वा के मौके पर जब मरवान ने अपनी और अपने अहलो अयाल की तबाही और बरबादी का यक़ीन कर लिया तो अब्दुल्लाह इब्ने उमर के पास जा कर कहने लगा कि हमारी मुहाफ़ज़त करो। हुकूमत की नज़र मेरी तरफ़ से भी फिरी हुई है मैं जान और औरतों की बेहुरमती से डरता हूँ। उन्होंने साफ़ इन्कार कर दिया। उस वह इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) के पास आया और उसने अपनी और अपने बच्चों की तबाही व बरबादी का हवाला दे कर हिफ़ाज़त की दरख्वास्त की हज़रत ने यह ख़्याल किए बग़ैर कि यह ख़ानदानी हमारा दुश्मन है और इसने वाए करबला के सिलसिले में पूरी दुश्मनी का मुज़ाहेरा किया है। आपने फ़रमाया बेहतर है कि अपने बच्चों को मेरे पास बमुक़ाम मुनबा भेज दो, जहां पर मेरे बच्चे रहेंगे तुम्हारे भी रहेंगे । चुनान्चे वह अपने बाल बच्चों को जिन में हज़रत उसमान की बेटी आयशा भी थी आपके पास पहुँचा गया और आपने सब की मुकम्मल हिफ़ाज़त फ़रमाई । (तारीखे कामिल जिल्द 4 पृष्ठ 45 )
इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ. स.) और मुस्लिम बिन अक़बा
अल्लामा मसूदी लिखते हैं कि मदीने के इन हंगामी हालात में एक दिन मुस्लिम बिन अक़बा ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) को बुला भेजा। अभी वह पहुँचे न थे कि उसने अपने पास के बैठने वालों से आपकी ख़ानदानी बुराई शुरू की और न जाने क्या क्या कह डाला लेकिन अल्लाह रे आपका रोब व जलाल कि ज्यों ही आप उसके पास पहुँचे वह ब सरो क़द ताज़ीम के लिये खड़ा हो गया। बात चीत के बाद जब आप तशरीफ़ ले गये तो किसी ने मुस्लिम से कहा कि तूने इतनी शानदार ताज़ीम क्यो कि उसने जवाब दिया, मैं क़सदन व इरादतन ऐसा नहीं किया बल्कि उनके रोब व जलाल की वजह से मजबूरन ऐसा किया है।
इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) से बैअत का सवाल न करने की वजह
मुर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि वाग़ए हर्रा में मदीने का कोई शख़्स ऐसा न था जो यज़ीद की बैअत न करे और क़त्ल होने से बच जाए लेकिन इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ. स.) बैअत न करने के बावजूद महफ़ूज़ रहे, बल्कि उसे यूं कहा जाए कि आप से बैअत तलब ही नहीं की गई। अल्लामा जलालउद्दीन हुसैनी मिसरी अपनी किताब “ अल हुसैन ” में लिखते हैं कि यज़ीद का हुक्म था कि सब से बैअत लेना। अली इब्नुल हुसैन को (अ.स.) को न छेड़ना वरना वह भी सवाले बैअत पर हुसैनी किरदार पेश करेंगे और एक नया हंगामा खड़ा हो जायेगा ।
दुश्मने अज़ली हसीन बिन नमीर के साथ आपकी करम नवाज़ी मदीने को तबाह बरबाद करने के बाद मुस्लिम बिन अक़बह इब्तिदाए 64 हिजरी में मदीने से मक्का को रवाना हो गया । इत्तेफ़ाक़न राह में बीमार हो कर वह गुमराह, राहिए जहन्नम हो गया मरते वक़्त उस ने हसीन बिन नमीर को अपना जा नशीन मुक़र्रर कर दिया। उसने वहां पहुँच कर ख़ाना ए काबा पर संग बारी की और उस में आग लगा दी, उसके बाद मुकम्मिल मुहासरा कर के अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर को क़त्ल करना चाहा। इस मुहासरे को चालीस दिन गुज़रे थे कि यज़ीद पलीद वासिले जहन्नम हो गया। उसके मरने की ख़बर से इब्ने जुबैर ने ग़लबा हासिल कर लिया और यह वहां से भाग कर मदीना जा पहुँचा ।
