अस्हाबे_फ़ील ‘हाथी वालों का’ क़िस्सा

हुज़ूर अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैदाईश से 50 या 55 दिन पहले यह वाक़िआ हुआ कि नजाशी हब्शा (इथोपिया के बादशाह) की तरफ़ से यमन देश का गवर्नर (हाकिम) अब्रहा अश्रम था, जो ईसाई मज़हब का मानने वाला था…। उसने देखा कि अरब देश के सभी आदमी मक्का आकर ख़ाना काबा का तवाफ़ (एक इबादत, जो काबा शरीफ़ के चक्कर लगाकर अदा होती है) करते हैं, तो उसने चाहा कि ईसाई मज़हब के नाम पर एक बहुत बड़ी व सुन्दर इमारत (चर्च) बना दूँ, ताक़ि अरब के लोग ख़ाना काबा को छोड़कर उस ख़ूबसूरत बनावटी काबे का आकर तवाफ़ करने लगें…।

चुनाँचे यमन देश की राजधानी ‘सनआ’ में उसने एक बहुत आलीशान चर्च (गिरजा) बनाया…। अरब देश में जब यह ख़बर मशहूर हुई तो क़बीला किनाना का कोई आदमी वहाँ आया और उसमें पाख़ाना करके भाग आया…।
बाज़ लोग कहते हैं कि अरब के नौजवानों ने उसके क़रीब आग जला रखी थी, हवा से उड़कर आग चर्च में लग गई और वह इमारत जलकर ढेर हो गई…।

अब्रहा को जब यह ख़बर मिली तो उसने ग़ुस्से में आकर क़सम खाई कि ख़ाना-ए-काबा (बैतुल्लाह) को ढहा कर ही दम लूँगा…। इसी इरादे से मक्का पर 60 हज़ार की फ़ौज लेकर हमले के इरादे से चल दिया…। रास्ते में जिस अरब क़बीले ने रुकावट डाली उसको ख़त्म कर दिया, तायफ़ के एक कबीले (#क़बीला_बनू_सक़ीफ़) ने उससे कोई जंग नहीं की, बल्कि अपने क़बीले से रास्ता बताने वाले #अबू_रग़ाल नामी शख़्स को साथ भेजा ताक़ि वो मक्का का रास्ता अब्रहा के लश्कर को बता सके…। अबू रग़ाल रास्ता बताता हुआ अब्रहा और उसके लश्कर को मक्का ले आया, यहाँ तक कि मक्का की सरहद में दाख़िल हुआ…।

 

अबू रग़ाल को अल्लाह के अजाब ने वहीं पकड़ लिया और वहीं मर गया… उस दौर में हाजी जब हज करने जाते थे तो क़बीला बनू सक़ीफ़ के अबू रग़ाल की कब्र पर पत्थर मारते और लानत भेजते थे…। अब्रहा के लश्कर में 13 हाथी भी थे और एक बहुत बड़े हाथी (जिसका नाम महमूद था और उसको चलाने वाले का नाम उनैस था) उस पर ख़ुद सवार था, मक्का के क़रीब पड़ाव डाला…।

मक्का के आस-पास मक्का वालों के जानवर चरा करते थे, वे जानवर अब्रहा के लश्कर वालों ने पकड़ लिये, जिन में 200 ऊँट हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दादा हज़रत अब्दुल-मुत्तलिब के भी थे, जो उस वक़्त मक्का के सरदार और ख़ाना काबा (बैतुल्लाह शरीफ़ की मस्जिद) के मुतवल्ली (प्रबंधक और देखभाल करने वाले) थे…।

जब उनको अब्रहा के हमले की ख़बर हुई तो क़ुरैश को जमा करके कहा कि घबराओ मत, मक्के को ख़ाली कर दो, ख़ाना काबा को कोई नहीं गिरा सकता, यह अल्लाह का घर है और वह ख़ुद इसकी हिफ़ाज़त करेगा…। उसके बाद अब्दुल-मुत्तलिब क़ुरैश के चन्द बड़े लोगों को साथ लेकर अब्रहा से मिलने और अपने ऊँट माँगने गये…। अब्रहा ने अब्दुल-मुत्तलिब का शानदार इस्तिक़बाल (स्वागत) किया…।

अल्लाह तआला ने अब्दुल-मुत्तलिब को बेमिसाल हुस्न व वक़ार (प्रभावी व्यक्तित्व) और दबदबा (रौब, शान व शौकत) दिया था, जिसको देखकर हर आदमी मरऊब हो जाता (असर मानता) था…।

अब्रहा भी हज़रत अब्दुल-मुत्तलिब को देखकर मरऊब हो गया और बहुत इज़्ज़त के साथ पेश आया…। यह तो मुनासिब न समझा कि उनको अपने तख़्त पर बैठाये, अलबत्ता उनकी इज़्ज़त की ख़ातिर यह किया कि ख़ुद तख़्त से उतर कर फ़र्श (ज़मीन) पर उनके पास बैठ गया…। बातचीत के दौरान हज़रत अब्दुल-मुत्तलिब ने अपने ऊँटो की रिहाई का मुतालबा (सवाल) किया…।

अब्रहा ने हैरान होकर कहा बड़े ताज्जुब (अचंभे) की बात है कि आपने मुझसे अपने ऊँटो के बारे मे तो सवाल किया और ख़ाना काबा जो आप और आपके बाप दादाओ के मज़हब और दीन की निशानी है, जिसको मैं गिराने के लिये आया हूँ उसकी आपको कोई फ़िक्र (परवाह) नहीं..?
अब्दुल-मुत्तलिब ने जवाब दिया कि मैं अपने ऊँटो का मालिक हूँ इसलिये मैंने अपने ऊँटो का सवाल किया, और काबे का मालिक ख़ुदा है, वह ख़ुद अपने घर को बचायेगा…।

अब्रहा ने कुछ ख़ामोशी के बाद अब्दुल-मुत्तलिब के ऊँट वापस देने का हुक्म दिया…। अब्दुल-मुत्तलिब अपने ऊँट लेकर वापस आ गये और क़ुरैश और मक्का वालों को हुक्म दिया कि मक्का ख़ाली कर दे और तमाम ऊँट जो अब्रहा से वापस मिले थे ख़ाना काबा के लिये वक़्फ़ (दान) कर दिये…।


हज़रत अब्दुल-मुत्तलिब चन्द आदमियों को साथ लेकर ख़ाना काबा पहुँचे और हज़रत आमना को जो हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की माँ है, उनको भी पास बैठाकर अल्लाह से दुआ माँगी:-

ऐ अल्लाह! इनसान अपनी जगह की हिफ़ाज़त करता है तू अपने घर की हिफ़ाज़त फ़रमा, और अहले सलीब (ईसाइयों) के मुक़ाबले में अपने घर की ख़िदमत करने वालों की मदद फ़रमा…। उनकी सलीब (ईसाइयों के क्रास का मज़हबी निशान) और उनकी तदबीर कभी भी तेरी तदबीर पर ग़ालिब (हावी) नहीं आ सकती…। लश्कर और हाथी चढ़ाकर लाये है ताकि तेरे अयाल (कुनबे वालों, यानी तेरे घर के पास रहने वालों) को क़ैद कर ले, तेरे हरम (इज़्ज़त वाले घर) की बर्बादी का क़स्द (इरादा) करके आये हैं, जहालत (बेइल्मी, नादानी व बेवक़ूफ़ी) की बिना पर तेरी अज़मत और जलाल (बड़ाई और बुज़ुर्गी) का ख़्याल नहीं किया…।

अब्दुल-मुत्तलिब दुआ से फ़ारिग़ होकर अपने साथियों के साथ पहाड़ पर चढ़ गये और अब्रहा अपना लश्कर और हाथी लेकर ख़ाना काबा को गिराने के इरादे से आगे बढ़ा…।

हरम की हद में पहुँचकर हाथी रुक गये और काबे की ताज़ीम (सम्मान व इज़्ज़त) में तमाम हाथियों ने अपना सर झुका लिया…। हज़ार कोशिशों के बावजूद भी हाथी आगे न बढ़े…। उनको किसी दूसरी तरफ़ को चलाया जाता तो दौड़ने लगते, लेकिन काबे की तरफ़ को चलाते तो एक इन्च भी आगे न बढ़ते, बल्कि अपना सर झुका लेते…।
यह मंज़र (नज़ारा और द्र्श्य) देखकर अब्रहा हाथी से उतरा और हाथियों को वहीं छोड़कर फ़ौज को आगे बढ़ने का हुक्म दिया…।

