






*22 Rajab Ko Hazrat Imaam Jafar Sadiq Alahis Salam Ke Koonde Ki Niyaz Ko Shiao Ka Tarika Batane Wale Hazraat Zara Gour Farmaye* 👇🏻
*1. Muhaddis e Aazam Pakistan Shaikh ul Hadees Hazrat Allama Muhammad Sardar Ahmad Sahab Farmate Hain :-* Hazrat Imaam Jafar Sadiq Ki Fatiha Ke Liye 22 Rajab Ko Koonde Bhi Sharan Jayaz wa Khair o Barkat Hain, Mukhalifeen e Ahle Sunnat Isko Bila Daleel Bidat o Haram Qaraar Dete Hain.
📚 *Reference* 📚
Koondo Ki Fazilat Ba Jawab Koondo Ki Haqiqat, Safa 7, 8.
Hazrat Molana Hasan Ali Razvi Barelvi Sahab.
*2. Aameer e Ahle Sunnat Mufti e Pakistan Hazrat Allama Abul Barkaat Sayyed Ahmad Qadri Razvi Rehmatullah Alaih Farmate Hain :-* Gyarvi Sharif, Shab e Bara’at, Urs o Chehlum Ki Tarah 22 Rajab ul Murajjab Ko Hazrat Imaam Jafar Sadiq Ki Niyaaz Ke Liye Koonde Bharna Bhi Ahle Sunnat Ke Mamulaat Me Se Hain Aur Iske Jawaz Ke Wahi Dala’il Hain Jo Fatiha Esale Sawab Wagera Ke Hain.
📚 *Reference* 📚
Koondo Ki Fazilat Ba Jawab Koondo Ki Haqiqat, Safa 8.
*3. Hakeem ul Ummat Muhaqqiq e Ahle Sunnat Hazrat Molana Mufti Ahmad Yaar Khan Naeemi Farmate Hain :-* Rajab Sharif Ke Mahine Ki 22 Tarikh Ko U.P Me Koonde Hote Hain Yani Naaye Koonde Mangaye Jaate Hain Aur Sawa Sair Maida Sawa Paao Shakkar Sawa Paao Ghee Ki Pooriya Bana Kar Hazrat Imaam Jafar Sadiq Ki Fatiha Karte Hain, 22wi Rajab Ko Hazrat Imaam Jafar Sadiq Ki Fatiha Karne Se Bhut Adi Hui Musibate Tal Jati Hain.
📚 *Reference* 📚
1. Islami Zindagi, Safa 69, 127.
2. Koonde Ki Fazilat Ba Jawab Koondo Ki Haqiqat, Safa 8, 9.
*4. Makhdoom e Ahle Sunnat Allama Abu Dawood Hazrat Molana Alhaaj Muhammad Sadiq (Ameer e Jamaat Raza e Mustufa Gujranwala) Farmate Hain :-* Sayyedna Imaam Jafar Sadiq Ki Yaad Me 22 Rajab Ka Khatam Sharif wa Isale Sawab Ahle Sunnat Wal Jamaat Me Mamool wa Maroof Hain, Mukhalifeen e Ahle Sunnat Munkireen e Gyarvi Chunki Mehboob e Khuda Buzurghane Deen Ki Yaad Manane Aur Khatam Sharif Dilane Ke Shuru Hi Se Khilaaf Hain Isliye Wo Milad wa Urs wa Gyarvi Ki Tarah 22 Rajab Ki Fatiha Ke Khilaaf Bhi Bila Wajah Wawaila Karte Hain.
📚 *Reference* 📚
*1* Maha Nama Raza e Mustufa Gujranwala, Shaban 1402 Hijri, Safa 22.
*2.* Koondo Ki Fazilat Ba Jawab Koondo Ki Haqiqat, Safa 9, 10.
*5. Bareilly Sharif Me Aala Hazrat Imaam e Ahle Sunnat Molana Ahmad Raza Khan Fazil e Barelvi Ke* Shezadgaan e Kiram Aur Khanwada Ke Afraad Me 22 Rajab Ke Koondo Ki Takreeb Manayi Jati Hain. (Hazrat Molana Hasan Ali Razvi Barelvi Sahab) Likhte Hain Me Khud 2 Martaba Hazri De Chuka Hu.