मदीने के दौरान क़याम में इस मलऊन ने एक दिन ब वक़्ते शब चन्द सवारों को ले कर फ़ौज के ग़िज़ाई सामान की फ़राहमी के लिये एक गाँव की राह पकड़ी। रास्ते में उसकी मुलाक़ात हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ. स.) से हो गई, आपके हमराह कुछ ऊटँ थे जिन पर ग़िज़ाई सामान लदा हुआ था। उसने आप से वह ग़ल्ला ख़रीदना चाहा, आपने फ़रमाया कि अगर तुझे ज़रूरत है तो यूं ही ले ले हम इसे फ़रोख़्त नहीं कर सकते ( क्यों कि मैं इसे फ़ुक़राए मदीना के लाया हूँ) उसने ” ” पूछा की आपका नाम क्या है? आपने फ़रमाया अली इब्नुल हुसैन कहते हैं। फिर आपने उससे नाम दरयाफ़्त किया तो उसने कहा मैं हसीन बिन नमीर अल्लाह रे आपकी करम नवाज़ी, आपने यह जानने के बावजूद कि यह मेरे बाप के क़ातिलों में से है उसे सारा गल्ला दे दिया ( और फ़ुक़रा के लिये दूसरा बन्दो बस्त फ़रमाया) उसने जब आपकी यह करम गुस्तरी देखी और अच्छी तरह पहचान भी लिया तो कहने लगा कि यज़ीद का इन्तेक़ाल हो चुका है आपसे ज़्यादा मुस्तहक़े ख़िलाफ़त कोई नहीं। आप मेरे साथ तशरीफ़ ले चलें मैं आपको तख़्ते खिलाफ़त पर बैठा दूंगा। आप ने फ़रमाया कि मैं ख़ुदा वन्दे आलम से अहद कर चुका हूँ कि ज़ाहिरी खिलाफत क़बूल न करूंगा। यह फ़रमा कर आप अपने दौलत सरा को तशरीफ़ ले गये। (तरीख़े तबरी फ़ारसी पृष्ठ 644)
इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और फ़ुक़राऐ मदीना की किफ़ालत
अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि हज़रत ज़ैनुल आबेदीन (अ. स.) फ़ुक़रा मदीना के 100 घरों की किफ़ालत फ़रमाते थे और सारा सामान उन के घर पहुँचाया करते थे। उनमे बहुत ज़्यादा ऐसे घराने थे जिनमें आप यह भी मालम न होने देते थे कि यह सामान ख़ुरदोनोश रात को कौन दे जाता है। आपका उसूल यह था कि बोरियाँ पुश्त पर लाद कर घरों में रोटी और आटा वग़ैरा पहुँचाते थे और यह सिलसिला ता बहयात जारी रहा। बाज़ मोअज़्ज़ेज़ीन का कहना है कि हमने अहले मदीना को यह कहते सुना है कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की ज़िन्दगी तक हम ख़ुफ़िया ग़िज़ाई रसद से महरूम नहीं हुए। (मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 265, नुरूल अबसार पृष्ठ 126 )
हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ. स.) और खेती
अहादीस में है कि ज़राअत (खेती) व काश्त कारी सुन्नत है। हज़रत इदरीस के अलावा कि वह ख़य्याती करते थे। तक़रीबन जुमला अम्बिया ज़राअत किया करते थे। हज़रात आइम्माए ताहेरीन (अ.स.) का भी यही पेशा रहा है लेकिन यह हज़रात इस काश्त कारी से ख़ुद फ़ायदा नहीं उठाते थे बल्कि इस से गुरबा, फ़ुक़रा और तयूर के लिये रोज़ी फ़राहम किया करते थे। हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ. स.) फ़रमाते हैं माअजरा अलज़रा लतालब अलफ़ज़ल फ़ीह वमाअज़रा अलालैतना ” वलहू अल फ़क़ीरो जुल हाजता वलैतना वल मना अलक़बरता ख़सता मन अल तर ” मैं अपना फ़ायदा हासिल करते के लिये ज़राअत नहीं किया करता बल्कि मैं इस लिये ज़राअत करता हूँ कि इस से ग़रीबों, फ़क़ीरों मोहताजों और तारों ख़ुसूसन कुबर्रहू को रोज़ी फ़राहम करूँ। (सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 1 पृष्ठ 549)
वाज़े हो कि कुबरहू वह ताएर हैं जो अपने महले इबादत में कहा करता है ” ” अल्लाह हुम्मा लाअन मबग़ज़ी आले मोहम्मद ” ख़ुदाया उन लोगों पर लानत कर जो आले मोहम्मद (स.व.व.अ.) से बुज़ रखते हैं। (लबाब अल तावील बग़वी)
हज़रत अबू तालिब عَلَیهِالسَّلام को काफ़िर कहने वालों से कुछ सवाल?????
