अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 70

ग़ज़वा नज्द

ग़ज़वा बनी नज़ीर में किसी क़ुरबानी के बग़ैर मुसलमानों को शानदार कामियाबी हासिल हुईं | इससे मदीने में मुसलमानों की सत्ता मज़बूत हो गई और मुनाफ़िक़ों पर निराशा छा गई। अब उन्हें कुछ खुलकर करने की जुर्रात नहीं हो रही थी ।

इस तरह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उन बहुओं की खबर लेने के लिए यकसू हो गए, जिन्होंने उहुद के बाद ही से मुसलमानों को बड़ी कठिनाइयों में उलझा रखा था और बड़े ज़ालिमाना तरीक़े से अल्लाह की दावत देने वालों पर हपले कर करके उन्हें मौत के घाट उतार चुके थे और अब उनकी जुर्रत इस हद तक बढ़ चुकी थी कि वे मदीने पर चढ़ाई की सोच रहे थे ।

चुनांचे ग़ज़वा बनी नज़ीर से छूटने के बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अभी इन झूठों को सिखाने के लिए उठे भी न थे कि आपको सूचना मिली कि बनू ग़तफ़ान के दो क़बीले बनू मुहारिब और बनू सालबा लड़ाई के लिए बहुओं और अरब के देहातियों के लोगों को जमा कर रहे हैं।

इस ख़बर के मिलते ही नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नज्द पर धावा बोलने का फ़ैसला किया और नज्द के रेगिस्तानों में दूर तक घुसते चले गए, जिसका मक़सद यह था कि इन संगदिल बहुओं पर भय छा जाए और दोबारा मुसलमानों के खिलाफ़ पहले जैसी संगीन कार्रवाइयों को दोहराने की जुर्रत न करें।

इधर उद्दंड बहू, जो लूटमार की तैयारियां कर रहे थे, मुसलमानों के इस यकायकी धावे की खबर सुनते ही डरकर भाग खड़े हुए और पहाड़ो की चोटियों में जा दुबके ।

1. लेखक अब्दुर्रज़्ज़ाक़ 8/358-360, हदीस 9733, सुनन अबी दाऊद किताबुल खिराज वल फै वल आरा बाब फ्री ख़बरुन नज़ीर 2/15



मुसलमानों ने लुटेरे क़बीलों पर अपना रौब व दबदबा कायम करने के बाद अम्न व अमान के साथ वापस मदीने की राह ली।

सीरत लिखने वालों ने इस सिलसिले में एक निश्चित ग़ज़वे का नाम लिया है, जो रबीउल आखिर या जुमादल ऊला सन् 04 हि० में नज्द भू-भाग पर पेश आरया था और वे इसी ग़ज़वा को ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ क़रार देते हैं।

जहां तक तथ्यों और प्रमाणों का ताल्लुक़ है, तो इसमें सन्देह नहीं कि इन दिनों में नज्द के अन्दर एक ग़ज़वा पेश आया था, क्योंकि मदीना के हालात ही कुछ ऐसे थे । अबू सुफ़ियान ने उहुद की लड़ाई से वापसी के वक़्त अगले साल बद्र के मैदान में लड़ाई के लिए ललकारा था और जिसे मुसलमानों ने मंजूर कर लिया था। अब उसका वक़्त क़रीब आ रहा था और सामरिक दृष्टि से यह बात किसी तरह मुनासिब न थी कि बहुओं और अरब देहातियों को उनकी सरकशी और उद्दंडता पर क़ायम छोड़कर बद्र जैसी ज़ोरदार लड़ाई में जाने के लिए मदीना खाली कर दिया जाए, बल्कि ज़रूरी था कि बद्र के मैदान में जिस भयानक लड़ाई की उम्मीद थी, उसके लिए निकलने से पहले, इन बहुओं की उछल-कूद पर ऐसी चोट लगाई जाए कि उन्हें मदीना का रुख करने की जुर्रत न हो।

बाक़ी रही यह बात कि यही ग़ज़वा जो रबीउल आखर या जुमादल ऊला सन् 04 हि० में पेश आया था, ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ था, हमारी खोज के मुताबिक़ सही नहीं, क्योंकि ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ में हज़रत अबू हुरैरह रजि० और हज़रत अबू मूसा अशअरी रज़ि० मौजूद थे और अबू हुरैरह रज़ि० ख़ैबर की लड़ाई से कुछ दिन पहले इस्लाम लाए थे।