अचानक अल्लाह के हुक्म से छोटे-छोटे परिन्दो के झुंड के झुंड नज़र आये, हर एक की चोंच और पंजो में छोटी-छोटी कंकरियाँ थीं जो लश्कर पर बरसने लगीं…।
ख़ुदा की क़ुदरत से वे कंकरियाँ गोली का काम दे रही थीं… सर पर गिरती और नीचे से निकल जाती थीं, जिस पर वह कंकरी गिरती वह ख़त्म हो जाता था…। ग़र्ज़ कि अब्रहा का लश्कर तबाह व बर्बाद हुआ और खाए हुए भुस की तरह हो गया…।
अब्रहा के बदन पर चेचक के दाने निकल आये जिससे उसका तमाम बदन सड़ गया, बदन से पीप और लहू (ख़ून) बहने लगा…। एक के बाद एक बदन का हिस्सा कट-कटकर गिरने लगा और अब्रहा बदन में घटते-घटते म़ुर्गे के चूज़े के बराबर हो गया और उसका सीना फटा और दिल बाहर निकल कर गिरा और मर गया…।
जब सब मर गये तो अल्लाह तआला ने एक सैलाब भेजा जो सबको बहाकर दरिया में ले गया…।

इस वाक़िए को क़ुरआने पाक में सूर: फ़ील में बयान किया गया है:-

शुरु करता हूँ अल्लाह के नाम से जो निहायत मेहरबान, बड़ा रहम वाला है…।

क्या आपको मालूम नहीं कि आपके रब ने हाथी वालों के साथ क्या मामला किया? (1) क्या उनकी तदबीर को (जो कि काबा शरीफ़ को वीरान करने के बारे मे थी) पूरी तरह ग़लत नहीं कर दिया? (2) और उन पर गिरोह के गिरोह परिन्दे भेजे (3) जो उन लोगों पर कंकर की पत्थरियाँ फेंकते थे। (4) सो अल्लाह तआला ने उनको खाये हुए भूसे की तरह (पामाल) कर दिया…। (5)

ज़क़ात किसको देनी चाहिये?? Who deserve your “Zakaat”???

ज़क़ात किसको देनी चाहिये?? Who deserve your “Zakaat”???

रमज़ान का आखिरी अशरा (हिस्सा) चल रहा है इस अशरे में सब मुसलमान अपनी साल भर की कमाई की ज़कात निकालते है। ज़कात क्या है??? कुरआन मजीद में अल्लाह ने फ़र्माया है :- “ज़कात तुम्हारी कमाई में गरीबों और मिस्कीनों का हक है।” ज़कात कितनी निकालनी चाहिये ये काफ़ी बडा मुद्दा है इस मसले पर बहुत सारे इख्तिलाफ़ है, कोई इन्सान कुछ कहता है और कुछ कहता है| इस मसले पर हम विस्तार से बाद में बात करेंगे।

ज़कात निकालने के बाद सबसे बडा जो मसला आता है वो है कि ज़कात किसको दी जाये???

ज़कात देते वक्त इस चीज़ का ख्याल रखें की ज़कात उसको ही मिलनी चाहिये जिसको उसकी सबसे ज़्यादा ज़रुरत हो…वो शख्स जिसकी आमदनी कम हो और उसका खर्चा ज़्यादा हो। अल्लाह ने इसके लिये कुछ पैमाने और औहदे तय किये है जिसके हिसाब से आपको अपनी ज़कात देनी चाहिये। इनके अलावा और जगहें भी बतायी गयी है जहां आप ज़कात के पैसे का इस्तेमाल कर सकते हैं।

सबसे पहले ज़कात का हकदार है :- “फ़कीर”

फ़कीर कौन है?? फ़कीर वो शख्स है जिसकी आमदनी 10,000/- रुपये सालाना है और उसका खर्च 21,000/- रुपये सालाना है यानि वो शख्स जिसकी आमदनी अपने कुल खर्च से आधी से भी कम है तो इस शख्स की आप ज़कात 11,000/- रुपये से मदद कर सकते है।

दुसरा नंबर आता है “मिस्कीन” का

“मिस्कीन” कौन है?? मिस्कीन वो शख्स है जो फ़कीर से थोडा अमीर है। ये वो शख्स है जिसकी आमदनी 10,000/- रुपये सालाना है और उसका खर्च 15,000/- सालाना है यानि वो शख्स जिसकी आमदनी अपने कुल खर्च से आधी से ज़्यादा है तो आप इस शख्स की आप ज़कात के 5,000/- रुपये से उसकी मदद कर सकते है।

तीसरा नंबर आता है “तारिके कल्ब” का

“तारिके कल्ब” कौन है?? “तारिके कल्ब” उन लोगों को कहते है जो ज़कात की वसुली करते है और उसको बांटते है। ये लोग आमतौर पर उन देशों में होते है जहां इस्लामिक हुकुमत या कानुन लागु होता है। हिन्दुस्तानं में भी ऐसे तारिके कल्ब है जो मदरसों और स्कु्लों वगैरह के लिये ज़कात इकट्ठा करते है। इन लोगो की तनख्खाह ज़कात के जमा किये गये पैसे से दी जा सकती है।

चौथे नंबर आता है “गर्दन को छुडानें में”

पहले के वक्त में गुलाम और बांदिया रखी जाती थी जो बहुत बडा गुनाह था। अल्लाह की निगाह में हर इंसान का दर्ज़ा बराबर है इसलिये मुसलमानों को हुक्म दिया गया की अपनी ज़कात का इस्तेमाल ऎसे गुलामो छुडाने में करो। उनको खरीदों और उनको आज़ाद कर दों। आज के दौर में गुलाम तो नही होते लेकिन आप लोग अब भी इस काम को अंजाम से सकते है।

अगर कोई मुसलमान पर किसी ऐसे इंसान का कर्ज़ है जो जिस्मानी और दिमागी तौर पर काफ़ी परेशान करता है तो आप उस मुसलमान की ज़कात के पैसे से मदद कर सकते है और उसकी गर्दन को उस इंसान के चंगुल से छुडा सकते हैं।

पांचवा नंबर आता है “कर्ज़दारों” का

आप अपनी ज़कात का इस्तेमाल मुसलमानों के कर्ज़ चुकाने में भी कर सकते है। जैसे कोई मुसलमान कर्ज़दार है वो उस कर्ज़ को चुकाने की हालत में नही है तो आप उसको कर्ज़ चुकाने के लिये ज़कात का पैसा दे सकते है और अगर आपको लगता है की ये इंसान आपसे पैसा लेने के बाद अपना कर्ज़ नही चुकायेगा बल्कि उस पैसे को अपने ऊपर इस्तेमाल कर लेगा तो आप उस इंसान के पास जायें जिससे उसने कर्ज़ लिया है और खुद अपने हाथ से कर्ज़ की रकम की अदायगी करें।

छ्ठां नंबर आता है “अल्लाह की राह में”

“अल्लाह की राह” का नाम आते ही लोग उसे “जिहाद” से जोड लेते है। यहां अल्लाह की राह से मुराद (मतलब) सिर्फ़ जिहाद से नही है। अल्लाह की राह में “जिहाद” के अलावा भी बहुत सी चीज़ें है जैसे :- बहुत-सी ऐसी जगहें है जहां के मुसलमान शिर्क और बिदआत में मसरुफ़ है और कुरआन, हदीस के इल्म से दुर है तो ऐसी जगह आप अपनी ज़कात का इस्तेमाल कर सकते है।

अगर आप किसी ऐसे बच्चे को जानते है जो पढना चाहता है लेकिन पैसे की कमी की वजह से नही पढ सकता, और आपको लगता है की ये बच्चा सोसाईटी और मुआशरे के लिये फ़ायदेमंद साबित होगा तो आप उस बच्चे की पढाई और परवरिश ज़कात के पैसे से कर सकते है।

और आखिर में “मुसाफ़िर की मदद”

मान लीजिये आपके पास काफ़ी पैसा है और आप कहीं सफ़र पर जाते है लेकिन अपने शहर से बाहर जाने के बाद आपकी जेब कट जाती है और आपके पास इतने पैसे भी नही हों के आप अपने घर लौट सकें तो एक मुसलमान का फ़र्ज़ बनता है की वो आपकी मदद अपने ज़कात के पैसे से करे और अपने घर तक आने का किराया वगैरह दें।

ये सारे वो जाइज़ तरीके है जिस तरह से आप अपनी ज़कात का इस्तेमाल कर सकते है।

अल्लाह आपको अपनी कमाई से ज़कात निकालकर उसको पाक करने की तौफ़ीक दें और 
अल्लाह तआला हम सबको कुरआन और हदीस को पढकर, सुनकर, उसको समझने की और उस पर अमल करने की तौफ़िक अता फ़र्मायें।

फ़ितरा” क्या है?? “फ़ितरा” कब देना चाहिये??? What Is Fitra?? When You Can Give Fitra??

