Hazrat Abdullah Al Mahad R.A

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हज़रत सैय्यदना अब्दुल्लाह अल महज़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु

 अब्दुल्लाह है नाम, महज़ है लक़ब

निसबत है इनको हसनो हुसैन से

ज़माने भर मे है ये शर्फ़ हासिल

सैय्यद हैं ये तरफ़ैन से

हज़रत सैय्यदना अब्दुल्लाह अल महज़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु का लक़ब जो महज़ है उसकी वजह तस्मिया यूँ बयान है कि “महज़”के माईने होता है ख़ालिस, जिसमे किसी और चीज़ की मिलावट ना हो, बस ये माँ बाप के तरफ़ से फ़ातिमी थें, इसलिये इनका लक़ब “महज़”हुआ!

हज़रत सैय्यदना अब्दुल्लाह अल महज़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु बहुत ही मुत्तक़ी परहेज़गार निहायत इबादतगुज़ार और सख़ी और बलन्द किरदार के मालिक थें और ये भी इनको अपने ख़ानदाने ज़ीवक़ार से विरासत मे मिला था और इसी के सबब आपको लोग “शैख़ बनु हाशिम” कहने लगे!

तरीख़ इब्ने ख़लदून “अ‍ल बिदाया वन निहाया” मे मरक़ूम है कि सन् एक सौ चव्वालीस हिजरी मे अब्बासी ख़लीफ़ा अबु जाफ़र मंसूर का काबे के रास्ते मे लोगों ने इस्तक़बाल किया जिनमे हज़रत अब्दुल्लाह अल महज़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु भी थें, मन्सूर ने इन्हें अपने साथ दस्तरख़्वान पर बैठाया और फिर इनसे बड़ी तवज्जो से गुफ़्तगू की, उसने इनसे इनके दोनो बेटों हज़रत सैय्यदना मोहम्मद नफ़्से ज़किया और हज़रत सैय्यदना इब्राहीम रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा (जो इसके मुख़ालिफ़ थे और ख़लाफ़त का दावा किया था) के मुताल्लिक़ दरयाफ़्त किया कि वो लोगों के साथ मेरे पास क्यों नही आएं? इसके जवाब मे हज़रत अब्दुल्लाह अल महज़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने उसे बताया कि उन्हे नही मालूम की वो ख़ुदा के ज़मीन मे कहाँ हैं! मुआमला ये है कि मरवान अल हम्मार की हुकूमत के आख़ीर मे अहले हिजाज़ के एक जमात ने हज़रत मोहम्मद नफ़्से ज़किया रज़िअल्लाह तआला अन्हु की बैअत कर ली थी और उन्होंने मरवान को माज़ूल कर दिया था, और उनकी बैअत करने वालों मे ख़ुद अबु जाफ़र मन्सूर भी शामिल था और ये बात बनु अब्बास के तरफ़ ख़लाफ़त मुन्तक़िल होने से पहले की है! जब अबु जाफ़र मन्सूर ख़लीफ़ा बन गया तो हज़रत मोहम्मद नफ़्से ज़किया और उनके भाई हज़रत इब्राहीम से ख़ौफ़ज़दा हो गया क्योंकि उसको ये शुबह हो गया था कि ये दोनों उसके ख़िलाफ़ इसी तरह बग़ावत करेंगे जैसे उन्होंने मरवान अल हम्मार के ख़िलाफ़ बग़ावत किया था! मन्सूर ने जो वहम किया था उसमे वो फस गया और वो दोनों दूर दराज़ इलाकों मे रूह पोश रहे फिर जब हसन बिन यज़ीद ने इनके मुताल्लिक़ बताया तो वो फिर किसी दूसरी जगह रूहपोश हो गएं! हसन बिन यज़ीद मन्सूर के यहाँ इन दोनों के अदावत पर क़ायम रहा जबकी हैरत कि बात तो ये है की वो इन दोनों के पैरोकारों मे से था! मन्सूर ने हज़रत मोहम्मद नफ़्से ज़किया रज़िअल्लाह तआला अन्हु और आपके भाई हज़रत इब्राहीम को हासिल करने की हर तरीक़े से कोशिश किया मगर वो नाकाम रहा! जब उसने उनके वालिद हज़रत सैय्यदना अब्दुल्लाह अल महज़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु से उनके मुताल्लिक़ पूछा तो उन्होंने क़सम खाकर कहा कि मुझे नही मालूम कि वो दोनों ख़ुदा की इस ज़मीन पर किस जगह चले गए हैं! मन्सूर ने जब सैय्यदना अब्दुल्लाह अल महज़ से इनके दोनों बेटों के तलाश के बारे मे इसरार किया तो आपको ग़ुस्सा आ गया और कहने लगे ख़ुदा की क़सम अगर वो दोनों मेरे पैरों के नीचे भी हों तो मै तुझे इसके मुताल्लिक़ नही बताऊंगा! मन्सूर ने गुस्सा होकर उनको क़ैद करने का हुक्म दे दिया और उनके ग़ुलामों और अमवालों को भी फ़रोख़्त करने का हुक्म दे दिया और वो तीन साल तक क़ैद ख़ाने मे रहें, और लोगों ने मन्सूर को मशवरह दिया कि वो सब बनु हसन मुजतबा को क़ैद करदे तो उसने वही किया! उसने हज़रत मोहम्मद नफ़्से ज़किया रज़िअल्लाह तआला अन्हु और उनके भाई हज़रत इब्राहीम रज़िअल्लाह तआला अन्हु की तलाश मे बड़ी जद्दो-जहेद किया जबकी दोनों अकसर सालों मे हज मे हाज़िर होते रहें, और दोनों अकसर अवक़ात मदीना मे रूह पोश हो जाते, इन दोनों के मुताल्लिक़ चुग़ल ख़ोरो मे किसी को पता न चला! वल्लाहुल हम्द और मन्सूर मदीना के नाएब को माज़ूल करता रहता और दूसरे को उसकी जगह नाएब मुक़र्रर करता और उन्हें उन दोनों को पकड़ने की तरग़ीब देता और उसने उन दोनों की तलाश मे अमवाल को ख़र्च किया और जो वो चहता था तक़दीर इलाही ने उसको उससे आजिज़ रखा!

