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20 Ramzan Yaum e Fatah Makkah

मक्के में अबू सुफियान बहुत बेचैन था,”आज कुछ होने वाला है”( वो बड़बड़ाया) उसकी नज़र आसमान की तरफ बार बार उठ रही थी-
उसकी बीवी”हिन्दा” जिसने हज़रत अमीर हम्ज़ा का कलेजा चबाया था उसकी परेशानी देखकर उसके पास आ गई थी,
क्या बात है? क्यूं परेशान हो?
हूं? अबू सुफियान चौंका – कुछ नहीं- तबीयत घबरा रही है मैं ज़रा घूम कर आता हूं,वो ये कहकर घर के बैरूनी दरवाज़े से बाहर निकल गया मक्के की गलियों में घूमते घूमते वो उसकी हद तक पहुंच गया, अचानक उसकी नज़र शहर से बाहर एक वसी मैदान पर पड़ी,
हज़ारों मशालें रौशन थीं, लोगों की चहल पहल उनकी रौशनी में नज़र आ रही थीं और भिनभिनाहट की आवाज़ थी जैसे सैकड़ों लोग धीमी आवाज़ में कुछ पढ़ रहे हों उसका दिल धक से रह गया था- उसने फ़ैसला किया कि वो क़रीब जाकर देखेगा कि ये कौन लोग हैं, इतना तो वो समझ ही चुका था कि मक्के के लोग तो ग़ाफीलों की नींद सो रहे हैं और ये लश्कर यक़ीनन मक्के पर चढ़ाई के लिए ही आया है
वो जानना चाहता था कि ये कौन हैं?
वो आहिस्ता आहिस्ता ओट लेता उस लश्कर के काफी क़रीब पहुंच चुका था,
कुछ लोगों को उसने पहचान लिया था,ये उसके अपने ही लोग थे जो मुसलमान हो चुके थे और मदीना हिजरत कर चुके थे,उसका दिल डूब रहा था,वो समझ गया था कि ये लश्कर मुसलमानों का है,
और यक़ीनन” मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم” अपने जां निसारों के साथ मक्का आ पहुंचे थे- वो छुप कर हालात का जायज़ा ले ही रहा था कि उक़ब से किसी ने उसकी गरदन पर तलवार रख दी,उसका ऊपर का सांस ऊपर और नीचे का नीचे रह गया था, लश्कर के पहरेदारों ने उसे पकड़ लिया था,और अब उसे बारगाहे मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم में लेजा रहे थे,उसका एक एक क़दम कई मन का हो चुका था,हर क़दम पर उसे अपने करतूत याद आ रहे थे,जंगे बद्र,उहद,खन्दक,खैबर सब उसकी आंखों के सामने नाच रही थीं,उसे याद आ रहा था कि उसने कैसे सरदाराने मक्का को इकट्ठा किया था “मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم को क़त्ल करने के लिए” कैसे नजाशी के दरबार में जाकर तक़रीर की थी कि –
ये मुसलमान हमारे गुलाम और बाग़ी हैं इनको हमें वापस दो,
कैसे उसकी बीवी हिन्दा ने अमीर हम्ज़ा को अपने ग़ुलाम हब्शी के ज़रिए शहीद करवा कर उनका सीना चाक करके उनका कलेजा निकाल कर चबाया और नाक और कान काट कर गले में हार बना कर डाले थे,और अब उसे उसी मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم के सामने पेश किया जा रहा था उसे यक़ीन था कि- उसकी रिवायात के मुताबिक़ उस जैसे “दहशतगर्द” को फौरन तहे तेग़ कर दिया जाएगा-