#फ़ितरा क्या है??

फ़ितरा रमज़ान के रोज़े पुरे होने के बाद यानि ईद का चांद दिखने के बाद दिया जाता है। ये एक तरह का सदका (दान) है जो हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है चाहे वो बच्चा हो, बुढा हो, औरत हो या लडकी हो। हर मुसलमान को हर हाल में फ़ितरा देना चाहिये।

#फ़ितरा कब निकालना चाहिये???

फ़ितरा ईद का चांद दिखने के बाद निकालना चाहिये। इसको निकालने का सबसे अव्वल वक्त जो हदीसों में बताया है वो ये है की “फ़ितरा ईद का चांद दिखने से तुलुहे-फ़ज़र (यानि फ़जर का वक्त खत्म होने) तक है।” इसके बाद दिया गया फ़ितरा आम सदके के तौर पर देखा जाता है। तो सबसे बेहतर है की आप फ़ितरा ईद का चांद दिखने के बाद दे देना चाहिये यही सबसे अव्वल है।

#फ़ितरा कितना और क्या देना चाहिये???

फ़ितरा कितना देना चाहिये?? ह्दीसों इसकी मात्रा के ज़िक्र में एक अल्फ़ाज़ “स” का इस्तेमाल किया गया है। असल में ये “स” लोहे के एक बर्तन को कहा जाता था जिसमें पहले अरब की औरतें खाना बनाते वक्त चावल या गेंहू नापा करती थी। आज भी हिन्दुस्तान के कुछ गावों में अब भी इसका इस्तेमाल होता है इसे हिन्दुस्तान में “साई” कहा जाता है। पहले इसका नाप लगभग “ढाई किलो” होता था अब वो सिर्फ़ एक किलो का रह गया है। तो फ़ितरे का सही नाप है “ढाई किलों”!

#फ़ितरे में क्या देना चाहिये???

फ़ितरे में अनाज देना चाहिये वो अनाज जो आप खाते है, गेंहू, चावल, दाल वगैरह। कुछ लोग इसके बदले पैसा दे देते है लेकिन सबसे अव्वल अनाज है और अनाज वो ही होना चाहिये जो आप खाते है। ये नही की आप तो 30 रुपये किलो का गेंहूं इस्तेमाल करते है और फ़ितरे में आप 20 रुपये किलो का गेंहूं दे दें, ये सरासर गलत है!

आपको वही अनाज देना होगा जो आप खुद खाते है..!!!!!

(नोट :- ये लेख लोगो तक पहुंचते पहुंचते ईद आ जायेगी इन्शा अल्लाह)

अल्लाह तआला हम सबको कुरआन और हदीस को पढकर, सुनकर, उसको समझने की और उस पर अमल करने की तौफ़िक अता फ़रमाएँ।

आमीन,
सुम्मा आमीन

अमरीका क्यों मानता है रुमी का लोहा

मौलाना मुहम्मद जलालुद्दीन रूमी (३० सितम्बर, १२०७) फारसी साहित्य के महत्वपूर्ण लेखक थे जिन्होंने मसनवी में महत्वपूर्ण योगदान किया। इन्होंने सूफ़ी परंपरा में नर्तक साधुओ (गिर्दानी दरवेशों) की परंपरा का संवर्धन किया। रूमी अफ़ग़ानिस्तान के मूल निवासी थे पर मध्य तुर्की के सल्जूक दरबार में इन्होंने अपना जीवन बिताया और कई महत्वपूर्ण रचनाएँ रचीं। कोन्या (मध्य तुर्की) में ही इनका देहांत हुआ जिसके बाद आपकी कब्र एक मज़ार का रूप लेती गई जहाँ आपकी याद में सालाना आयोजन सैकड़ों सालों से होते आते रहे हैं।

रूमी के जीवन में शम्स तबरीज़ी का महत्वपूर्ण स्थान है जिनसे मिलने के बाद इनकी शायरी में मस्ताना रंग भर आया था। इनकी रचनाओं के एक संग्रह (दीवान) को दीवान-ए-शम्स कहते हैं।

इनका जन्म फारस देश के प्रसिद्ध नगर
बाल्ख़ में सन् 604 हिजरी में हुआ था। रूमी के पिता शेख बहाउद्दीन अपने समय के अद्वितीय पंडित थे जिनके उपदेश सुनने और फतवे लेने फारस के बड़े-बड़े अमीर और विद्वान् आया करते थे। एक बार किसी मामले में सम्राट् से मतभेद होने के कारण उन्होंने बलख नगर छोड़ दिया। तीन सौ विद्वान मुरीदों के साथ वे बलख से रवाना हुए। जहां कहीं वे गए, लोगों ने उसका हृदय से स्वागत किया और उनके उपदेशों से लाभ उठाया। यात्रा करते हुए सन् 610 हिजरी में वे नेशांपुर नामक नगर में पहुंचे। वहां के प्रसिद्ध विद्वान् ख्वाजा फरीदउद्दीन अत्तार उनसे मिलने आए। उस समय बालक जलालुद्दीन की उम्र ६ वर्ष की थी। ख्वाजा अत्तार ने जब उन्हें देखा तो बहुत खुश हुए और उसके पिता से कहा, “यह बालक एक दिन अवश्य महान पुरुष होगा। इसकी शिक्षा और देख-रेख में कमी न करना।” ख्वाजा अत्तार ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ मसनवी अत्तार की एक प्रति भी बालक रूमी को भेंट की।

वहां से भ्रमण करते हुए वे बगदाद पहुंचे और कुछ दिन वहां रहे। फिर वहां से हजाज़ और शाम होते हुए लाइन्दा पहुंचे। १८ वर्ष की उम्र में रूमी का विवाह एक प्रतिष्ठित कुल की कन्या से हुआ। इसी दौरान बादशाह ख्व़ाजरज़मशाह का देहान्त हो गया और शाह अलाउद्दीन कैकबाद राजसिंहासन पर बैठे। उन्होंने अपने कर्मचारी भेजकर शेख बहाउद्दीन से वापस आने की प्रार्थना की। सन् ६२४ हिजरी में वह अपने पुत्र सहित क़ौनिया गए और चार वर्ष तक यहां रहे। सन ६२८ हिजरी में उनका देहान्त हो गया।

रूमी अपने पिता के जीवनकाल से उनके विद्वान शिष्य सैयद बरहानउद्दीन से पढ़ा करते थे। पिता की मृत्यु के बाद वह दमिश्क और हलब के विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए चले गये और लगभग १५ वर्ष बाद वापस लौटे। उस समय उनकी उम्र चालीस वर्ष की हो गयी थी। तब तक रूमी की विद्वत्ता और सदाचार की इतनी प्रसिद्ध हो गयी थी कि देश-देशान्तरों से लोग उनके दर्शन करने और उपदेश सुनने आया करते थे। रूमी भी रात-दिन लोगों को सन्मार्ग दिखाने और उपदेश देने में लगे रहते। इसी अर्से में उनकी भेंट विख्यात साधू शम्स तबरेज़ से हुई जिन्होंने रूमी को अध्यात्म-विद्या की शिक्षा दी और उसके गुप्त रहस्य बतलाये। रूमी पर उनकी शिखाओं का ऐसा प्रभाव पड़ा कि रात-दिन आत्मचिन्तन और साधना में संलग्न रहने लगे। उपदेश, फतवे ओर पढ़ने-पढ़ाने का सब काम बन्द कर दिया। जब उनके भक्तों और शिष्यों ने यह हालत देखी तो उन्हें सन्देह हुआ कि शम्स तबरेज़ ने रूमी पर जादू कर दिया है। इसलिए वे शम्स तबरेज़ के विरुद्ध हो गये और उनका वध कर डाला। इस दुष्कृत्य में रूमी के छोटे बेटे इलाउद्दीन मुहम्मद का भी हाथ था। इस हत्या से सारे देश में शोक छा गया और हत्यारों के प्रति रोष और घृणा प्रकट की गयी। रूमी को इस दुर्घटना से ऐसा दु:ख हुआ कि वे संसार से विरक्त हो गये और एकान्तवास करने लगे। इसी समय उन्होंने अपने प्रिय शिष्य मौलाना हसामउद्दीन चिश्ती के आग्रह पर ‘मसनवी’ की रचना शुरू की। कुछ दिन बाद वह बीमार हो गये और फिर स्वस्थ नहीं हो सके। ६७२ हिजरी में उनका देहान्त हो गया। उस समय वे ६८ वर्ष के थे। उनकी मज़ार क़ौनिया में बनी हुई है।

