*अहले बैत से मुखालिफत करने वाला शैतान की जमात से है सहिह उल इस्नाद हदीस

✋ *अहले बैत से मुखालिफत करने वाला शैतान की जमात से है सहिह उल इस्नाद हदीस*👊

हजरत अब्दुल्ला बिन अब्बास (राजी अल्लाह अन्हुमा) फरमाते है: रसूल अल्लाह (सलअल्लाहु अलैहे वआलेही वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया: सितारे जमीन वालों के लिए डूबने से बचाव (का सबब) है और मेरे *अहले बैत* मेरी उम्मत को इख्तीलाफ से बचाने का सबब है, *अरब का कोई कबीला अगर उनकी मुखालिफत करेगा तो वो शैतान की जमात करार पाएगा,,*

अल मुस्तद्रक हाकिम जिल्द:4 हदीस नं: 4715
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: इस हदीस के मद्दे नज़र में तमाम लोगों से पूछना चाहता हूं के क्या ये फरमान रसूल अल्लाह saws ने यूं ही बेवजह बोल दिया था या उनको इस बात का इल्म था के मेरे इस दुनिया से जाने के बाद मेरे अहलेबेत (हज़रत अली,हज़रत फातिमा ,इमाम हसन,इमाम हुसैन अलैहिमुस्सलाम अजमइन) से अलग अलग वक्त इख्तलाफ करने और जंग करने भी कुछ लोग आयेंगे ??

मेरा तो ये अकीदा है की अल्लाह के रसूल saws कोई भी कलाम बेवजह नही करते बल्कि वो को भी बोलते हैं वो हुक्म ऐ खुदा होता है।

अब अगर ये बात खुद नबी saws ने बयान फरमाई है तो फिर जो जो भी इंसान इन अहलेबेत अलेहिस्सलाम के मुकाबले में आया और इन हज़रात को ज़हनी या जिस्मानी नुकसान पहुंचाया या तकलीफ पहुंचाई वो सब लोग नबी saws के हुक्म के मुताबिक़ *शैतान की जमात* क़रार पाएंगे।

अब आप लोग ख़ुद तहकीक की जिए के
हज़रत अली अलैहिस्सलाम के मुक़ाबले कौन आया ??

हज़रत फातिमा ज़हरा सलाम उल्लाह अलेहा के मुकाबले कौन कौन आया??

हज़रत इमाम हसन अलेहिस्सलाम के मुक़ाबले कौन आया??

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मुकाबले में कौन आया??

*फैसला आप खुद कीजिए??*

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को खत लिखकर बुलाने वाला ईमाम बुखारी के नजदीक सहाबी ए रसूल है..

🔥 इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को खत लिखकर बुलाने वाला ईमाम बुखारी के नजदीक सहाबी ए रसूल है..🔥

✍️ इमाम इब्ने असीर जजरी ने उस्दुल गाबा और तारीख ए कामिल में, सिब्त इब्ने ज़ौजी ने तजकिरातुल ख्वास में, इमाम अब्दुल बर्र ने अल इसतियाब में, इमाम इब्ने हज़र अस्क़लानी ने ‘अल इसाबा फी तम्यीजुस्सहाबा’ में और इसके अलावा तारीख ए आसम कूफी वगैरह में है कि हुसैन अलैहिस्सलाम को खत लिखकर बुलाने वालों में सुलेमान बिन सुर्द मशहूर था और इसी के घर पर लोगों ने मीटिंग करके उपाय निकाला कि किस तरह से हुसैन अलैहिस्सलाम को यहां बुलाया जाए.??
जैसे कि उस्दुल गाबा में इसके बारे में है कि “ये उन लोगों में है जिन्होंने हुसैन बिन अली अलैहिस्सलाम को माविया की वफात के बाद कूफा में बुलाया था और जब वो कूफा में आए तो उनके साथ होकर ना लड़े।”
सिब्त इब्ने ज़ौजी ने तजकिरातुल हुफ्फाज़ में और इमाम इब्ने असीर जजरी ने तारीख ए कामिल में लिखा है कि “खत लिखने वालों में सुलेमान बिन सुर्द प्रमुख था और इसके बाद कूफा के बड़े बड़े लोगों ने भी खत लिखे और इसके बाद कूफा से खत कसरत से लिखे जाने लगे।”
इस कमीने सुलेमान बिन सुर्द से बुखारी ने सही बुखारी में पांच जगहों पर रिवायत लिया है और इमाम बुखारी ने ‘अल आदाब उल मुफरद’ में इसे अस्हाबुन्नबी (नबी का सहाबी) कहा है।
इमाम इब्ने जरीर तबरी ने तारीख ए तबरी के 60 हिजरी के बयान में लिखा है कि जब हुसैन अलैहिस्सलाम कूफा पहुंचे तो एक भला शख्स मिला जिसने कहा कि –
“हम आपको खुदा की कसम देते हैं कि अपनी जान का और अपने अहले बैत का ख्याल कीजिए कि इसी जगह से पलट जाएं। कूफा में ना कोई आपका यार-ओ-मददगार है और ना आपके शिया ही.., बल्कि हमें तो खौफ इस बात का है कि वो लोग आपकी मुखालिफत ना करें।”