जो लोग ईमान ऐ अबू तालिब ع के कायल नहीं हैं, यह पोस्ट खासकर उन्हीं लोगों के लिये है..और मेरे हर लफ़्ज़ पर गौरो फ़िक्र करें..
1- चलो अगर मान भी लें कि अबू तालिब ع ने कलमा नहीं पढ़ा और बचपन से आखिरी सांस तक काफ़िर ही रहें तो क्या मुमकिन है कि कोई आदमी अपने बेटे को किसी ऐसे आदमी के साथ छोड़ दे जो उसे उसके मां बाप के दीन से हटाने की कोशिश कर रहा हो और उसे नये मज़हब/धर्म की तालीम देकर अपने ही जैसा विधर्मी बना रहा हो… इंसान हर चीज़ बर्दाश्त कर सकता है मगर वोह अपने बाप दादा से चले आ रहे दीन की ज़िम्मेदारियों से नहीं भाग सकता और ना ही अपने दीन का नुक़सान होते देख सकता है। हो सकता है कि अबू तालिब ع को इस बात का इल्म नहीं रहा होगा कि मेरा भतीजा मेरे बेटे को अपने दीन की तालीम दे रहा है, इसीलिए साथ रहने पर कभी ऐतराज़ नहीं किया हो.?? लेकिन ऐसा नहीं है। इमाम बुखारी और इमाम मुस्लिम के दूध के दांत टूटे भी शायद नही होंगे तब इब्ने हिशाम की वफ़ात हो गयी थी यानि इब्ने हिशाम की वफ़ात 213 हिजरी में होती है, जबकि 206 हिजरी में इमाम मुस्लिम पैदा होते हैं और 261 हिजरी में वफ़ात पाते हैं। इब्ने हिशाम की सीरतुन्नबी जिसे सीरत इब्ने हिशाम भी कहते हैं यह ऐहले’सुन्नत वल जमाआत के नज़दीक सबसे ज़्यादा मोतबर किताब है और दुनिया में जितने भी आज तक नबी ﷺ की सीरत लिखी गयी है, उन सबकी जड़ सीरत इब्ने हिशाम और सीरत इब्ने इशहाक है। इब्ने हिशाम में लिखा है, जिसका मफ़हूम यह है कि एक बार हज़रत मोहम्मद ﷺ के साथ मौला अली ع अपने बचपन में नमाज़ पढ़ रहे थे फ़िर अबू तालिब ع अपने भतीजे और बेटे की तलाश में बाहर निकले… तलाश करते हुए जब अबू तालिब ع की निगाह इन दोनों की तरफ़ गयी और देखा कि मेरा बेटा भी कुछ वैसे ही कर रहा है जैसे मेरा भतीजा करता है.. नज़दीक जाकर बेटे से पूछा तो अली ع ने कहा कि नमाज़ पढ़ रहा था। तो जानते हो कि अबू तालिब ع ने क्या कहा????? अबू तालिब ع की गुफ़्तगू भतीजे से फ़िर बेटे से होती है…जो तफ़सील से पढ़ सकते हो मगर मैं सिर्फ़ अबू तालिब ع के जुमले पर ध्यान दिलाने के लिए ज़हमत दे रहा हूं। इब्ने हिशाम लिखते हैं कि अबू तालिब ع ने इसके बाद अपने बेटे अली ع से कहा कि- उन्होंने (यानि मेरे भतीजे मोहम्मद ﷺ ने) तुम्हें ‘बेहतरी की तरफ़ दावत दी है और ‘इस पर जमें’ रहो। अब बताओ कि क्या जो नया दीन तुम्हें पसंद ना हो उसकी पैरवी करने के लिए अपने बेटे को हिदायत करोगे कि बेटा वही दीन बेहतरी की तरफ़ है और उस दीन पर मज़बूती से जमे रहना?? अब सवाल यह है कि जब अबू तालिब ع को पता था कि मोहम्मद ﷺ का दीन और दावत बेहतरी की तरफ़ है और खुद अपने बेटे को हिदायत कर रहे हैं कि इस पर जमे रहना तो कैसे मुमकिन है कि इंसान दीन के मामले में खुद ऐसा दीन कबूल ना करे और अपने बेटे को कबूल करने का हुक़्म दें?? 