The High Spiritual Status of Sayyidunā Imām ʿAlī (peace be upon him) Among the Sufis.

■ The High Spiritual Status of Sayyidunā
Imām ʿAlī (peace be upon him) Among the Sufis.

Among the Companions of the Prophet ﷺ,
few figures occupy as central a place in the spiritual imagination of Islam as Sayyidunā Imām Ali ibn Abi Talib.

While he is universally revered in the Islamic tradition for his courage, knowledge, and closeness to the Prophet ﷺ, the Sufis in particular regard him as one of the greatest fountains of inner wisdom (ḥikmah) and spiritual knowledge (maʿrifah).

Many early spiritual biographies, including the famous work Hilyat al-Awliya by Abu Nu’aym al-Isfahani, preserve reports and sayings that illustrate the extraordinary depth of Imām ʿAlī’s spiritual life.

These narrations do not merely present him
as a political leader or warrior; they portray him as a man whose heart was immersed in the Qur’an, contemplation, and divine awareness.

One of the most striking stories preserved in Hilyat al-Awliya describes Imām ʿAlī’s devotion to the Qur’an:

“Imam ʿAlī would recite the entire Qur’an
before mounting his horse.”

This narration is often interpreted by Sufi scholars as a symbol of his intense attachment to the Qur’an, showing that his every action even preparing for battle was suffused with remembrance and divine consciousness.

Whether understood literally or as a hyperbolic praise, the story communicates that the Qur’an was inseparable from his daily life and his heart, flowing constantly from his tongue and residing deeply within his being.

The sayings attributed to him further reveal why later spiritual masters regarded him as
a guide of the inner path. Among the most famous lines attributed to him is the reflection:

“Your cure is within you, but you do not perceive it. Your illness comes from you, but you do not see it. You think you are a small being, yet within you is contained the entire universe.”

This profound meditation on the human soul became foundational in Sufi psychology.

It points to a central teaching of the mystical path: the human being carries within himself the capacity to know God, but this knowledge is veiled by the ego and heedlessness.

Another famous saying attributed to Imām ʿAlī declares:

“Whoever knows himself knows his Lord.”

Sufi masters understood this statement as a key to spiritual realization. To know oneself in truth is to discover the limits of the ego, the dependence of the soul, and the constant presence of the Divine. Thus self-knowledge becomes a mirror reflecting knowledge of God.

Similarly, Imām ʿAlī is reported to have said:

“People are asleep; when they die, they awaken.”

This aphorism became a cornerstone of Sufi teachings on spiritual wakefulness. According to the mystics, most people live in a state of heedlessness, absorbed in the illusions of the world.

Death removes these veils and reveals reality. The path of Sufism seeks to awaken the heart before physical death arrives.

Sufi scholars also admired Imām ʿAlī’s emphasis on knowledge and wisdom. One famous saying attributed to him declares:

“Knowledge is better than wealth. Knowledge guards you, while you guard wealth.”

This statement reflects a core principle of
the spiritual path: material possessions are temporary, while knowledge of truth transforms the soul and accompanies a person into eternity.

Because of these teachings and his profound spirituality, later Sufi masters such as Imām Abu Hamid al-Ghazali and Shaykh Ibn Arabi frequently cited Imām ʿAlī as a source of wisdom.

In fact, many Sufi orders trace their spiritual lineage (silsilah) back to the Prophet ﷺ through Imām ʿAlī. This lineage symbolizes
the transmission of inner knowledge, spiritual discipline, and purification of the heart.

For the Sufis, Imām ʿAlī represents the union
of outward strength and inward illumination. He was a warrior in battle, a judge in matters
of law, and a sage in matters of the soul.

His life demonstrates that the highest spirituality in Islam is not withdrawal from the world, but living within it while remaining inwardly connected to God.

Thus his legacy in Sufism is not merely historical it is spiritual. To the people of the path, Imam ʿAlī stands as a symbol of courage in the body, wisdom in the mind, and divine awareness in the heart.

Through the sayings and stories preserved
in works like Hilyat al-Awliyāʾ, including his extraordinary devotion to the Qur’an even before mounting his horse.

His voice continues to guide seekers toward the deeper realities of faith, reminding them that the journey to God begins with the purification of the self and the awakening
of the heart.