रूमी की कविताओं में प्रेम और ईश्वर भक्ति का सुंदर समिश्रण है। इनको हुस्न और ख़ुदा के बारे में लिखने के लिए जाना जाता है।

माशूक चूँ आफ़्ताब ताबां गरदद।
आशक़ बे मिस्ल-ए-ज़र्र-ए-गरदान गरदद।
चूँ बाद-ए-बहार-ए-इश्क़ जोंबां गरदद।
हर शाख़ के ख़ुश्क नीस्त, रक़सां गरदद।

(प्रेमिका सूरज की तरह जलकर घूमती है और आशिक़ घूमते हुए कणों की तरह परिक्रमा करते हैं। जब इश्क़ की हवा हिलोर करती है, तो हर शाख (डाली) जो सूखी नहीं है, नाचते हुए परिक्रमा करती है)

#Rumi

ﻣﺤﻤﺪ ﺟﻼﻝ ﺍﻟﺪﯾﻦ ﺭﻭﻣﯽ ‏( ﭘﯿﺪﺍﺋﺶ : 1207 ﺀ ﻣﯿﮟ ﭘﯿﺪﺍ ﮨﻮﺋﮯ، ﻣﺸﮩﻮﺭ ﻓﺎﺭﺳﯽ ﺷﺎﻋﺮ ﺗﮭﮯ۔
ﻣﺜﻨﻮﯼ ، ﻓﯿﮧ ﻣﺎ ﻓﯿﮧ ﺍﻭﺭ ﺩﯾﻮﺍﻥ ﺷﻤﺲ ﺗﺒﺮﯾﺰ ﺁﭖ ﮐﯽ ﻣﻌﺮﻑ ﮐﺘﺐ ﮨﮯ، ﺁﭖ ﺩﻧﯿﺎ ﺑﮭﺮ ﻣﯿﮟ ﺍﭘﻨﯽ ﻻﺯﺍﻭﻝ ﺗﺼﻨﯿﻒ ﻣﺜﻨﻮﯼ ﮐﯽ ﺑﺪﻭﻟﺖ ﺟﺎﻧﮯ ﺟﺎﺗﮯ ﮨﯿﮟ، ﺁﭖ ﮐﺎ ﻣﺰﺍﺭ ﺗﺮﮐﯽ ﻣﯿﮟ ﻭﺍﻗﻊ ﮨﮯ۔

ﺍﺻﻞ ﻧﺎﻡ ﻣﺤﻤﺪ ﺍﺑﻦ ﻣﺤﻤﺪ ﺍﺑﻦ ﺣﺴﯿﻦ ﺣﺴﯿﻨﯽ ﺧﻄﯿﺒﯽ ﺑﮑﺮﯼ ﺑﻠﺨﯽ ﺗﮭﺎ۔ ﺍﻭﺭ ﺁﭖ ﺟﻼﻝ ﺍﻟﺪﯾﻦ، ﺧﺪﺍﻭﻧﺪﮔﺎﺭ ﺍﻭﺭ ﻣﻮﻻﻧﺎ ﺧﺪﺍﻭﻧﺪﮔﺎﺭ ﮐﮯ ﺍﻟﻘﺎﺏ ﺳﮯ ﻧﻮﺍﺯﮮ ﮔﺌﮯ۔ ﻟﯿﮑﻦ ﻣﻮﻻﻧﺎ ﺭﻭﻣﯽ ﮐﮯ ﻧﺎﻡ ﺳﮯ ﻣﺸﮩﻮﺭ ﮨﻮﺋﮯ۔ ﺟﻮﺍﮨﺮ ﻣﻀﺌﯿﮧ ﻣﯿﮟ ﺳﻠﺴﻠﮧ ﻧﺴﺐ ﺍﺱ ﻃﺮﺡ ﺑﯿﺎﻥ ﮐﯿﺎ ﮨﮯ : ﻣﺤﻤﺪ ﺑﻦ ﻣﺤﻤﺪ ﺑﻦ ﻣﺤﻤﺪ ﺑﻦ ﺣﺴﯿﻦ ﺑﻦ ﺍﺣﻤﺪ ﺑﻦ ﻗﺎﺳﻢ ﺑﻦ ﻣﺴﯿﺐ ﺑﻦ ﻋﺒﺪﺍﻟﻠﮧ ﺑﻦ ﻋﺒﺪﺍﻟﺮﺣﻤﻦ ﺑﻦ ﺍﺑﯽ ﺑﮑﺮﻥ ﺍﻟﺼﺪﯾﻖ۔ ﺍﺱ ﺭﻭﺍﯾﺖ ﺳﮯ ﺣﺴﯿﻦ ﺑﻠﺨﯽ ﻣﻮﻻﻧﺎ ﮐﮯ ﭘﺮﺩﺍﺩﺍ ﮨﻮﺗﮯ ﮨﯿﮟ ﻟﯿﮑﻦ ﺳﭙﮧ ﺳﺎﻻﺭ ﻧﮯ ﺍﻧﮩﯿﮟ ﺩﺍﺩﺍ ﻟﮑﮭﺎ ﮨﮯ ﺍﻭﺭ ﯾﮩﯽ ﺭﻭﺍﯾﺖ ﺻﺤﯿﺢ ﮨﮯ۔ ﮐﯿﻮﻧﮑﮧ ﻭﮦ ﺳﻠﺠﻮﻗﯽ ﺳﻠﻄﺎﻥ ﮐﮯ ﮐﮩﻨﮯ ﭘﺮ ﺍﻧﺎﻃﻮﻟﯿﮧ ﭼﻠﮯ ﮔﺌﮯ ﺗﮭﮯ ﺟﻮ ﺍﺱ ﺯﻣﺎﻧﮯ ﻣﯿﮟ ﺭﻭﻡ ﮐﮩﻼﺗﺎ ﺗﮭﺎ۔ ﺍﻥ ﮐﮯ ﻭﺍﻟﺪ ﺑﮩﺎﺅ ﺍﻟﺪﯾﻦ ﺑﮍﮮ ﺻﺎﺣﺐ ﻋﻠﻢ ﻭ ﻓﻀﻞ ﺑﺰﺭﮒ ﺗﮭﮯ۔ ﺍﻥ ﮐﺎ ﻭﻃﻦ ﺑﻠﺦ ﺗﮭﺎ ﺍﻭﺭ ﯾﮩﯿﮟ ﻣﻮﻻﻧﺎ ﺭﻭﻣﯽ 1207 ﺀ ﺑﻤﻄﺎﺑﻖ 6 ﺭﺑﯿﻊ ﺍﻻﻭﻝ 604 ﮪ ﻣﯿﮟ ﭘﯿﺪﺍ ﮨﻮﺋﮯ۔

ﺍﺑﺘﺪﺍﺋﯽ ﺗﻌﻠﯿﻢ ﮐﮯ ﻣﺮﺍﺣﻞ ﺷﯿﺦ ﺑﮩﺎﻭﻟﺪﯾﻦ ﻧﮯ ﻃﮯ ﮐﺮﺍﺩﯾﮯ ﺍﻭﺭ ﭘﮭﺮ ﺍﭘﻨﮯ ﻣﺮﯾﺪ ﺳﯿﺪ ﺑﺮﮨﺎﻥ ﺍﻟﺪﯾﻦ ﮐﻮ ﺟﻮ ﺍﭘﻨﮯ ﺯﻣﺎﻧﮯ ﮐﮯ ﻓﺎﺿﻞ ﻋﻠﻤﺎﺀ ﻣﯿﮟ ﺷﻤﺎﺭ ﮐﯿﮯ ﺟﺎﺗﮯ ﺗﮭﮯ ﻣﻮﻻﻧﺎﮐﺎ ﻣﻌﻠﻢ ﺍﻭﺭ ﺍﺗﺎﻟﯿﻖ ﺑﻨﺎﺩﯾﺎ۔ ﺍﮐﺜﺮ ﻋﻠﻮﻡ ﻣﻮﻻﻧﺎ ﮐﻮ ﺍﻧﮩﯽ ﺳﮯ ﺣﺎﺻﻞ ﮨﻮﺋﮯ۔ ﺍﭘﻨﮯ ﻭﺍﻟﺪ ﮐﯽ ﺣﯿﺎﺕ ﺗﮏ ﺍﻥ ﮨﯽ ﮐﯽ ﺧﺪﻣﺖ ﻣﯿﮟ ﺭﮨﮯ۔ ﻭﺍﻟﺪ ﮐﮯ ﺍﻧﺘﻘﺎﻝ ﮐﮯ ﺑﻌﺪ 639 ﮪ ﻣﯿﮟ ﺷﺎﻡ ﮐﺎ ﻗﺼﺪ ﮐﯿﺎ ۔ ﺍﺑﺘﺪﺍ ﻣﯿﮟ ﺣﻠﺐ ﮐﮯ ﻣﺪﺭﺳﮧ ﺣﻼﻭﯾﮧ ﻣﯿﮟ ﺭﮦ ﮐﺮ ﻣﻮﻻﻧﺎﮐﻤﺎﻝ ﺍﻟﺪﯾﻦ ﺳﮯ ﺷﺮﻑ ﺗﻠﻤﺬ ﺣﺎﺻﻞ ﮐﯿﺎ۔

