
Khutba e Hajja-Tul-Wida Or Shan Mola Ali a.s | New Full Byan 2026 | Syed Mohsin Ali gelani



✨ आलम-ए-अरवाह (आत्माओं का संसार) की सूफ़ीवाद और अध्यात्म में शिक्षाएँ
आत्माओं के संसार (आलम-ए-अरवाह) की अवधारणा सूफ़ीवाद और अध्यात्म में मौलिक महत्व रखती है। सूफ़ियों और ज्ञानियों (अहल-ए-मआरफ़त) के अनुसार, मनुष्य की मूल वास्तविकता उसकी आत्मा है, और दुनिया में उसका قیام एक अस्थायी यात्रा की हैसियत रखता है। सूफ़ीवाद और आध्यात्मिक शिक्षाओं में आलम-ए-अरवाह को एक ऐसी अलौकिक दुनिया माना जाता है जहाँ आत्माएँ अपने मूल स्थान पर मौजूद होती हैं, और जहाँ से उन्हें दुनिया में भेजा जाता है।
1. सूफ़ीवाद में आलम-ए-अरवाह की वास्तविकता
1.1 आत्मा की अनादि वास्तविकता (अज़ली हक़ीक़त)
सूफ़ीवाद के अनुसार, आत्मा को “नूर-ए-इलाही” (ईश्वरीय प्रकाश) से बनाया गया है और उसकी मूल मंज़िल क़ुर्ब-ए-इलाही (ईश्वर का सामिप्य) है। जब आत्मा आलम-ए-अरवाह में थी, तो वह अल्लाह के निकट थी, लेकिन दुनिया में आकर वह भौतिक इच्छाओं में उलझकर अपनी असलियत को भूल जाती है
क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं
“وَنَفَخْتُ فِيهِ مِن رُّوحِي” (ص: 72)
अर्थात: “और मैंने उसमें अपनी रूह (आत्मा) फूँकी”, जिससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य का मूल तत्व आध्यात्मिक है, न कि भौतिक
हदीस में आता है
“کُنتُ كَنزًا مَخْفِيًّا فَأَحْبَبْتُ أَنْ أُعْرَفَ، فَخَلَقْتُ الْخَلْقَ لِكَيْ أُعْرَفَ”
अर्थात: “मैं एक छिपा हुआ ख़ज़ाना था, मैंने चाहा कि पहचाना जाऊँ, अतः मैंने सृष्टि को पैदा किया ताकि वह मुझे पहचाने
यह हदीस सूफ़ीवाद में आध्यात्मिक वास्तविकता की नींव है, जिसका मतलब यह है कि आत्मा का उद्देश्य अल्लाह की मआरफ़त (पहचान/ज्ञान) प्राप्त करना है
2. आलम-ए-अरवाह में आत्माओं का समझौता (अहद-ए-अलस्त)
सूफ़ीवाद में “अहद-ए-अलस्त” (Alast Covenant) को बहुत महत्व प्राप्त है।
क़ुरआन में ज़िक्र है
“وَإِذْ أَخَذَ رَبُّكَ مِنْ بَنِي آدَمَ مِنْ ظُهُورِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ وَأَشْهَدَهُمْ عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ ۖ أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ ۖ قَالُوا بَلَىٰ ۛ شَهِدْنَا ۛ ” (अल-अअराफ़: 172)
अर्थात: “और जब तुम्हारे रब ने बनी आदम की पुश्तों से उनकी औलाद को निकाला और उनसे उनकी अपनी ज़ात पर गवाही ली, (फ़रमाया) क्या मैं तुम्हारा रब नहीं? सब ने कहा: क्यों नहीं, हम गवाह हैं

सूफ़ीवाद में इसकी व्याख्या
आलम-ए-अरवाह में सब आत्माओं ने अल्लाह को पहचान लिया था, लेकिन दुनिया में आकर अधिकतर लोग भूल गए
सूफ़ियों का कहना है कि सूफ़ीवाद का मूल यही है कि इंसान अपनी इस भूली हुई वास्तविकता को दोबारा पहचान ले और अल्लाह से वही संबंध स्थापित करे जो आलम-ए-अरवाह में था
3. आत्मा की दुनिया में वापसी (सैर इला अल्लाह और फ़ना फ़ी अल्लाह)
सूफ़ीवाद में आध्यात्मिक उन्नति के कई चरण होते हैं, जिन्हें “सुलूक” और “मक़ामात” कहा जाता है। इन चरणों का मूल उद्देश्य यह होता है कि आत्मा को उसके मूल वतन यानी अल्लाह के सामिप्य तक पहुँचाया जाए
सूफ़ीवाद में आध्यात्मिक यात्रा के चरण
तौबा (पश्चाताप): गुनाहों से बचना और पवित्रता अपनाना
ज़ुह्द (वैराग्य): दुनियावी इच्छाओं को त्यागना
मआरफ़त (पहचान): अल्लाह को पहचानना
मुहब्बत (प्रेम): अल्लाह से इश्क़ में डूब जाना
फ़ना फ़ी अल्लाह (ईश्वर में विलीन): अपनी ज़ात (अस्तित्व) को मिटाकर अल्लाह में फ़ना हो जाना
यही यात्रा असल में आलम-ए-अरवाह में आत्मा के मूल स्थान की ओर वापसी है। सूफ़ियों का मानना है कि जो व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक यात्रा में सफल हो जाता है, वह मरने से पहले ही वास्तव में “वापस” चला जाता है, यानी वह दुनिया में रहकर भी अल्लाह के क़ुर्ब (सामिप्य) में होता है
4. बातिनी (आंतरिक) ज्ञान में आलम-ए-अरवाह की शिक्षाएँ