#इधर-
बारगाहे रहमतुल्लिल आलमीन صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم में असहाब जमा थे और सुबह के इक़दामात के बारे में मशावरत चल रही थी कि किसी ने आकर अबू सुफियान की गिरफ्तारी की खबर दे दी “अल्लाहु अकबर” खैमा में नारा ए तकबीर बलंद हुआ अबू सुफियान की गिरफ्तारी एक बहुत बड़ी खबर और कामयाबी थी,खैमे में मौजूद उमर इब्ने ख़त्ताब उठ कर खड़े हुए और तलवार को म्यान से निकाल कर इंतिहाई जोश के आलम में बोले-
उस बदबख्त को क़त्ल कर देना चाहिए शुरू से सारे फसाद की जड़ यही रहा है,
चेहरा ए मुबारक रहमतुल्लिल आलमीन صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم पर तबस्सुम नमूदार हुआ, और उनकी दिलों में उतरती हुई आवाज़ गूंजती
” बैठ जाओ उमर- उसे आने दो”
उमर इब्ने खत्ताब आंखों में गैज़ लिए हुक्मे रसूल صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم की इताअत में बैठ तो गए लेकिन उनके चेहरे की सुर्खी बता रही थी कि उनका बस चलता तो अबू सुफियान के टुकड़े टुकड़े कर डालते इतने में पहरेदारों ने बारगाहे रिसालत صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم में हाज़िर होने की इजाज़त चाही, इजाज़त मिलने पर अबू सुफियान को रहमतुल्लिल आलमीन के सामने इस हाल में पेश किया गया कि उसके हाथ उसके अमामे से उसकी पुश्त पर बंधे हुए थे, चेहरे की रंगत पीली पड़ चुकी थी,और उसकी आंखों में मौत के साए लहरा रहे थे,
लबहाए रिसालत मआब صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم को जुंबिश हुई और असहाब किराम رضی اللّٰہ تعالیٰ عنہم ने एक अजीब जुमला सुना-
इसके हाथ खोल दो,और इसको पानी पिलाओ,बैठ जाओ अबू सुफियान-!!
अबू सुफियान हारे हुए जुवारी की तरह गिरने के अंदाज़ में खैमा के फर्श पर बिछे कालीन पर बैठ गया-पानी पीकर उसको कुछ हौसला हुआ तो नज़र उठाकर खैमे में मौजूद लोगों की तरफ देखा,उमर इब्ने खत्ताब की आंखें ग़ुस्से से सुर्ख थीं, अबूबक्र इब्ने क़ुहाफा की आंखों में उसके लिए अफसोस का तास्सुर था,उस्मान बिन अफ्फान के चेहरे पर अज़ीज़दारी की हमदर्दी और अफसोस का मिला जुला तास्सुर था अली इब्न अबी तालिब का चेहरा सपाट था,इसी तरह बाक़ी तमाम असहाब के चेहरों को देखता देखता आखिर उसकी नज़र मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم के चेहरे मुबारक पर आकर ठहर गई, जहां जलालत व रहमत के खूबसूरत इम्तिज़ाज (मिलावट) के साथ कायनात की खूबसूरत तरीन मुस्कुराहट थी,
कहो अबू सुफियान? कैसे आना हुआ??
अबू सुफियान के गले में जैसे आवाज़ ही नहीं रही थी, बहुत हिम्मत करके बोला- मैं इस्लाम क़ुबूल करना चाहता हूं??
उमर इब्न खत्ताब एक बार फिर उठ खड़े हुए ” या रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ” ये शख्स मक्कारी कर रहा है,जान बचाने के लिए इस्लाम क़ुबूल करना चाहता है, मुझे इजाज़त दीजिए, मैं आज इस दुश्मने अज़ली का खात्मा कर ही दूं, उनके मुंह से कफ जारी था-
बैठ जाओ उमर- रिसालत मआब صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ने नरमी से फिर फ़रमाया: बोलो अबू सुफियान! क्या तुम वाक़ई इस्लाम क़ुबूल करना चाहते हो?
जी या रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم – मैं इस्लाम क़ुबूल करना चाहता हूं मैं समझ गया हूं कि आप और आपका दीन भी सच्चा है और आपका ख़ुदा भी सच्चा है,उसका वादा पूरा हुआ- मैं जान गया हूं कि सुबह मक्का को फतह होने से कोई नहीं बचा सकेगा-

