
🔥 माविया पर अल्लाह, फरिश्तों और तमाम लोगों की लानत है.. 🔥
✍️ शेख नासिरुद्दीन अलबानी ने सिलसिला अहादीस ए सहीहा (जिल्द 3, सफा 460) में एक सही हदीस नक़ल करते हैं कि-
عن عبادة بن الصامت مرفوعا اللهم من ظلم اهل المدينة واخافهم فاخفه، وعليه لعنة الله والملائكة والناس اجمعين، لا يقبل منه صرف ولا عدل.
(الصحيحة)
“ऐ अल्लाह, जो अहले मदीना पर जुल्म करे और उन्हें डराए-धमकाए तो तू भी उसे डरा दे और ऐसे आदमी पर अल्लाह तआला, फरिश्तों और तमाम लोगों की लानत होती है और उसकी [ना] फर्जी [यानि फर्ज किया हुआ] इबादत कबूल होगी ना नकली।” (हदीस नं 3392)
इसी रिवायत को इमाम तबरानी ने मुअज्मल अवसत [रकम 3589] में है और इमाम तबरानी की इसी रिवायत को इमाम हैसमी ने मजमआ उल जवाएद की तीसरी जिल्द में सफा नंबर 494 पर रकम नंबर 5823 के तहत नकल करते हुए इसकी सनद को सही कहते हैं, देखें 👇
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वही ए इलाही के बगैर अपनी ख्वाहिश से कुछ ना बोलने वाले नबी करीम सल्ल० के इस फरमान को सामने रखकर माविया को देखें तो पता चलता है क मदीना मुनव्वरा पर यजीद के हमला करने से पहले इसके बाप माविया ने बैत लेने के लिए बुशर बिन अरतात को फौज के साथ मदीना शरीफ भेजकर अहले मदीना को डराया धमकाया और फिर बैत के लिए मदीना शरीफ से हजाज और यमन की तरफ रवाना हुए और यमन में नबी करीम सल्ल० के सगे चचा हजरत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब के बेटे हजरत उबैदुल्ला बिन अब्दुल्ला को और हज़रत अब्बास के दो छोटे छोटे मासूम पोतों का सर तन से जुदा करके उसकी मां यानि हज़रत उबैदुल्ला बिन अब्दुल्ला बिन अब्दुल्ल मुत्तलिब की बीवी के गोद में डाल दिया इससे उसकी मां पागल हो गयीं और बाजारों में अपने बच्चों का नाम लेकर चिल्लाती चीखती और दौड़ती थी।
मदीने में बुशर बिन अरतात ने हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्ला अंसारी रजिअल्लाह अन्हु से जब बैत लेना चाहा तो आप छिपकर उम्मुल-मोमिनीन हज़रत उम्मे सलमा रजिअल्लाह अन्हा से मुलाकात की तो हज़रत उम्मे सलमा ने कहा कि ‘आप अपना और मदीने में अपने कबीले वालों का ख़ून बहने से रोके और आप इस गुमराही की बैत कर लें यहां तक कि बुशर ने मुस्लिम औरतों को कैद करके उनकी शर्मगाहों को खोला और इन औरतों को बाजारों में खड़ा कर दिया।
माविया ने खुद तो मदीने पर लश्कर भेजकर बैत के लिए लोगों को डराया धमकाया जिससे लोग अपनी जान और अहले मदीना को पामाल होने से बचाने के लिए अहले मदीना ने बैत कर ली इतना ही नहीं बल्कि अपने आखिरी वक्त में माविया ने अपने बेटे यजीद को वसीयत की थी कि अहले मदीना से जब तुमको मुकाबला करना पड़े तो मुस्लिम बिन उकबा को फौज देकर भेजना और इस वसीयत के मुताबिक यजीद ने मुस्लिम बिन उकबा को फौज देकर अपनी बैत के लिए अहले मदीना पर हमला करने के लिए भेजा जो तारीख ए इस्लाम में वाक्या ए हुर्रह के नाम से इस हादसे को याद किया जाता है, इस वाक्ये से मुताल्लिक मेरा पोस्ट देखें 👇
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अब हम मुस्तनद रिवायत से से चार बातों को देखते हैं कि-
1) माविया ने बुशर बिन अरतात जैसे जालिम को मदीना मुनव्वरा बैत के लिए भेजा
2) बुशर बिन अरतात ने अहले मदीना को धमकी दी और अहले मदीना अपनी जान माल से डर गयें
3) बुशर बिन अरतात ने जुल्म ओ सितम की इंतिहा कर दी।
4) हज़रत उम्मे सलमा के मुताबिक माविया की बैत गुमराही की बैत है जिसे लोगों ने मजबूरन अपनी जान की हिफाजत के लिए किया।
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इमाम बुखारी के उस्ताद इमाम इब्ने अबी शैबा ने मुसन्नफ में हजरत वहब बिन कैसान रजिअल्लाह अन्हु से रिवायत नक़ल किया है कि हजरत जाबिर बिन अब्दुल्ला अंसारी रजिअल्लाह अन्हु को यह फरमाते हुए सुना कि-
بَعَثَ مُعَاوِیَۃُ إلَی الْمَدِینَۃِ بُسْرَ بْنَ أَرْطَاۃَ لِیُبَایِعَ أَہْلَہَا عَلَی رَایَاتِہِمْ وَقَبَائِلِہِمْ فَلَمَّا..