मन्सूर के उमरा मे से एक अमीर अबुल असाकिर ख़ालिद बिन हस्सान ने हज़रत नफ़्से ज़किया और हज़रत इब्राहीम से मंसूर के मुक़ाबले मे इत्तिफ़ाक़ किया और उन्होंने एक हज मे सफ़ाह और मरवह के दरमियान मन्सूर को अचानक क़त्ल कर देने का इरादा किया तो हज़रत अब्दुल्लाह अल महज़ ने इन्हें इस ख़ित्तए ज़मीन के शर्फ़ के वजह से रोक दिया और मन्सूर को इसकी इत्तिला मिली और जिस अमीर ने उन दोनो कि मदद की थी उसका भी पता चल गया तो उसने उसे सज़ा दिया, फिर मन्सूर ने उस अमीर से पूछा कि तुम्हे किसने मुझे क़त्ल कर देने की बात से रोका? तो उसने कहा कि जनाब अब्दुल्लाह अल महज़ बिन सैय्यदना इमाम हसन मुसन्ना रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने हमे इस बात से रोका था!

मन्सूर ने अपने साहिबे राय उमरा और वुज़रा से मशवरह लिया जो हज़रत अब्दुल्लाह अल महज़ के दोनों बेटो के मामले को जानते थे और उसने जासूसो और मुतलाशियो को शहरो मे भेजा, मगर इन्हें उनदोनो के मुताल्लिक़ कोई ख़बर नही मिली और इनको उनका कोई नामो निशान ना मिला और अल्लाह अपने अम्र पर ग़ालिब है!

हज़रत मोहम्मद नफ़्से ज़किया ने अपनी वालिदा से आकर कहा कि “ऐ मेरी वालिदा मोहतरमा मुझसे अब अपने वालिद और चचाओं का ये हाल नही देखा जाता है, मैने इरादा किया है कि मै अपना हाथ उन लोगों के हाथो पर रख दूँ ताकि अपने अहल को आराम दे सकूँ (आप अपने आपको खलीफ़ा मन्सूर के हवाले करने की बात सोच रहे थे ) तो इनकी वालिदा क़ैदख़ाने के तरफ़ गईं और जनाब अब्दुल्लाह अल महज़ के सामने वो बातें पेश किया जो आपके बेटे इमाम मोहम्मद नफ़्से ज़किया ने आपसे कही थी, इसको सुनकर जनाब अब्दुल्लाह कहने लगे, नही ये कोई इज़्ज़त की बात नही है, बल्कि हम इसके मामले मे सब्र करेंगे, शायद अल्लाह तआला इसके हाथो भलाई का दरवाज़ा खोल दे, हम अल्लाह तआला के फ़ज़ल से कुशादगी हासिल करेंगे चाहे वो हम पर कुशादगी करे या तंगी करे और इस मामले मे सबने एक दूसरे कि मदद की!