2- अबू तालिब ع को काफ़िर कहने के लिए जो कहानी गढ़ी गयी है वोह नासबियत की देन है जो इस्लाम में १४०० साल पहले से आज तक मौजूद है। कहा जाता है कि अबू तालिब ع जब बिस्तर पर अपने आखिरी लम्हात में पड़े हुए थे तो मोहम्मद ﷺ अपने चहेते चाचा के पास गये और कहा कि चाचा, कलमा पढ़ लीजिये, मगर अबू तालिब ع ने मुंह फ़ेर लिया! फ़िर मेरे नबी ﷺ दूसरी जानिब गये और फ़िर इस्लाम की दावत दी कि कलमा पढ़ लीजिये और कयामत में आपकी बख़्शीश हम करवायेगें लेकिन वहां पर कुरैश खानदान के बड़े बड़े बुज़ुर्ग भी मौजूद थे तो अबू तालिब ع ने यह सोचकर कि कुरैश के लोग कहेंगे कि देखो भतीजे के बहकावे में आकर अपना दीन छोड़ दिया इसीलिए अबू तालिब ع ने कलमा पढ़ने से इंकार कर दिया और कहा कि मैं अपने बाप दादा और अब्दुल मुत्तलिब की दीन कायम हूं। इस पर मोहम्मद ﷺ को बहुत रंज हुआ तो अल्लाह ﷻ ने आयत नाज़िल की कि “इन्नका ला तहदी मन अहबब्त..” यानि (यह नबी) तुम अपने महबूब को हिदायत नहीं कर सकते हो। [तारीख इब्ने कसीर, फ़तावा रिज़विया, जिल्द 29, सफ़ाह 661-663] महबूब यानि जिसे चाहा जाये..इस आयत में कहा गया है कि जिसे तुम चाहते हो यानि अपने महबूब को.. अबू तालिब ع ने कलमा पढ़ा या नहीं पढ़ा, मुझे नहीं मालूम मगर एक बात तो तय है कि अबू तालिब ع हैं मोहम्मद ﷺ के महबूब!! यह किस्सा तारीखे इब्ने कसीर में 40 हिजरी के वाक्यात में दर्ज है और कई किताबों में भी। इस पोइंट को अपने दिमाग में बिठा लो कि कुरआन की इस आयत के मुताबिक अबू तालिब ع है महबूबे रसूल!! वैसे भी इस बात पर किसी को इंकार नहीं कि अबू तालिब ع है महबूबे रसूल क्योंकि मोहम्मद ﷺ अबू तालिब ع को बहुत चाहते थे। अब सही किताब की सही हदीस सुनो..सहीह बुखारी में अब्दुल्ला बिन मसूद रजि. से रिवायत है। अब्दुल्ला बिन मसूद बहुत बड़े सहाबी हैं इन्हें हर कोई जानता है। रिवायत और इस बाब का मफ़हूम यह है कि नबी ﷺ से पूछा गया कि या रसूल अल्लाह..कयामत में हम कहां होंगे?? रावी का ख्याल था कि शायद कहेंगे कि मेरे साथ मगर किसी एक का नाम नहीं लिया बल्कि कहा कि “अल मरहु मआ मन अ हब्बा” यानि हर आदमी अपने महबूब के साथ होगा.. यानि हर आदमी उसी के साथ होगा जिससे वोह मोहब्बत करता हो। अब बताइये..