Blog

Allah raazi ho jaata

Imam Jafar us Sadiq (A.S.) apne waalid Imam Muhammad al Baqir (A.S.) se, woh apne waalid Imam Zain ul Abideen (A.S.) se, woh apne waalid Imam Hussain (A.S.) se, aur woh apne waalid Imam Ali (A.S.) se riwayat naqal karte hain ki Hazrat Rasool-e-Khuda (S.A.W.W.) ne Janab-e-Sayyeda-e-Tahira Fatima Zahra (S.A.) se farmaya:
Aye beti Fatima! Beshak tu jisse naraaz ho uss se Allah Rabb ul Aalameen  naraaz ho jaata hai, aur tu jisse raazi ho uss se Allah raazi ho jaata

रसूलल्लाह ﷺ सबसे ज्यादा मोहब्बत मौला अली (अलैहिस्सलाम) से और सैयेदा फातिमा जहरा (सलामुल्लाही अलैहा) से करते हैं..

रसूलल्लाह ﷺ सबसे ज्यादा मोहब्बत मौला अली (अलैहिस्सलाम) से और सैयेदा फातिमा जहरा (सलामुल्लाही अलैहा) से करते हैं..👇

हजरत जमीआ बिन आमिर बयान करते है: में अपने वालिद के हम राह उमूल मोमिनिन हजरत आयशा (राजी अल्लाह अन्हा) के वहां गया , मैंने परदे के पीछे से उनकी आवाज सुनी मेरे वालिद उनसे हजरत अली (राजी अल्लाह अन्हो) के बारे मे पूछ रहे थे , तो उमूल मोमिनिन ने फरमाया: तुम मुझसे उस आदमी के बारे मे पूछ रहे हो , खुदा की कसम ! में हजरत अली (राजी अल्लाह अन्हो) के सिवा और किसी शख्स को नहीं जानती जो रसूलल्लाह ﷺ को उनसे ज्यादा मोहब्बत हो , और उनकी जौजा से बढ़कर और किसी खातून को नहीं जानती जो रूहे जमीन पर उनसे ज्यादा मोहब्बत हो,,

ये हदीस सहीह उल इशनाद है

अल मुस्तद्रक हाकिम जिल्द: 4, हदीस नं: 4731

हज़रते हुज़ीफ़ा मरइशी रदियल्लाहु तआला अन्हु

हज़रते हुज़ीफ़ा मरइशी रदियल्लाहु तआला अन्हु

आप हज़रत ख्वाजा हुबैरा बसरी के पीर ने मुर्शिद थे। दमिश्क में आप बमुक़ाम मरइश में पैदा हुए थे । किताबों में लिखा है कि सात बरस की उम्र में कुरआन शरीफ़ हिफ्ज़ फरमा लिया था और सोलह बरस की उम्र में आप तमाम ऊलूम से फ़ारिग हो गए थे। जब खुदावन्द कुद्दूस की मोहब्बत ज़ियाद ग़ालिब आयी तो आप हज़रत ख्वाजा इब्राहीम बिन अदहम के दस्त हक़ परस्त पर जा कर बैअत हो गए। और सिर्फ़ छ: महीने आपने पीर की बारगाह में रहकर खिलाफत ने इजाज़त से भी माला माल हुए। पीर से इजाज़त लेकर आप मक्का मुअज्जमा तशरीफ़ ले गए हज्जे बयतुल्लाह से फ़ारिग़
होकर बारगाहे रिसालत मआब सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम में हाज़िर हुए और रौज़-ए-मुबारक पर रोजाना एक कलाम पाक रात में तिलावत फ़रमाते थे। आप बहुत ज़ियादा तन्हाई पसन्द थे और खौफ़े खुदा से हर वक़्त आप की आँखों से आँसू जारी रहते। आप के हाथों पर छः सौ काफ़िरों ने कालिमा पढ़ा।

आप २४ शव्वाल सन् २५२ हिजरी में अपनी जाने आफ़रीन को ख़ुदा के सिपुर्द किया और आप का मज़ारे पाक बसरा में ज़ियारते खलाएक़ है।