सन् एक सौ चव्वालीस हिजरी मे ख़ानवाद-ए-हसन मुजतबा पर बहुत ज़ुल्मो सितम ढाया गया! इस साल आले हसन मुजतबा को मदीना के क़ैद ख़ाने से इराक़ के क़ैद ख़ाने मे मुन्तक़िल किया गया और इनके पाँओ मे बेड़ियाँ और गर्दनों मे तौक़ पड़े हुए थे और अबु जाफ़र मनसूर के हुक्म से इन्हें बेड़ियाँ डालने की इब्तिदा रब्ज़ह से हुई! उसने आले सैय्यदना हसन मुजतबा के साथ साथ मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह उसमानी को भी तकलीफ़ दिया जो हज़रत अब्दुल्लाह अल महज़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु के माँ जाया भाई थे और इनकी बेटी इब्राहीम बिन अब्दुल्लाह अल महज़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु को बियाही थी और थोड़े दिनों से हामला थीं! ख़लीफ़ा मन्सूर ने मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह उसमानी को बुलाकर कहा कि अगर तू मुझसे फ़रेब ना करे तो मैने तलाक़ और अताक़ की क़सम खाई है, और ये तेरी बेटी हामला है, और अगर वो अपने ख़ाविन्द से हामला हुई है तो तुझे इसके मुताल्लिक़ इल्म होगा और अगर वो किसी और से हामला हुई है तो तू दय्यूस है! हज़रत अब्दुल्लाह बिन उसमानी ने उसे ऐसा जवाब दिया जिसने उसे बुरा फ़रोख़्ताँ कर दिया, बस उसने मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह के कपड़े उतरवाए, तो उनका जिस्म चाँदी के तरह शफ़्फ़ाफ़ था, फिर मन्सूर ने अपने सामने उन्हें डेढ़ सौ कोड़े मरवाए जिनमे से तीस कोड़े उनके सर पर मारे जिनमे से एक उनके आँख पर लगा जिससे वो फूट गई! फिर उसने उन्हें क़ैद ख़ाने मे भेज दिया और वो मार की निलाहट और जिल्द के ऊपर ख़ून जम जाने से एक सियाह फ़ाम ग़ुलाम की तरह हो गए, उनको उनके माँ जाया भाई हज़रत अब्दुल्लाह अल महज़ के पहलू मे बिठा दिया गया, हज़रत मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह उसमानी ने पानी माँगा लेकिन किसी ने उन्हें मन्सूर के ख़ौफ़ से पानी पिलाने की जसारत ना किया हत्ता कि एक ख़ुरासानी ने उन्हें पानी पिलाया जो उन जल्लादों मे से एक था जो उनपर मुसल्लत किया गया था! फिर मन्सूर अपने हौंदज पर सवार हुआ और उन्हें तंग महमलों मे सवार किया गया और ये बेड़ियों मे जकड़े हुए थें और तौक़ भी पहने हुए थें! मन्सूर अपने हौंदज मे उनके पास से गुज़रा तो अब्दुल्लाह अल महज़ बिन हसन मुसन्ना बिन इमाम हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने उसे आवाज़ दी, “ऐ अबु जाफ़र मन्सूर क़सम ब ख़ुदा हमने मारकऐ बद्र मे तुम्हारे क़ैदियों से ये सुलूक़ नही किया था, जो तुम हम लोगों के साथ कर रहे हो और इस बात से मन्सूर को ज़लील कर दिया और ये बात उसे गिरआँ गुज़री और उसने उनसे ऐराज़ किया और जब वो इराक़ पहुँचे तो उन्हें हाश्मिया मे क़ैद कर दिया गया और उनमे मोहम्मद बिन इब्राहीम बिन अब्दुल्लाह अल महज़ भी थे जो बहुत ख़ूबसूरत जवान थे, लोग उनके हुस्न जमाल को देखते रहते थे, और उन्हें ज़र्द दयाबाज कहते थे! मन्सूर ने उन्हें अपने सामने बुलाया और कहा कि मै तुझे ऐसे क़त्ल करुंगा कि मैने किसी को ऐसे क़त्ल न किया होगा, फिर उन्हें दो सुतूनो के दर्मियान लटका दिया गया और उन्हें बन्द कर दिया (यानी चुन्वा दिया गया) तो उन्हें उसमे शहादत हासिल हुई! बस मन्सूर पर अल्लाह की लानत हो जिसका वो मुसतहक़ है, और आले हसन मे से बहुत से लोगों ने क़ैद ख़ाने मे शहादत का जाम नोश फ़रमाया हत्ता कि मन्सूर के मरने के बाद उन्हें क़ैद ख़ाने से रिहाई मिली! क़ैद ख़ाने मे हलाक होने वालों मे हज़रत सैय्यदना अब्दुल्लाह अल महज़ बिन इमाम हसन मुसन्ना बिन इमाम हसन अलैहिस्सलाम भी थे और इनको बान्ध कर शहीद किया गया था, और इनके साथ इनके भाई इब्राहीम अल ग़मर बिन हसन मुसन्ना और हसन मुसल्लस बिन हसन मुसन्ना भी शहीद कर दिये गएं! क़ैद ख़ाने मे से कम ही लोग क़ैद से बाहर निकल पाए, मन्सूर ने उन्हें ऐसे क़ैद ख़ाने मे रखा था कि जिसमे वो अज़ान तक ना सुन पाते थे, और उन्हें सिर्फ़ तिलावत से नमाज़ का वक़्त मालूम होता था!