📚 *Reference* 📚
Koondo Ki Fazilat Ba Jawab Koondo Ki Haqiqat, Safa 10.
*6. Mufti Abdul Majeed Khan Saeedi Razvi Likhte Hain :-* Me 1986 Me Apne Murshid e Kareem Imaam e Ahle Sunnat Ghazli e Zama Hazrat Allama Sayyed Ahmad Saeed Kazmi Ke Daulat Kade Par Hazir Tha, 22 Rajab Ko Tule e Aaftab Ke Baad Aapke Ghar Koondo Ka Khatam Dilaya Gaya Aur Bande Ke Malumat Ke Mutabik Ab Bhi Hazrat Ke Ghar Har Saal 22 Rajab Ko Koonde Kiye Jate Hain.
📚 *Reference* 📚
Koondo Ki Sharah Haisiyat, Safa 26, Owais Raza Library Hyderabad, Sindh.

*★ कुंडे की नियाज़ किस तारीख़ को करें…?? और उस की हक़ीक़त ★*
हज़राते मोहतरम आज लोगों में एक मुस्तहब व जाएज़ अमल जो हुसूले बरकत के लिए हमारे बुज़ुर्ग 22 रजब को हज़रते सय्यदुना इमाम जाफर सादिक़ की कुंडो की नियाज़ करते आये है लेकिन अभी तक़रीबन 4-5 सालों से कुछ लोगों ने इस नियाज़ के मुताल्लिक बड़ा हंगामा मचा रखा है की नियाज़ 15 रजब को करें
इस में कुछ मस्जिदों से भी ये एलान क्या जा रहा है और हालांके *”दावते इस्लामी”* के इशा’अती इदारा मकतबतुल मदीना से शाया होने वाली किताब *”कफन की वापसी”* जो अमीर ए दावते इस्लामी हज़रत मौलाना इल्यास अत्तार साहब की लिखी हुई है उस में अमीर ए दावते इस्लामी हज़रत मौलाना इल्यास अत्तार साहब तहरीर फरमाते हैं..की कुंडे की नियाज़ 22 रजब को ही होती आयी है….
*दावते इस्लामी* ही के इदारे से छपी एक और किताब हकीम उल उम्मत हज़रत मुफ़्ती अहमद यार खान साहब नईमी की *”इस्लामी ज़िन्दगी”* में हकीम उल उम्मत तहरीर फरमाते हैं “रजब के महीने में 22 तारीख़ को कुंडो की रस्म बहुत अच्छी और ब बरकत है..”
एक मुस्तहब व जाएज़ अमल को लेकर आवाम में फितना करना कहाँ तक बेहतर है…??
जब के आवाम अभी सही मानो में फर्ज़ वाजिब से भी ब खबर नहीं है अल्लाह हमारे हाल ए ज़ार पर रहम फरमाए आमीन
नोट:- इस पोस्ट को लिखने का मक़सद सिर्फ ये है आवामे अहले सुन्नत किसी फितने का शिकार न हौ..!
*हमने ऊपर जिन किताबों का ज़िक्र क्या है उन किताबों का इस्क्रीन शार्ट सबूत के तोर पर निचे दिया है मुलाहिज़ा हो…*👇👇
नोट:- नियाज़ कभी भी की जाए हो जाएगी पर ख़ास दिन की करने में हिकमते होती हैं…
वरना हम गियार्वी और छठी की नियाज़ ख़ास दिन क्यों करते हैं… जब के जब चाहे नियाज़ हो जाएगी लेकिन उस ख़ास दिन से निस्बत की बिना पर करते हैं
*अब रही बात 15 रजब को नियाज़ करने की….??*
तो कुछ लोग 22 रजब को नियाज़ न करने की वजह ये बताते हैं….