यानि ‘माविया ने बुशर बिन अरतात को मदीना मुनव्वरा भेजा ताकि वो अहले मदीना से उनके झंडों और कबीलों के ऐतबार से बैत कर लें।’
फिर जिस दिन हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्ला के पास अंसार के आने का दिन था उस रोज उनके पास बनू सलमा [के लोग] आए। उन्होंने [आकर] कहा : हजरत जाबिर हैं ?
लोगों ने कहा : नहीं !
उन्होंने [आपस में] कहा : चलो वापस लौट चलो, मैं उस वक्त तक उनसे बैत नहीं लूंगा जब तक उनके अंदर हज़रत जाबिर नहीं होंगे।
हज़रत जाबिर कहते हैं कि : वो लोग मेरे पास आएं और कहा कि –
نَاشَدْتُک اللَّہَ إلاَّ مَا انْطَلَقْت مَعَنا فَبَایَعْت فَحَقَنْت دَمَک وَدِمَائَ قَوْمِکَ ، فَإِنَّک إنْ لَمْ تَفْعَلْ قُتِلَتْ مُقَاتِلَتُنَا وَسُبِیَتْ ذَرَارِیّنَا..
यानि ‘हम आपको अल्लाह का वास्ता देते हैं कि आप हमारे साथ चलकर बैत कर लें जिससे आपका और हमारे खून महफूज हो जाएं और अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो हमारे लड़ सकने वाले लोग कत्ल कर दिए जाएंगे और हमारे बच्चे कैद हो जाएंगे।’
हज़रत जाबिर ने उनसे रात भर का मोहलत मांगी और जब रात हुई तो नबी करीम सल्ल० की बीवी हजरत उम्मे सलमा रजिअल्लाह अन्हा के पास गयें और उनको पूरी बात बताई तो हज़रत उम्मे सलमा ने फरमाया –
یَا ابْنَ أَخِی ، انْطَلِقْ فَبَایِعْ وَاحْقِنْ دَمَک وَدِمَائَ قَوْمِکَ ، فَإِنِّی قَدْ أَمَرْت ابْنَ أَخِی یَذْہَبُ فَیُبَایِعُ.
यानि ‘ऐ मेरे भतीजे, जाओ बैत कर लो और अपना और अपनी कौम के खून का तहफ्फुज करो क्योंकि मैंने भी अपने भतीजे को बैत का हुक्म दिया है।’
इस हदीस की सनद सही है, देखें मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा की जिल्द नंबर 17 में सफा नंबर 110 पर रकम नंबर 32588 👇
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इस रिवायत का उर्दू तर्जुमा मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा की जिल्द नंबर 9 में सफा नंबर 99 से 100 पर रकम नंबर 31203 के तहत देखें 👇
https://archive.org/details/musannafibnabishaibah11/musannaf%20ibn%20abi%20shaibah%209/page/n100/mode/1up?view=theater
इस बात को और तफ्सील से इमाम बुखारी ने तारीख ए सगीर में नक़ल किया है।
इमाम बुखारी ने तारीख़ ए सगीर की पहली जिल्द में सफा नंबर 141 पर लिखते हैं कि-
حدثني سعيد بن محمد الجرمي ثنا يعقوب بن إبراهيم ثنا أبي عن محمد بن إسحاق حدثني أبو نعيم وهب بن كيسان مولى الزبير أنه سمع جابر بن عبد الله يقول قدم بسر بن أرطاة المدينة زمان معاوية فقال لا أبايع رجلا من بنى سلمة حتى يأتي جابر فأتيت أم سلمة بنت أبي أمية زوج النبي صلى الله عليه وسلم فقالت بايع فقد أمرت عبد الله بن زمعة بن أخي أن يبايع على دمه وماله أنا أعلم أنها بيعة ضلالة.
