसन , 17. फ़ज़ल , 18. हुसैन , 19. सुलैमान , 20. फ़ात्मा , 21. कुबरा , 22. रूक़य्या , 23. आलीया , 24. रूक़य्या सुग़रा , 25. कुलसूम , 26. उम्मे जाफ़र , 27. लबाह , 28. ज़ैनब , 29. ख़तीजा , 30. आलीहा , 31. आमना , 32. हुसना , 33. बरयह , 34. उम्मे सलमा , 35. मैमूना , 36. उम्मे कुलसूम , 37. उम्मे अबीहा व ब़क़ौले उम्मे अब्दुल्लाह व बक़ौले उम्मे असमा।

(आलामुल वुरा पृष्ठ 181 कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 103 , इरशाद पृष्ठ 330 , नूरूल अबसार पृष्ठ 137 आपकी यह औलादें मुख़तलिफ़ बीबीयों से थे।