4.1 कश्फ़ (आवरण हटना) और मुशाहिदा (दर्शन)
सूफ़ियों के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति ज़िक्र (सुमिरन) व इबादत, मुजाहिदा (संघर्ष) और रियाज़त (अभ्यास) के ज़रिए आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर ले, तो उस पर आलम-ए-अरवाह के दरवाज़े खुल सकते हैं। इस कैफ़ियत को कश्फ़ कहा जाता है
कुछ वली अल्लाह (ईश्वर के मित्र) फ़रमाते हैं कि उन्होंने अरवाह-ए-मुक़द्दसा (यानी पैग़म्बरों और वलियों की आत्माओं) से मुलाक़ातें कीं
कुछ सूफ़ियों का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से उन्नति कर ले, तो उसे अपनी आत्मा की मूल वास्तविकता नज़र आ जाती है
4.2 ख़्वाब (स्वप्न), इल्हाम (ईश्वरीय प्रेरणा) और आध्यात्मिक फ़ैज़ (लाभ)
सूफ़ियों के अनुसार कुछ ख़्वाब दरअसल आलम-ए-अरवाह की झलक होते हैं
कुछ ख़ास व्यक्तियों को इल्हाम के ज़रिए आलम-ए-अरवाह की कुछ वास्तविकताएँ दिखाई जाती हैं
5. आलम-ए-अरवाह, मृत्यु और बरज़ख़ (मध्यलोक)
सूफ़ीवाद में मृत्यु को विसाल (मिलन) कहा जाता है, यानी अल्लाह से मुलाक़ात।
मौलाना रूमीؒ फ़रमाते हैं
जब मैं मर जाऊँ, तो यह मत समझना कि मैं मर गया हूँ, बल्कि मैं अपनी असल की तरफ वापस चला गया हूँ
5.1 आलम-ए-बरज़ख़ की वास्तविकता
सूफ़ीवाद में यह भी माना जाता है कि बरज़ख़ (मध्यलोक) में आत्माएँ एक-दूसरे से मिलती हैं। नेक आत्माओं को नूरानी दुनिया में रखा जाता है, जबकि बुरे लोगों की आत्माएँ कष्ट में مبتلا होती हैं
निष्कर्ष
सूफ़ीवाद और अध्यात्म में आलम-ए-अरवाह को इंसान की मूल वास्तविकता समझा जाता है। सूफ़ी शिक्षाओं के अनुसार:
इंसान की आत्मा आलम-ए-अरवाह से आई है और उसे वापस अल्लाह के पास जाना है
दुनियावी ज़िंदगी एक परीक्षा है कि क्या आत्मा अपनी असलियत को पहचानती है या नहीं
सूफ़ीवाद का उद्देश्य यही है कि इंसान अपनी आत्मा को पहचानकर अल्लाह की मआरफ़त (पहचान/ज्ञान) प्राप्त करे।
मरने के बाद मूल वास्तविकता खुल जाती है, लेकिन जो लोग आध्यात्मिक रूप से जागृत हो जाते हैं, वे मरने से पहले ही वास्तविकता को पा लेते हैं
इसलिए, सूफ़ी कहते हैं:
“مَن عَرَفَ نَفسَهُ فَقَد عَرَفَ رَبَّهُ”
अर्थात: “जिसने अपने नफ़्स (स्वयं) को पहचान लिया, उसने अपने रब (परमेश्वर) को पहचान लिया
बातिनी (आंतरिक) ज्ञान में आलम-ए-अरवाह की शिक्षाएँ
बातिनी ज्ञान सूफ़ीवाद, अध्यात्म और पराभौतिक (Metaphysical) वास्तविकताओं पर गहरी नज़र रखते हैं। इन علوم में आलम-ए-अरवाह को एक अलौकिक वास्तविकता समझा जाता है जहाँ से इंसान की आत्मा आती है और जहाँ वह वापस जाती है। बातिनी ज्ञान में आलम-ए-अरवाह की शिक्षाएँ निम्नलिखित बिंदुओं पर आधारित हैं:
1. आलम-ए-अरवाह की वास्तविकता और इसका बातिनी ज्ञान से संबंध
1.1 आत्मा की अनादि वास्तविकता
बातिनी ज्ञान में आत्मा को एक ऐसी मख़लूक़ (सृष्टि) समझा जाता है जो नूरानी लतीफ़ा (सूक्ष्म प्रकाशमय तत्व) है और इसका संबंध सीधे आलम-ए-मलकूत (ग़ैबी दुनिया/देवलोक) से है। शरीर एक अस्थायी लिबास (पोशाक) है, जबकि आत्मा मूल वास्तविकता है
बातिनी शिक्षाओं के अनुसार
आत्मा का शरीर से संबंध महज़ एक अनुभव है, जबकि इसका मूल वतन आलम-ए-अरवाह है।
सूफ़ियों के नज़दीक यह दुनिया एक ख़्वाब (स्वप्न) की मानिंद है जबकि असली जागृति आलम-ए-अरवाह में है।
2. अहद-ए-अलस्त और आध्यात्मिक जागृति
2.1 अहद-ए-अलस्त का बातिनी अर्थ
बातिनी ज्ञान में अहद-ए-अलस्त को आध्यात्मिक जागृति (Spiritual Awakening) की नींव माना जाता है।
क़ुरआन में ज़िक्र है
“أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ ۖ قَالُوا بَلَىٰ ۛ ” (अल-अअराफ़: 172)
(क्या मैं तुम्हारा रब नहीं? सब ने कहा: क्यों नहीं, हम गवाह हैं)
बातिनी ज्ञान में इसका मतलब यह लिया जाता है कि इंसान के बातिन (आंतरिक मन) में एक आध्यात्मिक याददाश्त मौजूद है, लेकिन दुनिया में आकर वह इसे भूल जाता है।
जब कोई सूफ़ी बातिनी सुलूक (आंतरिक यात्रा) अपनाता है, तो उस पर यह वास्तविकता दोबारा आश्वस्त हो जाती है।