तबरी ने अम्र बिन साद के खत को नकल किया है जिसमें उसने हुसैन अलैहिस्सलाम से वफा करने और साथ देने का वादा किया मगर जब कर्बला में जंग का आगाज हुआ तो सबसे पहला तीर इसी ने चलाया- अफसोस कि ये भी अहले सुन्नत के नजदीक सहाबी है।
पता चला कि जिस तरह आज मुसलमान के भेष में मुनाफिक छिपे हुए हैं उसी तरह उस समय भी मुनाफिकों ने शियाने-अली का लिबास ओढ़कर हुसैन अलैहिस्सलाम को धोखे से बुलाया और गद्दारी की।
ऐसा नहीं है कि कूफा में सभी एक जैसे थे मगर हुसैन अलैहिस्सलाम का साथ देने वाले बहुत थोड़े से लोग थे जिन्होंने हुसैन अलैहिस्सलाम का साथ देकर अपने शिया होने का हक अदा किया।
वाक्या कर्बला के बाद एक यजीदी सिपाही ने यजीद को शहादते हुसैन का मुबारकबाद देते हुए कहता है-
أَبْشِرْ يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ بِفَتْحِ اللَّهِ عَلَيْكَ وَنَصْرِهِ، وَرَدَ عَلَيْنَا الْحُسَيْنُ بْنُ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ وَثَمَانِيَةَ عَشَرَ مِنْ أَهْلِ بَيْتِهِ، 🔹وَسِتُّونَ رَجُلًا مِنْ شِيعَتِهِ🔹
👆यह बात इमाम इब्ने कसीर ने अल बिदाया वन निहाया के ग्यारहवीं जिल्द के सफा 556 पर लिखा है, यानि-
“ए यजीद आपको मुबारक हो, आपको फत्ह मिली है। हमने हुसैन को और इनके अहल में से अट्ठारह बंदों को कत्ल किया है और وَسِتُّونَ رَجُلًا مِنْ شِيعَتِهِ
उनके साथ उनके शिया भी कत्ल हुएं।”

आप खुद दिए गए लिंक को क्लिक करके सीधे उस सफे को पढ़ सकते हैं 👇
https://archive.org/details/Albidaya_Wannihaya/bn11/page/n555/mode/1up?view=theater

इसी तरह कूफा के बारे में एक शाफाई आलिमे दीन ‘मुहम्मद बिन उमर शाफाई’
(محمد بن عمر بن مبارك الحميري الحضرمي الشافعي)
अपनी एक किताब में लिखते हैं कि-
وكان آئمة علماء الکوفة الذي صحبوا عمر وعليا كعلقمة والاسود وشریح القاضی وغیرھم ، یرجعون قول عمر علی قول علي.

(الحسام المسلول على منتقصي أصحاب الرسول ,ص 38)
यानि, ‘कूफा में बड़े बड़े फुक्हा रहते थे हजरत उमर की सोहबत में, और हजरत अली की सोहबत में अलकमह, असवद और काजी सुरेह और इसके अलावा अन्य लोग थे लेकिन [वहां के लोग] हज़रत उमर के कौल को हज़रत अली अलैहिस्सलाम के कौल पर तरजीह (वरीयता, प्रमुखता) देते थे।”

निष्कर्ष यह निकलता है कि पहले कूफा में जो भी लोग थे उनमें से कुछ लोग अली अलैहिस्सलाम के पैरोकार थे तो कुछ हजरत उमर रदी0 को मानने वाले थे मगर वहां की अक्सरियत हजरत उमर के कौल को अली अलैहिस्सलाम के कौल पर प्रमुखता देते थे..इस तरह वहां के शिया का अकीदा था।
किताब के सफे का लिंक 👇
https://archive.org/details/0407-pdf_202101/page/n37/mode/1up?view=theater