अबू तालिब ع है महबूबे रसूल…और अगर अबू तालिब ع जहन्नम में होंगे तो मेरे नबी मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ कहां होंगे????? अबू तालिब ع को तो तुमने भेज दिया जहन्नम में मगर जब रसूल का महबूब जहन्नम में होगा तो रसूल कहां होंगे????? यह मेरा दूसरा सवाल है। 3- कुरआन में हज़रत इब्राहीम ع की दुआ मौजूद है.. कौन-कौन सी दुआ की थी????? ना मालूम हो तो कुरआन पढ़ो या किसी आलिम से पूछो?? हज़रत इब्राहीम ع और हज़रत इस्माइल ع जब काबा बना रहे थे तो दोनों ने बहुत सी दुआएं मांगी थी मगर एक दुआ यह था कि मेरी नस्ल मुस्लिम कौम रख और आखिर ज़माने में इसी नस्ल से एक रसूल मुंतख़ब कर। ऐहले’सुन्नत वल जमाआत के खासकर बरेलवी मसलक से ताल्लुक रखने वाले मशहूर आलिम मुफ़्ती अहमद यार खां नईमी साहब ने तफ़सीर-नईमी में सूरह बकरह की तफ़सीर में लिखा है कि इब्राहीम ع ने जो दुआ की थी कि मेरे नस्ल यानि जुरुरियत या मेरी औलाद में एक मुस्लिम जमाआत रख और कहा था कि इसी मुस्लिम जमाआत से एक आखिरी रसूल भेजना जो दुआ हमारे मोहम्मद ﷺ पर कबूल हुई यानि मोहम्मद ﷺ मुस्लिम जमाआत से हैं। यानि मोहम्मद ﷺ जिस नस्ल में जिस आल में पैदा हुए वोह मुस्लिम जमाआत थी। अगर आले इब्राहीम मुस्लिम जमाआत नहीं होती तो आखिरी नबी इस नस्ल और जुरुरियत में पैदा नहीं होता और ना ही अल्लाह ﷻ आले इब्राहीम पर हमसे तुमसे दुरुद भिजवाता?? कुरआन से और इब्राहीम ع की दुआ से साबित है कि आले इब्राहीम मुस्लिम जमाआत है। अब इस आल में कौन कौन आते हैं..या किसने दावा किया कि हम आले इब्राहीम में पैदा हुए?? पूरी तारीखे इस्लाम में ना तो किसी सहाबी ने और ना ही किसी सहाबी के बाप ने दावा किया कि हम आले इब्राहीम से हैं क्योंकि दावा वही कर सकता है जो यकीनन मुस्लिम जमाआत से हो, वोह दावा नहीं कर सकता जिसके बाप दादा मुश्रिक रहे हों या उसके पैदा होने पर उसके असली बाप जानने के लिए पंचायत इकट्ठा हो…. अब्दुल हक़ मोहद्दिस देहलवी रह० ने मदारुजुन्नबूवत में लिखा है कि अबू तालिब ع ने जब हज़रत खदीजा सलामुल्लाह अलैहा का निकाह मोहम्मद ﷺ से कराया और ख़ुतबा पढ़ा तो उसमें अबू तालिब ع ने अल्लाह ﷻ का शुक्र अदा करते हुए दावा किया कि मैं आले इब्राहीम से हूं….और मुझे हज़रत इस्माईल ع की नस्ल में पैदा किया और मुझे अपने घर यानि काबा का मुहाफ़िज वा पेशवा बनाया। तीसरा सवाल है कि अगर अबू तालिब ع काफ़िर है तो दिन में पांच बार उस आले इब्राहीम पर दुरुद क्यूं भेजते हो जिस आल में काफ़िर और मुश्रिक हैं?? और क्या इब्राहीम ع की दुआ कबूल हुई या नहीं.?? 