चेहरा ए रिसालत मआब صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم पर मुस्कुराहट फैली-
ठीक है अबू सुफियान- तो मैं तुम्हें इस्लाम की दावत देता हूं और तुम्हारी दरख्वास्त क़ुबूल करता हूं जाओ तुम आज़ाद हो, सुबह हम मक्का में दाखिल होंगे इंशा अल्लाह
मैं तुम्हारे घर को जहां आज तक इस्लाम और हमारे खिलाफ साज़िशें होती रहीं,जाए अमन क़रार देता हूं,जो तुम्हारे घर में पनाह ले लेगा वो महफूज़ है,
अबू सुफियान की आंखें हैरत से फटती जा रही थीं
” और मक्का वालों से कहना- जो बैतुल्लाह में दाखिल हो गया उसको अमान है,जो अपनी किसी इबादतगाह में चला गया,उसको अमान है, यहां तक कि जो अपने घरों में बैठा रहा उसको अमान है,
जाओ अबू सुफियान! जाओ और जाकर सुबह हमारी आमद का इंतज़ार करो, और कहना मक्का वालों से कि हमारी कोई तलवार म्यान से बाहर नहीं निकल होगी,हमारा कोई तीर तरकश से बाहर नहीं होगा, हमारा कोई नेज़ा किसी की तरफ सीधा नहीं होगा जब तक कि कोई हमारे साथ लड़ना ना चाहे”
अबू सुफियान ने हैरत से मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ،की तरफ देखा और कांपते हुए होंठों से बोलना शुरू किया-
” اشھد ان لاالہٰ الا اللہ و اشھد ان محمّد عبدہُ و رسولہُ ”
सबसे पहले उमर इब्ने खत्ताब आगे बढ़े- और अबू सुफियान को गले से लगाया,”मरहबा ऐ अबू सुफियान” अब से तुम हमारे दीनी भाई हो गए,तुम्हारी जान,माल हमारे ऊपर वैसे ही हराम हो गया जैसा कि हर मुसलमान का दूसरे पर हराम है,तुमको मुबारक हो कि तुम्हारी पिछली सारी खताएं मुआफ कर दी गईं और अल्लाह तबारक व तआला तुम्हारे पिछले गुनाह मुआफ फरमाए,अबू सुफियान हैरत से खत्ताब के बेटे को देख रहा था,ये वही था कि चंद लम्हे पहले जिसकी आंखों में उसके लिए शदीद नफरत और गुस्सा था और जो उसकी जान लेना चाहता था,अब वही उसको गले से लगा कर भाई बोल रहा था?
ये कैसा दीन है?
ये कैसे लोग हैं?
सबसे गले मिलकर और रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم के हाथों पर बोसा देकर अबू सुफियान खैमे से बाहर निकल गया,
वो दहशतगर्द अबू सुफियान कि जिसके शर से मुसलमान आज तक तंग थे उन्ही के दरमियान से सलामती से गुज़रता हुआ जा रहा था, जहां से गुज़रता,उस इस्लामी लश्कर का हर फर्द,हर जंगजू,हर सिपाही जो थोड़ी देर पहले उसकी जान के दुश्मन थे अब आगे बढ़ बढ़ कर उससे मुसाहफा कर रहे थे,खुश आमदीद कह रहे थे-