अर-रहीकुल मख़्तूम पार्ट 46



                               नबी सल्ल० की हिजरत

कुरैश की चाल और अल्लाह की चाल

उल्लिखित सामाजिकता का स्वभाव यह होता है कि उसे बड़े रहस्य में रखा जाता है और ऊपरी सतह पर कोई ऐसी हलचल सामने नहीं आने दी जाती जो नित्य प्रति से हटकर और आम आदत से हटकर हो, ताकि कोई व्यवित खतरे की गंध न सूंघ सके और किसी के दिल में ख्याल न आए कि यह खामोशी किसी खतरे का पता देती है। यह कुरैश की चाल या दांव-पेच था, पर यह चाल उन्होंने अल्लाह से चली थी। इसलिए अल्लाह ने उन्हें ऐसे ढंग से विफल किया कि वे सोच भी नहीं सकते थे, चुनांचे जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के क़त्ल का अपराधपूर्ण प्रस्ताव पारित हो चुका तो हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम अपने रब की वह्य लेकर आपकी सेवा में आए और आपको कुरैश के षड्यंत्र की सूचना देते हुए बताया कि अल्लाह ने आपको यहां से हिजरत कर जाने की इजाज़त दे दी और यह कहते हुए हिजरत का समय भी निर्धारित कर दिया कि आप यह रात अपने उस बिस्तर पर न गुज़ारें जिस पर अब तक गुज़ारा करते थे।

इस सूचना के बाद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ठीक दोपहर के वक़्त अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के घर तशरीफ़ ले गए, ताकि उनके साथ हिजरत के सारे प्रोग्राम और मरहले तै फ़रमा लें।

हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा का बयान है कि ठीक दोपहर के वक़्त हम लोग अबूबक्र रज़ि० के मकान में बैठे थे कि किसी कहने वाले ने अबूबक्र रज़ि० से कहा, यह अल्लाह के रसूल सल्ल० सिर ढांके तशरीफ़ ला रहे हैं।

यह ऐसा वक़्त था, जिसमें आप तशरीफ़ नहीं लाया करते थे।

अबूबक्र रज़ि० ने कहा, मेरे मां-बाप आप पर कुर्बान ! आप इस वक़्त किसी अहम मामले ही की वजह से तशरीफ़ लाए हैं।

हज़रत आइशा रज़ि० बयान करती हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तशरीफ़ लाए, इजाज़त तलब की। आपको इजाज़त दी गई और आप अन्दर दाखिल हुए, फिर अबूबक्र रज़ि० से फ़रमाया-

‘तुम्हारे पास जो लोग हैं, उन्हें हटा दो ।’

1. इब्ने हिशाम 1/482, ज़ादुल मआद 2/52 और हिजरत के लिए देखिए बुखारी की To 476, 2138, 2263, 2264, 2297, 3905, 4093, 5807, 6079

अबूबक्र रज़ि० ने कहा, बस आपकी घरवाली ही है, आप पर मेरे मां-बाप फ़िदा हों, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० !

आपने फ़रमाया, अच्छा तो मुझे चलने की इजाज़त मिल चुकी है।

अबूबक्र रज़ि० ने कहा, साथ…. आप पर फ़िदा हों। ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! मेरे मां-बाप

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया- हां।’

इसके बाद हिजरत का प्रोग्राम तै करके अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने घर वापस तशरीफ़ ले आए और रात के आने का इन्तिज़ार करने लगे।

अल्लाह के रसूल सल्ल० के मकान का घेराव

इधर कुरैश के बड़े अपराधियों ने अपना सारा दिन मक्के की पार्लियामेंट ‘दारुन्नदवा’ को पहले पहर के पारित प्रस्ताव के लागू करने की तैयारी में गुज़ारा और इस उद्देश्य के लिए उन बड़े अपराधियों में से ग्यारह सरदार चुने गए, जिनके नाम ये हैं-

1. अबू जहल बिन हिशाम,

2. हकम बिन आस,

3. उत्बा बिन अबी मुऐत,

4. नज्र बिन हारिस,

5. उमैया बिन खल्फ़

6. ज़मआ बिन अस्वद,

7. तुऐमा बिन अदी,

8. अबू लहब,

9. उबई बिन खल्फ़

10. नुबैह बिन हिजाज, और

11. उसका भाई मुनब्बह बिन हिजाज । नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का तरीक़ा था कि आप शुरू रात में इशा की नमाज़ के बाद सो जाते और आधी रात के बाद घर से निकलकर मस्जिदे

1. सहीह बुखारी, बाब हिजरतुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम 1/553