4- सूरह कहफ़ (सूरह नं 18) की आयत नंबर 51 में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि- مَا کُنۡتُ مُتَّخِذَ الۡمُضِلِّیۡنَ عَضُدًا. “मैं गुमराहों को अपना मददगार नहीं बनाता हूं।” यानि अल्लाह ﷻ गुमराहों से मदद नहीं लेता…. अब आप सोचते होंगे कि अल्लाह ﷻ को हमारे मदद की क्या ज़रूरत जबकि वोह तो ख़ुद सबकी मदद करता है?? बिल्कुल सही है कि अल्लाह ﷻ को किसी की मदद की कोई ज़रुरत नहीं है मगर कुछ अल्लाह ﷻ वाले ऐसे हैं जिनकी मदद अल्लाह ﷻ की मदद और जिनकी इताआत अल्लाह ﷻ की इताआत, जिनकी नाराज़गी अल्लाह ﷻ की नाराज़गी, जिनकी नाफ़रमानी अल्लाह ﷻ की नाफ़रमानी है। कुरआन में है कि इताआत करो अल्लाह ﷻ की और उसके रसूल की… क्योंकि रसूल फरमां-बरदारी और इताआत दरहकीकत अल्लाह ﷻ की इताआत है… इसी तरह मोहम्मद ﷺ की मदद करना खुदा की मदद करना है तभी तो अल्लाह ﷻ नकुरआन द के सूरह मोहम्मद (सूरह नंबर 7) में कहा कि یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡۤا اِنۡ تَنۡصُرُوا اللّٰہَ یَنۡصُرۡکُمۡ وَ یُثَبِّتۡ اَقۡدَامَکُمۡ. ‘ऐ ईमान वालों.! अगर तुम अल्लाह ﷻ की मदद करोगे तो वह [यानि अल्लाह ﷻ] तुम्हारी भी मदद करेगा और साबित कदम रखेगा।’ कुरआन में सूरह दुहा की आयत नंबर 6 में है कि “क्या उसने आपको यतीम नहीं पाया फ़िर पनाह दी।” मोहम्मद ﷺ अपनी मादरे शिक़म में छः महीने के थे कि आपके वालिद हज़रत अब्दुल्ला बिन अबू मुत्तलिब का विसाल हो गया फ़िर पैदा होने के छः महीने बाद मां का भी इंतकाल हो जाता है और फ़िर जब आप आठ महीने के होते हैं तो आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब का भी इंतकाल हो जाता है तो अब्दुल मुत्तलिब की वसीहत के मुताबिक आपकी परवरिश अबू तालिब ع करते हैं। इस तरह आप ﷺ बचपन में ही यतीम हो जाते हैं और अबू तालिब ع ने आपकी परवरिश की और अपने जीते जी आप को काफ़िरों की तरफ़ से कोई भी आंच नहीं आने दी। इमाम अहमद रजा खां बरेलवी ने फ़तावा रिज़विया के जिल्द नं 28 के सफ़ाह नं 579 पर लिखा है कि “अबू तालिब ع ने मोहम्मद ﷺ की हमेशा मदद की”, आप खुद देखे 👇 https://archive.org/details/fatawa-rizvia-ahmad-raza-khan-jild-28/page/579/mode/1up?view=theater इसके अलावा बहुत से इस्लामी तारीख से भी यह बात वाज़ेह है कि अल्लाह ﷻ ने अबू तालिब ع के ज़रिए मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की मदद की फ़िर कैसे मुमकिन है कि अल्लाह ﷻ ने खुद अपने मिशन में किसी गुमराहों से मदद ना लेने का ऐलान करने के