👉 के हज़रत सय्यदूना इमाम जाफर सादिक़ की यौमे वफ़ात (यानी इस दुनिया ए फानी से इंतेक़ाल ) की तारीख़ 15 रजब है न की 22 रजब….. बेशक़ भाई इमाम जाफर सादिक़ की वफ़ात 15 रजब है पर हम कुंडे की नियाज़ वफ़ात या पैदाइश की निस्बत की वजह से नहीं करते बल्कि इस में दूसरी निस्बत शामिल है 👇👇👇👇
*अब समझने वाली बात ये है की अभी तक हमारे बुज़ुर्गोने दीन फिर सदयों से 22 रजब को क्यों करते आये कुंडो की नियाज़……???*
*इसका जवाब ये है की हम कुंडो की नियाज़ हज़रत इमाम जाफर सादिक़ के यौमे पैदाइश और यौमे वफ़ात (यानु इंतेक़ाल का दिन) की वजह से नहीं करते आये बल्कि इस ख़ास दिन यानी 22 रजब को अल्लाह تعالى ने इमाम जाफर सादिक़ को मक़ामे गोसियत कुबरा आता फ़रमाया था देखें…..*
और 22 रजब को नियाज़ करने का सबूत हमारी अहले सुन्नत की किताबों से साबित है… खलीफा ए आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान फ़ाज़िले बरेलवी رحمة الله تعالى عليه
हज़रत सदरुल अफ़ाज़िल के शागिर्द जिन्होंने हदीस की किताब मिश्कात शरीफ की शराह लिखी हज़रत हकीम उल उम्मत मुफ़्ती अहमद यार खान नईमी अपनी किताब “इस्लामी ज़िन्दगी” में भी 22 रजब को ही नियाज़ करने का ज़िक्र करते हैं…
नोट:- 15 रजब को भी ईसाले सवाब करें पर ख़ास नियाज़ कुंडो की 22 रजब ही है
हमने सबूत के तोर पर किताबों के हवाले दिए हैं
22 रज्जब उल मुरज्जब इमाम जाफ़र सादिक़ رضي الله تعالى عنه नियाज़।
*हिजरी 122 रज्जब की 22 तारीख़ की रात यानी 21 का दिन गुज़ार कर 22 की रात बा वक़्त ए नमाज़ ए तहज्जुद अल्लाह तआला ने सैय्यदना इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम को मक़ाम ए ग़ौसियत ए कुब्रा अता फरमाया।*
*सुबह 22 रज्जब को आपने अल्लाह तआला की जानिब से ये अज़ीम नेमत मिलने पर बतौर ए शुक्र अदा करने के लिए नियाज़ करवाई जो दूध और चावल मिलाकर बनाई गई जिसे हम खीर कहते हैं।*
आप ख़ानदान ए रसूल (صلي الله تعالى عليه وعلى آله وصحبه وسلم) के चश्म ओ चिराग़ थे, आप के घर में टूटी चटाई और मिट्टी के बर्तन ही थे इसी पर आप शाकिर ओ साबिर थे, आप ने मिट्टी के पियाले में नियाज़ रख कर अपने दोस्त ओ अहबाब को बुला कर फरमाया कि आज रात अल्लाह तआला ने मुझे मक़ाम ए ग़ौसियत ए कुब्रा अता फ़रमाया है इसी का शुक्र अदा करते हुए ये नियाज़ आप लोगों को पेश करता हूं।
आप के साहब ज़ादे इमाम मूसा क़ाज़िम अलैहिस्सलाम और आप के दीगर मुसाहेबीन ने पूछा कि इस में हमारे लिए क्या फायदा है?
आप ने फरमाया कि रब्बे काबा की कसम अल्लाह तआला ने जो नेमत मुझे अता फरमाई है जिस का मैं शुक्र अदा करता हूं नियाज़ की शक्ल में इसी तरह इसी तारीख में जो भी शुक्र अदा करेगा और हमारे वसीले से जो अल्लाह تعالى से दुआ मांगेगा तो अल्लाह तआला उसकी मुराद ज़रूर पूरा फरमाएगा और दुआ ज़रूर कबूल होगी क्योंकि अल्लाह तआला अपने शुक्र गुज़ार बन्दों को मायूस नहीं करता।
इमाम ज़ाफर सादिक़ رضي الله تعالى عنه अलैहिस्सलाम के परपोते सैय्यदना इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम से कुछ दुश्मन ए अहले बैत ने सवाल किया कि “जब हमारे घर में पीतल तांबे के बेहतरीन बर्तन मौजूद है तो मिट्टी के कुंडो की क्या ज़रूरत है?”