2. जादुल मआद 2/52

हराम तशरीफ़ ले जाते और वहां तहज्जुद की नमाज़ अदा फ़रमाते। उस रात आपने हज़रत अली रजि० को हुक्म दिया कि वह आपके बिस्तर पर सो जाएं और आपकी हरी हज़रमी’ चादर ओढ़ लें। यह भी बतला दिया कि तुम्हें उनके हाथों कोई चोट नहीं पहुंचेगी। (आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम वही चादर ओढ़ कर सोया करते थे ।)

इधर रात जब तनिक अंधेरी हो गई, हर ओर सन्नाटा छा गया और आम लोग सोने के लिए जा चुके तो उपरोक्त व्यक्तियों ने खुफ़िया तौर पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के घर का रुख किया और दरवाज़े पर जमा होकर घात में बैठ गए। वह हज़रत अली को देखकर समझ रहे थे कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ही सोये हुए हैं। इसलिए इन्तिज़ार करने लगे कि आप उठें और बाहर निकलें तो ये लोग यकायक आप पर टूट पड़ें और तय किया हुआ फ़ैसला लागू करते हुए आपको क़त्ल कर दें ।

इन लोगों को पूरा भरोसा और पूरा यकीन था कि उनका यह नापाक षड्यंत्र सफल होकर रहेगा, यहां तक कि अबू जहल ने दंभ से भरे पूरे घमंड के साथ उपहास करते हुए अपने घेरा डालने वाले साथियों से कहा-

‘मुहम्मद (सल्ल०) कहता है कि अगर तुम लोग उसके दीन में दाखिल होकर उसकी पैरवी करोगे तो अरब व अजम के बादशाह बन जाओगे, फिर मरने के बाद उठाए जाओगे तो तुम्हारे लिए जार्डन के बाग़ों जैसी जन्नतें होंगी और अगर तुमने ऐसा न किया तो उनकी ओर से तुम्हारे अन्दर ज़िब्ह की घटनाएं सामने आएंगी, फिर तुम मरने के बाद उठाए जाओगे और तुम्हारे लिए आग होगी, जिसमें तुम जलाए जाओगे | 2

बहरहाल इस षड्यंत्र को लागू करने के लिए आधी रात के बाद का समय निश्चित था । इसलिए ये लोग जाग कर रात गुज़ार रहे थे और निर्धारित समय के आने का इन्तिज़ार कर रहे थे, लेकिन अल्लाह अपने काम पर ग़ालिब है । उसीके हाथ में आसमानों और ज़मीन की बादशाही है। वह जो सोचता है, करता है। जिसे बचाना चाहे, कोई उसका बाल टेढ़ा नहीं कर सकता और जिसे पकड़ना चाहे, कोई उसको बचा नहीं सकता ।

चुनांचे इस मौक़े पर अल्लाह ने वह काम किया जिसे नीचे की आयत में अल्लाह ने रसूल को सम्बोधित करते हुए बयान फ़रमाया है कि-


1. हज़रत मौत (दक्षिणी यमन) की बनी हुई चादर हज़रमी कहलाती है। 2. इब्ने हिशाम 1/482,

‘वह मौक़ा याद करो जब कुफ़्फ़ार तुम्हारे खिलाफ चाल चल रहे थे, ताकि तुम्हें क़ैद कर दें या क़त्ल कर दें या निकाल बाहर करें और वे लोग दाव चल रहे थे और अल्लाह भी दाव चल रहा था और अल्लाह सबसे बेहतर दाव चलने वाला है।’ (8:30)

अल्लाह के रसूल सल्ल० अपना घर छोड़ते हैं

बहरहाल कुरैश अपनी योजना के लागू करने की भरपूर तैयारी के बाजूद बुरी तरह परास्त हुए और असफल रहे, क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम घर से बाहर तशरीफ लाए, मुश्किों की सफ़े चीरीं और एक मुट्ठी कंकरियां लेकर उनके सरों पर डाली, लेकिन अल्लाह ने उनकी निगाहें पकड़ लीं और वे आपको देख न सके। उस वक़्त आप यह आयत तिलावत फरमा रहे थे—

‘हमने उनके आगे रुकावट खड़ी कर दी और उनके पीछे रुकावट खड़ी कर दी, पस हमने उन्हें ढांक लिया है और वे देख नहीं रहे हैं।’

(36:9) इस मौके पर कोई भी मुश्कि बाक़ी न बचा, जिसके सर पर आपने मिट्टी न डाली हो ।

इसके बाद आप अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के घर तशरीफ़ ले गए और फिर उनके मकान की एक खिड़की से निकलकर दोनों हज़रात ने रात ही रात यमन का रुख किया और कुछ मील पर स्थित सौर नामी पहाड़ की एक गुफा में जा पहुंचे। 1

इधर घेराव करने वाले शून्य समय का इन्तिज़ार कर रहे थे, लेकिन इससे थोड़ा पहले उन्हें अपनी नाकामी व नामुरादी का ज्ञान हो गया।

हुआ यह कि उनके पास एक ग़ैर-मुताल्लिक़ आदमी आया और उन्हें आपके दरवाज़े पर देखकर पूछा कि आप लोग किस चीज़ का इन्तिक़ार कर रहे हैं?

