
सरीया तुरफ़या तुरक़
यह सरीया भी हज़रत ज़ैद बिन हारिसा के नेतृत्व में जुमादल आखर में तुरफ़ या तुरक़ नामी जगह की ओर भेजा गया। यह जगह बनू सालबा के इलाक़े में थी। हज़रत ज़ैद के साथ सिर्फ़ पन्द्रह आदमी थे, लेकिन बहुओं ने खबर पाते ही भागने का रास्ता अपना लिया। उन्हें ख़तरा था कि अल्लाह के रसूल सल्ल० तशरीफ़ ला रहे थे। हज़रत ज़ैद को चार ऊंट हाथ लगे और दो चार दिन बाद वापस आए।
1. दोनों हदीसों पर कलाम के लिए देखिए तोहफ़तुल अहवज़ी 2/195, 196 2. इस सरीया को इब्नुल हजर ने भी फत्हुल बारी में सन् 06 हि० की घटनाओं में गिना है। (7/498)
10. सरीया वादिल कुरा
यह सरीया बारह आदमियों पर सम्मिलित था और इसके कमांडर भी हज़रत ज़ैद ही थे। वह रजब सन् 06 हि० में वादिल कुरा की ओर रवाना हुए। मक्सद दुश्मन की गतिविधियों का पता लगाना था, मगर वादिल कुरा के रहने वालों ने उन पर हमला करके नौ सहाबा को शहीद कर दिया और सिर्फ़ तीन बच सके, जिनमें एक खुद हज़रत ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु थे।’
11. सरीया ख़ब्त
इस सरीया का ज़माना रजब 08 हि० बताया जाता है, पर सन्दर्भ बताता है कि यह हुदैबिया से पहले की घटना है।
हज़रत जाबिर रज़ि० का बयान है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमारे तीन सौ सवारों की टीम भेजी। हमारे अमीर अबू उबैदा बिन जर्राह थे। कुरैश के एक क़ाफ़िले का पता लगाना था। हम इस हदीस के दौरान ज़बरदस्त भूख से दोचार हुए, यहां तक कि पत्ते झाड़-झाड़कर खाने पड़े। इसीलिए इसका नाम जैश (सेना की टुकड़ी) खब्त (झाड़े जाने वाले पत्ते) पड़ गया।
आखिर एक आदमी ने तीन ऊंट ज़िब्ह किए, लेकिन इसके बाद अबू उबैदा ने उसे मना कर दिया। फिर इसके बाद ही समुद्र ने अंबर नामी एक मछली फेंक दी. जिसे हम आधे महीने तक खाते रहे और उसका तेल भी लगाते रहे, यहां तक कि हमारे जिस्म हमारी ओर फिर पलट आए और तन्दुरुस्त हो गए ।
अबू उबैदा रज़ि० ने उसकी पसली का एक कांटा लिया और फ़ौज के अन्दर सबसे लम्बे ऊंट को देखकर आदमी को उस पर सवार किया और वह (सवार होकर) कांटे के नीचे से गुज़र गया। हमने उसके गोश्त के टुकड़े तोशे के तौर पर रख लिए और जब मदीना पहुंचे तो रसूलुल्लाह सल्ल० की खिदमत में हाज़िर होकर उसका उल्लेख किया।
आपने फ़रमाया, यह एक रोज़ी थी, जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए निकाली थी । उसका मांस तुम्हारे पास हो तो हमें भी खिलाओ ।
1. रहमतुल लिल आलमीन 2/226, इन सरायों को विस्तार में जानने के लिए रहमतुल लिल आलमीन, ज़ादुल मआद 2/120, 121, 122, और तलक़ीह फ़हूम अहलुल असर की टिप्पणियां 28, 29 देखी जा सकती है।
हमने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की खिदमत में भेज दिया’, घटना का विवरण ख़त्म हुआ । कुछ गोश्त
ऊपर जो यह कहा गया कि इस घटना का सन्दर्भ बताता है कि यह हुदैबिया से पहले का है, इसकी वजह यह है कि हुदैबिया की सुलह के बाद मुसलमान क़ुरैश के किसी क़ाफ़िले से छेड़छाड़ नहीं करते थे
1. सहीह बुखारी 2/625, 626, सहीह मुस्लिम 2/145, 146