आप ने फरमाया अल्लाह के प्यारे रसूल हमारे नाना जान हुज़ूर (صلي الله تعالى عليه وعلى آله وصحبه وسلم) की सुन्नत है मिट्टी के बर्तन में खाना।
आज मुसलमानों ने हमारे नाना जान की सुन्नत को तर्क कर दिया है हम ने इस नियाज़ को मिट्टी के पियालों में इस लिए ज़रूरी (ज़रूरी से मतलब फर्ज़ या वाज़िब नहीं मक़सद सुन्नत पर अमल करना है) करार दिया ताकि कम से कम साल में एक मर्तबा ही नाना जान की उम्मत मिट्टी के कुंडो में नियाज़ खाकर सुन्नत ए रसूल (صلي الله تعالى عليه وعلى آله وصحبه وسلم) अदा करें।
अल्लाह पाक हमें अहले बैत ए मुतह’हीरात और सहाबा किराम वा औलिया ए किराम का फैज़ान नसीब फरमाए आमीन
~~ रेफरेंस ~~
ये ऊपर लिखी बात इन किताबों से साबित है।
📚 मिन्हाज उस सालेहीन।
✍️ सैयदना इमाम मोहि उद्दीन इब्ने अबू बकर बगदाद।
📚 कशफुल असरार।
✍️सैयदना इमाम अब्दुल्लाह बिन अली अस्फाहनी।
📚 मदाम ए असरार अहले बैत।
✍️ सैयदना इमाम मोहम्मद बिन इस्माईल मुतक्की।
📚 मखजन ए अनवार ए विलायत।
✍️ सैयदना इमाम बरहन उद्दीन अस्कलनी।

🌹जरूर पढ़े कुंन्डे की हकीकत🌹
मनाया जाए या ना मनाया जाए
न्यू नासबी यज़ीदी लोग एक बहुत नाकाम कोशिश में लगे हुए हैं और वोह चाहते हैं 22 रजब कुंडे की नियाज को 15 रजब के दिन करवाना और उसको *बिना दलील साबित करने में लगे हैं..*
सबसे पहले ये जानो कि इमाम जाफर सादिक कौन हैं?
मौला अली के फ़रजंद इमाम हुसैन, इमाम हुसैन के फ़रजंद इमाम जैनुल आब्दीन, इमाम जैनुल आब्दीन के फ़रजंद इमाम बाकिर, और इमाम बाकिर के फ़रजंद हैं इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम….
इमाम जाफर सादिक के फ़रजंद इमाम मूसा काजिम जिनकी औलादों में से हैं ख्वाजा गरीब नवाज…..
बगैर हुब्बे अली मुद्दआ नहीं मिलता
ईबादतों का भी हरगिज सिला नहीं मिलता
खुदा के बंदों सुनो गोर से खुदा की कसम
जिसे अली नहीं मिलते उसे खुदा नहीं मिलता
अलीع के बच्चेع अगर इजाजत नहीं देंगे
किसी का बाप भी जन्नत में जा नहीं सकता
*अल हसन वल हुसैन सय्यदल शबाबिल अहलिल जन्ना*
*22 रजब को नियाज़ इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम*
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🌹*मक़ाम ए वुस अत ए कुबरा*🌹
22 रजब को सैय्यदना इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की न तो विलादत की तारीख़ है और न ही आपकी शहादत की तारीख़ है…..
असान लफ्जों में समझो तो जैसे 11 वीं शरीफ है,
11 वीं शरीफ़ ना तो गौस ए आज़म की विलादत का दिन है और ना ही विसाल का दिन….
कुंडे की नजर नियाज़ फ़ातिहा 22 रजब
12 जनवरी पीर शरीफ (सोमवार) के दिन है…..