इसी तरह हज़रत अबू मूसा अशअरी रज़ि० मुसलमान होकर यमन से रवाना हुए तो उनकी सवारी साहिल हब्शा से जा लगी थी और वह हब्शा से उस वक़्त वापस आए थे जब नबी सल्ल० ख़ैबर में तशरीफ़ रखते थे। इस तरह वह पहली बार खैबर ही के अन्दर नबी सल्ल० की खिदमत में हाज़िर हो सके थे। पस ज़रूरी है कि ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ ग़ज़वा खैबर के बाद पेश आया हो ।

सन् 04 हि० के एक अर्से के बाद ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ के पेश आने की एक निशानी यह भी है कि नबी सल्ल० ने ग़ज़वा ज़ातुर्रिक़ाअ में खौफ़ की नमाज़’

1. लड़ाई की हालत में पढ़ी गई नमाज़ को ‘खौफ की नमाज़’ कहते हैं, जिसका एक तरीका यह है कि आधी फ़ौज हथियार बन्द होकर इमाम के पीछे नमाज़ पढ़े, बाक़ी आधी फ़ौज हथियार बांधे दुश्मन पर नज़र रखे। एक रक्अत के बाद यह फ़ौज इमाम

पढ़ी थी और ख़ौफ़ की नमाज़ पहले पहल ग़ज़वा अस्फ़ान में पढ़ी गई और इसमें कोई मतभेद नहीं कि ग़ज़वा अस्फ़ान का ज़माना राज़वा खंदक़ के भी बाद का है, जबकि ग़ज़वा खंदक़ का ज़माना सन् 05 हि० के आखिर का है।

सच तो यह है कि ग़ज़वा अस्फ़ान हुदैबिया के सफ़र की एक छोटी-सी घटना है और हुदैबिया का सफ़र सन् 06 हि० के आखिर में हुआ था, जिससे वापस आकर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ख़ैबर का रास्ता लिया था, इसलिए इस दृष्टि से भी ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ का ज़माना ख़ैबर के ज़माने के बाद का ही साबित होता है।

फातिमा फहरी और मरियम फहरी

बारह सौ साल से ज्यादा हो गए ट्यूनीशिया के शहर कैरवान में मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह फहरी नाम के एक व्यापारी रहते थे वह शहर के प्रतिष्ठित लोगों में से थे नेक लोगों में शुमार होता था शिक्षा दौलत और नेकी सभी गुण उन में थे फातेहीन के खानदान से थे उन के पूर्वजों में से उकबा बिन नाफे ने इस कैरवान शहर को बसाया था

उन की दो छोटी और प्यारी बच्चियां थीं नाम था फातिमा और मरियम

पड़ोसी देश मोरक्को मे इदरीसी सल्तनत कायम हुई थी जिस की शान व शौकत के चर्चे ज़ोरों पर थे वहां के सुलतान इदरीस सानी एक नया शहर बसा रहे थे जिस का नाम फास  (इंग्लिश में Fez) था और इसे वह अपनी राजधानी बनाना चाहते थे

मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह फहरी ने नए शहर के चर्चे सुने देखने का शौक हुआ वहाँ गए शहर पसंद आ गया इस नए फास शहर में आबाद होने का इरादा कर लिया कैरवान शहर से कारोबार समेटा और फास में व्यापार फैला लिया चूंकि कैरवान शहर छोड़ कर आए थे इस लिए नए शहर में इन के घराने को करवीइन कहा जाने लगा

दोनों बच्चियां बड़ी हो रही थी दोनों की अपने ही जैसे व्यापारिक खानदानों में शादी कर दी

लेकिन कुदरत को कुछ और मंजूर था बेटियों की शादी के कुछ वर्षों बाद उन का इंतकाल हो गया उन की जायदाद बेटियों के हिस्से में आई बेटियां पहले ही मालदार घरानों में थीं किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी वह वालिद की विरासत को किसी अच्छे और नेक काम में लगाना चाहती थीं

अल्लाह का करना ऐसा हुआ कि मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह फहरी के इंतकाल के कुछ महीने बाद उन के बड़े दामाद का भी इंतकाल हो गया इस तरह बड़ी बेटी फातिमा पर दोहरा गम आ पड़ा वालिद के साथ साथ शौहर का गम

लेकिन दोनों बच्चियों की तरबियत एक नेक और व्यापारी बाप ने की थी दोनों पर उन का प्रभाव था बेटी फातिमा ने अपने शौहर का कारोबार बखूबी संभाल लिया