बाद अबू तालिब ع के गुमराह होने पर भी अल्लाह ﷻ ने अबू तालिब ع से मदद ली हो… और अगर मदद ली तो अल्लाह ﷻ अपने मददगार को साबित कदम रखने को कहता है तो क्या अबू तालिब ع साबित कदम नहीं थे.?? क्या कुफ़्र ऐ अबू तालिब ع वाली सभी रिवायकुरआन की इस आयत के खिलाफ़ नहीं है?? सवाल यह है कि अल्लाह ﷻ कहता है कि ‘जो अल्लाह ﷻ की मदद करेगा वोह उसकी मदद करेगा’ तो इसमें अल्लाह ﷻ की मदद कैसे किया जा सकता है.?? क्या मोहम्मद ﷺ की मदद करना अल्लाह ﷻ की मदद करना नहीं है?? जब तक अबू तालिब ع ज़िंदा रहे तब तक रसूल अल्लाह ﷺ अबू तालिब आलैहिस्सलाम की मदद लेते रहे और इस बात को खुद आला हज़रत ने भी माना है।
5- सूरह अनफ़ाल की आयत नंबर 34 में है कि – وَ مَا لَہُمۡ اَلَّا یُعَذِّبَہُمُ اللّٰہُ وَ ہُمۡ یَصُدُّوۡنَ عَنِ الۡمَسۡجِدِ الۡحَرَامِ وَ مَا کَانُوۡۤا اَوۡلِیَآءَہٗ ؕ اِنۡ اَوۡلِیَآؤُہٗۤ اِلَّا الۡمُتَّقُوۡنَ وَ لٰکِنَّ اَکۡثَرَہُمۡ لَا یَعۡلَمُوۡنَ. यानि “और अल्लाह ﷻ उन पर अज़ाब नाज़िल क्यूं ना करे जबकि वोह [यानि काफ़िर और मुश्रिक] मस्जिदुल-हराम का रास्ता रोकते हैं हालांकि वोह [यानि रास्ता रोकने वाले काफ़िर] इस मस्जिद के [यानि काबा के] मतवल्ली नहीं हैं। इसके मतवल्ली [ यानि पेशवा और मुहाफिज़] तो सिर्फ़ तक़वा [ यानि परहेज़गार] वाले हैं।’ इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि काबा का मतवल्ली तक़वा वाला होता है जबकि तारीखे इब्ने खलदून, तबकात इब्ने साद, मदारुजुन्नबुवत में है कि अबू तालिब ع काबा के मतवल्ली रहे हैं। जब अबू तालिब ع ने मोहम्मद ﷺ का हज़रत खदीजा सलामुल्लाह अलैहा से निकाह पढ़ाया और इस मौके पर ख़ुतबा पढ़ा था तो अबू तालिब ع ने ख़ुतबे इसी बात पर अल्लाह ﷻ का शुक्र अदा किया था कि अल्लाह ﷻ ने उन्हें आले इब्राहीम और इस्माइल की औलाद में पैदा किया और इस बात पर कि अल्लाह ﷻ ने उन्हें अपने घर का पेशवा और मुहाफ़िज़ बनाया। छोटे गांव और मोहल्ले में कोई आदमी अपने मस्जिद में किसी गुमराह को मतवल्ली नहीं बनाता फ़िर क्या अल्लाह ﷻ काबा का मतवल्ली किसी काफ़िर को बना सकता है?? जबकि खुद अल्लाह ﷻ उसके तक़वा की गवाही देता है। यह हदीस जो मशहूर है कि अबू तालिब ع ने कलमा नहीं पढ़ा और उन्हें अज़ाब होगा और अज़ाब का पूरा मैनू कार्ड मौजूद है कि ऐसा होगा वैसा होगा और अबू तालिब ع का दिमाग खौल रहा होगा वगैरह वगैरह.., अगर सनद के ऐतबार से सही मान भी लें तो मतन के लिहाज़ से दुरुस्त नहीं है और कुरआन के खिलाफ़ है और हज़रत इब्राहीम ع की दुआ के भी