ﻣﻮﻻﻧﺎ ﺭﻭﻣﯽ ﺍﭘﻨﮯ ﺩﻭﺭ ﮐﮯ ﺍﮐﺎﺑﺮ ﻋﻠﻤﺎﺀ ﻣﯿﮟ ﺳﮯ ﺗﮭﮯ۔ ﻓﻘﮧ ﺍﻭﺭ ﻣﺬﺍﮨﺐ ﮐﮯ ﺑﮩﺖ ﺑﮍﮮ ﻋﺎﻟﻢ ﺗﮭﮯ۔ ﻟﯿﮑﻦ ﺁﭖ ﮐﯽ ﺷﮩﺮﺕ ﺑﻄﻮﺭ ﺍﯾﮏ ﺻﻮﻓﯽ ﺷﺎﻋﺮ ﮐﮯ ﮨﻮﺋﯽ۔ ﺩﯾﮕﺮﻋﻠﻮﻡ ﻣﯿﮟ ﺑﮭﯽ ﺁﭖ ﮐﻮ ﭘﻮﺭﯼ ﺩﺳﺘﮕﺎﮦ ﺣﺎﺻﻞ ﺗﮭﯽ۔ ﺩﻭﺭﺍﻥ ﻃﺎﻟﺐ ﻋﻠﻤﯽ ﻣﯿﮟ ﮨﯽ ﭘﯿﭽﯿﺪﮦ ﻣﺴﺎﺋﻞ ﻣﯿﮟ ﻋﻠﻤﺎﺋﮯ ﻭﻗﺖ ﻣﻮﻻﻧﺎ ﮐﯽ ﻃﺮﻑ ﺭﺟﻮﻉ ﮐﺮﺗﮯ ﺗﮭﮯ۔

ﺷﻤﺲ ﺗﺒﺮﯾﺰ ﻣﻮﻻﻧﺎ ﮐﮯ ﭘﯿﺮ ﻭ ﻣﺮﺷﺪ ﺗﮭﮯ۔ ﻣﻮﻻﻧﺎ ﮐﯽ ﺷﮩﺮﺕ ﺳﻦ ﮐﺮ ﺳﻠﺠﻮﻗﯽ ﺳﻠﻄﺎﻥ ﻧﮯ ﺍﻧﮭﯿﮟ ﺍﭘﻨﮯ ﭘﺎﺱ ﺑﻠﻮﺍﯾﺎ۔ ﻣﻮﻻﻧﺎ ﻧﮯ ﺩﺭﺧﻮﺍﺳﺖ ﻗﺒﻮﻝ ﮐﯽ ﺍﻭﺭ ﻗﻮﻧﯿﮧ ﭼﻠﮯ ﮔﺌﮯ ۔ﻭﮦ ﺗﻘﺮﯾﺒﺎًَ 30 ﺳﺎﻝ ﺗﮏ ﺗﻌﻠﯿﻢ ﻭ ﺗﺮﺑﯿﺖ ﻣﯿﮟ ﻣﺸﻐﻮﻝ ﺭﮨﮯ۔ ﺟﻼﻝ ﺍﻟﺪﯾﻦ ﺭﻭﻣﯽ ؒ ﻧﮯ 3500 ﻏﺰﻟﯿﮟ 2000 ﺭﺑﺎﻋﯿﺎﺕ ﺍﻭﺭ ﺭﺯﻣﯿﮧ ﻧﻈﻤﯿﮟ ﻟﮑﮭﯿﮟ۔

ﻣﻮﻻﻧﺎ ﮐﮯ ﺩﻭ ﻓﺮﺯﻧﺪ ﺗﮭﮯ ، ﻋﻼﺅ ﺍﻟﺪﯾﻦ ﻣﺤﻤﺪ ، ﺳﻠﻄﺎﻥ ﻭﻟﺪ ۔ ﻋﻼﺅ ﺍﻟﺪﯾﻦ ﻣﺤﻤﺪ ﮐﺎ ﻧﺎﻡ ﺻﺮﻑ ﺍﺱ ﮐﺎﺭﻧﺎﻣﮯ ﺳﮯ ﺯﻧﺪﮦ ﮨﮯ ﮐﮧ ﺍﻧﮩﻮﮞ ﻧﮯ ﺷﻤﺲ ﺗﺒﺮﯾﺰ ﮐﻮ ﺷﮩﯿﺪ ﮐﯿﺎ ﺗﮭﺎ۔ ﺳﻠﻄﺎﻥ ﻭﻟﺪ ﺟﻮ ﻓﺮﺯﻧﺪ ﺍﮐﺒﺮ ﺗﮭﮯ ، ﺧﻠﻒ ﺍﻟﺮﺷﯿﺪ ﺗﮭﮯ ، ﮔﻮ ﻣﻮﻻﻧﺎ ﮐﯽ ﺷﮩﺮﺕ ﮐﮯ ﺁﮔﮯ ﺍﻥ ﮐﺎ ﻧﺎﻡ ﺭﻭﺷﻦ ﻧﮧ ﮨﻮﺳﮑﺎ ﻟﯿﮑﻦ ﻋﻠﻮﻡ ﻇﺎﮨﺮﯼ ﻭ ﺑﺎﻃﻨﯽ ﻣﯿﮟ ﻭﮦ ﯾﮕﺎﻧﮧ ﺭﻭﺯﮔﺎﺭ ﺗﮭﮯ۔ ﺍﻥ ﮐﯽ ﺗﺼﺎﻧﯿﻒ ﻣﯿﮟ ﺳﮯ ﺧﺎﺹ ﻗﺎﺑﻞ ﺫﮐﺮ ﺍﯾﮏ ﻣﺜﻨﻮﯼ ﮨﮯ ، ﺟﺲ ﻣﯿﮟ ﻣﻮﻻﻧﺎ ﮐﮯ ﺣﺎﻻﺕ ﺍﻭﺭ ﻭﺍﺭﺩﺍﺕ ﻟﮑﮭﮯ ﮨﯿﮟ ﺍﻭﺭ ﺍﺱ ﻟﺤﺎﻅ ﺳﮯ ﻭﮦ ﮔﻮﯾﺎ ﻣﻮﻻﻧﺎ ﮐﯽ ﻣﺨﺘﺼﺮ ﺳﻮﺍﻧﺢ ﻋﻤﺮﯼ ﮨﮯ۔