20 Ramzan Yaum e Fatah Makkah

मक्के में अबू सुफियान बहुत बेचैन था,”आज कुछ होने वाला है”( वो बड़बड़ाया) उसकी नज़र आसमान की तरफ बार बार उठ रही थी-
उसकी बीवी”हिन्दा” जिसने हज़रत अमीर हम्ज़ा का कलेजा चबाया था उसकी परेशानी देखकर उसके पास आ गई थी,
क्या बात है? क्यूं परेशान हो?
हूं? अबू सुफियान चौंका – कुछ नहीं- तबीयत घबरा रही है मैं ज़रा घूम कर आता हूं,वो ये कहकर घर के बैरूनी दरवाज़े से बाहर निकल गया मक्के की गलियों में घूमते घूमते वो उसकी हद तक पहुंच गया, अचानक उसकी नज़र शहर से बाहर एक वसी मैदान पर पड़ी,
हज़ारों मशालें रौशन थीं, लोगों की चहल पहल उनकी रौशनी में नज़र आ रही थीं और भिनभिनाहट की आवाज़ थी जैसे सैकड़ों लोग धीमी आवाज़ में कुछ पढ़ रहे हों उसका दिल धक से रह गया था- उसने फ़ैसला किया कि वो क़रीब जाकर देखेगा कि ये कौन लोग हैं, इतना तो वो समझ ही चुका था कि मक्के के लोग तो ग़ाफीलों की नींद सो रहे हैं और ये लश्कर यक़ीनन मक्के पर चढ़ाई के लिए ही आया है
वो जानना चाहता था कि ये कौन हैं?
वो आहिस्ता आहिस्ता ओट लेता उस लश्कर के काफी क़रीब पहुंच चुका था,
कुछ लोगों को उसने पहचान लिया था,ये उसके अपने ही लोग थे जो मुसलमान हो चुके थे और मदीना हिजरत कर चुके थे,उसका दिल डूब रहा था,वो समझ गया था कि ये लश्कर मुसलमानों का है,
और यक़ीनन” मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم” अपने जां निसारों के साथ मक्का आ पहुंचे थे- वो छुप कर हालात का जायज़ा ले ही रहा था कि उक़ब से किसी ने उसकी गरदन पर तलवार रख दी,उसका ऊपर का सांस ऊपर और नीचे का नीचे रह गया था, लश्कर के पहरेदारों ने उसे पकड़ लिया था,और अब उसे बारगाहे मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم में लेजा रहे थे,उसका एक एक क़दम कई मन का हो चुका था,हर क़दम पर उसे अपने करतूत याद आ रहे थे,जंगे बद्र,उहद,खन्दक,खैबर सब उसकी आंखों के सामने नाच रही थीं,उसे याद आ रहा था कि उसने कैसे सरदाराने मक्का को इकट्ठा किया था “मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم को क़त्ल करने के लिए” कैसे नजाशी के दरबार में जाकर तक़रीर की थी कि –
ये मुसलमान हमारे गुलाम और बाग़ी हैं इनको हमें वापस दो,
कैसे उसकी बीवी हिन्दा ने अमीर हम्ज़ा को अपने ग़ुलाम हब्शी के ज़रिए शहीद करवा कर उनका सीना चाक करके उनका कलेजा निकाल कर चबाया और नाक और कान काट कर गले में हार बना कर डाले थे,और अब उसे उसी मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم के सामने पेश किया जा रहा था उसे यक़ीन था कि- उसकी रिवायात के मुताबिक़ उस जैसे “दहशतगर्द” को फौरन तहे तेग़ कर दिया जाएगा-