फातिमा ने दूसरी शादी नहीं की खुद की औलाद नहीं थी इस लिए गरीब और यतीम बच्चों को पालने लगीं यहाँ तक कि वह उम्मुल बनीन कही जाने लगीं यानी ढेर सारे बच्चों की माँ

दोनों बहनों ने अपने वालिद से मिले पैसे से एक एक मस्जिद और मदरसा बनाया फातिमा के बनाए हुए मदरसा का नाम क़रवीन और मरियम के बनाए हुए मदरसा का नाम उंदलुस था

1200 साल गुजर गए बनाने वालियों का खुलूस था या  कोई और बात थी आज भी दोनों मदरसे मौजूद हैं बस क़रवीन युनिवर्सिटी बन चुकी है और उंदलुस एक कालेज है

क़रवीन युनिवर्सिटी को दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी युनिवर्सिटी कहा जाता है फातिमा जो उम्मुल बनीन फातिमा फहरी के नाम से मशहूर हुई उन का नाम इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गया आज हम में से तकरीबन हर आदमी उन का नाम जानता है उन की इज्जत व एहतराम करता है

यह मदरसा जो आगे चलकर युनिवर्सिटी बना इस की स्थापना सन 859 ईस्वी में हुई और सन 878 में फातिमा फहरी का इंतकाल हो गया

फातिमा फहरी और उन की बहन मरियम फहरी जैसी बहुत सी खवातीन हमारे इस्लामिक हिस्ट्री का हिस्सा हैं हमें कभी-कभी उन्हें याद करते रहना चाहिए

तीन सवाल और उनके जवाब अहलेसुन्नत की कुतुब की रोशनी में…पूरा ज़रूर पढ़िए*

*तीन सवाल और उनके जवाब अहलेसुन्नत की कुतुब की रोशनी में…पूरा ज़रूर पढ़िए*

1️⃣ *हज़रत अली अलैहिस्सलाम से बुग़ज़ रखने वाला क्या कहलाता है ❓*

2️⃣ *क्या कोई ऐसा इंसान भी गुज़रा है जो हज़रत अली अलैहिस्सलाम से बुग़ज़ रखता था ❓*

3️⃣ *हज़रत अली अलैहिस्सलाम से बुग़ज़ रखने वाले कि सज़ा क्या है ❓*


👆ये सब बातें हर मुसलमान को जानना बहुत ज़रूरी है, ताकि वो हक़ व बातिल में फ़र्क़ कर सके।नही तो होता क्या है एक मुसलमान जिसे अच्छा और नेक समझ रहा होता है वो दरअसल बुरा और जहन्नमी निकलता है तो फिर इंसान अपना सर पीट लेता है।तो चलिए देखते हैं ऊपर लिखी बातों में कितनी सच्चाई है और आख़िर वो कौन है जिसके बारे में ये बातें हुज़ूर पाक saws ने बताई हैं।

*पहले सवाल का जवाब👉*

حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، وَأَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنِ الْأَعْمَشِ، ح وَحَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ يَحْيَى، وَاللَّفْظُ لَهُ، أَخْبَرَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنِ الْأَعْمَشِ، عَنْ عَدِيِّ بْنِ ثَابِتٍ، عَنْ زِرٍّ، قَالَ: قَالَ عَلِيٌّ: وَالَّذِي فَلَقَ الْحَبَّةَ، وَبَرَأَ النَّسَمَةَ، إِنَّهُ لَعَهْدُ النَّبِيِّ الْأُمِّيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِلَيَّ: «أَنْ لَا يُحِبَّنِي إِلَّا مُؤْمِنٌ، وَلَا يُبْغِضَنِي إِلَّا مُنَافِقٌ»

तर्जुमा- हज़रत अली र अ ने फ़रमाया :  उस ज़ात की क़सम जिसने दाने को फाड़ा और रूह को तख़लीक़ किया ! नबी ए उम्मी saws ने मुझे बता दिया था कि *”मेरे साथ मोमिन के सिवा कोई मोहब्बत नही करेगा और मुनाफ़िक़ के सिवा कोई बुग़ज़ नही रखेगा”*

Sahih Muslim#240


👈  ۔ (۱۲۲۹۵)۔ وَعَنْ اُمِّ سَلَمَۃَ ‌رضی ‌اللہ ‌عنہا  زَوْجِ النَّبِیِّ ‌صلی ‌اللہ ‌علیہ ‌وآلہ ‌وسلم  قَالَتْ: سَمِعْتُ رَسُوْلَ اللّٰہِ ‌صلی ‌اللہ ‌علیہ ‌وآلہ ‌وسلم یَقُوْلُ لِعَلِیٍّ: ((لَا یُبْغِضُکَ مُؤْمِنٌ وَلَا یُحِبُّکَ مُنَافِقٌ۔)) (مسند احمد: ۲۷۰۴۰)