ﻣﻮﻻﻧﺎ ﮐﺎ ﺳﻠﺴﻠﮧ ﺍﺏ ﺗﮏ ﻗﺎﺋﻢ ﮨﮯ۔ ﺍﺑﻦ ﺑﻄﻮﻃﮧ ﻧﮯ ﺍﭘﻨﮯ ﺳﻔﺮﻧﺎﻣﮯ ﻣﯿﮟ ﻟﮑﮭﺎ ﮨﮯ ﮐﮧ ﺍﻥ ﮐﮯ ﻓﺮﻗﮯ ﮐﮯ ﻟﻮﮒ ﺟﻼﻟﯿﮧ ﮐﮩﻼﺗﮯ ﮨﯿﮟ۔ ﭼﻮﻧﮑﮧ ﻣﻮﻻﻧﺎ ﮐﺎ ﻟﻘﺐ ﺟﻼﻝ ﺍﻟﺪﯾﻦ ﺗﮭﺎ ﺍﺱ ﻟﯿﮯ ﺍﻥ ﮐﮯ ﺍﻧﺘﺴﺎﺏ ﮐﯽ ﻭﺟﮧ ﺳﮯ ﯾﮧ ﻧﺎﻡ ﻣﺸﮩﻮﺭ ﮨﻮﺍ ﮨﻮﮔﺎ ۔ ﻟﯿﮑﻦ ﺁﺝ ﮐﻞ ﺍﯾﺸﯿﺎﺋﮯ ﮐﻮﭼﮏ ، ﺷﺎﻡ ، ﻣﺼﺮ ﺍﻭﺭ ﻗﺴﻄﻨﻄﻨﯿﮧ ﻣﯿﮟ ﺍﺱ ﻓﺮﻗﮯ ﮐﻮ ﻟﻮﮒ ﻣﻮﻟﻮﯾﮧ ﮐﮩﺘﮯ ﮨﯿﮟ۔ﺩﻭﺳﺮﯼ ﺟﻨﮓ ﻋﻈﯿﻢ ﺳﮯ ﻗﺒﻞ ﺑﻠﻘﺎﻥ، ﺍﻓﺮﯾﻘﮧ ﺍﻭﺭ ﺍﯾﺸﯿﺎ ﻣﯿﮟ ﻣﻮﻟﻮﯼ ﻃﺮﯾﻘﺖ ﮐﮯ ﭘﯿﺮﻭﮐﺎﺭﻭﮞ ﮐﯽ ﺗﻌﺪﺍﺩ ﺍﯾﮏ ﻻﮐﮫ ﺳﮯ ﺯﺍﺋﺪ ﺗﮭﯽ۔ ﯾﮧ ﻟﻮﮒ ﻧﻤﺪ ﮐﯽ ﭨﻮﭘﯽ ﭘﮩﻨﺘﮯ ﮨﯿﮟ ﺟﺲ ﻣﯿﮟ ﺟﻮﮌ ﯾﺎ ﺩﺭﺯ ﻧﮩﯿﮟ ﮨﻮﺗﯽ ، ﻣﺸﺎﺋﺦ ﺍﺱ ﭨﻮﭘﯽ ﭘﺮ ﻋﻤﺎﻣﮧ ﺑﺎﻧﺪﮬﺘﮯ ﮨﯿﮟ۔ ﺧﺮﻗﮧ ﯾﺎ ﮐﺮﺗﮧ ﮐﯽ ﺑﺠﺎﺋﮯ ﺍﯾﮏ ﭼﻨﭧ ﺩﺍﺭ ﭘﺎﺟﺎﻣﮧ ﮨﻮﺗﺎﮨﮯ۔ ﺫﮐﺮ ﻭ ﺷﻐﻞ ﮐﺎ ﯾﮧ ﻃﺮﯾﻘﮧ ﮨﮯ ﮐﮧ ﺣﻠﻘﮧ ﺑﺎﻧﺪﮪ ﮐﺮ ﺑﯿﭩﮭﺘﮯ ﮨﯿﮟ۔ ﺍﯾﮏ ﺷﺨﺺ ﮐﮭﮍﺍ ﮨﻮ ﮐﺮ ﺍﯾﮏ ﮨﺎﺗﮫ ﺳﯿﻨﮯ ﭘﺮ ﺍﻭﺭ ﺍﯾﮏ ﮨﺎﺗﮫ ﭘﮭﯿﻼﺋﮯ ﮨﻮﺋﮯ ﺭﻗﺺ ﺷﺮﻭﻉ ﮐﺮﺗﺎ ﮨﮯ۔ ﺭﻗﺺ ﻣﯿﮟ ﺁﮔﮯ ﭘﯿﭽﮭﮯ ﺑﮍﮬﻨﺎ ﯾﺎ ﮨﭩﻨﺎ ﻧﮩﯿﮟ ﮨﻮﺗﺎ ﺑﻠﮑﮧ ﺍﯾﮏ ﺟﮕﮧ ﺟﻢ ﮐﺮ ﻣﺘﺼﻞ ﭼﮑﺮ ﻟﮕﺎﺗﮯ ﮨﯿﮟ۔ ﺳﻤﺎﻉ ﮐﮯ ﻭﻗﺖ ﺩﻑ ﺍﻭﺭ ﻧﮯ ﺑﮭﯽ ﺑﺠﺎﺗﮯ ﮨﯿﮟ۔

ﺑﻘﯿﮧ ﺯﻧﺪﮔﯽ ﻭﮨﯿﮟ ﮔﺬﺍﺭ ﮐﺮ ﺗﻘﺮﯾﺒﺎًَ 66 ﺳﺎﻝ ﮐﯽ ﻋﻤﺮ ﻣﯿﮟ ﺳﻦ 1273 ﺀ ﺑﻤﻄﺎﺑﻖ 672 ﮪ ﻣﯿﮟ ﺍﻧﺘﻘﺎﻝ ﮐﺮﮔﺌﮯ۔ ﻗﻮﻧﯿﮧ ﻣﯿﮟ ﺍﻥ ﮐﺎ ﻣﺰﺍﺭ ﺁﺝ ﺑﮭﯽ ﻋﻘﯿﺪﺕ ﻣﻨﺪﻭﮞ ﮐﺎ ﻣﺮﮐﺰ ﮨﮯ۔

ﺍﻥ ﮐﯽ ﺳﺐ ﺳﮯ ﻣﺸﮩﻮﺭ ﺗﺼﻨﯿﻒ ’’ ﻣﺜﻨﻮﯼ ﻣﻮﻻﻧﺎ ﺭﻭﻡ ‘‘ ﮨﮯ۔ ﺍﺱ ﮐﮯ ﻋﻼﻭﮦ ﺍﻥ ﮐﯽ ﺍﯾﮏ ﻣﺸﮩﻮﺭ ﮐﺘﺎﺏ ’’ ﻓﯿﮧ ﻣﺎﻓﯿﮧ ‘‘ ﺑﮭﯽ ﮨﮯ۔

” ﺑﺎﻗﯽ ﺍﯾﮟ ﮔﻔﺘﮧ ﺁﯾﺪ ﺑﮯ ﺯﺑﺎﮞ
ﺩﺭ ﺩﻝ ﮨﺮ ﮐﺲ ﮐﮧ ﺩﺍﺭﺩ ﻧﻮﺭِ ﺟﺎﻥ
ﺗﺮﺟﻤﮧ : ’’ ﺟﺲ ﺷﺨﺺ ﮐﯽ ﺟﺎﻥ ﻣﯿﮟ ﻧﻮﺭﮨﻮﮔﺎ ﺍﺱ ﻣﺜﻨﻮﯼ ﮐﺎ ﺑﻘﯿﮧ ﺣﺼﮧ ﺍﺱ ﮐﮯ ﺩﻝ ﻣﯿﮟ ﺧﻮﺩﺑﺨﻮﺩ ﺍﺗﺮ ﺟﺎﺋﮯ ﮔﺎ ‘‘ “

ﺍﻥ ﮐﮯ 800 ﻭﯾﮟ ﺟﺸﻦ ﭘﯿﺪﺍﺋﺶ ﭘﺮ ﺗﺮﮐﯽ ﮐﯽ ﺩﺭﺧﻮﺍﺳﺖ ﭘﺮ ﺍﻗﻮﺍﻡ ﻣﺘﺤﺪﮦ ﮐﮯ ﺍﺩﺍﺭﮦ ﺑﺮﺍﺋﮯ ﺗﻌﻠﯿﻢ، ﺛﻘﺎﻓﺖ ﻭ ﺳﺎﺋﻨﺲ ﯾﻮﻧﯿﺴﮑﻮ ﻧﮯ
2007 ﺀ ﮐﻮ ﺑﯿﻦ ﺍﻻﻗﻮﺍﻣﯽ ﺳﺎﻝِ ﺭﻭﻣﯽ ﻗﺮﺍﺭ ﺩﯾﺎ۔ ﺍﺱ ﻣﻮﻗﻊ ﭘﺮ ﯾﻮﻧﯿﺴﮑﻮ ﺗﻤﻐﺎ ﺑﮭﯽ ﺟﺎﺭﯼ ﮐﯿﺎ۔

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अमरीका क्यों मानता है जलालुद्दीन का लोहा
हाल के सालों में फ़ारसी के मशहूर शायर और सूफ़ी दिग्गज जलालुद्दीन मोहम्मद रूमी की लोकप्रियता अमरीका में इतनी बढ़ी है कि कविता प्रेमियों के बीच वो सबसे मशहूर कवि माने जा रहे हैं.

रूमी का जन्म 1207 में ताजिकिस्तान के एक गांव में हुआ था.

उनके जन्म के 800 से ज़्यादा साल बाद भी अमरीका में उनकी रूबाईयों और ग़ज़लों की किताबों की लाखों प्रतियां बिक रही हैं.