3. आध्यात्मिक यात्रा और आलम-ए-अरवाह का मुशाहिदा (दर्शन)
3.1 मुराक़बा (ध्यान) और कश्फ़ में आलम-ए-अरवाह का ज़हूर (प्रकट होना)
बातिनी ज्ञान के विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति लगातार ज़िक्र, मुराक़बा और तज़्किया-ए-नफ़्स (आत्मा की शुद्धि) करे तो उस पर आलम-ए-अरवाह के पर्दे हट सकते हैं
कुछ सूफ़ी आलम-ए-अरवाह की ज़ियारत (दर्शन) करते हैं
कुछ अहल-ए-कश्फ़ (जिन्हें आंतरिक ज्ञान प्राप्त हो) को आध्यात्मिक दुनिया के तथ्य दिखाई देते हैं
3.2 आध्यात्मिक यात्रा के चरण
मुकाशफ़ा: तथ्यों का बाहरी इंद्रियों से परे तरीके से दर्शन करना
मुशाहिदा: आलम-ए-अरवाह में प्रवेश करने का अनुभव।
मुलाक़ात-ए-अरवाह: नेक आत्माओं से बातचीत करना, जैसे वली अल्लाह की आत्माओं से लाभ (फ़ैज़) लेना।
वही या इल्हाम: ग़ैबी (अदृश्य) ज्ञान का आत्मा पर प्रकट होना
4. बातिनी ज्ञान में आलम-ए-अरवाह के रहस्य
4.1 आत्मा का विकास (तकाम्ल-ए-रूहानी)
बातिनी ज्ञान में यह माना जाता है कि हर आत्मा विभिन्न स्तरों से गुज़रती है
रूह-ए-अम्मारह: (नफ़्स (इच्छा) की ग़ुलामी में)
रूह-ए-लव्वामा: (नफ़्स से संघर्ष में)
रूह-ए-मुल्हामा: (इल्हाम प्राप्त करने वाली आत्मा)
रूह-ए-मुतमइन्ना: (अल्लाह के सामिप्य में सुकून पाने वाली आत्मा)
रूह-ए-राज़िया व मरज़िया: (अल्लाह की रज़ा (इच्छा) में फ़ना होने वाली आत्मा)
4.2 आलम-ए-बरज़ख़ की वास्तविकता
बातिनी ज्ञान में आलम-ए-बरज़ख़ को आलम-ए-अरवाह का मध्यवर्ती स्थान समझा जाता है, जहाँ आत्मा अपनी शुद्धि के चरणों से गुज़रती है
नेक आत्माएँ नूरानी (प्रकाशमय) आलमों (लोकों) में रहती हैं
गुनाहगार आत्माएँ अंधेरे आलमों में ठहरती हैं
5. ख़्वाब, कश्फ़, और आध्यात्मिक ارتباط (संबंध)
5.1 ख़्वाब में आलम-ए-अरवाह की झलक
बातिनी ज्ञान के विशेषज्ञ कहते हैं कि कुछ ख़्वाब दरअसल आलम-ए-अरवाह का मुशाहिदा होते हैं
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया
“नींद में आत्मा आलम-ए-अरवाह की तरफ परवाज़ (उड़ान) करती है और कभी-कभी ग़ैबी तथ्य देखती है
5.2 आत्माओं से संपर्क (आध्यात्मिक मजलिसें)
कुछ सूफ़िया-ए-किराम मुराक़बा में आलम-ए-अरवाह में वलियों व पैग़म्बरों की आत्माओं से फ़ैज़ (लाभ/आशीर्वाद) प्राप्त करते हैं
आध्यात्मिक उस्ताद (मुर्शिद) अपने मुरीद (शिष्य) की आत्मा को आलम-ए-अरवाह से जोड़ने में मदद करता है
6. हक़ीक़त-ए-रूह (आत्मा की वास्तविकता) और फ़ना-ए-ज़ात (स्वयं का विलय)
6.1 फ़ना फ़ी अल्लाह और बक़ा बिलल्लाह
बातिनी ज्ञान में आध्यात्मिक उन्नति का सबसे उच्चतम स्तर “फ़ना-ए-ज़ात” है, यानी आध्यात्मिक रूप से अल्लाह के साथ जुड़ जाना
फ़ना का मतलब है कि आत्मा अपनी ख़ुदी (अहंकार) ख़त्म करके आलम-ए-अरवाह में अपनी मूल वास्तविकता को पहचान ले
मौलाना रूमीؒ फ़रमाते हैं
“जब मैं मरूँगा, तो मत समझना कि मैं फ़ना हो गया, बल्कि मैं अपने असल वतन की तरफ लौट जाऊँगा।”
निष्कर्ष
बातिनी ज्ञान में आलम-ए-अरवाह को इंसान के वास्तविक स्थान का केंद्र समझा जाता है। इसकी शिक्षाओं के अनुसार
आत्मा का असली वतन आलम-ए-अरवाह है, दुनिया अस्थायी है
अहद-ए-अलस्त हर आत्मा के बातिन (आंतरिक मन) में सुरक्षित है, लेकिन दुनिया में आकर वह उसे भूल जाती है।
बातिनी ज्ञान का उद्देश्य यही है कि इंसान इस गुमशुदा हक़ीक़त को दोबारा याद करे
ज़िक्र, मुराक़बा, और तज़्किया-ए-नफ़्स के ज़रिए आलम-ए-अरवाह के पर्दे हट सकते हैं
मरने के बाद आत्मा आलम-ए-बरज़ख़ में प्रवेश कर जाती है, और अपनी मूल वास्तविकता के और क़रीब हो जाती है।
यही वजह है कि बातिनी ज्ञान में सबसे अहम शिक्षा आत्मा को उसके मूल स्थान तक वापस पहुँचाने की कोशिश है, जिसे सैर इला अल्लाह कहा जाता है
आलम-ए-अरवाह के संबंध में विज्ञान की राय