#इधर-
बारगाहे रहमतुल्लिल आलमीन صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم में असहाब जमा थे और सुबह के इक़दामात के बारे में मशावरत चल रही थी कि किसी ने आकर अबू सुफियान की गिरफ्तारी की खबर दे दी “अल्लाहु अकबर” खैमा में नारा ए तकबीर बलंद हुआ अबू सुफियान की गिरफ्तारी एक बहुत बड़ी खबर और कामयाबी थी,खैमे में मौजूद उमर इब्ने ख़त्ताब उठ कर खड़े हुए और तलवार को म्यान से निकाल कर इंतिहाई जोश के आलम में बोले-
उस बदबख्त को क़त्ल कर देना चाहिए शुरू से सारे फसाद की जड़ यही रहा है,
चेहरा ए मुबारक रहमतुल्लिल आलमीन صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم पर तबस्सुम नमूदार हुआ, और उनकी दिलों में उतरती हुई आवाज़ गूंजती
” बैठ जाओ उमर- उसे आने दो”
उमर इब्ने खत्ताब आंखों में गैज़ लिए हुक्मे रसूल صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم की इताअत में बैठ तो गए लेकिन उनके चेहरे की सुर्खी बता रही थी कि उनका बस चलता तो अबू सुफियान के टुकड़े टुकड़े कर डालते इतने में पहरेदारों ने बारगाहे रिसालत صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم में हाज़िर होने की इजाज़त चाही, इजाज़त मिलने पर अबू सुफियान को रहमतुल्लिल आलमीन के सामने इस हाल में पेश किया गया कि उसके हाथ उसके अमामे से उसकी पुश्त पर बंधे हुए थे, चेहरे की रंगत पीली पड़ चुकी थी,और उसकी आंखों में मौत के साए लहरा रहे थे,
लबहाए रिसालत मआब صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم को जुंबिश हुई और असहाब किराम رضی اللّٰہ تعالیٰ عنہم ने एक अजीब जुमला सुना-
इसके हाथ खोल दो,और इसको पानी पिलाओ,बैठ जाओ अबू सुफियान-!!
अबू सुफियान हारे हुए जुवारी की तरह गिरने के अंदाज़ में खैमा के फर्श पर बिछे कालीन पर बैठ गया-पानी पीकर उसको कुछ हौसला हुआ तो नज़र उठाकर खैमे में मौजूद लोगों की तरफ देखा,उमर इब्ने खत्ताब की आंखें ग़ुस्से से सुर्ख थीं, अबूबक्र इब्ने क़ुहाफा की आंखों में उसके लिए अफसोस का तास्सुर था,उस्मान बिन अफ्फान के चेहरे पर अज़ीज़दारी की हमदर्दी और अफसोस का मिला जुला तास्सुर था अली इब्न अबी तालिब का चेहरा सपाट था,इसी तरह बाक़ी तमाम असहाब के चेहरों को देखता देखता आखिर उसकी नज़र मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم के चेहरे मुबारक पर आकर ठहर गई, जहां जलालत व रहमत के खूबसूरत इम्तिज़ाज (मिलावट) के साथ कायनात की खूबसूरत तरीन मुस्कुराहट थी,
कहो अबू सुफियान? कैसे आना हुआ??
अबू सुफियान के गले में जैसे आवाज़ ही नहीं रही थी, बहुत हिम्मत करके बोला- मैं इस्लाम क़ुबूल करना चाहता हूं??
उमर इब्न खत्ताब एक बार फिर उठ खड़े हुए ” या रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ” ये शख्स मक्कारी कर रहा है,जान बचाने के लिए इस्लाम क़ुबूल करना चाहता है, मुझे इजाज़त दीजिए, मैं आज इस दुश्मने अज़ली का खात्मा कर ही दूं, उनके मुंह से कफ जारी था-
बैठ जाओ उमर- रिसालत मआब صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ने नरमी से फिर फ़रमाया: बोलो अबू सुफियान! क्या तुम वाक़ई इस्लाम क़ुबूल करना चाहते हो?
जी या रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم – मैं इस्लाम क़ुबूल करना चाहता हूं मैं समझ गया हूं कि आप और आपका दीन भी सच्चा है और आपका ख़ुदा भी सच्चा है,उसका वादा पूरा हुआ- मैं जान गया हूं कि सुबह मक्का को फतह होने से कोई नहीं बचा सकेगा-

चेहरा ए रिसालत मआब صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم पर मुस्कुराहट फैली-
ठीक है अबू सुफियान- तो मैं तुम्हें इस्लाम की दावत देता हूं और तुम्हारी दरख्वास्त क़ुबूल करता हूं जाओ तुम आज़ाद हो, सुबह हम मक्का में दाखिल होंगे इंशा अल्लाह
मैं तुम्हारे घर को जहां आज तक इस्लाम और हमारे खिलाफ साज़िशें होती रहीं,जाए अमन क़रार देता हूं,जो तुम्हारे घर में पनाह ले लेगा वो महफूज़ है,
अबू सुफियान की आंखें हैरत से फटती जा रही थीं
” और मक्का वालों से कहना- जो बैतुल्लाह में दाखिल हो गया उसको अमान है,जो अपनी किसी इबादतगाह में चला गया,उसको अमान है, यहां तक कि जो अपने घरों में बैठा रहा उसको अमान है,
जाओ अबू सुफियान! जाओ और जाकर सुबह हमारी आमद का इंतज़ार करो, और कहना मक्का वालों से कि हमारी कोई तलवार म्यान से बाहर नहीं निकल होगी,हमारा कोई तीर तरकश से बाहर नहीं होगा, हमारा कोई नेज़ा किसी की तरफ सीधा नहीं होगा जब तक कि कोई हमारे साथ लड़ना ना चाहे”
अबू सुफियान ने हैरत से मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ،की तरफ देखा और कांपते हुए होंठों से बोलना शुरू किया-
” اشھد ان لاالہٰ الا اللہ و اشھد ان محمّد عبدہُ و رسولہُ ”
सबसे पहले उमर इब्ने खत्ताब आगे बढ़े- और अबू सुफियान को गले से लगाया,”मरहबा ऐ अबू सुफियान” अब से तुम हमारे दीनी भाई हो गए,तुम्हारी जान,माल हमारे ऊपर वैसे ही हराम हो गया जैसा कि हर मुसलमान का दूसरे पर हराम है,तुमको मुबारक हो कि तुम्हारी पिछली सारी खताएं मुआफ कर दी गईं और अल्लाह तबारक व तआला तुम्हारे पिछले गुनाह मुआफ फरमाए,अबू सुफियान हैरत से खत्ताब के बेटे को देख रहा था,ये वही था कि चंद लम्हे पहले जिसकी आंखों में उसके लिए शदीद नफरत और गुस्सा था और जो उसकी जान लेना चाहता था,अब वही उसको गले से लगा कर भाई बोल रहा था?
ये कैसा दीन है?
ये कैसे लोग हैं?
सबसे गले मिलकर और रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم के हाथों पर बोसा देकर अबू सुफियान खैमे से बाहर निकल गया,
वो दहशतगर्द अबू सुफियान कि जिसके शर से मुसलमान आज तक तंग थे उन्ही के दरमियान से सलामती से गुज़रता हुआ जा रहा था, जहां से गुज़रता,उस इस्लामी लश्कर का हर फर्द,हर जंगजू,हर सिपाही जो थोड़ी देर पहले उसकी जान के दुश्मन थे अब आगे बढ़ बढ़ कर उससे मुसाहफा कर रहे थे,खुश आमदीद कह रहे थे-