दुनिया भर में तो उनके करोड़ों प्रशंसकों की संख्या है ही. रूमी की जीवनी लिख रहे ब्रैड गूच कहते हैं, “रूमी का सभी संस्कृतियों पर असर दिखता है.”

गूच ने रूमी की जीवनी पर काम करने के लिए उन तमाम मुल्कों की यात्रा की है, जो किसी ना किसी रूप में रूमी से जुड़े रहे.

गूच कहते हैं, “रूमी का जीवन 2500 मील लंबे इलाके में फैला हुआ है. रूमी का जन्म ताजिकिस्तान के वख़्श गांव में हुआ. इसके बाद वे उज्बेकिस्तान में समरकंद, फिर ईरान और सीरिया गए. रूमी ने युवावस्था में सीरिया (शाम) के दमिश्क और एलेप्पो में अपनी पढ़ाई पूरी की.”

इसके बाद उन्होंने जीवन के 50 सालों तक तुर्की के कोन्या को अपना ठिकाना बनाया और वहीं रूमी का निधन हुआ था.

शम्स तबरेज़ी का असर
रूमी के मक़बरे पर हर साल 17 दिसंबर को उनके प्रशंसकों (कई राष्ट्राध्यक्षों समेत) का जमावड़ा लगता है. उनकी पुण्यतिथि पर दरवेशी परंपरा के इस आयोजन में दुनिया भर से रूमी प्रशंसक पहुंचते हैं.

रूमी के जीवन में सबसे बड़ा बदलाव 1244 में आया जब वे सूफ़ी संत शम्स तबरेज़ी से मिले. गूच बताते हैं, “तब रूमी 37 साल के थे और अपने पिता और दादा की तरह वे एक मुस्लिम धार्मिक गुरू और विद्धान थे.”

गूच कहते हैं, “रूमी और शम्स में तीन साल तक बेहतरीन दोस्ती रही. दोनों के बीच ये रिश्ता प्रेम का था या फिर मुरशिद-चेले (गुरू-शिष्य) का था, ये स्पष्ट नहीं हो पाया.” लेकिन इस सोहबत ने रूमी को सूफ़ियाना रंग में रंग लिया.

तीन साल बाद शम्स तबरेज़ी अचानक ग़ायब हो गए. रूमी सूफ़ी बन गए.

कहा जाता है कि शायद शम्स की हत्या रूमी के किसी बेटे ने कर दी हो, जो अपने पिता और शम्स की दोस्ती से ईष्या करने लगा हो. इसके बाद रूमी पूरी तरह शायरी में डूब गए.

गूच बताते हैं, “उनकी लगभग सभी रचनाएँ 37 से 67 साल की उम्र में लिखी गईं. उन्होंने शम्स, पैगंबर मोहम्मद और अल्लाह के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने वाले करीब 3000 गीत लिखे. इसके अलावा उन्होंने 2000 रूबाईयां भी लिखीं. रूबाई चार पंक्तियों वाला दोहा होता है. साथ ही उन्होंने छह खंडों वाले अध्यात्मिक महाकाव्य मसनवी की रचना भी की.”

शायरी, संगीत और नृत्य
जीवन के इन तीन दशकों में रूमी ने शायरी, संगीत और नृत्य को धार्मिक परंपराओं से जोड़ने का काम किया. गूच कहते हैं, “रूमी जब अध्यात्म में डूबे होते थे या फिर शायरी बोल रहे होते, तो झूमते रहते थे.”

उनकी मृत्यु के बाद उनके इसी अंदाज़ को लोगों ने अध्यात्मिक नृत्य के तौर पर अपनाया. रूमी ने अपनी एक ग़ज़ल में लिखा है, “मैं पहले प्रार्थना-सजदा सुनाता था. अब मैं धुन, शायरी और गीत सुनाता हूं.”

उनकी मौत के सैकड़ों साल बाद रूमी की शायरी सुनाई जाती है, गाई जाती है, इसे संगीत में सजाया जाता है.

ये शायरी संगीत, फ़िल्म, यूट्यूब वीडियो और ट्वीट्स की दुनिया के लिए प्रेरणा स्रोत साबित हो रही है. क्या वजह है कि रूमी की रूबाईयां आज भी लोकप्रिय हैं?

गूच कहते हैं, “रूमी प्रेम और उल्लास के कवि थे. उनकी रचनाएं शम्स के वियोग, प्रेम और विधाता से संबंधित उनके अनुभव और मृत्यु का सामना करते हुए उनके अनुभवों से निकली हैं. रूमी का संदेश सीधे संवाद करता है. एक बार मैंने एक बेहतरीन संदेश देखा, जो रूमी की रचना की एक पंक्ति थी- सही और ग़लत करने के विचार से परे, एक जगह होती है, मैं तुमसे वहीं मिलूंगा.”

नारोपा यूनिवर्सिटी के जैक कैरोएक स्कूल ऑफ डिसइम्बॉडिड पोएटिक्स विभाग की सह-संस्थापक और कवि एने वाल्डमान कहती हैं, “जब हम सूफ़ी परंपरा, परम आनंद और भक्ति भाव के अलावा शायरी की ताक़त को समझने का प्रयास करते हैं तो रूमी काफी रहस्यमयी और विचारोत्तेजक शायर के तौर पर सामने आते हैं.”

रूबाईयां आज भी जीवंत

काव्यशास्त्र की प्रोफेसर एने वाल्डमान कहती हैं, “समलैंगिक परंपरा को भी उनसे बढ़ावा मिला. सैफ़ो से लेकर वॉल्ट व्हिट्मैन तक, वे परमानंद की तलाश करने वाली परंपरा में बने रहे.”

अमरीका में नेशनल लाइब्रेरी सीरीज में रूमी को भी जगह मिली है. इस प्रोजेक्ट की सह प्रायोजक पोएट्स हाउस की कार्यकारी निदेशक ली ब्रीक्केटी कहती हैं, “समय, जगह और संस्कृति के लिहाज से रूमी की रूबाईयां आज भी जीवंत लगती हैं.”

ब्रीक्केटी कहती हैं, “उनकी रचनाएं हमें अपनी उस खोज को समझने में मदद करती हैं, जो प्रेम और परमआनंद के भाव से जुड़ी है.”

ब्रीक्केटी रूमी की रचनाओं की तुलना सौंदर्य और प्रेम की गूंज के लिहाज से शेक्सपीयर से करती हैं.

कोलमैन बार्क्स ने रूमी की रचनाओं का अनुवाद किया है. इन रचनाओं की लोकप्रियता ने ही रूमी की शायरी को अमरीका में सबसे ज्यादा बिकने वाली शायरी बना दिया.

वे कहते हैं, “रूमी की कल्पनाओं में ताज़गी है. उन्हें पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि वे कहीं हमारे अंदर से आ रही हैं. उनमें गज़ब का ह्यूमर भी है. उनकी रचनाओं में चंचलता के बीच ही ज्ञान की झलक भी मिलती है.”

1976 में कवि रॉबर्ट ब्लाय ने बार्क्स को रूमी की रचनाओं का वह अनुवाद दिया जो केंब्रिज यूनिवर्सिटी के एजे अरबेरी ने किया था.

ब्लाय ने बार्क्स से कहा था, “इन कविताओं को इनके पिंजरे से रिहा करने की जरूरत है.” इसके बाद बार्क्स ने उस अकादमिक अनुवाद को अमरीकी शैली की आमफहम अंग्रेजी में बदल डाला.

लाखों प्रतियों की बिक्री
इसके बाद 33 सालों में बार्क्स ने 22 खंडों में रूमी की रचनाओं का अनुवाद किया.

इनमें द इंसेशिएल रूमी, एन ईयर विद रूमी, रूमी: द बिग रेड बुक और रूमीस फादर्स स्पिरिच्यूयल डायरी, द ड्राउनड बुक शामिल हैं. इनका प्रकाशन हार्परवन ने किया है. इन किताबों की 20 लाख से ज़्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं और उनका 23 भाषाओं में अनुवाद हो चुका है.

बार्क्स रूमी की इस लोकप्रियता के बारे में कहते हैं, “मेरे ख़्याल से दुनिया भर में रूमी को लेकर एक आंदोलन जैसा चल रहा है, जो सभी धर्मों में दिख रहा है. इसके पीछे सांप्रदायिक हिंसा को खत्म कर, धर्म को धर्म से अलग करने वाली दीवारों को हटाने की भावना है. ऐसा कहा जाता है कि 1273 में रूमी को दफ़न करने के समय सभी धर्मों के लोग शामिल हुए थे, क्योंकि वे हर किसी की आस्था को मज़बूत करने में कामयाब हुए थे. रूमी के लेखन में आज भी यही अहम तत्व है.”