11 जनवरी इतवार की रात पकाया जायेगा…….
ख़ैर 22 रज़ब की हकीकत कुछ इस तरह है..
*122 सन हिजरी रज़ब की 22 तारीख़ की रात यानी 21 का* दिन गुज़र कर 22 की रात ब वक़्त नमाज़े तहज्जुद *अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने* सैय्यदना इमाम ज़ाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम को *मक़ाम ए वुस अत ए कुबराअता फ़रमाया*
-: ये ज़हन में रखियेगा कि मक़ाम ए वुस अत ए कुबरा सैय्यदना इमाम ज़ाफ़र सादिक अलैहिस्सलाम को अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने अता फ़रमाया :-
22 रजब को अज़ीम नेमत मक़ाम ए वूस अत ए *हासिल होने के बाद सैय्यदना इमाम ज़ाफ़र सादिक़* अलैहिस्सलाम ने सुबह के वक़्त अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की जानिब *ब’तौरे शुक्र अदा करने के लिए नियाज़* बनवाई जो दूध और चावल मिलाकर बनाइ गई जिसे हम खीर कहते हैं।
सैय्यदना इमाम ज़ाफ़र ऐ सादिक़ अलैहिस्सलाम ख़ानदाने रसूल सलल्लाहु अलैहिवसल्लम के चश्मों चिराग़ हैं,
आप के घर में टुटी चटाई और मिट्टी के बरतन ही थे इसी पर आप शाकिर ओ साबिर थे,
आप मिट्टी के पियाले में नियाज़ रखकर अपने दोस्तों ओ अहबाब को बुलाकर फ़रमाया के आज रात अल्लाह पाक ने मुझे मक़ामे ग़ौसियत ऐ कुबरा अता फ़रमाए इस का शुक्र अदा करते हुए ये नियाज़ आप लोगों को बतौर ऐ तबर्रूक पेश करता हूं,
आप के शहज़ादे *सैय्यदना इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम* और दीगर मुशाहेबिन ने दरयाफ़्त किया कि इस नियाज़ में हमारे लिए फ़ायदा है आप ने फ़रमाया के रब्बे काबा की कसम अल्लाह ने जो नेअमत मुझे अता फ़रमाए जिस का मैं शुक्र अदा करता हूं नियाज़ की शक्ल में *इसी तरह इसी तारीख में जो भी शुक्र अदा करेगा* और हमारे वसीले से जो दुआ मांगेगा तो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त उसकी मुराद ज़रूर पूरी फ़रमाएगा और दुआ ज़रूर क़ुबूल होगी।
क्योंकि *अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त अपने शुक्र गुजार बंदों को मायूस नहीं फ़रमाता।* …..सुब्हान अल्लाह
सुब्हान अल्लाह
हवाला :-
1:मिन्हाजूस्सालेहिंन/मुसन्निफ़; सैय्यदना इमाम मोहिय्युद्दीन इब्ने अबुबकर बग़दाद
2: कशफुल असरार :सैय्यदना इमाम अब्दुलाह बिन अली अशफहानि
3: मदाम ए असरार अहलेबैत: सैय्यदना इमाम मुहम्मद बिन इस्माइल मुत्तक़ी मक्की
4: मख’जन ऐ अनवारे विलायत★सैय्यदना इमाम बुरहानुद्दीन
अश्क़’लानी
मेरे प्यारे इस्लामी मोमिन भाईयों अपने घरों में 22 रज्जब अल मुर्जब के दिन ही इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की नज़रों नियाज़ करें किसी नासबी यज़ीदी के चक्कर में गुमराह मत होना
ये फ़िरका उम्मत के भोले भाले मुसलमान भाईयों को गुमराह कर रहा हैं
अलहम्दुलिल्लाह हम मौलाई हुसैनी सुन्नियों के यहां हमेशा से 22 रजब को ही इमाम की नज़रों नियाज़ होती है और इं-शा अल्लाह होती रहेगी
अम्मार को एक बागी जमात क़त्ल करेगी अम्मार उन्हें अल्लाह और जन्नत की तरफ बुला रहा होगा और वो जमात उसे दोज़ख की तरफ बुला रही होगी।
(रसूले खुदा हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम)
सहीह बुखारी : 2812-447
सहीह मुस्लिम : 7320-7322
मुसनद अहमद : 12347।
कितने बेशर्म हैं लोग जो अल्लाह उसके रसूल की बात नहीं मानते
और फिर दवा के हम मुसलमान हैं
ख़ारजी नासबी अपनी पुरी ताक़त लगा लो फिर भी ज़ालिमों को बचा नहीं पाओगे जाहन्नम से…..