#अगले_दिन:-
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मक्का शहर की हद पर जो लोग खड़े थे उनमें सबसे नुमाया अबू सुफियान था, मुसलमानों का लश्कर मक्का में दाखिल हो चुका था किसी एक तलवार, किसी एक नेज़े की अनी, किसी एक तीर की नोक पर खून का एक क़तरा भी नहीं था, लश्करे इस्लाम को हिदायत मिल चुकी थी,
किसी के घर में दाख़िल मत होना
किसी की इबादतगाह को नुक़सान मत पहुंचाना
किसी का पीछा मत करना
औरतों और बच्चों पर हाथ ना उठाना
किसी का माल ना लूटना
बिलाल हब्शी आगे आगे ऐलान करते जा रहे थे
“मक्का वालों ! रसूल ए खुदा صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم की तरफ से- आज तुम सबके लिए आम मुआफी का ऐलान है-
किसी से उसके साबिक़ा आमाल की बाज़पुर्श नहीं की जाएगी,
जो इस्लाम क़ुबूल करना चाहे वो कर सकता है
जो ना करना चाहे वो अपने साबिक़ा दीन पर रह सकता है,
सबको उनके मज़हब के मुताबिक़ इबादत की खुली इजाज़त होगी
सिर्फ मस्जिदे हराम और उसकी हुदूद के अंदर बुत परस्ती की इजाज़त नहीं होगी
किसी का ज़रीया ए मआश छीना नहीं जाएगा
किसी को उसकी ज़मीन व जायदाद से महरूम नहीं किया जाएगा
ग़ैर मुसलमानों की जान माल की हिफाज़त मुसलमान करेंगे
ऐ मक्का के लोगो-!!”
हिन्दा अपने घर के दरवाज़े पर खड़ी लश्कर इस्लाम को गुज़रते देख रही थी
उसका दिल गवाही नहीं देंगी रहा था कि “हज़रत हम्ज़ा” का क़त्ल उसको मुआफ कर दिया जाएगा,
लेकिन अबू सुफियान ने तो रात यहीं कहा था कि-
“इस्लाम क़ुबूल कर लो सब ग़ल्तियां मुआफ हो जाएंगी”
#मक्काफतहहोचुकाथा
बिना ज़ुल्मो तशद्दुद, बिना खून बहाए, बिना तीरो तलवार चलाए,
लोग जौक़ दर जौक़ उस आफाक़ी मज़हब को इख्तियार करने और अल्लाह की तौहीद और रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم की रिसालत का इक़रार करने मस्जिद हराम के सहन में जमा हो रहे थे,
और तभी मक्का वालों ने देखा-
“उस हुज़ूम में हिन्दा भी शामिल थी”
ये हुआ करता था इस्लाम- ये थी उसकी तालीमात- ये सिखाया था रहमते आलम صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ने

यौमे_फ़तेह_मक्का मुबारक़ हो!
20 रमज़ान सन 8 हिजरी० को रसूलअल्लाह ﷺ ने मक्का को फ़तेह किया

इमाम उल अंबिया ﷺ काला अमामा शरीफ़ पहन कर मक्का शरीफ़ में दाखिल हुए थे! 10 हज़ार का लश्कर ए इस्लाम हुज़ूर ﷺ के साथ मक्का शरीफ़ में दाख़िल हुआ और ख़ाने काबा से सारे बुत निकाल कर मक्का शरीफ़ को बुतों से पाक कर दिया_
♥___صلی الله عليه وسلم_

UMM IMMARA

UMM IMMARA

She was Nasiba bint Ka‘b ibn ‘Amr ibn ‘Auf ibn ‘Abdhul al-Ansariyya who belonged to Banu Mazin. She was among the first Madinian women to enter Islam. She accompanied the delegate who set out from Madina for Makka in order to give the pledge of faith to the Prophet (pbuh). The delegate consisted of seventy-two persons, two of them were women.

She was a brave woman. In the battle of Uhud she joined the Muslim army with her two sons: ‘Abdullah and Habib. She was to carry water to the Muslim soldiers but when the Muslims were trapped, she had nothing to do but to hold a sword in order to defend the Prophet (pbuh). She received in this battle about thirteen wounds. She remained treating these wounds for a year although she came out bleeding from the battle of Uhud, she went with the Muslim army to fight in the battle of Hamra’ al-Asad, which occurred immediately after the battle of Uhud.

Let us give Umm ‘Imara our ears to recount such amazing story. She said, “I noticed in the battle of Uhud the people leaving the Prophet (pbuh) alone. There were only ten people around him. Subsequently I stood by him beside my two sons and my husband. Many people passed by the Prophet (pbuh) defeated. Meanwhile, the Prophet (pbuh) noticed me unarmed. When he noticed a man fleeing from the battlefield with his weapon, he ordered him saying ‘Throw your weapon to whoever can fight instead.’ Having thrown it, I picked it up and started to defend the Prophet (pbuh). But it is the horsemen who trapped us and put us into difficulty. Were they infantry like us we would defeat them by Allah’s willing. Thereupon, a horseman attacked me. But I received his sword on my shield, and when he turned back I hit the rear of his horse with my sword. The man fell down joggling on his back. Then, the Prophet (pbuh)

Shouted, “O son of Umm ‘Imarah, your mother, your mother!” Then came my son to help me and I killed him.

