
4. सरीया राम्र
रबीउल अव्वल या रबीउल आखर सन् 06 हि० में हज़रत उकाशा बिन मेहरून रज़ि० को चालीस व्यक्तियों की कमान देकर ग़म्र नामी जगह की ओर रवाना किया। यह बनू असद के एक चश्मे का नाम है। मुसलमानों के आने की ख़बर सुनकर दुश्मन भाग गया और मुसलमान उनके दो सौ ऊंट मदीना हांक लाए ।
5. सरीया ज़ुल क़िस्सा न० 1
उसी रबीउल अव्वल या रबीउल आखर सन् 06 हि० में हज़रत मुहम्मद बिन मस्लमा के नेतृत्व में दस लोगों की एक टुकड़ी ज़ुलक़िस्सा की ओर रवाना की गई। यह जगह बनू सालबा के पड़ोस में स्थित थी। दुश्मन जिसकी तायदाद एक सौ थी, इधर-उधर छिप गया और जब सहाबा किराम सो गए, तो अचानक हमला करके उन्हें क़त्ल कर दिया, सिर्फ़ मुहम्मद बिन मस्लमा रज़ियल्लाहु अन्हु बच निकलने में सफल हो सके, वह भी घायल होकर ।
6. सरीया ज़ुल क़िस्सा न० 2
मुहम्मद बिन मसलमा के साथियों की शहादत के बाद रबीउल आखर सन् 06 हि० ही में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज़रत अबू उबैदा रज़ियल्लाहु अन्हु को ज़ुल क़िस्सा की ओर भेजा। वह चालीस लोगों को साथ लेकर उक्त सहाबा किराम की शहादतगाह की ओर चले और रात पैदल सफ़र करके सुबह सवेरे ही, बनू सालबा के पास पहुंचते ही छापा मार दिया, लेकिन बनू सालबा इस तेज़ी से पहाड़ों में भागे कि मुसलमानों की पकड़ में न आ सके, सिर्फ़ एक आदमी पकड़ा गया और वह मुसलमान हो गया, अलबत्ता मवेशी और बकरियां हाथ आईं।
7. सरीया जमूम
यह सरीया ज़ैद बिन हारिसा के नेतृत्व में रबीउल आखर सन् 06 हि० में जमूम की ओर रवाना किया गया। जमूम मर्रज्ज़हरान (वर्तमान फ़ातिमा घाटी) में बनू सुलैम के एक चश्मे का नाम है।
हज़रत ज़ैद रज़ि० वहां पहुंचे तो क़बीला मुज़ैना की एक औरत, जिसका नाम हलीमा था, पकड़ में आ गई। उसने बनू सुलैम की एक जगह का पता बताया, जहां से बहुत से मवेशी, बकरियां और क़ैदी हाथ आए हज़रत ज़ैद यह सब लेकर मदीना वापस आए। रसूलुल्लाह सल्ल० ने उस मुज़नी औरत को आज़ाद करके उससे शादी कर ली।
8. सरीया अस
यह सरीया एक सौ सत्तर सवारों पर सम्मिलित था और इसे भी हज़रत ज़ैद बिन हारिसा रज़ि० के नेतृत्व में जुमादल ऊला सन् 06 हि० में औीस की ओर भेजा गया था। इस मुहिम में क़ुरैश के एक क़ाफ़िले का माल हाथ आया, जो रसूलुल्लाह के दामाद हज़रत अबुल आस के नेतृत्व में सफ़र कर रहा था। अबुल आस उस वक़्त तक मुसलमान न हुए थे। वह गिरफ़्तार तो न हो सके, लेकिन भाग कर सीधे मदीना पहुंचे और हज़रत ज़ैनब की पनाह लेकर उनसे कहा कि वह रसूलुल्लाह सल्ल० से कहकर क़ाफ़िले का माल वापस दिला दें।
हज़रत जैनब रज़ि० ने रसूलुल्लाह सल्ल० के सामने यह बात पेश की तो आपने किसी तरह का दबाव डाले बिना सहाबा किराम से इशारा किया कि माल वापस कर दें। सहाबा किराम रज़ि० ने थोड़ा-ज़्यादा, छोटा-बड़ा जो कुछ था, सब वापस कर दिया।
अबुल आस सारा माल लेकर मक्का पहुंचे, अमानतें उनके मालिकों के हवाले की, फिर मुसलमान होकर मदीना तशरीफ़ लाए। रसूलुल्लाह सल्ल० ने पहले ही निकाह पर हज़रत ज़ैनब को उनके हवाले कर दिया, जैसा कि सहीह हदीस से साबित है। 1
आपने पहले ही निकाह की बुनियाद पर इसलिए हवाले किया था कि उस वक़्त तक कुफ़्फ़ार पर मुसलमान औरतों के हराम किए जाने का हुक्म उतरा नहीं था और एक हदीस में यह जो आया है कि आपने नए निकाह के साथ विदा
1. देखिए सुनन अबू दाऊद, मय शरह औनुल माबूद बाब इला मता तुरहु अलैहि इमरातुहू इज़ा अस ल-म वादहा
किया था या यह कि छः वर्ष के बाद विदा किया था, तो यह न मानी के एतबार से सही है, न सनद के एतबार से’, बल्कि दोनों पहलुओं से कमज़ोर है।
और जो लोग इसी कमज़ोर हदीस के क़ायल हैं, वे एक विचित्र आपस में टकराने वाली बात कहते हैं। वह कहते हैं कि अबुल आस सन् 08 हि० के आखिर में मक्का- विजय से कुछ पहले मुसलमान हुए थे। फिर यह भी कहते हैं कि सन् 08 हि० के शुरू में हज़रत ज़ैनब का इंतिक़ाल हो गया था, हालांकि अगर ये दोनों बातें सही मान ली जाएं, तो विरोधाभास बिल्कुल स्पष्ट है |
सवाल यह है कि ऐसी स्थिति में अबुल आस के इस्लाम लाने और हिजरत करके मदीना पहुंचने के वक़्त हज़रत ज़ैनब रजि० ज़िंदा ही कहां थीं कि उन्हें उनके पास नए निकाह के ज़रिए या पुराने निकाह की बुनियाद पर अबुल आस के हवाले किया जाता ।
हमने इस विषय पर बुलूगुल मराम में बड़े विस्तार में वार्ता की है। 2
इसके अलावा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सोचा भी नहीं जा सकता कि आप हुदैबिया का समझौता कर लेने के बावजूद कुरैश के क़ाफ़िले पर छापा मारने के लिए मुसलमानों को भेजेंगे। सीरत लिखने वाले तमाम विद्वान इस पर सहमत हैं। इस समझौते को मुसलमानों ने नहीं, बल्कि कुरैश ने भंग किया था ।
मशहूर साहिबे मग़ाज़ी मूसा बिन उक़बा का रुझान इस ओर है कि यह घटना सन् 07 हि० में अबू बसीर और उनके साथियों के हाथों घटी, लेकिन यह . न सहीह हदीस के अनुसार है, न कमज़ोर हदीस के ।