विज्ञान का मूल सिद्धांत यह है कि वह अवलोकन (Observation), प्रयोग (Experimentation), और प्रमाण (Evidence) पर विश्वास रखता है। चूँकि आलम-ए-अरवाह एक पराभौतिक (Metaphysical) अवधारणा है, इसलिए विज्ञान सीधे तौर पर इसकी पुष्टि या खंडन नहीं कर सकता। हालाँकि, वैज्ञानिकों ने चेतना (Consciousness), मृत्यु के बाद जीवन (Afterlife), और गैर-भौतिक अस्तित्व (Non-Material Existence) पर अनुसंधान किया है, जो कुछ हद तक आलम-ए-अरवाह के विचार से जुड़े हुए विषय हैं।
1. चेतना और आत्मा के अस्तित्व पर वैज्ञानिक सिद्धांत
1.1 चेतना (Consciousness) का रहस्य
विज्ञान के अनुसार, चेतना क्या है? यह कहाँ से आती है? क्या यह शारीरिक मस्तिष्क का परिणाम है या किसी और चीज़ का? यह एक रहस्य (Mystery) है जिस पर अभी तक कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकला है।
न्यूरोसाइंस (Neuroscience) का अनुसंधान:
न्यूरोसाइंस का कहना है कि चेतना का संबंध मस्तिष्क की गतिविधियों से है और जब मस्तिष्क मर जाता है तो चेतना भी समाप्त हो जाती है
लेकिन कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि चेतना एक अलग इकाई हो सकती है, जो शरीर से स्वतंत्र भी मौजूद रह सकती है, जिससे आत्मा के अस्तित्व की ओर संकेत मिलता है।
क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) और चेतना:
कुछ सिद्धांत, जैसे क्वांटम मैकेनिकल थ्योरीज़ ऑफ़ कॉन्शियसनेस, यह बताते हैं कि चेतना क्वांटम स्तर पर एक अलग ऊर्जा या वास्तविकता हो सकती है जो मृत्यु के बाद भी बाक़ी रह सकती है
2. आसन्न-मृत्यु अनुभव (Near-Death Experiences – NDEs) पर अनुसंधान
बहुत से लोग जो नैदानिक मृत्यु (Clinical Death) के करीब पहुँच चुके हैं, वे ऐसे आध्यात्मिक और अलौकिक अनुभवों की सूचना देते हैं जिन्हें “आसन्न-मृत्यु अनुभव” (NDEs) कहा जाता है
2.1 आसन्न-मृत्यु अनुभवों में सामान्य अवलोकन
प्रकाश की एक सुरंग में प्रवेश करना।
अपने शरीर को बाहर से देखना (Out-of-Body Experience – OBE)
मृत रिश्तेदारों या आध्यात्मिक हस्तियों से मुलाक़ात
किसी “दिव्य प्रकाश” या “ईश्वरीय हस्ती” को देखना
शरीर में वापस आ जाने का एहसास
वैज्ञानिक अनुसंधान
डॉ. रेमंड मूडी (Raymond Moody) ने अपनी किताब Life After Life में हज़ारों मरीज़ों के NDEs का विश्लेषण किया और बताया कि ऐसे अनुभव केवल एक मस्तिष्क विकार नहीं हो सकते, बल्कि कुछ ज़्यादा गहरी वास्तविकता के प्रतीक हैं
डॉ. सैम पारनिया (Sam Parnia) ने मृत्यु के बाद चेतना की उपस्थिति पर अनुसंधान किया और यह खोज की कि कुछ मरीज़ जिनके मस्तिष्क के कार्य समाप्त हो चुके थे, वे बाद में अपने वातावरण के बारे में सही जानकारी देने में सक्षम थे
यह अनुसंधान आलम-ए-अरवाह के अस्तित्व को साबित नहीं करते, लेकिन यह संकेत ज़रूर देते हैं कि चेतना मृत्यु के बाद भी किसी न किसी रूप में मौजूद रह सकती है
3. क्वांटम भौतिकी और आत्मा के अस्तित्व पर सिद्धांत
3.1 क्वांटम बायो-सेंट्रिज़्म (Quantum Biocentrism) डॉ. रॉबर्ट लैंज़ा
डॉ. रॉबर्ट लैंज़ा का सिद्धांत “बायो-सेंट्रिज़्म” यह कहता है कि जीवन और चेतना वास्तविकता की मूल नींव हैं, न कि पदार्थ (Matter)
उनके अनुसार, चेतना एक क्वांटम घटना (Quantum Phenomenon) हो सकती है जो शारीरिक शरीर के मरने के बाद भी किसी और आयाम (Dimension) में जारी रह सकती है
इस सिद्धांत के अनुसार, मृत्यु एक “समाप्ति” नहीं, बल्कि एक “संक्रमण” हो सकती है, जो आत्मा के आलम-ए-अरवाह में जाने के विचार के समान है
4. विज्ञान और आध्यात्मिक सिद्धांतों का तुलनात्मक अध्ययन
सूफ़ीवाद और अध्यात्म | विज्ञान
आत्मा एक गैर-भौतिक इकाई है जो शरीर से स्वतंत्र हो सकती है। | चेतना के गैर-भौतिक या क्वांटम होने पर अनुसंधान जारी है
मृत्यु के बाद आत्मा आलम-ए-अरवाह में चली जाती है
NDEs में मृत्यु के बाद जीवन के संकेत मिलते हैं
शारीरिक दुनिया एक नश्वर वास्तविकता है, जबकि मूल वास्तविकता आध्यात्मिक दुनिया है
कुछ क्वांटम सिद्धांत बताते हैं कि चेतना किसी और आयाम में जारी रह सकती है
आध्यात्मिक मुकाशफ़ा और मुराक़बा के ज़रिए इंसान आलम-ए-अरवाह से जुड़ सकता है