मौला अली अलैहिस्सलाम के दुश्मनों पर लानत।
मौला हसन अलैहिस्सलाम के दुश्मनों पर लानत।
मौला हुसैन अलैहिस्सलाम के दुश्मनों पर लानत
हज़रत अबु बक्र सिद्दीक के बेटों के कातिलों पर लानत।
अम्मा आयशा के कातिलों पर लानत। हज़रते उस्मान के कातिलों पर लानत। हज़रते अम्मार बिन यासिर के कातिलों पर लानत।
हज़रते हजर बिन अदी के कातिलों पर लानत।
हज़रते मोहम्मद बिन अबू बकर के कातिलों पर लानत।
हज़रते अब्दुल रहमान बिन अबू बकर के कातिलों पर लानत।
हज़रते उवैश करनी के कातिलों पर लानत।
प्यारे नबी सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया अहले बैत अलैहिस्सलाम का दुश्मन हमारा दुश्मन,
अहले बैत अलैहिस्सलाम के बुग्ज़ में मरा काफ़िर मरा
प्यारे नबी सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जो कबीला मेरी अहले बैत से लड़ा वह शैतान का गिरोह है।


ग़ज़वा नज्द
ग़ज़वा बनी नज़ीर में किसी क़ुरबानी के बग़ैर मुसलमानों को शानदार कामियाबी हासिल हुईं | इससे मदीने में मुसलमानों की सत्ता मज़बूत हो गई और मुनाफ़िक़ों पर निराशा छा गई। अब उन्हें कुछ खुलकर करने की जुर्रात नहीं हो रही थी ।
इस तरह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उन बहुओं की खबर लेने के लिए यकसू हो गए, जिन्होंने उहुद के बाद ही से मुसलमानों को बड़ी कठिनाइयों में उलझा रखा था और बड़े ज़ालिमाना तरीक़े से अल्लाह की दावत देने वालों पर हपले कर करके उन्हें मौत के घाट उतार चुके थे और अब उनकी जुर्रत इस हद तक बढ़ चुकी थी कि वे मदीने पर चढ़ाई की सोच रहे थे ।
चुनांचे ग़ज़वा बनी नज़ीर से छूटने के बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अभी इन झूठों को सिखाने के लिए उठे भी न थे कि आपको सूचना मिली कि बनू ग़तफ़ान के दो क़बीले बनू मुहारिब और बनू सालबा लड़ाई के लिए बहुओं और अरब के देहातियों के लोगों को जमा कर रहे हैं।
इस ख़बर के मिलते ही नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नज्द पर धावा बोलने का फ़ैसला किया और नज्द के रेगिस्तानों में दूर तक घुसते चले गए, जिसका मक़सद यह था कि इन संगदिल बहुओं पर भय छा जाए और दोबारा मुसलमानों के खिलाफ़ पहले जैसी संगीन कार्रवाइयों को दोहराने की जुर्रत न करें।
इधर उद्दंड बहू, जो लूटमार की तैयारियां कर रहे थे, मुसलमानों के इस यकायकी धावे की खबर सुनते ही डरकर भाग खड़े हुए और पहाड़ो की चोटियों में जा दुबके ।
1. लेखक अब्दुर्रज़्ज़ाक़ 8/358-360, हदीस 9733, सुनन अबी दाऊद किताबुल खिराज वल फै वल आरा बाब फ्री ख़बरुन नज़ीर 2/15
मुसलमानों ने लुटेरे क़बीलों पर अपना रौब व दबदबा कायम करने के बाद अम्न व अमान के साथ वापस मदीने की राह ली।
सीरत लिखने वालों ने इस सिलसिले में एक निश्चित ग़ज़वे का नाम लिया है, जो रबीउल आखिर या जुमादल ऊला सन् 04 हि० में नज्द भू-भाग पर पेश आरया था और वे इसी ग़ज़वा को ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ क़रार देते हैं।
