Blog

अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 65

ग़ज़वा हमरउल असद

इधर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने पूरी रात लड़ाई से पैदा हुई स्थिति पर विचार करते हुए गुज़ारी। आपको भय था कि अगर मुश्किों ने सोचा कि लड़ाई के मैदान में अपना पल्ला भारी रहते हुए भी हमने कोई लाभ नहीं उठाया तो उन्हें निश्चय ही शर्मिंदगी होगी और वे रास्ते से पलट कर दोबारा मदीना पर हमला करेंगे, इसलिए आपने फ़ैसला किया कि बहरहाल मक्की सेना का पीछा किया जाना चाहिए।

चुनांचे सीरत लिखने वालों का बयान है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उहुद की लड़ाई के दूसरे दिन यानी रविवार 8 शव्वाल सन् 03 हि० को सुबह सवेरे एलान फ़रमारया कि दुश्मन के मुक़ाबले के लिए चलना है और साथ ही यह भी एलान फ़रमाया कि हमारे साथ सिर्फ़ वही आदमी चल सकता है जो उहुद की लड़ाई में मौजूद था, फिर भी अब्दुल्लाह बिन उबई ने इजाज़त चा हीकि आपके साथ चले, मगर आपने इजाजत न ।

इधर जितने मुसलमान थे, अगरचे घावों से चूर, ग़म से निढाल और भय और आशंका से दो चार थे, लेकिन बिना किसी संकोच के इताअत का सर झुका दिया।

हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह ने भी इजाज़त चाही जो उहुद की लड़ाई में शरीक न थे, सेना में उपस्थित हुए, बोले, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! मैं चाहता हूं कि आप जिस किसी लड़ाई में तशरीफ़ ले जाएं, मैं भी सेवा में लगा रहूं। और चूंकि (इस लड़ाई में) मेरे बाप ने मुझे अपनी बच्चियों की देखभाल के लिए घर पर रोक दिया था, इसलिए आप मुझे इजाज़त दे दें कि मैं भी आपके साथ चलूं । इस पर आपने उन्हें इजाज़त दे दी।

प्रोग्राम के मुताबिक़ रसूलुल्लाह सल्ल० मुसलमानों को साथ लेकर चले और मदीने से आठ मील दूर हमरउल असद पहुंचकर पड़ाव डाल दिया।

ठहरने के दौरान माबद बिन अबी माबद खुजाई अल्लाह के रसूल सल्ल० की खिदमत में हाज़िर होकर मुसलमान हो गए। और कहा जाता है कि वह अपने शिर्क ही पर क़ायम था, लेकिन अल्लाह के रसूल सल्ल० का भला चाहने वाला था, क्योंकि खुजाआ और बनू हाशिम के बीच हलफ़ (यानी दोस्ती का वचन ) था ।

बहरहाल उसने कहा, ऐ मुहम्मद (सल्ल०) ! आपको और आपके साथियों को कष्ट पहुंचा है, तो अल्लाह की क़सम ! हमको भी इससे सदमा पहुंचा है। हमारी आरज़ू थी कि अल्लाह आपको सकुशल रखता।

इस तरह सहानुभूति दिखाने पर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उससे फ़रमाया कि वह अबू सुफ़ियान के पास जाए और उसका मनोबल गिराए ।

इधर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जो आशंका जताई थी कि मुश्कि मदीने की ओर पलटने की बात सोचेंगे, वह बिल्कुल सही थी चुनांचे मुश्किों ने मदीने से ३६ मील दूर रौहा नामी जगह पर पहुंचकर जब पड़ाव डाला तो आपस में एक दूसरे को धिक्कारने लगे। कहने लगे, तुम लोगों कुछ नहीं किया, उनकी ताक़त तोड़ कर भी उन्हें यों ही छोड़ दिया, हालांकि अभी उनके इतने सर बाक़ी हैं, कि वे तुम्हारे लिए फिर सर दर्द बन सकते हैं, इसलिए वापस चलो और उन्हें जड़ से साफ़ कर दो। ने