यानि ‘हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्ला रजिअल्लाह अन्हु कहते हैं : जब बुशर बिन अरतात माविया के दौर में मदीना आया तो इसने कहा कि मैंने बनू सलमा में से किसी से बैत नहीं लूंगा जब तक जाबिर बिन अब्दुल्ला बैत ना करें।
हज़रत जाबिर कहते हैं : मैं उम्मुल-मोमिनीन हज़रत उम्मे सलमा के पास गया तो उन्होंने फरमाया : बैत कर लो मैंने भी अपने भतीजे अब्दुल्ला बिन जमअह को हुक्म दिया है कि वो (माविया के लिए) अपने ख़ून और माल [की हिफाजत] पर बैत करे और कहा:
أنا أعلم أنها بيعة ضلالة.
यानि ‘मैं जानती हूं कि यह गुमराही की बैत है।’
देखें सफा नंबर 141 पर 👇
https://archive.org/details/Tarikh_Sagher_Bukhari/page/n141/mode/1up?view=theater
इमाम बुखारी ने फिर इसी किताब के सफा नंबर 111 पर लिखते हैं कि-
بعث معاوية بسر بن أرطاة سنة سبع وثلاثين فقدم المدينة فبايع ، ثم انطلق إلى مكة واليمن ، فقتل عبد الرحمن ، وقثم وعبيد الله ابني عباس.
यानि ‘माविया ने बुशर बिन अरतात को 37 हिजरी में [मदीना] भेजा तो उसने मदीने आकर बैत ली फिर वो मक्का और यमन की तरफ रवाना हुआ जहां उसने हज़रत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब के बेटे हजरत उबैदुल्ला और पोते अब्दुर्रहमान और किस्म को कत्ल किया।’
देखें सफा 111 पर 👇
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इस बात को इमाम इब्ने हज़र अस्कलानी ने ‘तहजीब उल तहजीब’ में इमाम मिज्ज़ी ने ‘तहज़ीब उल कमाल फी अस्मां उर रिजाल’ की चौथी जिल्द में सफा नंबर 64 पर रकम नंबर 665 के तहत ‘बुशर बिन अरतात’ के हालात में हू-ब-हू इबारत को इमाम बुखारी की तारीख़ ए सगीर से नकल करते हुए लिखा है कि-
وقال البخاري : في التاريخ الصغير : حدثنا : سعيد بن يحيى بن سعيد ، عن زياد ، عن ابن اسحاق ، قال : بعث معاوية بسر بن أبي أرطاة سنة تسع وثلاثين ، فقدم المدينة فبايع ، ثم انطلق إلى مكة واليمن ، فقتل عبد الرحمن ، وقثم ابني عبيد الله بن عباس.
देखें सफा नंबर 64 पर 👇
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फिर इमाम शमशुद्दीन ज़हबी ने ‘सियर अलामिन नुबला’ की तीसरी जिल्द में सफा नंबर 137 पर लिखा है कि बुशर बिन अरतात ने हज़रत अब्बास के दोनों बच्चों को कत्ल कर दिया, देखें 👇
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इमाम इब्ने असाकिर ने ‘तारीख ए मदीना दमिश्क’ की दसवीं जिल्द में सफा नंबर 151 से 152 तक तफ्सील से इस वाक्या को सनद के साथ नकल किया है।
इमाम इब्ने असाकिर ने सफा 151 पर लिखा है कि-
أَخْبَرَنا أبو الحسن بن محمد بن أحمد بن عبد الله، أنبأنا أبو منصور محمد بن الحسن النهاوندي، حدثنا أحمد بن الحسين النهاوندي، أخبرنا عبد الله بن محمد بن عبد الرحمن، حدثنا محمد بن إسماعيل البخاري، حدثنا سعيد بن يحيى، عن زياد عن ابن إسحاق، قال:
بعث معاوية بسر بن أبي أرطأة سنة سبع وثلاثين فقدم المدينة فبايع ثم انطلق إلى مكة واليمن فقتل عبد الرحمن وقثم ابني عبيد الله بن عباس .