विज्ञान ध्यान (Meditation) के प्रभावों को स्वीकार करता है, लेकिन आलम-ए-अरवाह के अस्तित्व पर विश्वास नहीं रखता
निष्कर्ष: क्या विज्ञान आलम-ए-अरवाह को स्वीकार करता है
विज्ञान आलम-ए-अरवाह के विचार को सीधे तौर पर साबित नहीं कर सकता, क्योंकि यह अवलोकन और प्रयोग से परे है
हालाँकि, चेतना, NDEs, और क्वांटम यांत्रिकी पर आधुनिक अनुसंधान यह संकेत देते हैं कि मृत्यु के बाद भी किसी न किसी स्तर पर चेतना का अस्तित्व बरकरार रह सकता है
यह संभव है कि भविष्य में विज्ञान ऐसे प्रमाण खोज ले जो आध्यात्मिक दुनिया और आलम-ए-अरवाह की वास्तविकता को और बेहतर तरीके से समझा सकें
अंतिम रूप से, विज्ञान और अध्यात्म में इस विषय पर एक “पुल” बनाने की कोशिश जारी है, लेकिन अभी तक कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकला है
नोट: विज्ञान किसी चीज़ को माने या न माने, एक मुसलमान आलम-ए-अरवाह को ज़रूर मानता है





*22 Rajab Ko Hazrat Imaam Jafar Sadiq Alahis Salam Ke Koonde Ki Niyaz Ko Shiao Ka Tarika Batane Wale Hazraat Zara Gour Farmaye* 👇🏻
*1. Muhaddis e Aazam Pakistan Shaikh ul Hadees Hazrat Allama Muhammad Sardar Ahmad Sahab Farmate Hain :-* Hazrat Imaam Jafar Sadiq Ki Fatiha Ke Liye 22 Rajab Ko Koonde Bhi Sharan Jayaz wa Khair o Barkat Hain, Mukhalifeen e Ahle Sunnat Isko Bila Daleel Bidat o Haram Qaraar Dete Hain.
📚 *Reference* 📚
Koondo Ki Fazilat Ba Jawab Koondo Ki Haqiqat, Safa 7, 8.
Hazrat Molana Hasan Ali Razvi Barelvi Sahab.
*2. Aameer e Ahle Sunnat Mufti e Pakistan Hazrat Allama Abul Barkaat Sayyed Ahmad Qadri Razvi Rehmatullah Alaih Farmate Hain :-* Gyarvi Sharif, Shab e Bara’at, Urs o Chehlum Ki Tarah 22 Rajab ul Murajjab Ko Hazrat Imaam Jafar Sadiq Ki Niyaaz Ke Liye Koonde Bharna Bhi Ahle Sunnat Ke Mamulaat Me Se Hain Aur Iske Jawaz Ke Wahi Dala’il Hain Jo Fatiha Esale Sawab Wagera Ke Hain.
📚 *Reference* 📚
Koondo Ki Fazilat Ba Jawab Koondo Ki Haqiqat, Safa 8.
*3. Hakeem ul Ummat Muhaqqiq e Ahle Sunnat Hazrat Molana Mufti Ahmad Yaar Khan Naeemi Farmate Hain :-* Rajab Sharif Ke Mahine Ki 22 Tarikh Ko U.P Me Koonde Hote Hain Yani Naaye Koonde Mangaye Jaate Hain Aur Sawa Sair Maida Sawa Paao Shakkar Sawa Paao Ghee Ki Pooriya Bana Kar Hazrat Imaam Jafar Sadiq Ki Fatiha Karte Hain, 22wi Rajab Ko Hazrat Imaam Jafar Sadiq Ki Fatiha Karne Se Bhut Adi Hui Musibate Tal Jati Hain.
📚 *Reference* 📚
1. Islami Zindagi, Safa 69, 127.
2. Koonde Ki Fazilat Ba Jawab Koondo Ki Haqiqat, Safa 8, 9.
*4. Makhdoom e Ahle Sunnat Allama Abu Dawood Hazrat Molana Alhaaj Muhammad Sadiq (Ameer e Jamaat Raza e Mustufa Gujranwala) Farmate Hain :-* Sayyedna Imaam Jafar Sadiq Ki Yaad Me 22 Rajab Ka Khatam Sharif wa Isale Sawab Ahle Sunnat Wal Jamaat Me Mamool wa Maroof Hain, Mukhalifeen e Ahle Sunnat Munkireen e Gyarvi Chunki Mehboob e Khuda Buzurghane Deen Ki Yaad Manane Aur Khatam Sharif Dilane Ke Shuru Hi Se Khilaaf Hain Isliye Wo Milad wa Urs wa Gyarvi Ki Tarah 22 Rajab Ki Fatiha Ke Khilaaf Bhi Bila Wajah Wawaila Karte Hain.
📚 *Reference* 📚
*1* Maha Nama Raza e Mustufa Gujranwala, Shaban 1402 Hijri, Safa 22.
*2.* Koondo Ki Fazilat Ba Jawab Koondo Ki Haqiqat, Safa 9, 10.
*5. Bareilly Sharif Me Aala Hazrat Imaam e Ahle Sunnat Molana Ahmad Raza Khan Fazil e Barelvi Ke* Shezadgaan e Kiram Aur Khanwada Ke Afraad Me 22 Rajab Ke Koondo Ki Takreeb Manayi Jati Hain. (Hazrat Molana Hasan Ali Razvi Barelvi Sahab) Likhte Hain Me Khud 2 Martaba Hazri De Chuka Hu.
📚 *Reference* 📚
Koondo Ki Fazilat Ba Jawab Koondo Ki Haqiqat, Safa 10.
