
Syeda Fatima Bint e Asad Ki Shadi | Serial Part 02/08 | Syed Tayyab Shah Jelani



हज़रत साद ने (घायल होने के बाद) दुआ की कि ऐ अल्लाह ! तू जानता है कि जिस क़ौम ने तेरे रसूल को झुठलाया और उन्हें निकाल बाहर किया, उनसे तेरी राह में जिहाद करना मुझे जितना प्रिय है, उतना किसी और क़ौम से नहीं है। ऐ अल्लाह ! मैं समझता हूं कि अब तूने हमारी और उनकी लड़ाई को आखिरी मरहले तक पहुंचा दिया है, पस अगर कुरैश की लड़ाई कुछ बाक़ी रह गई हो, तो मुझे उनके लिए बाक़ी रख कि मैं उनसे तेरी राह में जिहाद करूं और अगर तूने लड़ाई खत्म कर दी है, तो इसी घाव को जारी करके इसे मेरी मौत की वजह बना दे ।’
उनकी इस दुआ का आखिरी टुकड़ा यह था (लेकिन) मुझे मौत न दे, यहां तक कि बनू कुरैज़ा के मामले में मेरी आंखों को ठंडक हासिल हो जाए। 2
बहरहाल एक ओर मुसलमान लड़ाई के मोर्चे पर इन परेशानियों को सहन कर रहे थे, तो दूसरी ओर षड्यंत्र के सांप अपने बिलों में हरकत कर रहे थे और इस कोशिश में थे कि मुसलमानों के देह में अपना विष उतार दें।
चुनांचे बनू नज़ीर का सबसे बड़ा अपराधी, हुइ बिन अख़तब, बनू कुरैज़ा के मुहल्ले में आया और उनके सरदार काब बिन असद कुरजी के पास हाज़िर हुआ। यह काब बिन असद वही आदमी है जो बनू कुरैज़ा की ओर से वायदाइक़रार करने का अधिकारी था और जिसने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह समझौता किया था कि लड़ाई के मौक़ों पर आपकी मदद करेगा (जैसा कि पीछे के पन्नों में गुज़र चुका है ।) है।
हुइ ने आकर उसके दरवाज़े पर दस्तक दी, तो उसने दरवाज़ा अन्दर से बंद कर लिया। मगर हुइ उससे ऐसी-ऐसी बातें करता रहा कि आखिरकार उसने दरवाज़ा खोल ही दिया।
हुइ ने कहा, ऐ काब ! मैं तुम्हारे पास ज़माने की इज़्ज़त और चढ़ा हुआ समुद्र लेकर आया हूं। मैंने कुरैश को उसके सरदारों और नेताओं सहित लाकर रूमा के मजमअल अस्याल में उतार दिया है और बनू ग़तफ़ान से उनके सरदारों और नेताओं समेत उहुद के पास ज़म्ब नक़मी में पड़ाव डलवा दिया है। इन लोगों ने मुझसे वायदा इक़रार किया है कि वे मुहम्मद (सल्ल०) और उनके साथियों का पूरा सफ़ाया किए बिना यहां से न टलेंगे।
काब ने कहा, खुदा की क़सम ! तुम मेरे पास ज़माने की ज़िल्लत और बरसा हुआ बादल लेकर आए हो जो सिर्फ़ गरज-चमक रहा है, पर उसमें कुछ रह नहीं
1. सहीह बुखारी, 2/591 2. इब्ने हिशाम 2/227
गया है । हुइ ! तुझ पर अफ़सोस ! मुझे मेरे हाल पर छोड़ दे। मैंने सच्चाई और वफ़ादारी के सिवा कुछ नहीं देखा है। मुहम्मद में मगर हुइ उसको बराबर चोटी और कंधे में बटता और लपेटता रहा, यहां तक कि उसे राम कर ही लिया। अलबत्ता उसे इस मक़सद के लिए वायदा व इक़रार करना पड़ा कि अगर कुरैश ने मुहम्मद को ख़त्म किए बग़ैर वापसी की राह ली, तो मैं भी तुम्हारे साथ तुम्हारे क़िले में दाखिल हो जाऊंगा, फिर जो अंजाम तुम्हारा होगा, वही मेरा भी होगा।
हुइ के इस क़ौल-क़रार के बाद काब बिन असद ने रसूलुल्लाह सल्ल० से किया हुआ समझौता तोड़ दिया और मुसलमानों के साथ तै की हुई ज़िम्मेदारियों से बरी होकर उनके खिलाफ़ मुश्किों की ओर से लड़ाई में शरीक हो गया।
इसके बाद कुरैज़ा के यहूदी अमली तौर पर जंगी कार्रवाइयों में लग गए।
इब्ने इस्हाक़ का बयान है कि हज़रत सफ़िया बिन्त अब्दुल मुत्तलिब रज़ि०, हज़रत हस्सान बिन साबित रज़ि० के फ़ारेअ नामी क़िले के अन्दर थीं। हज़रत हस्सान औरतों और बच्चों के साथ वहीं थे ।