लेकिन ऐसा लगता है कि यह उचटती राय थी, जो उन लोगों की ओर से पेश की गई थी, जिन्हें दोनों फ़रीक़ों की ताक़त और उनके हौसलों का अन्दाज़ा न था। इसलिए एक ज़िम्मेदार अफ़सर सफ़वान बिन उमैया ने इसका विरोध किया और कहा, लोगो ! ऐसा न करो। मुझे खतरा है कि जो (मुसलमान उहुद की लड़ाई में) नहीं आए थे, वे भी तुम्हारे खिलाफ़ जमा हो जाएंगे। इसलिए इस हालत में वापस चलो कि जीत तुम्हारी है, वरना मुझे ख़तरा है कि मदीने पर फिर चढ़ाई करोगे, तो चक्कर में पड़ जाओगे, लेकिन भारी संख्या में लोगों ने यह राय कुबूल न की और फ़ैसला किया कि मदीना वापस चलेंगे।

लेकिन अभी पड़ाव छोड़कर अबू सुफ़ियान और उसके फ़ौजी हिले भी न थे कि माबद बिन अबी माबद खुज़ाई पहुंच गया। अबू सुफ़ियान को मालूम न था कि वह मुसलमान हो गया है, उसने पूछा, माबद! पीछे की क्या ख़बर है ?

माबद ने प्रचार का ज़ोरदार हथकंडा इस्तेमाल करते हुए कहा, मुहम्मद अपने साथियों को लेकर तुम्हारा पीछा करने के लिए निकल चुके हैं। उनकी फ़ौज इतनी बड़ी है कि मैंने ऐसी फ़ौज कभी देखी ही नहीं। सारे लोग तुम्हारे खिलाफ़ गुस्से से कबाब हुए जा रहे हैं। उहुद में पीछे रह जाने वाले भी आ गए हैं। वे जो कुछ बर्बाद कर चुके, उस पर बहुत ज़्यादा शर्मिंदगी है और तुम्हारे खिलाफ़ इतने भड़के हुए हैं कि मैंने इसकी मिसाल देखी ही नहीं ।

अबू सुफ़ियान ने कहा, अरे भाई ! यह क्या कह रहे हो ?

माबद ने कहा, अल्लाह की क़सम ! मेरा ख्याल है कि तुम कूच करने से पहले-पहले घोड़ों की पेशानियां देख लोगे या फ़ौज का आगे का दस्ता इस टीले के पीछे से ज़ाहिर हो जाएगा।

अबू सुफ़ियान ने कहा, ख़ुदा की क़सम ! हमने फ़ैसला किया है कि उन पर पलट कर फिर हमला करें और उनकी जड़ काट कर रख दें।

माबद ने कहा, ऐसा न करना, मैं तुम्हारे भले की बात कर रहा हूं।

ये बातें सुनकर मक्की फ़ौज के हौसले टूट गए। उन पर घबराहट और रौब छा गया, और उन्हें इसी में कुशलता नज़र आई कि मक्का की ओर अपनी वापसी जारी रखें। अलबत्ता अबू सुफ़ियान ने इस्लामी फ़ौज का पीछा करने से रोकने और इस तरह दोबारा सशस्त्र टकराव से बचने के प्रोपगंडे का एक जवाबी हमला किया।

शक्ल यह हुई कि अबू सुफ़ियान के पास से क़बीला अब्दुल क़ैस का एक क़ाफ़िला गुज़रा। अबू सुफ़ियान ने कहा, क्या आप लोग मेरा एक पैग़ाम मुहम्मद को पहुंचा देंगे? मेरा वायदा है कि इसके बदले जब आप लोग मक्का आएंगे, तो उकाज़ के बाज़ार में आप लोगों को इतनी किशमिश दूंगा, जितनी आपकी यहऊंटनी उठा सकेगी।
उन लोगों ने कहा, जी हां।

अबू सुफ़ियान ने कहा, मुहम्मद को यह खबर पहुंचा दें कि हमने उनकी और उनके साथियों की जड़ काट देने के लिए दोबारा पलट कर हमले का फ़ैसला किया है।

इसके बाद जब यह क़ाफ़िला हमरउल असद में रसूलुल्लाह सल्ल० और सहाबा किराम रजि० के पास से गुज़रा, तो उनसे अबू सुफ़ियान का पैग़ाम कह सुनाया और कहा कि लोग तुम्हारे खिलाफ़ जमा हैं, उनसे डरो।