रुटर्जस यूनिवर्सिटी में मध्यकालीन सूफीवाद के विद्धान जावेद मोजादेदी कहते हैं, “रूमी फ़ारसी कवियों में प्रयोगधर्मी थे और सूफ़ी दिग्गज थे. उनकी रूबाईयों में रहस्य की गहराई भी है और एक तरह की बोल्डनेस भी है, इसी वजह से वो आज इतने लोकप्रिय हैं.”

मोजादेदी के मुताबिक रूमी की रचनाओं में सबसे पहली ख़ास बात तो ये है कि वे पाठकों से सीधा संवाद करती हैं. इसके अलावा रूमी की रचनाओं में पाठकों को कुछ सीख देने की प्रबल इच्छा भी अभिव्यक्त होती है.

रूमी की तीसरी खास बात है उनकी कल्पनाशीलता है. मोजादेदी के मुताबिक चौथी बात ” सूफ़ी परंपरा तो यह रही है कि प्रेम मिलन के अप्राप्य होने और प्रेमिका के ठुकरा देने के दर्द पर ज़ोर दिया जाए. लेकिन रूमी मिलन को एक उत्सव की तरह मनाते हैं.”

मोजादेदी ने रूमी की सबसे बेहतरीन रचना मसनवी के छह खंडों में से तीन खंडों का अनुवाद भी किया है. रूमी की मसनवी एक ही शायर के लिखे हुए 26 हज़ार अशार की सबसे लंबी आध्यात्मिक काव्य रचना है. मोजादेदी की नज़र में इस्लामी दुनिया में रूमी की मसनवी क़ुरान के बाद सबसे प्रभावी रचना है.

JERUSALEM AND UMAR IBN AL-KHATTAB (RA)

Jerusalem is a city holy to the three largest monotheistic faiths – Islam, Judaism, and Christianity. Because of its history that spans thousands of years, it goes by many names: Jerusalem, al-Quds, Yerushaláyim, Aelia, and more, all reflecting its diverse heritage. It is a city that numerous Muslim prophets called home, from Sulayman and Dawood to Isa (Jesus), may Allah be pleased with them.

During the Prophet Muhammad ﷺ’s life, he made a miraculous journey in one night from Makkah to Jerusalem and then from Jerusalem to Heaven – the Isra’ and Mi’raj. During his life, however, Jerusalem never came under Muslim political control. That would change during the caliphate of Umar ibn al-Khattab, the second caliph of Islam.

Into Syria

During Muhammad ﷺ’s life, the Byzantine Empire made clear its desire to eliminate the new Muslim religion growing on its southern borders. The Expedition of Tabuk thus commenced in October 630, with Muhammad ﷺleading an army of 30,000 people to the border with the Byzantine Empire. While no Byzantine army met the Muslims for a battle, the expedition marked the beginning of the Muslim-Byzantine Wars that would continue for decades.

During the rule of the caliph Abu Bakr (may Allah be pleased with him) from 632 to 634, no major offensives were taken into Byzantine land. It was during the caliphate of Umar ibn al-Khattab (may Allah be pleased with him), that Muslims would begin to seriously expand northwards into the Byzantine realm. He sent some of the ablest Muslim generals, including Khalid ibn al-Walid and Amr ibn al-’As (may Allah be pleased with them) to fight the Byzantines. The decisive Battle of Yarmuk in 636 was a huge blow to Byzantine power in the region, leading to the fall of numerous cities throughout Syria such as Damascus.

In many cases, Muslim armies were welcomed by the local population – both Jews and Christians. The majority of the Christians of the region were Monophysites, who had a more monotheistic view of God that was similar to what the new Muslims were preaching. They welcomed Muslim rule over the area instead of the Byzantines, with whom they had many theological differences.

Capture of Jerusalem

By 637, Muslim armies began to appear in the vicinity of Jerusalem. In charge of Jerusalem was Patriarch Sophronius, a representative of the Byzantine government, as well as a leader in the Christian Church. Although numerous Muslim armies under the command of Khalid ibn al-Walid and Amr ibn al-’As (may Allah be pleased with them) began to surround the city, Sophronius refused to surrender the city unless Umar came to accept the surrender himself.

Having heard of such a condition, Umar ibn al-Khattab (may Allah be pleased with him)  left Madinah, travelling alone with one donkey and one servant. When he arrived in Jerusalem, he was greeted by Sophronius, who undoubtedly must have been amazed that the caliph of the Muslims, one of the most powerful people in the world at that point, was dressed in no more than simple robes and was indistinguishable from his servant.

Umar was given a tour of the city, including the Church of the Holy Sepulchre. When the time for prayer came, Sophronius invited Umar to pray inside the Church, but Umar refused. He insisted that if he prayed there, later Muslims would use it as an excuse to convert it into a mosque – thereby depriving Christendom of one of its holiest sites. Instead, Umar prayed outside the Church, where a mosque (called Masjid Umar – the Mosque of Umar) was later built.

The Treaty of Umar (may Allah be pleased with him)

As they did with all other cities they conquered, the Muslims had to write up a treaty detailing the rights and privileges regarding the conquered people and the Muslims in Jerusalem. This treaty was signed by Umar (may Allah be pleased with him) and Patriarch Sophronius, along with some of the generals of the Muslim armies. The text of the treaty read:

In the name of God, the Merciful, the Compassionate. This is the assurance of safety which the servant of God, Umar, the Commander of the Faithful, has given to the people of Jerusalem. He has given them an assurance of safety for themselves  for their property, their churches, their crosses, the sick and healthy of the city and for all the rituals which belong to their religion. Their churches will not be inhabited by Muslims and will not be destroyed. Neither they, nor the land on which they stand, nor their cross, nor their property will be damaged. They will not be forcibly converted. No Jew will live with them in Jerusalem.

The people of Jerusalem must pay the taxes like the people of other cities and must expel the Byzantines and the robbers. Those of the people of Jerusalem who want to leave with the Byzantines, take their property and abandon their churches and crosses will be safe until they reach their place of refuge. The villagers may remain in the city if they wish but must pay taxes like the citizens. Those who wish may go with the Byzantines and those who wish may return to their families. Nothing is to be taken from them before their harvest is reaped.

If they pay their taxes according to their obligations, then the conditions laid out in this letter are under the covenant of God, are the responsibility of His Prophet, of the caliphs and of the faithful.

– Quoted in The Great Arab Conquests, from Tarikh Tabari

At the time, this was by far one of the most progressive treaties in history. For comparison, just 23 years earlier when Jerusalem was conquered by the Persians from the Byzantines, a general massacre was ordered. Another massacre ensued when Jerusalem was conquered by the Crusaders from the Muslims in 1099.

The Treaty of Umar allowed the Christians of Jerusalem religious freedom, as is dictated in the Quran and the sayings of Muhammad ﷺ. This was one of the first and most significant guarantees of religious freedom in history. While there is a clause in the treaty regarding the banning of Jews from Jerusalem, its authenticity is debated. One of Umar’s guides in Jerusalem was a Jew named Kaab al-Ahbar. Umar further allowed Jews to worship on the Temple Mount and the Wailing Wall, while the Byzantines banned them from such activities. Thus, the authenticity of the clause regarding Jews is in question.

What is not in question, however, was the significance of such a progressive and equitable surrender treaty, which protected minority rights. The treaty became the standard for Muslim-Christian relations throughout the former Byzantine Empire, with rights of conquered people being protected in all situations, and forced conversions never being a sanctioned act.

Revitalization of the City

Umar immediately set about making the city an important Muslim landmark. He cleared the area of the Temple Mount, where Muhammad ﷺascended to heaven from. The Christians had used the area as a garbage dump to offend the Jews, and Umar and his army (along with some Jews) personally cleaned it and built a mosque – Masjid al-Aqsa – there.

Throughout the remainder of Umar’s caliphate and into the Umayyad Empire’s reign over the city, Jerusalem became a major center of religious pilgrimage and trade. The Dome of the Rock was added to complement Masjid al-Aqsa in 691. Numerous other mosques and public institutions were soon established throughout the city.

The Muslim conquest of Jerusalem under the caliph Umar in 637 was clearly an important moment in the city’s history. For the next 462 years, it would be ruled by Muslims, with religious freedom for minorities protected according to the Treaty of Umar. Even in 2012, as fighting continues over the future status of the city, many Muslims, Christians, and Jews insist that the Treaty maintains legal standing and look to it to help solve Jerusalem’s current problems.