तर्जुमा-सय्यदा उम्मे सलमा र अ से रिवायत है कि *रसूलअल्लाह saws ने सैयदना हज़रत अली र अ से फ़रमाया : कोई मोमिन तुझसे बुग़ज़ नही रख सकता और कोई मुनाफ़िक़ तुझसे मोहब्बत नही कर सकता।*

Musnad Ahmed#12295

👈  حَدَّثَنَا أَبُو جَعْفَرٍ أَحْمَدُ بْنُ عُبَيْدٍ الْحَافِظُ، بِهَمْدَانَ، ثنا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ الْفَسَوِيُّ، ثنا إِسْحَاقُ بْنُ بِشْرٍ الْكَاهِلِيُّ، ثنا شَرِيكٌ، عَنْ قَيْسِ بْنِ مُسْلِمٍ، عَنْ أَبِي عَبْدِ اللَّهِ الْجَدَلِيِّ، عَنْ أَبِي ذَرٍّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: «مَا كُنَّا نَعْرِفُ الْمُنَافِقِينَ إِلَّا بِتَكْذِيبِهِمُ اللَّهَ وَرَسُولَهُ، وَالتَّخَلُّفَ عَنِ الصَّلَوَاتِ، وَالْبُغْضِ لِعَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ» هَذَا حَدِيثٌ صَحِيحٌ عَلَى شَرْطِ مُسْلِمٍ وَلَمْ يُخَرِّجَاهُ “”
[التعليق – من تلخيص الذهبي] 4643 – بل إسحاق بن بشر متهم بالكذب

तर्जुमा- हज़रत अबुज़र र अ फ़रमाते हैं : *हम मुनाफ़ेक़ीन को अल्लाह और उसके रसूल की तक्ज़ीब और नमाज़ों से पीछे रहने और हज़रत अली इब्ने अबी तालिब र अ के बुग्ज़ से पहचानते थे।*

Al Mustadrak Hakim#4643

👈   أَخْبَرَنِي أَحْمَدُ بْنُ عُثْمَانَ بْنِ يَحْيَى الْمُقْرِي، بِبَغْدَادَ، ثنا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي الْعَوَّامِ الرِّيَاحِيُّ، ثنا أَبُو زَيْدٍ سَعِيدُ بْنُ أَوْسٍ الْأَنْصَارِيُّ، ثنا عَوْفُ عَنْ أَبِي عُثْمَانَ النَّهْدِيُّ قَالَ: قَالَ رَجُلٌ لِسَلْمَانَ: مَا أَشَدَّ حُبُّكَ لِعَلِيٍّ، قَالَ: سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: «مَنْ أَحَبَّ عَلِيًّا فَقَدْ أَحَبَّنِي، وَمَنْ أَبْغَضَ عَلِيًّا فَقَدْ أَبْغَضَنِي» هَذَا حَدِيثٌ صَحِيحٌ عَلَى شَرْطِ الشَّيْخَيْنِ، وَلَمْ يُخَرِّجَاهُ “”
[التعليق – من تلخيص الذهبي] 4648 – على شرط البخاري ومسلم

तर्जुमा- हज़रत ओफ़ बिन अबु उस्मान फ़रमाते हैं : एक आदमी ने मुसलमान से पूछा : *तू हज़रत अली र अ से इतनी शदीद मोहब्बत क्यों करता है ? उसने कहा : इसलिए के मेने रसूलअल्लाह saws का ये इरशाद सुन रखा है “जिसने अली से मोहब्बत की उसने मुझसे मोहब्बत की और जिसने अली से बुग़ज़ रखा उसने मुझ रसूल से बुग़ज़ रखा।”*

