
Silsila-e-Shah-e-Wilayat | Hazrat Syed Hussain Sharfuddin Shahwilayat Naqvi R.A



ग़ज़वा नज्द
ग़ज़वा बनी नज़ीर में किसी क़ुरबानी के बग़ैर मुसलमानों को शानदार कामियाबी हासिल हुईं | इससे मदीने में मुसलमानों की सत्ता मज़बूत हो गई और मुनाफ़िक़ों पर निराशा छा गई। अब उन्हें कुछ खुलकर करने की जुर्रात नहीं हो रही थी ।
इस तरह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उन बहुओं की खबर लेने के लिए यकसू हो गए, जिन्होंने उहुद के बाद ही से मुसलमानों को बड़ी कठिनाइयों में उलझा रखा था और बड़े ज़ालिमाना तरीक़े से अल्लाह की दावत देने वालों पर हपले कर करके उन्हें मौत के घाट उतार चुके थे और अब उनकी जुर्रत इस हद तक बढ़ चुकी थी कि वे मदीने पर चढ़ाई की सोच रहे थे ।
चुनांचे ग़ज़वा बनी नज़ीर से छूटने के बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अभी इन झूठों को सिखाने के लिए उठे भी न थे कि आपको सूचना मिली कि बनू ग़तफ़ान के दो क़बीले बनू मुहारिब और बनू सालबा लड़ाई के लिए बहुओं और अरब के देहातियों के लोगों को जमा कर रहे हैं।
इस ख़बर के मिलते ही नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नज्द पर धावा बोलने का फ़ैसला किया और नज्द के रेगिस्तानों में दूर तक घुसते चले गए, जिसका मक़सद यह था कि इन संगदिल बहुओं पर भय छा जाए और दोबारा मुसलमानों के खिलाफ़ पहले जैसी संगीन कार्रवाइयों को दोहराने की जुर्रत न करें।
इधर उद्दंड बहू, जो लूटमार की तैयारियां कर रहे थे, मुसलमानों के इस यकायकी धावे की खबर सुनते ही डरकर भाग खड़े हुए और पहाड़ो की चोटियों में जा दुबके ।
1. लेखक अब्दुर्रज़्ज़ाक़ 8/358-360, हदीस 9733, सुनन अबी दाऊद किताबुल खिराज वल फै वल आरा बाब फ्री ख़बरुन नज़ीर 2/15
मुसलमानों ने लुटेरे क़बीलों पर अपना रौब व दबदबा कायम करने के बाद अम्न व अमान के साथ वापस मदीने की राह ली।
सीरत लिखने वालों ने इस सिलसिले में एक निश्चित ग़ज़वे का नाम लिया है, जो रबीउल आखिर या जुमादल ऊला सन् 04 हि० में नज्द भू-भाग पर पेश आरया था और वे इसी ग़ज़वा को ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ क़रार देते हैं।
जहां तक तथ्यों और प्रमाणों का ताल्लुक़ है, तो इसमें सन्देह नहीं कि इन दिनों में नज्द के अन्दर एक ग़ज़वा पेश आया था, क्योंकि मदीना के हालात ही कुछ ऐसे थे । अबू सुफ़ियान ने उहुद की लड़ाई से वापसी के वक़्त अगले साल बद्र के मैदान में लड़ाई के लिए ललकारा था और जिसे मुसलमानों ने मंजूर कर लिया था। अब उसका वक़्त क़रीब आ रहा था और सामरिक दृष्टि से यह बात किसी तरह मुनासिब न थी कि बहुओं और अरब देहातियों को उनकी सरकशी और उद्दंडता पर क़ायम छोड़कर बद्र जैसी ज़ोरदार लड़ाई में जाने के लिए मदीना खाली कर दिया जाए, बल्कि ज़रूरी था कि बद्र के मैदान में जिस भयानक लड़ाई की उम्मीद थी, उसके लिए निकलने से पहले, इन बहुओं की उछल-कूद पर ऐसी चोट लगाई जाए कि उन्हें मदीना का रुख करने की जुर्रत न हो।
बाक़ी रही यह बात कि यही ग़ज़वा जो रबीउल आखर या जुमादल ऊला सन् 04 हि० में पेश आया था, ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ था, हमारी खोज के मुताबिक़ सही नहीं, क्योंकि ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ में हज़रत अबू हुरैरह रजि० और हज़रत अबू मूसा अशअरी रज़ि० मौजूद थे और अबू हुरैरह रज़ि० ख़ैबर की लड़ाई से कुछ दिन पहले इस्लाम लाए थे।
इसी तरह हज़रत अबू मूसा अशअरी रज़ि० मुसलमान होकर यमन से रवाना हुए तो उनकी सवारी साहिल हब्शा से जा लगी थी और वह हब्शा से उस वक़्त वापस आए थे जब नबी सल्ल० ख़ैबर में तशरीफ़ रखते थे। इस तरह वह पहली बार खैबर ही के अन्दर नबी सल्ल० की खिदमत में हाज़िर हो सके थे। पस ज़रूरी है कि ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ ग़ज़वा खैबर के बाद पेश आया हो ।
सन् 04 हि० के एक अर्से के बाद ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ के पेश आने की एक निशानी यह भी है कि नबी सल्ल० ने ग़ज़वा ज़ातुर्रिक़ाअ में खौफ़ की नमाज़’