जहां तक तथ्यों और प्रमाणों का ताल्लुक़ है, तो इसमें सन्देह नहीं कि इन दिनों में नज्द के अन्दर एक ग़ज़वा पेश आया था, क्योंकि मदीना के हालात ही कुछ ऐसे थे । अबू सुफ़ियान ने उहुद की लड़ाई से वापसी के वक़्त अगले साल बद्र के मैदान में लड़ाई के लिए ललकारा था और जिसे मुसलमानों ने मंजूर कर लिया था। अब उसका वक़्त क़रीब आ रहा था और सामरिक दृष्टि से यह बात किसी तरह मुनासिब न थी कि बहुओं और अरब देहातियों को उनकी सरकशी और उद्दंडता पर क़ायम छोड़कर बद्र जैसी ज़ोरदार लड़ाई में जाने के लिए मदीना खाली कर दिया जाए, बल्कि ज़रूरी था कि बद्र के मैदान में जिस भयानक लड़ाई की उम्मीद थी, उसके लिए निकलने से पहले, इन बहुओं की उछल-कूद पर ऐसी चोट लगाई जाए कि उन्हें मदीना का रुख करने की जुर्रत न हो।
बाक़ी रही यह बात कि यही ग़ज़वा जो रबीउल आखर या जुमादल ऊला सन् 04 हि० में पेश आया था, ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ था, हमारी खोज के मुताबिक़ सही नहीं, क्योंकि ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ में हज़रत अबू हुरैरह रजि० और हज़रत अबू मूसा अशअरी रज़ि० मौजूद थे और अबू हुरैरह रज़ि० ख़ैबर की लड़ाई से कुछ दिन पहले इस्लाम लाए थे।
इसी तरह हज़रत अबू मूसा अशअरी रज़ि० मुसलमान होकर यमन से रवाना हुए तो उनकी सवारी साहिल हब्शा से जा लगी थी और वह हब्शा से उस वक़्त वापस आए थे जब नबी सल्ल० ख़ैबर में तशरीफ़ रखते थे। इस तरह वह पहली बार खैबर ही के अन्दर नबी सल्ल० की खिदमत में हाज़िर हो सके थे। पस ज़रूरी है कि ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ ग़ज़वा खैबर के बाद पेश आया हो ।
सन् 04 हि० के एक अर्से के बाद ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ के पेश आने की एक निशानी यह भी है कि नबी सल्ल० ने ग़ज़वा ज़ातुर्रिक़ाअ में खौफ़ की नमाज़’
1. लड़ाई की हालत में पढ़ी गई नमाज़ को ‘खौफ की नमाज़’ कहते हैं, जिसका एक तरीका यह है कि आधी फ़ौज हथियार बन्द होकर इमाम के पीछे नमाज़ पढ़े, बाक़ी आधी फ़ौज हथियार बांधे दुश्मन पर नज़र रखे। एक रक्अत के बाद यह फ़ौज इमाम
पढ़ी थी और ख़ौफ़ की नमाज़ पहले पहल ग़ज़वा अस्फ़ान में पढ़ी गई और इसमें कोई मतभेद नहीं कि ग़ज़वा अस्फ़ान का ज़माना राज़वा खंदक़ के भी बाद का है, जबकि ग़ज़वा खंदक़ का ज़माना सन् 05 हि० के आखिर का है।
सच तो यह है कि ग़ज़वा अस्फ़ान हुदैबिया के सफ़र की एक छोटी-सी घटना है और हुदैबिया का सफ़र सन् 06 हि० के आखिर में हुआ था, जिससे वापस आकर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ख़ैबर का रास्ता लिया था, इसलिए इस दृष्टि से भी ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ का ज़माना ख़ैबर के ज़माने के बाद का ही साबित होता है।