Al Mustadrak Hakim#4648


*दूसरे सवाल का जवाब👉*

👈أَخْبَرَنِي مُحَمَّدُ بْنُ الْمُؤَمَّلِ بْنِ الْحَسَنِ، حَدَّثَنَا الْفَضْلُ بْنُ مُحَمَّدٍ، ثَنَا نُعَيْمُ بْنُ حَمَّادٍ، ثَنَا الْوَلِيدُ بْنُ مُسْلِمٍ، عَنْ أَبِي رَافِعٍ إِسْمَاعِيلَ بْنِ رَافِعٍ، عَنْ أَبِي نَضْرَةَ، قَالَ: قَالَ أَبُو سَعِيدٍ الْخُدْرِيُّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «إِنَّ أَهْلَ بَيْتِي سَيَلْقَوْنَ مِنْ بَعْدِي مِنْ أُمَّتِي قَتْلًا وَتَشْرِيدًا، وَإِنَّ أَشَدَّ قَوْمِنَا لَنَا بُغْضًا بَنُو أُمَيَّةَ، وَبَنُو الْمُغِيرَةِ، وَبَنُو مَخْزُومٍ» هَذَا حَدِيثٌ صَحِيحُ الْإِسْنَادِ، وَلَمْ يُخْرِجَاهُ “

तर्जुमा- हज़रत अबु सईद ख़ुदरी र अ फ़रमाते हैं कि रसूलअल्लाह saws ने इरशाद फ़रमाया : *मेरे बाद मेरी उम्मत की जानिब से मेरे अहलेबैत को क़त्ल किया जाएगा और उन्हें भागने का सामना होगा और मेरी क़ौम के साथ सबसे ज़्यादा बुग़ज़ रखने वाले लोग बनु उमय्या,बनु मुगेरा और बनु मख्ज़ूम हैं।*

Al Mustadrak Hakim#8500

👈   أَخْبَرَنَا إِسْحَاقُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ خَالِدٍ الْهَاشِمِيُّ بِالْكُوفَةِ، ثنا أَحْمَدُ بْنُ حَازِمِ بْنِ أَبِي غَرْزَةَ الْغِفَارِيُّ، ثنا خَالِدُ بْنُ مَخْلَدٍ الْقَطَوَانِيُّ، وَأَخْبَرَنِي أَبُو سَعِيدٍ عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ أَحْمَدَ الْمُؤَذِّنُ، ثنا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْحَاقَ الْإِمَامُ، ثنا عَلِيُّ بْنُ مُسْلِمٍ، ثنا خَالِدُ بْنُ مَخْلَدٍ، ثنا عَلِيُّ بْنُ مُسْهِرٍ، عَنْ مَيْسَرَةَ بْنِ حَبِيبٍ، عَنِ الْمِنْهَالِ بْنِ عَمْرٍو، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، قَالَ: كُنَّا مَعَ ابْنِ عَبَّاسٍ بِعَرَفَةَ، فَقَالَ لِي: يَا سَيِّدُ مَا لِي لَا أَسْمَعُ النَّاسَ يُلَبُّونَ؟ فَقُلْتُ: يَخَافُونَ مِنْ مُعَاوِيَةَ، قَالَ: فَخَرَجَ ابْنُ عَبَّاسٍ مِنْ فُسْطَاطِهِ، فَقَالَ: «لَبَّيْكَ اللَّهُمَّ لَبَّيْكَ، فَإِنَّهُمْ قَدْ تَرَكُوا السُّنَّةَ مِنْ بُغْضِ عَلِيٍّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ» هَذَا حَدِيثٌ صَحِيحٌ عَلَى شَرْطِ الشَّيْخَيْنِ، وَلَمْ يُخَرِّجَاهُ “

तर्जुमा-हज़रत सईद इब्ने जबीर र अ फ़रमाते हैं : हम इब्ने अब्बास र अ के हमराह अरफ़ात में थे, उन्होंने मुझसे कहा: ए सरदार क्या बात है ? आज लोगों के तलबिया कहने की आवाज़ सुनाई नही दे रही? *मेने जवाब दिया : लोग मुआविया से ख़ौफ़ खाए हुए हैं(इसलिए तलबिया नही पढ़ रहे) आप फ़रमाते हैं(ये सुन कर) इब्ने अब्बास र अ अपने ख़ेमे से बाहर आए और बुलंद आवाज़ से तलबिया(लब्बेक अल्लाहुम्मा लब्बेक) कहते हुए फरमाने लगे : लोगों (मुआविया) ने अली के बुग्ज़ की वजह से सुन्नत को छोड़ रखा है।*