*6. Mufti Abdul Majeed Khan Saeedi Razvi Likhte Hain :-* Me 1986 Me Apne Murshid e Kareem Imaam e Ahle Sunnat Ghazli e Zama Hazrat Allama Sayyed Ahmad Saeed Kazmi Ke Daulat Kade Par Hazir Tha, 22 Rajab Ko Tule e Aaftab Ke Baad Aapke Ghar Koondo Ka Khatam Dilaya Gaya Aur Bande Ke Malumat Ke Mutabik Ab Bhi Hazrat Ke Ghar Har Saal 22 Rajab Ko Koonde Kiye Jate Hain.
📚 *Reference* 📚
Koondo Ki Sharah Haisiyat, Safa 26, Owais Raza Library Hyderabad, Sindh.

*★ कुंडे की नियाज़ किस तारीख़ को करें…?? और उस की हक़ीक़त ★*
हज़राते मोहतरम आज लोगों में एक मुस्तहब व जाएज़ अमल जो हुसूले बरकत के लिए हमारे बुज़ुर्ग 22 रजब को हज़रते सय्यदुना इमाम जाफर सादिक़ की कुंडो की नियाज़ करते आये है लेकिन अभी तक़रीबन 4-5 सालों से कुछ लोगों ने इस नियाज़ के मुताल्लिक बड़ा हंगामा मचा रखा है की नियाज़ 15 रजब को करें
इस में कुछ मस्जिदों से भी ये एलान क्या जा रहा है और हालांके *”दावते इस्लामी”* के इशा’अती इदारा मकतबतुल मदीना से शाया होने वाली किताब *”कफन की वापसी”* जो अमीर ए दावते इस्लामी हज़रत मौलाना इल्यास अत्तार साहब की लिखी हुई है उस में अमीर ए दावते इस्लामी हज़रत मौलाना इल्यास अत्तार साहब तहरीर फरमाते हैं..की कुंडे की नियाज़ 22 रजब को ही होती आयी है….
*दावते इस्लामी* ही के इदारे से छपी एक और किताब हकीम उल उम्मत हज़रत मुफ़्ती अहमद यार खान साहब नईमी की *”इस्लामी ज़िन्दगी”* में हकीम उल उम्मत तहरीर फरमाते हैं “रजब के महीने में 22 तारीख़ को कुंडो की रस्म बहुत अच्छी और ब बरकत है..”
एक मुस्तहब व जाएज़ अमल को लेकर आवाम में फितना करना कहाँ तक बेहतर है…??
जब के आवाम अभी सही मानो में फर्ज़ वाजिब से भी ब खबर नहीं है अल्लाह हमारे हाल ए ज़ार पर रहम फरमाए आमीन
नोट:- इस पोस्ट को लिखने का मक़सद सिर्फ ये है आवामे अहले सुन्नत किसी फितने का शिकार न हौ..!
*हमने ऊपर जिन किताबों का ज़िक्र क्या है उन किताबों का इस्क्रीन शार्ट सबूत के तोर पर निचे दिया है मुलाहिज़ा हो…*👇👇
नोट:- नियाज़ कभी भी की जाए हो जाएगी पर ख़ास दिन की करने में हिकमते होती हैं…
वरना हम गियार्वी और छठी की नियाज़ ख़ास दिन क्यों करते हैं… जब के जब चाहे नियाज़ हो जाएगी लेकिन उस ख़ास दिन से निस्बत की बिना पर करते हैं
*अब रही बात 15 रजब को नियाज़ करने की….??*
तो कुछ लोग 22 रजब को नियाज़ न करने की वजह ये बताते हैं….
👉 के हज़रत सय्यदूना इमाम जाफर सादिक़ की यौमे वफ़ात (यानी इस दुनिया ए फानी से इंतेक़ाल ) की तारीख़ 15 रजब है न की 22 रजब….. बेशक़ भाई इमाम जाफर सादिक़ की वफ़ात 15 रजब है पर हम कुंडे की नियाज़ वफ़ात या पैदाइश की निस्बत की वजह से नहीं करते बल्कि इस में दूसरी निस्बत शामिल है 👇👇👇👇
*अब समझने वाली बात ये है की अभी तक हमारे बुज़ुर्गोने दीन फिर सदयों से 22 रजब को क्यों करते आये कुंडो की नियाज़……???*
*इसका जवाब ये है की हम कुंडो की नियाज़ हज़रत इमाम जाफर सादिक़ के यौमे पैदाइश और यौमे वफ़ात (यानु इंतेक़ाल का दिन) की वजह से नहीं करते आये बल्कि इस ख़ास दिन यानी 22 रजब को अल्लाह تعالى ने इमाम जाफर सादिक़ को मक़ामे गोसियत कुबरा आता फ़रमाया था देखें…..*
और 22 रजब को नियाज़ करने का सबूत हमारी अहले सुन्नत की किताबों से साबित है… खलीफा ए आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान फ़ाज़िले बरेलवी رحمة الله تعالى عليه
हज़रत सदरुल अफ़ाज़िल के शागिर्द जिन्होंने हदीस की किताब मिश्कात शरीफ की शराह लिखी हज़रत हकीम उल उम्मत मुफ़्ती अहमद यार खान नईमी अपनी किताब “इस्लामी ज़िन्दगी” में भी 22 रजब को ही नियाज़ करने का ज़िक्र करते हैं…
नोट:- 15 रजब को भी ईसाले सवाब करें पर ख़ास नियाज़ कुंडो की 22 रजब ही है
हमने सबूत के तोर पर किताबों के हवाले दिए हैं
22 रज्जब उल मुरज्जब इमाम जाफ़र सादिक़ رضي الله تعالى عنه नियाज़।
*हिजरी 122 रज्जब की 22 तारीख़ की रात यानी 21 का दिन गुज़ार कर 22 की रात बा वक़्त ए नमाज़ ए तहज्जुद अल्लाह तआला ने सैय्यदना इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम को मक़ाम ए ग़ौसियत ए कुब्रा अता फरमाया।*
*सुबह 22 रज्जब को आपने अल्लाह तआला की जानिब से ये अज़ीम नेमत मिलने पर बतौर ए शुक्र अदा करने के लिए नियाज़ करवाई जो दूध और चावल मिलाकर बनाई गई जिसे हम खीर कहते हैं।*
आप ख़ानदान ए रसूल (صلي الله تعالى عليه وعلى آله وصحبه وسلم) के चश्म ओ चिराग़ थे, आप के घर में टूटी चटाई और मिट्टी के बर्तन ही थे इसी पर आप शाकिर ओ साबिर थे, आप ने मिट्टी के पियाले में नियाज़ रख कर अपने दोस्त ओ अहबाब को बुला कर फरमाया कि आज रात अल्लाह तआला ने मुझे मक़ाम ए ग़ौसियत ए कुब्रा अता फ़रमाया है इसी का शुक्र अदा करते हुए ये नियाज़ आप लोगों को पेश करता हूं।
आप के साहब ज़ादे इमाम मूसा क़ाज़िम अलैहिस्सलाम और आप के दीगर मुसाहेबीन ने पूछा कि इस में हमारे लिए क्या फायदा है?