यानि ‘माविया ने बुशर बिन अरतात को 37 हिजरी में [मदीना] भेजा तो उसने मदीने आकर बैत ली फिर वो मक्का और यमन की तरफ रवाना हुआ जहां उसने हज़रत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब के बेटे हजरत उबैदुल्ला और पोते अब्दुर्रहमान और किस्म को कत्ल किया।’
फिर सफा नंबर 152 पर लिखा है कि-
بعث معاوية بسر بن أرطأة إلى المدينة ومكة واليمن يستعرض الناس فيقتل من كان في طاعة علي بن أبي طالب.
यानि ‘माविया ने बुशर बिन अरतात को मदीना मुनव्वरा, मक्का शरीफ और यमन की तरफ भेजा ताकि [बैत के लिए] लोगों का जायजा लिया जाए और उन लोगों को कत्ल कर दिया जाए जो हजरत अली के तरफदार हों।’
फिर आगे लिखते हैं कि
‘माविया ने बुशर को शाम से एक लश्कर के साथ रवाना किया तो वो चल पड़ा यहां तक कि मदीना पहुंचा तो उस वक्त वहां के गवर्नर सहाबिए रसूल हजरत अबू अय्यूब अंसारी रजिअल्लाह अन्हु थे जो वहां से हज़रत अली की तरफ़ कूफा भाग गयें फिर बुशर ने मेंबर ए नबवी पर चढ़कर लोगों से कहा कि –
شیخ سمح عهدته ها هنا بالأمس – يعني عثمان رضي الله عنه -وجعل يقول :
يا أهل المدينة، والله لولا ما عهد إلي أمير المؤمنين ما تركت بها محتلماً إلا قتلته.
यानि ‘मैंने इस मुकाम पर हज़रत उस्मान से अहद किया था फिर कहा :
ऐ अहले मदीना, अगर मुझे अमीरुल-मोमिनीन (यानि उस्मान) ने यह अहद ना लिया होता तो मैं तुम्हारे हर बालिग शख्स को कत्ल कर देता।
وبايع أهل المدينة لمعاوية.
यानि ‘फिर अहले मदीना ने माविया की बैत कर ली।’
देखें सफा 151 से 152 पर 👇
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मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा की जिल्द नंबर 11 में सफा नंबर 666 से 667 पर रकम नंबर 38771 के तहत हज़रत अबी रबाब और इनके साथियों से मरवी है कि-
हज़रत अबू ज़र गफ्फारी रजिअल्लाह अन्हु दुआ करते हुए फरमां रहे थे कि अल्लाह हमें यौमिल बला और यौमिल औरह से पनाह मांगी।
तो जब आपसे पूछा गया कि क्या बात है ?
तो हज़रत अबू ज़र ने कहा कि – यौमिल बला से मुराद मुसीबत का दिन यानि जब मुसलमान के दो गिरोह आपस में तलवार चलाएंगे और एक दूसरे का खून बहाया जाएगा, और यौमिल औरह से मुराद शर्मगाह खोलने का दिन यानि जब मुसलमान औरतें कैद किए जाएंगी और उनकी पिंडलियों को खोला जाएगा और इनमें से जो अच्छी यानि मोटी पिंडलियों वाली मुस्लिम औरतें होंगी उन्हें खरीदा बेचा जाएगा,- मैंने अल्लाह से दुआ की है कि मैं उस जमाने को ना पाऊं जबकि तुम लोग उस जमाने को पाओगे।
रावी कहता है कि-
فَقُتِلَ عُثْمَان وَأُرْسِلَ مُعَاوِیَۃُ بْنُ أَبِی أَرْطَاۃَ إِلَی الْیَمَنِ فَسَبَی نِسَائً مِنَ الْمُسْلِمَاتِ فَأُقِمْنَ فِی السُّوقِ.
यानि ‘हजरत उस्मान शहीद कर दिए गए फिर [इसके बाद] माविया ने बुशर बिन अरतात को यमन भेजा तो उन्होंने मुस्लिम औरतों को कैद करके बाजार में खड़ा कर दिया था।’
इमाम इब्ने हज़र अस्कलानी ने ‘अल इसाबा फी तम्यीजुस् सहाबा’ में, इमाम अब्दुल बर्र ने ‘अल इस्तियाब’ में और इमाम इब्ने असीर जज़री ने “उस्दुल गाबा फी मआरिफतुस् सहाबा’ में बुशर बिन अरतात के हालात में और बहुत कुछ लिखा है जैसे कि-
وقال الدارقطني : له صحبة ، ولم تكن له استقامة بعد النبي ﷺ.
यानि ‘इमाम दारे क़ुतनी कहते हैं कि यह सहाबी है मगर नबी करीम ﷺ के बाद इसके हालात ठीक नहीं रहे।
كان يحيى بن معين يقول فيه : رجل سوء”.