हज़रत सफ़िया रज़ि० कहती हैं कि हमारे पास से एक यहूदी गुज़रा और क़िले का चक्कर काटने लगा। यह उस वक़्त की बात है, जब बनू कुरैज़ा रसूलुल्लाह सल्ल० से किया हुआ वायदा-क़रार तोड़कर आपसे लड़ने पर उतर आए थे और हमारे और उनके दर्मियान कोई न था, जो हमारी रक्षा करता. रसूलुल्लाह सल्ल० मुसलमानों समेत दुश्मन से मुक़ाबला करने में लगे हुए थे। अगर इस पर कोई हमलावर हो जाता, तो आप उन्हें छोड़कर आ नहीं सकते थे। इसलिए मैंने कहा, ऐ हस्सान ! यह यहूदी, जैसा कि आप देख रहे हैं, क़िले का चक्कर लगा रहा है और मुझे खुदा की क़सम ! डर है कि यह बाक़ी यहूदियों को भी हमारी कमज़ोरी से आगाह कर देगा। उधर रसूलुल्लाह सल्ल० और सहाबा किराम रज़ि० इस तरह फंसे हुए हैं कि हमारी मदद को नहीं आ सकते, इसलिए आप जाइए और उसे क़त्ल कर दीजिए।
हज़रत हस्सान ने कहा, अल्लाह की क़सम ! आप जानती ही हैं कि मैं इस काम का आदमी नहीं ।
हज़रत सफ़िया कहती हैं, अब मैंने खुद अपनी कमर बांधी, फिर स्तून की एक लकड़ी ली और इसके बाद क़िले से उतरकर उस यहूदी के पास पहुंची और उसे लकड़ी मार-मारकर उसका खात्मा कर दिया।
इब्ने हिशाम 2/220, 221
इसके बाद क़िले में वापस आई और हस्सान से कहा, जाइए, इसका हथियार और सामान उतार लीजिए, चूंकि वह मर्द है, इसलिए मैंने उसका हथियार नहीं उतारा।
हस्सान ने कहा, मुझे उसके हथियार और सामान की कोई ज़रूरत नहीं ।
सच तो यह है कि मुसलमान बच्चों और औरतों की हिफ़ाज़त पर रसूलुल्लाह सल्ल० की फूफी के इस वीरतापूर्ण कार्य का बड़ा गहरा और अच्छा असर पड़ा। इस कार्रवाई से शायद यहूदियों ने समझा कि इस किले और गढ़ियों में भी मुसलमानों की रक्षात्मक सेना मौजूद है, हालांकि वहां कोई फ़ौज न थी, इसलिए यहूदियों को दोबारा इस क़िस्म की जुर्रत न हुई। अलबत्ता वे बुतपरस्त हमलावरों के साथ अपने वायदे व क़रार के मुताबिक़ उन्हें बराबर रसद पहुंचाते रहे, यहां तक कि मुसलमानों ने उनकी रसद के बीस ऊंटों पर क़ब्ज़ा भी कर लिया।
बहरहाल यहूदियों के वचन भंग करने की खबर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को मालूम हुई तो आपने तुरन्त उसकी खोज की ओर तवज्जोह फ़रमाई, ताकि बनू कुरैज़ा के इरादे मालूम हो जाएं और उसकी रोशनी में फ़ौजी दृष्टिकोण से जो क़दम उठाना मुनासिब हो, उसे उठाया जाए।
चुनांचे आपने इस ख़बर की पड़ताल के लिए हज़रत साद बिन मुआज़, साद बिन उबादा, अब्दुल्लाह बिन रवाहा और ख्वात बिन जुबैर रज़ि० को रवाना फ़रमाया और हिदायत की कि जाओ, देखो, बनी कुरैज़ा के बारे में जो कुछ मालूम हुआ है, वह वाक़ई सही है या नहीं। अगर सही है, तो वापस आकर सिर्फ़ मुझे बता देना और वह भी इशारों-इशारों में, लोगों के बाज़ू मत तोड़ना और अगर वे वायदा-क़रार पर क़ायम रहें, तो फिर लोगों के दर्मियान एलानिया उसका ज़िक्र कर देना ।
जब ये लोग बनू कुरैज़ा के क़रीब पहुंचे, तो उन्हें बड़ी ढिठाई और दुष्टता पर उतारू पाया। उन्होंने एलानिया गालियां बकी, दुश्मनी की बातें कीं और रसूलुल्लाह सल्ल० की तौहीन की। कहने लगे, अल्लाह का रसूल कौन? हमारे और मुहम्मद के बीच न क़ौल है न क़रार ।
यह सुनकर वे लोग वापस आ गए और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सेवा में पहुंचकर स्थिति की ओर इशारा करते हुए सिर्फ़ इतना कहा, अज़्ल व क़ारा । उद्देश्य यह था कि जिस तरह अज़्ल व क़ारा ने रजीअ के लोगों के साथ ग़द्दारी की थी, उसी तरह यहूदी भी ग़द्दारी पर तुले हुए हैं।
इब्ने हिशाम 2/228


