
इसके बावजूद कि इन सहाबा किराम ने सच छिपाने की कोशिश की, लेकिन आम लोगों को स्थिति का पता लग गया और इस तरह एक भयानक खतरा उनके सामने आ खड़ा हुआ।
सच तो यह है कि उस वक़्त मुसलमान बड़ी संगीन परिस्थितियों से गुज़र रहे थे। पीछे बनू कुरैज़ा थे, जिनका हमला रोकने के लिए उनके और मुसलमानों के बीच में कोई न था ? आगे मुश्किों की भारी फ़ौज थी, जिन्हें छोड़कर हटना मुम्किन न था, फिर मुसलमान बच्चे और औरतें थीं जो किसी सुरक्षा के बिना ग़द्दार यहूदियों के क़रीब ही थे। इसलिए लोगों में बड़ी बेचैनी पैदा हुई, जिसकी स्थिति इस आयत में बयान की गई है-
‘और निगाहें टेढ़ी हो गईं, दिल हलक़ में आ गए और तुम लोग अल्लाह के साथ तरह-तरह के गुमान करने लगे। उस वक़्त ईमान वालों की आज़माइश की गई और उन्हें बहुत तेज़ झिंझोड़ा गया।’ (33/101)
फिर इसी मौके पर कुछ मुनाफ़िक़ों के निफ़ाक़ ने भी सर निकाला। चुनांचे वे कहने लगे कि मुहम्मद तो हमसे वायदे करते थे कि हम क़ैसर व किसरा के ख़ज़ाने खाएंगे और यहां यह हालत है कि पेशाब-पाखाने के लिए निकलने में भी जान की खैर नहीं ।
कुछ और मुनाफ़िक़ों ने अपनी क़ौम के बड़ों के सामने यहां तक कहा कि हमारे घर दुश्मन के सामने खुले पड़े हैं। हमें इजाज़त दीजिए कि हम अपने घरों को वापस चले जाएं, क्योंकि हमारे घर शहर से बाहर हैं।
नौबत यहां तक पहुंच चुकी थी कि बनू सलमा के क़दम उखड़ रहे थे और वे पसपाई की सोच रहे थे। इन्हीं लोगों के बारे में अल्लाह ने इर्शाद फ़रमाया है-
‘और जब मुनाफ़िक़ और वे लोग जिनके दिलों में बीमारी है, कह रहे थे कि हमसे अल्लाह और उसके रसूल सल्ल० ने जो वायदा किया है, वह फ़रेब के सिवा कुछ नहीं और जब उनकी एक जमाअत ने कहा कि ऐ यसरिब वालो ! तुम्हारे लिए ठहरने की गुंजाइश नहीं, इसलिए वापस चलो और उनका एक फ़रीक़ नबी से इजाज़त मांग रहा था, कहता था, हमारे घर खाली पड़े हैं, हालांकि वे खाली नहीं पड़े थे, ये लोग सिर्फ़ फ़रार चाहते थे।’ (33: 12-13)
एक ओर फ़ौज का यह हाल था, दूसरी ओर रसूलुल्लाह सल्ल० की यह स्थिति थी कि आपने बनू कुरैज़ा के वचन-भंग की खबर सुनकर अपना सर और चेहरा कपडे से ढक लिया और देर तक चित लेटे रहे। इस स्थिति को देखकर लोगों की बेचैनी और ज़्यादा बढ़ गई, लेकिन इसके बाद आप पर आशा की लहर छा गई। और आप अल्लाहु अक्बर कहते हुए खड़े हुए और फ़रमाया,
मुसलमानो ! अल्लाह की मदद और जीत की खुशखबरी सुन लो ।
इसके बाद आपने पेश आने वाले हालात से निमटने का प्रोग्राम बनाया और इसी प्रोग्राम के एक हिस्से के तौर पर मदीना की निगरानी के लिए फ़ौज का एक हिस्सा रवाना फ़रमाते रहे, ताकि मुसलमानों को ग़ाफ़िल देखकर यहूदियों की ओर से औरतों और बच्चों पर अचानक कोई हमला न हो जाए।
लेकिन इस मौक़े पर एक निर्णायक क़दम उठाने की ज़रूरत थी, जिसके ज़रिए दुश्मन के अलग-अलग गिरोहों को एक दूसरे से बे-ताल्लुक़ कर दिया जाए। इस मक़सद के लिए आपने सोचा कि बनू ग़तफ़ान के दोनों सरदारों उऐना बिन हिस्न और हारिस बिन औफ़ से मदीना की एक तिहाई पैदावार पर समझौता कर लें, ताकि ये दोनों सरदार अपने-अपने क़बीले लेकर वापस चले जाएं और मुसलमान अकेले कुरैश पर जिनकी ताक़त का बार-बार अन्दाज़ा लगाया जा चुका था, भारी चोट लगाने के लिए फ़ारिग़ हो जाएं।
इस तज्वीज़ पर कुछ बातें भी हुईं, पर जब आपने हज़रत साद बिन मुआज़ और हज़रत साद बिन उबादा रज़ि० से इस तज्वीज़ के बारे में मश्विरा किया तो उन दोनों ने एक ज़ुबान होकर कहा, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! अगर अल्लाह ने आपको इसका हुक्म दिया है तो तब बिना कुछ कहे-सुने हम इसे मान लेते हैं और अगर आप सिर्फ़ हमारे लिए ऐसा करना चाहते हैं, तो हमें इसकी ज़रूरत नहीं। जब हम लोग और ये लोग दोनों शिर्क और बुतपरस्ती कर रहे थे, तब तो वे लोग मेज़बानी (सत्कार) या क्रय-विक्रय के अलावा किसी और तरीक़े से किसी एक दाने का भी लालच नहीं कर सकते थे, तो भला अब जबकि अल्लाह ने हमें इस्लाम जैसी नेमत दी है और आपके ज़रिए इज़्ज़त बख़्शी है, हम इन्हें अपना माल देंगे? ख़ुदा क़ी क़सम, हम इन्हें सिर्फ़ अपनी तलवार देंगे।
आपने इन दोनों की राय को दुरुस्त पाया और फ़रमाया कि जब मैंने देखा कि सारा अरब एक कमान खींचकर तुम पर पिल पड़ा है, तो केवल तुम्हारे लिए मैंने यह काम करना चाहा था ।
फिर अल्लाह का करना ऐसा हुआ कि दुश्मन में फूट पड़ गई। उनका मोर्चा टूट गया। उनकी धार कुंठित हो गई।
हुआ यह कि बनू ग़तफ़ान के एक साहब, जिनका नाम नुऐम बिन मसऊद बिन आमिर अशजई था, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सेवा में उपस्थित हुए और कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! मैं मुसलमान हो गया हूं, लेकिन मेरी क़ौम को मेरे इस्लाम लाने का पता नहीं है, इसलिए आप मुझे कोई हुक्म फ़रमाइए।