1. लड़ाई की हालत में पढ़ी गई नमाज़ को ‘खौफ की नमाज़’ कहते हैं, जिसका एक तरीका यह है कि आधी फ़ौज हथियार बन्द होकर इमाम के पीछे नमाज़ पढ़े, बाक़ी आधी फ़ौज हथियार बांधे दुश्मन पर नज़र रखे। एक रक्अत के बाद यह फ़ौज इमाम
पढ़ी थी और ख़ौफ़ की नमाज़ पहले पहल ग़ज़वा अस्फ़ान में पढ़ी गई और इसमें कोई मतभेद नहीं कि ग़ज़वा अस्फ़ान का ज़माना राज़वा खंदक़ के भी बाद का है, जबकि ग़ज़वा खंदक़ का ज़माना सन् 05 हि० के आखिर का है।
सच तो यह है कि ग़ज़वा अस्फ़ान हुदैबिया के सफ़र की एक छोटी-सी घटना है और हुदैबिया का सफ़र सन् 06 हि० के आखिर में हुआ था, जिससे वापस आकर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ख़ैबर का रास्ता लिया था, इसलिए इस दृष्टि से भी ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ का ज़माना ख़ैबर के ज़माने के बाद का ही साबित होता है।

बारह सौ साल से ज्यादा हो गए ट्यूनीशिया के शहर कैरवान में मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह फहरी नाम के एक व्यापारी रहते थे वह शहर के प्रतिष्ठित लोगों में से थे नेक लोगों में शुमार होता था शिक्षा दौलत और नेकी सभी गुण उन में थे फातेहीन के खानदान से थे उन के पूर्वजों में से उकबा बिन नाफे ने इस कैरवान शहर को बसाया था
उन की दो छोटी और प्यारी बच्चियां थीं नाम था फातिमा और मरियम
पड़ोसी देश मोरक्को मे इदरीसी सल्तनत कायम हुई थी जिस की शान व शौकत के चर्चे ज़ोरों पर थे वहां के सुलतान इदरीस सानी एक नया शहर बसा रहे थे जिस का नाम फास (इंग्लिश में Fez) था और इसे वह अपनी राजधानी बनाना चाहते थे
मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह फहरी ने नए शहर के चर्चे सुने देखने का शौक हुआ वहाँ गए शहर पसंद आ गया इस नए फास शहर में आबाद होने का इरादा कर लिया कैरवान शहर से कारोबार समेटा और फास में व्यापार फैला लिया चूंकि कैरवान शहर छोड़ कर आए थे इस लिए नए शहर में इन के घराने को करवीइन कहा जाने लगा
दोनों बच्चियां बड़ी हो रही थी दोनों की अपने ही जैसे व्यापारिक खानदानों में शादी कर दी
लेकिन कुदरत को कुछ और मंजूर था बेटियों की शादी के कुछ वर्षों बाद उन का इंतकाल हो गया उन की जायदाद बेटियों के हिस्से में आई बेटियां पहले ही मालदार घरानों में थीं किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी वह वालिद की विरासत को किसी अच्छे और नेक काम में लगाना चाहती थीं
अल्लाह का करना ऐसा हुआ कि मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह फहरी के इंतकाल के कुछ महीने बाद उन के बड़े दामाद का भी इंतकाल हो गया इस तरह बड़ी बेटी फातिमा पर दोहरा गम आ पड़ा वालिद के साथ साथ शौहर का गम
लेकिन दोनों बच्चियों की तरबियत एक नेक और व्यापारी बाप ने की थी दोनों पर उन का प्रभाव था बेटी फातिमा ने अपने शौहर का कारोबार बखूबी संभाल लिया
फातिमा ने दूसरी शादी नहीं की खुद की औलाद नहीं थी इस लिए गरीब और यतीम बच्चों को पालने लगीं यहाँ तक कि वह उम्मुल बनीन कही जाने लगीं यानी ढेर सारे बच्चों की माँ
दोनों बहनों ने अपने वालिद से मिले पैसे से एक एक मस्जिद और मदरसा बनाया फातिमा के बनाए हुए मदरसा का नाम क़रवीन और मरियम के बनाए हुए मदरसा का नाम उंदलुस था
1200 साल गुजर गए बनाने वालियों का खुलूस था या कोई और बात थी आज भी दोनों मदरसे मौजूद हैं बस क़रवीन युनिवर्सिटी बन चुकी है और उंदलुस एक कालेज है
क़रवीन युनिवर्सिटी को दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी युनिवर्सिटी कहा जाता है फातिमा जो उम्मुल बनीन फातिमा फहरी के नाम से मशहूर हुई उन का नाम इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गया आज हम में से तकरीबन हर आदमी उन का नाम जानता है उन की इज्जत व एहतराम करता है
यह मदरसा जो आगे चलकर युनिवर्सिटी बना इस की स्थापना सन 859 ईस्वी में हुई और सन 878 में फातिमा फहरी का इंतकाल हो गया
फातिमा फहरी और उन की बहन मरियम फहरी जैसी बहुत सी खवातीन हमारे इस्लामिक हिस्ट्री का हिस्सा हैं हमें कभी-कभी उन्हें याद करते रहना चाहिए