खिलाफ़ है। अबू तालिब ع के कलमा ना पढ़ने के मर्कज़ी रावियों में अब्दुल्ला बिन अब्बास भी हैं जो उस समय बहुत ही कम उम्र का थे, उस समय अब्दुल्ला बिन अब्बास की उम्र 5 साल से कम थी जबकि मोहम्मद ﷺ के विसाल के वक्त अब्दुल्ला बिन अब्बास कई उम्र 14 से 16 साल के बीच थी। यही रावी यानि अब्दुल्ला बिन अब्बास हिजरत से पहले वाली घटना यानि अबू तालिब ع के कलमा ना पढ़ने का ज़िक्र करता है तो आपके नज़दीक काबिले कबूल है जबकि यही रावी अपने 15 साल की उम्र में होने वाली घटना का ज़िक्र करता है तो काबिले कबूल नहीं है?? आखिर क्यूं?? दोनो रिवायत बुखारी में और दोनों का मर्कज़ी रावी भी यही…दोनो में अंतर सिर्फ़ इतना है कि एक में अबू तालिब ع के कलमा ना पढ़ने का ज़िक्र है और दूसरे में उमर बिन खत्ताब का कलाम दवात ना देने का ज़िक्र है और अंतर यह है कि अबू तालिब ع के विसाल के वक़्त रावी बच्चा था और जब उमर बिन खत्ताब ने नबी ﷺ को कलाम दवात नहीं दिया था उस समय यह जवान था!!!!!
6- बुखारी, मुस्लिम और मोत्ता इमाम मालिक में किताबुल जनायज़ में मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की हदीस है कि ‘दुनिया का हर बच्चा फ़ितरते इस्लाम पर पैदा होता है मगर उसके पालने वाले मां बाप उस बच्चे को अपने जैसा बना देते हैं तो कोई ईसाई तो कोई यहूदी बना देते हैं तो कोई मोमिन बना देते हैं।’ तो जब साबित है कि बच्चा फ़ितरते इस्लाम पर पैदा होता है और पालने वाले उसे अपने जैसा बना देते हैं तो इसी हदीस से अबू तालिब ع और अबू सुफ़ियान ل के ईमान वा कुफ़्र का फ़ैसला कर लो… क्योंकि दो बच्चे अबू तालिब ع ने पाले:- एक मुस्तफ़ा बना तो दूसरा मुर्तज़ा बना..और दो बच्चे अबू सुफ़ियान ل ने पाले:- एक मुआविया ل बना तो दूसरा यज़ीद ل बना.!! अब समझ गये सीरते इब्ने हिशाम का वोह जुमला कि क्यूं कहा था.. अबू तालिब ع ने अपने बेटे से कि ‘मोहम्मद ﷺ तुम्हें बेहतरी की तरफ़ दावत देते हैं और इसी पर जमें रहना।’ सिर्फ़ अपने अपने फ़ितरत की बात है कि कोई अपने बच्चे को कैसा बनाता है क्योंकि जो जैसा होगा या जैसा चाहेगा वैसा बच्चे को बनायेगा। यह सब सिर्फ़ नासबियत का खेल है कि अबू तालिब ع काफ़िर थे (माज’अल्लाह) और अबू सुफ़ियान ل मोमिन!! ईमान वोह लाये जो काफ़िर हो..यह तो मुस्लिम जमाआत हैं। 👇
रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि हे अली (عَلَیهِالسَّلام)! हक़ीक़त में, जो कोई मुझसे जुदा हो गया वोह अल्लाह (ﷻ) से जुदा हो गया और जो कोई तुमसे जुदा हो गया वोह मुझसे जुदा हो गया।