उन्होंने कहा, मुहम्मद का।

उसने कहा, आप लोग विफल हो गए। खुदा की क़सम, मुहम्मद तो आप लोगों के पास से गुज़रे और आपके सरों पर कंकरी डालते

हुए अपना काम कर गए। उन्होंने कहा, अल्लाह की क़सम, हमने तो उन्हें नहीं देखा। और इसके बाद अपने सरों से मिट्टी झाड़ते हुए उठ खड़े हुए। फिर दरवाज़े के दराज़ से झांक कर देखा, तो हज़रत अली रज़ि० नज़र

वही, 1/483, ज़ादुल मआद 2/52

आए। कहने लगे-

‘अल्लाह की क़सम, यह तो मुहम्मद सोए पड़े हैं। उनके ऊपर उनकी चादर मौजूद है।’

चुनांचे वे लोग सुबह तक वहीं डटे रहे।

इधर सुबह हुई और हज़रत अली रज़ि० बिस्तर से उठे, तो मुश्रिकों के हाथों के तोते उड़ गए। उन्होंने हज़रत अली रजि० से पूछा कि अल्लाह के रसूल कहां हैं? हज़रत अली रज़ि० ने कहा, मुझे मालूम नहीं। 1

Hazrat Aun aur Muhammad Ki Sahadat – Karbala Ke Do Jawaan Shaheed

Hazrat Aun aur Muhammad Ki Sahadat – Karbala Ke Do Jawaan Shaheed

Hazrat Aun aur Muhammad, Hazrat Zainab (RA) ke bete the. Hazrat Zainab, Hazrat Ali (RA) aur Hazrat Fatima (RA) ki beti aur Imam Hussain (AS) ki behen thi. Inke walid ka naam tha Hazrat Abdullah ibn Ja’far (RA) jo Rasool Allah (SAW) ke ashaab mein se the.

Yeh dono bhai Imam Hussain ke bhatije the aur Ahl-e-Bait ke farzand the.



Karbala Ka Safar

Jab Imam Hussain (AS) ne Medina se Karbala ka safar shuru kiya, to unke saath unki behen Hazrat Zainab bhi apne dono beto, Aun aur Muhammad ke saath thi. Dono naujawan the, magar jazbe se bhare hue the. Unka maqsad tha apne mamu Imam Hussain ke sath zulm ke khilaf ladna.



Ashura Ka Din

10 Muharram ko jab jang shuru hui, to Hazrat Zainab ne apne dono beto ko kaha:

> “Mere laal, jao aur apne mamu Hussain ki madad mein jaan qurban karo. Yeh waqt hai apni maa ki tarbiyat aur apne khun ka saboot dene ka.”



Shahadat

1. Sabse pehle Hazrat Muhammad ne jang ke maidan mein qadam rakha. Kam umar ke hone ke bawajood, bahaduri se lade. Dushman ke kai faujiyon ko maar giraya. Aakhirkar, unhe gher liya gaya aur woh shahid ho gaye.

2. Phir Hazrat Aun ne jang shuru ki. Unhone bhi dilerana muqabla kiya. Dushman ke kai lashkarion ko khatam kiya, lekin aakhir mein woh bhi shahid ho gaye.



Hazrat Zainab Ka Sabr

Jab Hazrat Zainab ko apne dono beto ki shahadat ki khabar mili, unhone ro kar shikayat nahi ki. Balki kaha:

> “Alhamdulillah, maine apne dono beto ko Allah ke raste mein qurban kar diya.”

Unka yeh sabr aur jazba aaj tak Islam ke tareekh ka hissa hai.



Karbala Ka Paighaam

Hazrat Aun aur Muhammad ki shahadat humein yeh sikhati hai:

Sacchai ke liye jaan deni pade to bhi ghabrana nahi chahiye.

Umar chhoti ho ya badi, haq ke liye ladna har momin ka farz hai.

Maa ki tarbiyat aur deen ka jazba insan ko shaheed banata hai.

Yeh dono naujawan hamesha Karbala ke hero ke roop mein yaad kiye jate hain.