मगर उनकी बातें सुनकर मुसलमानों का ईमान और बढ़ गए और उन्होंने कहा, ‘हस्बुनल्लाहु व निअमल वकील०’ (अल्लाह हमारे लिए काफ़ी है और वह बेहतरीन कर्ता-धर्ता है।) (इस ईमानी ताक़त की बदौलत वे लोग अल्लाह की नेमत और मेहरबानी के साथ पलटे। उन्हें किसी बुराई ने न छुआ और उन्होंने अल्लाह की रज़ामंदी की पैरवी की और अल्लाह बड़ी मेहरबानियों वाला है।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रविवार को हमरउल असद तशरीफ़ ले गए थे। सोमवार, मंगलवार, बुधवार यानी 9, 10, 11 शव्वाल सन् 03 हि० तक वहीं ठहरे रहे। इसके बाद मदीना वापस आए।

मदीना वापसी से पहले अबू अज़्ज़ा जुमही आपकी पकड़ में आ गया। यह वही व्यक्ति है जिसे बद्र में गिरफ़्तार किए जाने के बाद उसके उपवास और लड़कियों की ज़्यादा तायदाद होने की वजह से इस शर्त पर बिना कुछ लिए-दिए छोड़ दिया गया कि वह रसूलुल्लाह सल्ल० के खिलाफ़ किसी की मदद नहीं करेगा। लेकिन उस व्यक्ति ने वायदा के खिलाफ़ काम किया और अपनी कविताओं द्वारा नबी सल्ल० और सहाबा किराम के खिलाफ़ लोगों की भावनाओं को भड़काया (जिसका उल्लेख पीछे पन्नों में किया जा चुका है), फिर मुसलमानों से लड़ने के लिए खुद भी उहुद की लड़ाई में आया ।

जब यह गिरफ़्तार करके अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की खिदमत में लाया गया, तो कहने लगा, मुहम्मद (सल्ल०) ! मेरी ग़लती माफ़ कर दो, मुझ पर एहसान कर दो और मेरी बच्चियों के लिए मुझे छोड़ दो। मैं वचन देता हूं कि अब दोबारा ऐसी हरकत नहीं करूंगा ।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया, अब यह नहीं हो सकता कि तुम मक्का जाकर अपने गाल पर हाथ फेरो और कहो कि मैंने मुहम्मद को दो बार धोखा दिया। मोमिन एक बिल से दो बार नहीं डसा जा सकता। इसके बाद

हज़रत जुबैर या हज़रत आसिम बिन साबित को हुक्म दिया और उन्होंने उसकी गरदन मार दी।

इसी तरह मक्के का एक जासूस भी मारा गया। उसका नाम मुआविया बिन मुग़ीरह बिन अबिल आस था और वह अब्दुल मलिक बिन मरवान का नाना था । यह व्यक्ति इस तरह निशाने पर आया कि जब उहुद के दिन मुश्रिक वापस चले गये तो यह अपने चचेरे भाई हज़रत उस्मान बिन अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अन्हु से मिलने आया, हज़रत उस्मान ने उसके लिए रसूलुल्लाह सल्ल० से अमान तलब की।

आपने इस शर्त पर अमान दे दी कि अगर वह तीन दिन के बाद पाया गया, तो क़त्ल कर दिया जाएगा, लेकिन जब मदीना इस्लामी फ़ौज से खाली हो गया, तो यह आदमी कुरैश की जासूसी के लिए तीन दिन से ज़्यादा ठहर गया और जब फ़ौज वापस आई तो भागने की कोशिश की। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज़रत ज़ैद बिन हारिसा रज़ि० और अम्मार बिन यासिर रज़ि० को हुक्म दिया और उन्होंने उस आदमी का पीछा करके उसकी जान ले ली ।

ग़ज़वा हमरउल असद का उल्लेख अगरचे एक अलग नाम से किया जाता है, पर सच तो यह है कि यह कोई अलग से ग़ज़वा न था, बल्कि ग़ज़वा उहुद का एक भाग या उसका पूरक था और उसी के पृष्ठों में से एक पृष्ठ था