आप ने फरमाया कि रब्बे काबा की कसम अल्लाह तआला ने जो नेमत मुझे अता फरमाई है जिस का मैं शुक्र अदा करता हूं नियाज़ की शक्ल में इसी तरह इसी तारीख में जो भी शुक्र अदा करेगा और हमारे वसीले से जो अल्लाह تعالى से दुआ मांगेगा तो अल्लाह तआला उसकी मुराद ज़रूर पूरा फरमाएगा और दुआ ज़रूर कबूल होगी क्योंकि अल्लाह तआला अपने शुक्र गुज़ार बन्दों को मायूस नहीं करता।
इमाम ज़ाफर सादिक़ رضي الله تعالى عنه अलैहिस्सलाम के परपोते सैय्यदना इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम से कुछ दुश्मन ए अहले बैत ने सवाल किया कि “जब हमारे घर में पीतल तांबे के बेहतरीन बर्तन मौजूद है तो मिट्टी के कुंडो की क्या ज़रूरत है?”
आप ने फरमाया अल्लाह के प्यारे रसूल हमारे नाना जान हुज़ूर (صلي الله تعالى عليه وعلى آله وصحبه وسلم) की सुन्नत है मिट्टी के बर्तन में खाना।
आज मुसलमानों ने हमारे नाना जान की सुन्नत को तर्क कर दिया है हम ने इस नियाज़ को मिट्टी के पियालों में इस लिए ज़रूरी (ज़रूरी से मतलब फर्ज़ या वाज़िब नहीं मक़सद सुन्नत पर अमल करना है) करार दिया ताकि कम से कम साल में एक मर्तबा ही नाना जान की उम्मत मिट्टी के कुंडो में नियाज़ खाकर सुन्नत ए रसूल (صلي الله تعالى عليه وعلى آله وصحبه وسلم) अदा करें।
अल्लाह पाक हमें अहले बैत ए मुतह’हीरात और सहाबा किराम वा औलिया ए किराम का फैज़ान नसीब फरमाए आमीन
~~ रेफरेंस ~~
ये ऊपर लिखी बात इन किताबों से साबित है।
📚 मिन्हाज उस सालेहीन।
✍️ सैयदना इमाम मोहि उद्दीन इब्ने अबू बकर बगदाद।
📚 कशफुल असरार।
✍️सैयदना इमाम अब्दुल्लाह बिन अली अस्फाहनी।
📚 मदाम ए असरार अहले बैत।
✍️ सैयदना इमाम मोहम्मद बिन इस्माईल मुतक्की।
📚 मखजन ए अनवार ए विलायत।
✍️ सैयदना इमाम बरहन उद्दीन अस्कलनी।

🌹जरूर पढ़े कुंन्डे की हकीकत🌹
मनाया जाए या ना मनाया जाए
न्यू नासबी यज़ीदी लोग एक बहुत नाकाम कोशिश में लगे हुए हैं और वोह चाहते हैं 22 रजब कुंडे की नियाज को 15 रजब के दिन करवाना और उसको *बिना दलील साबित करने में लगे हैं..*
सबसे पहले ये जानो कि इमाम जाफर सादिक कौन हैं?
मौला अली के फ़रजंद इमाम हुसैन, इमाम हुसैन के फ़रजंद इमाम जैनुल आब्दीन, इमाम जैनुल आब्दीन के फ़रजंद इमाम बाकिर, और इमाम बाकिर के फ़रजंद हैं इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम….
इमाम जाफर सादिक के फ़रजंद इमाम मूसा काजिम जिनकी औलादों में से हैं ख्वाजा गरीब नवाज…..
बगैर हुब्बे अली मुद्दआ नहीं मिलता
ईबादतों का भी हरगिज सिला नहीं मिलता
खुदा के बंदों सुनो गोर से खुदा की कसम
जिसे अली नहीं मिलते उसे खुदा नहीं मिलता
अलीع के बच्चेع अगर इजाजत नहीं देंगे
किसी का बाप भी जन्नत में जा नहीं सकता
*अल हसन वल हुसैन सय्यदल शबाबिल अहलिल जन्ना*
*22 रजब को नियाज़ इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम*
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🌹*मक़ाम ए वुस अत ए कुबरा*🌹
22 रजब को सैय्यदना इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की न तो विलादत की तारीख़ है और न ही आपकी शहादत की तारीख़ है…..
असान लफ्जों में समझो तो जैसे 11 वीं शरीफ है,
11 वीं शरीफ़ ना तो गौस ए आज़म की विलादत का दिन है और ना ही विसाल का दिन….
कुंडे की नजर नियाज़ फ़ातिहा 22 रजब
12 जनवरी पीर शरीफ (सोमवार) के दिन है…..