यानि ‘यहया बिन मोईन कहते हैं कि यह बुरा आदमी था।’
इमाम अब्दुल बर्र ने अल इस्तियाब में लिखते हैं कि-
وقال الدار قطني : له صحبة ولم تكن له استقامة بعد النبي الله ، وهو الذي قتل طفلين لعبيد الله بن عباس بن عبد المطلب باليمن في خلافة معاوية، وهما عبد الرحمن و قثم ابنا عبيد الله بن العباس.
यानि ‘इमाम दारे क़ुतनी कहते हैं कि वह सहाबी है लेकिन नबी करीम ﷺ के बाद उसके हालात ठीक नहीं रहे, यह वही है जिसने हज़रत अबू उबैदुल्ला बिन अब्बास के दो बच्चों को यमन में मारा,- यह वाक्या माविया के ख़िलाफत के ज़माने का है वो दोनों बच्चे अब्दुर्रहमान और किस्म थे।’
इमाम इब्ने असीर जज़री ने उस्दुल गाबा में यहां तक लिखा है कि ‘हजरत अब्बास के दो छोटे पोतों का सर काटकर मां की गोद में डाल दिया जिससे मां पागल हो गई और अपने चेहरे पर तमाचे मारती थी।’
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इन सभी दलीलों से यह बात साबित होता है कि माविया ने बुशर को मदीना पर अपनी बैत के लिए भेजा जो वहां जाकर लोगों को डराया और हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्ला अंसारी रजिअल्लाह अन्हु और बनू सलमा के लोग अपने जान माल की हिफाजत करने के लिए डरकर बैत कर ली और हज़रत उम्मे सलमा ने इस बैत को गुमराही की बैत कहा..और बुशर ने शियाने अली को कत्ल किया और मुस्लिम औरतों को कैद करके बाजारों में बेचा।
क्या नबी करीम सल्ल० के फरमान और इन सभी रिवायतों को सामने रखकर अभी भी हम या कोई माविया पर लानत नहीं कर सकते जबकि नबी करीम सल्ल० ने अहले मदीना को डराने-धमकाने वालों पर अल्लाह की, तमाम मोमिनीन की और फरिश्तों की लानत भेजी है।
यजीद ने वाक्या हुर्रह में अपने बाप माविया के वसीयत के मुताबिक ही मदीना पर बैत के लिए हमला किया था क्योंकि बेटे से पहले खुद यजीद के बाप माविया ने भी यही किया था।
शैख ए मुहक्किक हज़रत शैख अब्दुल हक़ मोहद्दिस देहलवी ने तारीख ए मदीना में लिखा है कि-
“‘इब्ने शैबा सनद सही से बयान करते हैं कि मदीना मुनव्वरा के बूढ़े लोग बातें करते हैं कि माविया ने अपनी मौत के वक्त यजीद पलीद को अपने पास बुलवाकर कहा कि मुझे मालूम होता है कि तुम्हें अहले मदीना से एक दिन निपटना पड़ेगा [तब] तुम्हें जरुरी है कि तुम मुस्लिम बिन उकबा के जरिए इसका इलाज करना क्योंकि मैं उससे ज्यादा नासिह (अच्छा उपाय बताने वाला) इस मामले में मुझे मालूम नहीं होता।
जब यजीद पलीद बाप की वफात के बाद तख्त ए अमारत पर बैठा तो उसे इस तरह का वाक्या जिस तरह हमने बयान किया है – पेश आया [तो] उसने बाप की वसीयत पर अमल किया और मुहिम अहले मदीना को सर ए अंजाम दिया।'”
देखें सफा 45 पर 👇
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अब अगर कोई यह कहे कि अहले मदीना को माविया ने नहीं बल्कि बुशर बिन अरतात ने डराया धमकाया था तो इसमें माविया लानती कैसे हो सकता है ?
तो उससे सवाल यह है कि बुशर को अपनी बैत के लिए मदीना भेजा किसने था और शायद वो शराब के बारे में हदीस नहीं जानता कि सिर्फ शराब पीने वाले पर अल्लाह की लानत और अजाब नहीं है बल्कि आठ लोगों पर लानत है कि शराब पीने वाले, बेचने वाले, खरीदने वाले, इसका हिसाब किताब रखने वाले, लाने वाले, ले जाने वाले… – तो इसी तरह से क्या शराब पीने का जुर्म मदीना मुनव्वरा की बेहुरमती से भी छोटा जुर्म है (अबू दाऊद, 3674) ??
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