As years passed, Umm ‘Imara kept on serving the call of Islam at war or peace. When the Prophet (pbuh) died, some Muslim tribes converted led by Musailama, the liar. No sooner did Abu Bakr, the caliph of the Muslims, issue his command to the Muslims to fight the apostates than Umm ‘Imara went forward to Abu Bakr to ask his permission to fight against the apostates. Abu Bakr (may Allah be pleased with him) said to her, “We know that you fight well, you can go (may Allah bless you).”

She set out accompanied by her son, Habib, to fight in the cause of Allah seeking the honor of martyrdom. But Musailama managed to capture her son Habib as a prisoner of war. He tried to convert him but all his efforts and attempts went in vain. He started to cut off Habib’s body into pieces but Habib kept patient and resorted to Allah and sought His pleasure. It was said that Habib’s body was cut off into piles of detached organs.

Yet, Umm ‘Imara set out to fight in the battle of Yamama accompanied by her other son, ‘Abdullah. In this battle, ‘Abdullah managed to kill Musailama aided by Wahshi ibn Harb. Thereupon, when she knew about the death of this tyrant liar she prostrated to Allah. She (may Allah be pleased with her) came out from this battle having twelve wounds. Moreover, she lost her arm and her son ‘Abdullah as well. She was indeed an example of courage and sacrifices to all women anywhere.

Shab-E-Zarbat-E- Ameer-ul-Momineen علیہ السلام

Shab-E-Zarbat-E- Ameer-ul-Momineen علیہ السلام

Yeh Woh Dardnaak Raat Hai Jab Ameer-ul-Momineen Maula Ali Ibn Abi Talib علیه السلام Ko Masjid-e Kufa Ke Mehrab Mein Haalat-E-Namaz Mein Talwar Se Zakhmi Kiya Gaya.

19 Ramzan Ki Fajr Ke Waqt Jab Maula Ali عليه السلام Namaz -E-Fajr Ki Imamat Farma Rahe The Abdur Rahman Ibn Muljim Al Muradi  Ne Zehr Alood Talwar Se Waar Kiya, Jis Se Mehrab-E-Masjid Khoon-e Ali علیه السلام Se Rangeen Ho Gayi.

Us Waqt Maula Ali  عليه السلام Ki Zaban-E-Mubarak Se Yeh Alfaaz Jari Hue:

*“Fuztu Wa Rabbil Kaaba”*
*(Rabb-e Kaaba Ki Qasam! Main Kamyab Ho Gaya)*  😢

Yeh Raat Tareekh-E- Islam Ki Sab Se Ghamgeen Raaton Mein Se Ek Hai, Jab Adl O Shujaat Ka Paikar, Maulal Momineen, Rasool Allah ﷺ Ke Bhai, vassi O Wazir Aur RasoolAllah ﷺ Ke Janasheen Zakhmi Howey.

19 रमजान सब ए ज़रबत अखी ए रसूल ﷺ मौला ए कायनात अली इब्ने अबी तालिब (अलैहिस्सलाम)..😥😥

रसूलल्लाह ﷺ ने हजरत अमीरूल मोमिनिन अली इब्ने अबी तालिब (अलैहिस्सलाम) से इरशाद फरमाया : ए अबू तुरब ! कायेनात के दो2 सबसे बदबख्त तरीन शख्स मैसे 1पहला वो था जिसने हजरत सालेह (अलैहिस्सलाम) कि उटनी की कोची काटी थी, और दूसरा वो होगा जो तेरे सर पर वार करेगा और तेरी दाढ़ी तेरे खून से रंगीन हो जाएगी,,😢😢
📚 मुसनद इमाम अहमद इब्न हंबल, जिल्द:11 सफाह:668
📚 अल मुस्तद्रक हाकिम, जिल्द:4 हदीस नं: 4662
📚 अल मजमुअल कबीर, जिल्द :1 हदीस नं:171

Note”: मौला अली (अलैहिस्सलाम) मस्जिद ए क़ुफ़ा मै हालत ए नमाज और हालत ए रोजा मै थे और लानती मलून इब्ने मुलजिम ने जेहर आलूदा तलवार से वार किया था
#imamali #yahussain #ramzanmubarak #fatima
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