#अगले_दिन:-
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मक्का शहर की हद पर जो लोग खड़े थे उनमें सबसे नुमाया अबू सुफियान था, मुसलमानों का लश्कर मक्का में दाखिल हो चुका था किसी एक तलवार, किसी एक नेज़े की अनी, किसी एक तीर की नोक पर खून का एक क़तरा भी नहीं था, लश्करे इस्लाम को हिदायत मिल चुकी थी,
किसी के घर में दाख़िल मत होना
किसी की इबादतगाह को नुक़सान मत पहुंचाना
किसी का पीछा मत करना
औरतों और बच्चों पर हाथ ना उठाना
किसी का माल ना लूटना
बिलाल हब्शी आगे आगे ऐलान करते जा रहे थे
“मक्का वालों ! रसूल ए खुदा صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم की तरफ से- आज तुम सबके लिए आम मुआफी का ऐलान है-
किसी से उसके साबिक़ा आमाल की बाज़पुर्श नहीं की जाएगी,
जो इस्लाम क़ुबूल करना चाहे वो कर सकता है
जो ना करना चाहे वो अपने साबिक़ा दीन पर रह सकता है,
सबको उनके मज़हब के मुताबिक़ इबादत की खुली इजाज़त होगी
सिर्फ मस्जिदे हराम और उसकी हुदूद के अंदर बुत परस्ती की इजाज़त नहीं होगी
किसी का ज़रीया ए मआश छीना नहीं जाएगा
किसी को उसकी ज़मीन व जायदाद से महरूम नहीं किया जाएगा
ग़ैर मुसलमानों की जान माल की हिफाज़त मुसलमान करेंगे
ऐ मक्का के लोगो-!!”
हिन्दा अपने घर के दरवाज़े पर खड़ी लश्कर इस्लाम को गुज़रते देख रही थी
उसका दिल गवाही नहीं देंगी रहा था कि “हज़रत हम्ज़ा” का क़त्ल उसको मुआफ कर दिया जाएगा,
लेकिन अबू सुफियान ने तो रात यहीं कहा था कि-
“इस्लाम क़ुबूल कर लो सब ग़ल्तियां मुआफ हो जाएंगी”
#मक्काफतहहोचुकाथा
बिना ज़ुल्मो तशद्दुद, बिना खून बहाए, बिना तीरो तलवार चलाए,
लोग जौक़ दर जौक़ उस आफाक़ी मज़हब को इख्तियार करने और अल्लाह की तौहीद और रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم की रिसालत का इक़रार करने मस्जिद हराम के सहन में जमा हो रहे थे,
और तभी मक्का वालों ने देखा-
“उस हुज़ूम में हिन्दा भी शामिल थी”
ये हुआ करता था इस्लाम- ये थी उसकी तालीमात- ये सिखाया था रहमते आलम صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ने

यौमे_फ़तेह_मक्का मुबारक़ हो!
20 रमज़ान सन 8 हिजरी० को रसूलअल्लाह ﷺ ने मक्का को फ़तेह किया

इमाम उल अंबिया ﷺ काला अमामा शरीफ़ पहन कर मक्का शरीफ़ में दाखिल हुए थे! 10 हज़ार का लश्कर ए इस्लाम हुज़ूर ﷺ के साथ मक्का शरीफ़ में दाख़िल हुआ और ख़ाने काबा से सारे बुत निकाल कर मक्का शरीफ़ को बुतों से पाक कर दिया_
♥___صلی الله عليه وسلم_