11 जनवरी इतवार की रात पकाया जायेगा…….
ख़ैर 22 रज़ब की हकीकत कुछ इस तरह है..
*122 सन हिजरी रज़ब की 22 तारीख़ की रात यानी 21 का* दिन गुज़र कर 22 की रात ब वक़्त नमाज़े तहज्जुद *अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने* सैय्यदना इमाम ज़ाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम को *मक़ाम ए वुस अत ए कुबराअता फ़रमाया*
-: ये ज़हन में रखियेगा कि मक़ाम ए वुस अत ए कुबरा सैय्यदना इमाम ज़ाफ़र सादिक अलैहिस्सलाम को अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने अता फ़रमाया :-
22 रजब को अज़ीम नेमत मक़ाम ए वूस अत ए *हासिल होने के बाद सैय्यदना इमाम ज़ाफ़र सादिक़* अलैहिस्सलाम ने सुबह के वक़्त अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की जानिब *ब’तौरे शुक्र अदा करने के लिए नियाज़* बनवाई जो दूध और चावल मिलाकर बनाइ गई जिसे हम खीर कहते हैं।
सैय्यदना इमाम ज़ाफ़र ऐ सादिक़ अलैहिस्सलाम ख़ानदाने रसूल सलल्लाहु अलैहिवसल्लम के चश्मों चिराग़ हैं,
आप के घर में टुटी चटाई और मिट्टी के बरतन ही थे इसी पर आप शाकिर ओ साबिर थे,
आप मिट्टी के पियाले में नियाज़ रखकर अपने दोस्तों ओ अहबाब को बुलाकर फ़रमाया के आज रात अल्लाह पाक ने मुझे मक़ामे ग़ौसियत ऐ कुबरा अता फ़रमाए इस का शुक्र अदा करते हुए ये नियाज़ आप लोगों को बतौर ऐ तबर्रूक पेश करता हूं,
आप के शहज़ादे *सैय्यदना इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम* और दीगर मुशाहेबिन ने दरयाफ़्त किया कि इस नियाज़ में हमारे लिए फ़ायदा है आप ने फ़रमाया के रब्बे काबा की कसम अल्लाह ने जो नेअमत मुझे अता फ़रमाए जिस का मैं शुक्र अदा करता हूं नियाज़ की शक्ल में *इसी तरह इसी तारीख में जो भी शुक्र अदा करेगा* और हमारे वसीले से जो दुआ मांगेगा तो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त उसकी मुराद ज़रूर पूरी फ़रमाएगा और दुआ ज़रूर क़ुबूल होगी।
क्योंकि *अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त अपने शुक्र गुजार बंदों को मायूस नहीं फ़रमाता।* …..सुब्हान अल्लाह
सुब्हान अल्लाह
हवाला :-
1:मिन्हाजूस्सालेहिंन/मुसन्निफ़; सैय्यदना इमाम मोहिय्युद्दीन इब्ने अबुबकर बग़दाद
2: कशफुल असरार :सैय्यदना इमाम अब्दुलाह बिन अली अशफहानि
3: मदाम ए असरार अहलेबैत: सैय्यदना इमाम मुहम्मद बिन इस्माइल मुत्तक़ी मक्की
4: मख’जन ऐ अनवारे विलायत★सैय्यदना इमाम बुरहानुद्दीन
अश्क़’लानी
मेरे प्यारे इस्लामी मोमिन भाईयों अपने घरों में 22 रज्जब अल मुर्जब के दिन ही इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की नज़रों नियाज़ करें किसी नासबी यज़ीदी के चक्कर में गुमराह मत होना
ये फ़िरका उम्मत के भोले भाले मुसलमान भाईयों को गुमराह कर रहा हैं
अलहम्दुलिल्लाह हम मौलाई हुसैनी सुन्नियों के यहां हमेशा से 22 रजब को ही इमाम की नज़रों नियाज़ होती है और इं-शा अल्लाह होती रहेगी
अम्मार को एक बागी जमात क़त्ल करेगी अम्मार उन्हें अल्लाह और जन्नत की तरफ बुला रहा होगा और वो जमात उसे दोज़ख की तरफ बुला रही होगी।
(रसूले खुदा हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम)
सहीह बुखारी : 2812-447
सहीह मुस्लिम : 7320-7322
मुसनद अहमद : 12347।
कितने बेशर्म हैं लोग जो अल्लाह उसके रसूल की बात नहीं मानते
और फिर दवा के हम मुसलमान हैं
ख़ारजी नासबी अपनी पुरी ताक़त लगा लो फिर भी ज़ालिमों को बचा नहीं पाओगे जाहन्नम से…..
मौला अली अलैहिस्सलाम के दुश्मनों पर लानत।
मौला हसन अलैहिस्सलाम के दुश्मनों पर लानत।
मौला हुसैन अलैहिस्सलाम के दुश्मनों पर लानत
हज़रत अबु बक्र सिद्दीक के बेटों के कातिलों पर लानत।
अम्मा आयशा के कातिलों पर लानत। हज़रते उस्मान के कातिलों पर लानत। हज़रते अम्मार बिन यासिर के कातिलों पर लानत।
हज़रते हजर बिन अदी के कातिलों पर लानत।
हज़रते मोहम्मद बिन अबू बकर के कातिलों पर लानत।
हज़रते अब्दुल रहमान बिन अबू बकर के कातिलों पर लानत।
हज़रते उवैश करनी के कातिलों पर लानत।
प्यारे नबी सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया अहले बैत अलैहिस्सलाम का दुश्मन हमारा दुश्मन,
अहले बैत अलैहिस्सलाम के बुग्ज़ में मरा काफ़िर मरा
प्यारे नबी सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जो कबीला मेरी अहले बैत से लड़ा वह शैतान का गिरोह है।