बारह सौ साल से ज्यादा हो गए ट्यूनीशिया के शहर कैरवान में मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह फहरी नाम के एक व्यापारी रहते थे वह शहर के प्रतिष्ठित लोगों में से थे नेक लोगों में शुमार होता था शिक्षा दौलत और नेकी सभी गुण उन में थे फातेहीन के खानदान से थे उन के पूर्वजों में से उकबा बिन नाफे ने इस कैरवान शहर को बसाया था
उन की दो छोटी और प्यारी बच्चियां थीं नाम था फातिमा और मरियम
पड़ोसी देश मोरक्को मे इदरीसी सल्तनत कायम हुई थी जिस की शान व शौकत के चर्चे ज़ोरों पर थे वहां के सुलतान इदरीस सानी एक नया शहर बसा रहे थे जिस का नाम फास (इंग्लिश में Fez) था और इसे वह अपनी राजधानी बनाना चाहते थे
मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह फहरी ने नए शहर के चर्चे सुने देखने का शौक हुआ वहाँ गए शहर पसंद आ गया इस नए फास शहर में आबाद होने का इरादा कर लिया कैरवान शहर से कारोबार समेटा और फास में व्यापार फैला लिया चूंकि कैरवान शहर छोड़ कर आए थे इस लिए नए शहर में इन के घराने को करवीइन कहा जाने लगा
दोनों बच्चियां बड़ी हो रही थी दोनों की अपने ही जैसे व्यापारिक खानदानों में शादी कर दी
लेकिन कुदरत को कुछ और मंजूर था बेटियों की शादी के कुछ वर्षों बाद उन का इंतकाल हो गया उन की जायदाद बेटियों के हिस्से में आई बेटियां पहले ही मालदार घरानों में थीं किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी वह वालिद की विरासत को किसी अच्छे और नेक काम में लगाना चाहती थीं
अल्लाह का करना ऐसा हुआ कि मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह फहरी के इंतकाल के कुछ महीने बाद उन के बड़े दामाद का भी इंतकाल हो गया इस तरह बड़ी बेटी फातिमा पर दोहरा गम आ पड़ा वालिद के साथ साथ शौहर का गम
लेकिन दोनों बच्चियों की तरबियत एक नेक और व्यापारी बाप ने की थी दोनों पर उन का प्रभाव था बेटी फातिमा ने अपने शौहर का कारोबार बखूबी संभाल लिया
फातिमा ने दूसरी शादी नहीं की खुद की औलाद नहीं थी इस लिए गरीब और यतीम बच्चों को पालने लगीं यहाँ तक कि वह उम्मुल बनीन कही जाने लगीं यानी ढेर सारे बच्चों की माँ
दोनों बहनों ने अपने वालिद से मिले पैसे से एक एक मस्जिद और मदरसा बनाया फातिमा के बनाए हुए मदरसा का नाम क़रवीन और मरियम के बनाए हुए मदरसा का नाम उंदलुस था
1200 साल गुजर गए बनाने वालियों का खुलूस था या कोई और बात थी आज भी दोनों मदरसे मौजूद हैं बस क़रवीन युनिवर्सिटी बन चुकी है और उंदलुस एक कालेज है
क़रवीन युनिवर्सिटी को दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी युनिवर्सिटी कहा जाता है फातिमा जो उम्मुल बनीन फातिमा फहरी के नाम से मशहूर हुई उन का नाम इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गया आज हम में से तकरीबन हर आदमी उन का नाम जानता है उन की इज्जत व एहतराम करता है
यह मदरसा जो आगे चलकर युनिवर्सिटी बना इस की स्थापना सन 859 ईस्वी में हुई और सन 878 में फातिमा फहरी का इंतकाल हो गया
फातिमा फहरी और उन की बहन मरियम फहरी जैसी बहुत सी खवातीन हमारे इस्लामिक हिस्ट्री का हिस्सा हैं हमें कभी-कभी उन्हें याद करते रहना चाहिए