अहले ख़ुरासान ने मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह उसमानी के बारे मे सिफ़ारिश भेजा तो मन्सूर ने उनके मुताल्लिक़ हुक्म दिया कि उन्हें क़त्ल करके उनका सर अहले ख़ुरासान के पास भेज दिया जाए फिर उसके हुक्म की तामील हुई!

हज़रत मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह बिन अमरू बिन उसमान ग़नी रज़िअल्लाह तआला अन्हु की माँ सैय्यदा फ़ातिमा सुग़रा बिंत सैय्यदना इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम थी (हज़रत सैय्यदा फातिमा सुग़रा की पहली शादी हज़रत सैय्यदना इमाम हसन मुसन्ना बिन इमाम हसन अलैहिस्सलाम से हुई थी) जब हज़रत सैय्यदना इमाम हसन मुसन्ना रज़िअल्लाह तआला अन्हु का विसाल हो गया तो सैय्यदा फ़ातिमा सुग़रा का दूसरा निकाह हज़रत अब्दुल्लाह बिन अमरू बिन उसमान ग़नी रज़िअल्लाह तआला अन्हु से हुआ और इसीलिये हज़रत अब्दुल्लाह अल महज़ बिन हज़रत हसन मुसन्ना और हज़रत मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह के बीच माँ जाया भाई का रिश्ता था! मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह उसमानी रज़िअल्लाहु तआला अन्हु की बेटी रूक़य्या हज़रत सैय्यदना इब्राहीम बिन सैय्यदना अब्दुल्लाह अल महज़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु की बीवी थीं!

अज़वाज व औलाद- हज़रत सैय्यदना अब्दुल्लाह अल महज़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु की ज़ौजा सैय्यदा हिंद बिन्त अबु उबैदा रज़िअल्लाह तआला अन्हा थीं जिनके शिकम से आपके पाँच फ़रज़न्द पैदा हुए यानी- (1) हज़रत सैय्यदना मोहम्मद ज़िउन्नफ़्स अज़ ज़किया रज़िअल्लाहु तआला अन्हु (जद् सादात क़ुत्बिया) (2) हज़रत सैय्यदना इब्राहीम रज़िअल्लाहु तआला अन्हु (3) हज़रत सैय्यदना मूसा अल जून रज़िअल्लाहु तआला अन्हु (जद् हज़रत मोहिउद्दीन अब्दुल क़ादिर जीलानी रहमतुल्लाह अलैह) (4) हज़रत सैय्यदना सुलैमान रज़िअल्लाहु तआला अन्हु और (5) हज़रत सैय्यदना इद्रीस रज़िअल्लाहु तआला अन्हु!

और सादात हसनी आपके चार फ़रज़न्दों से दुनिया मे मौजूद हैं यानी हज़रत इमाम मोहम्मद नफ़्से ज़किया, हज़रत मूसा अल जून, हज़रत सुलैमान और हज़रत इद्रीस रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा से! हज़रत इब्राहीम रज़िअल्लाह तआला अन्हु के एक फ़रज़न्द जिनका नाम मोहम्मद रज़िअल्लाह तआला अन्हु था और जिनको मन्सूर ने बड़ी बेरहमी से क़त्ल करवा दिया था (जिसका ज़िक्र पहले हो चुका है)! (तारीख़ इब्ने ख़लदून अल बिदाया वन निहाया, तारीख़ इब्ने क़सीर अल कामिल फ़ित्तारीख़, ख़ानदाने मुस्तफा)

Hazrat sarkar Abdullah Al Mahad r.a jo Shaikh e Bani hashim k Naam se jaane jaate hai Aap bhi be misl o misaal the Aur aapko mahaz is liye Kaha jata hai ki aap Bahut khalisun nasab the najeeb fatmi sadaat the Aur aap bhi apne waqt k peshwa aur Sardar the jinki tazeem har Adna o aala bakhoobi Baja laata tha. Aapko Iraq k ek qhaid khane me shahadat naseeb hui.

Hasan Musanna was married to Fatima Sugrah; daughter of Hazrat Husain bin Ali.
Hasan Musanna had three sons. The eldest one was Abdullah al Muhiz.He had given the title ‘Shaykhul Itrah’. He led a mutiny against the regime of the Abbasid Khalifa, Abu Jafar al Mansoor

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