Al Mustadrak Hakim#1706

👈    أَخْبَرَنَا أَحْمَدُ بْنُ عُثْمَانَ بْنِ حَكِيمٍ الْأَوْدِيُّ قَالَ حَدَّثَنَا خَالِدُ بْنُ مَخْلَدٍ قَالَ حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ صَالِحٍ عَنْ مَيْسَرَةَ بْنِ حَبِيبٍ عَنْ الْمِنْهَالِ بْنِ عَمْرٍو عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ قَالَ كُنْتُ مَعَ ابْنِ عَبَّاسٍ بِعَرَفَاتٍ فَقَالَ مَا لِي لَا أَسْمَعُ النَّاسَ يُلَبُّونَ قُلْتُ يَخَافُونَ مِنْ مُعَاوِيَةَ فَخَرَجَ ابْنُ عَبَّاسٍ مِنْ فُسْطَاطِهِ فَقَالَ لَبَّيْكَ اللَّهُمَّ لَبَّيْكَ لَبَّيْكَ فَإِنَّهُمْ قَدْ تَرَكُوا السُّنَّةَ مِنْ بُغْضِ عَلِيٍّ


हज़रत सईद-बिन-जुबैर बयान करते हैं कि मैं हज़रत इब्ने-अब्बास (रज़ि०) के साथ अराफ़ात में था। वो फ़रमाने लगे : क्या वजह है कि मैं लोगों को लब्बैक पुकारते नहीं सुनता? *मैंने कहा : वो हज़रत मुआविया (रज़ि०) से डरते हैं। हज़रत इब्ने-अब्बास (रज़ि०) अपने ख़ेमे से निकले और बुलन्द आवाज़ से पुकारा :  ( لَبَّیْکَ اللّٰھُمَّ لَبَّیْکَ لَبَّیْکَ  ) ताज्जुब है कि उन्होंने(मुआविया) ने हज़रत अली (रज़ि०) से बुग़्ज़ रखने की वजह से रसूलुल्लाह ﷺ की सुन्नत छोड़ दी है।*

Sunan Nasai#3009

 
*तीसरे सवाल का जवाब👉*

👈حَدَّثَنَا أَبُو عَبْدِ اللَّهِ مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ الصَّفَّارُ، ثنا أَبُو عَبْدِ اللَّهِ مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الْحَسَنِ الْأَصْبَهَانِيُّ، ثنا مُحَمَّدُ بْنُ بُكَيْرٍ الْحَضْرَمِيُّ، ثنا مُحَمَّدُ بْنُ فُضَيْلٍ الضَّبِّيُّ، ثنا أَبَانُ بْنُ جَعْفَرِ بْنِ ثَعْلَبٍ، عَنْ جَعْفَرِ بْنِ إِيَاسٍ، عَنْ أَبِي نَضْرَةَ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ لَا يَبْغَضُنَا أَهْلَ الْبَيْتِ أَحَدٌ إِلَّا أَدْخَلَهُ اللَّهُ النَّارَ» هَذَا حَدِيثٌ صَحِيحٌ عَلَى شَرْطِ مُسْلِمٍ وَلَمْ يُخَرِّجَاهُ “”
[التعليق – من تلخيص الذهبي] 4717 – سكت عنه الذهبي في التلخيص

तर्जुमा-हज़रत अबु सईद ख़ुदरी र अ फ़रमाते हैं : *रसूलअल्लाह saws ने इरशाद फ़रमाया : उस ज़ात की क़सम ! जो शख़्स मेरे अहलेबैत से बुग़ज़ रखेगा ,अल्लाह तआला उसे दोज़ख़🔥 में डालेगा।*

Al Mustadrak Hakim#4717


🙏 *खुलासा ए कलाम ये है कि पहले सवाल का जवाब ये है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम से बुग़ज़ रखने वाले मौजूद थे और जो हज़रत अली से बुग़ज़ रखे वो मुनाफ़िक़ कहलाता है हुज़ूर पाक के क़ौल व फ़रमान के मुताबिक़, और हज़रत अली से जिसने सबसे ज़्यादा बुग़ज़ रखा वो मोआविया  बिन अबु सुफ़ियान था जिसने हज़रत अली अस से बुग़ज़ के चक्कर मे रसूलअल्लाह saws की सुन्नत तक तब्दील कर दी थी। और रसूलअल्लाह saws ने ख़ुद फ़रमाया हैं कि जो मेरे अहलेबैत से बुग़ज़ रखे अल्लाह तआला उसे दोज़ख़🔥 मतलब जहन्नम में डालेगा।*

*अब आप मुसलमान भाईयों से हाथ जोड़कर🙏 गुज़ारिश है कि अपनी अक़ीदत व मोहब्बत ऐसे शख़्स से रखें जो मुनाफ़िक़👹 और जहन्नमी न हो।*