आप हज़रत ख्वाजा हुबैरा बसरी के पीर ने मुर्शिद थे। दमिश्क में आप बमुक़ाम मरइश में पैदा हुए थे । किताबों में लिखा है कि सात बरस की उम्र में कुरआन शरीफ़ हिफ्ज़ फरमा लिया था और सोलह बरस की उम्र में आप तमाम ऊलूम से फ़ारिग हो गए थे। जब खुदावन्द कुद्दूस की मोहब्बत ज़ियाद ग़ालिब आयी तो आप हज़रत ख्वाजा इब्राहीम बिन अदहम के दस्त हक़ परस्त पर जा कर बैअत हो गए। और सिर्फ़ छ: महीने आपने पीर की बारगाह में रहकर खिलाफत ने इजाज़त से भी माला माल हुए। पीर से इजाज़त लेकर आप मक्का मुअज्जमा तशरीफ़ ले गए हज्जे बयतुल्लाह से फ़ारिग़ होकर बारगाहे रिसालत मआब सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम में हाज़िर हुए और रौज़-ए-मुबारक पर रोजाना एक कलाम पाक रात में तिलावत फ़रमाते थे। आप बहुत ज़ियादा तन्हाई पसन्द थे और खौफ़े खुदा से हर वक़्त आप की आँखों से आँसू जारी रहते। आप के हाथों पर छः सौ काफ़िरों ने कालिमा पढ़ा।
आप २४ शव्वाल सन् २५२ हिजरी में अपनी जाने आफ़रीन को ख़ुदा के सिपुर्द किया और आप का मज़ारे पाक बसरा में ज़ियारते खलाएक़ है।
इसके बावजूद कि इन सहाबा किराम ने सच छिपाने की कोशिश की, लेकिन आम लोगों को स्थिति का पता लग गया और इस तरह एक भयानक खतरा उनके सामने आ खड़ा हुआ।
सच तो यह है कि उस वक़्त मुसलमान बड़ी संगीन परिस्थितियों से गुज़र रहे थे। पीछे बनू कुरैज़ा थे, जिनका हमला रोकने के लिए उनके और मुसलमानों के बीच में कोई न था ? आगे मुश्किों की भारी फ़ौज थी, जिन्हें छोड़कर हटना मुम्किन न था, फिर मुसलमान बच्चे और औरतें थीं जो किसी सुरक्षा के बिना ग़द्दार यहूदियों के क़रीब ही थे। इसलिए लोगों में बड़ी बेचैनी पैदा हुई, जिसकी स्थिति इस आयत में बयान की गई है-
‘और निगाहें टेढ़ी हो गईं, दिल हलक़ में आ गए और तुम लोग अल्लाह के साथ तरह-तरह के गुमान करने लगे। उस वक़्त ईमान वालों की आज़माइश की गई और उन्हें बहुत तेज़ झिंझोड़ा गया।’ (33/101)
फिर इसी मौके पर कुछ मुनाफ़िक़ों के निफ़ाक़ ने भी सर निकाला। चुनांचे वे कहने लगे कि मुहम्मद तो हमसे वायदे करते थे कि हम क़ैसर व किसरा के ख़ज़ाने खाएंगे और यहां यह हालत है कि पेशाब-पाखाने के लिए निकलने में भी जान की खैर नहीं ।
कुछ और मुनाफ़िक़ों ने अपनी क़ौम के बड़ों के सामने यहां तक कहा कि हमारे घर दुश्मन के सामने खुले पड़े हैं। हमें इजाज़त दीजिए कि हम अपने घरों को वापस चले जाएं, क्योंकि हमारे घर शहर से बाहर हैं।
नौबत यहां तक पहुंच चुकी थी कि बनू सलमा के क़दम उखड़ रहे थे और वे पसपाई की सोच रहे थे। इन्हीं लोगों के बारे में अल्लाह ने इर्शाद फ़रमाया है-
‘और जब मुनाफ़िक़ और वे लोग जिनके दिलों में बीमारी है, कह रहे थे कि हमसे अल्लाह और उसके रसूल सल्ल० ने जो वायदा किया है, वह फ़रेब के सिवा कुछ नहीं और जब उनकी एक जमाअत ने कहा कि ऐ यसरिब वालो ! तुम्हारे लिए ठहरने की गुंजाइश नहीं, इसलिए वापस चलो और उनका एक फ़रीक़ नबी से इजाज़त मांग रहा था, कहता था, हमारे घर खाली पड़े हैं, हालांकि वे खाली नहीं पड़े थे, ये लोग सिर्फ़ फ़रार चाहते थे।’ (33: 12-13)
एक ओर फ़ौज का यह हाल था, दूसरी ओर रसूलुल्लाह सल्ल० की यह स्थिति थी कि आपने बनू कुरैज़ा के वचन-भंग की खबर सुनकर अपना सर और चेहरा कपडे से ढक लिया और देर तक चित लेटे रहे। इस स्थिति को देखकर लोगों की बेचैनी और ज़्यादा बढ़ गई, लेकिन इसके बाद आप पर आशा की लहर छा गई। और आप अल्लाहु अक्बर कहते हुए खड़े हुए और फ़रमाया,
मुसलमानो ! अल्लाह की मदद और जीत की खुशखबरी सुन लो ।
इसके बाद आपने पेश आने वाले हालात से निमटने का प्रोग्राम बनाया और इसी प्रोग्राम के एक हिस्से के तौर पर मदीना की निगरानी के लिए फ़ौज का एक हिस्सा रवाना फ़रमाते रहे, ताकि मुसलमानों को ग़ाफ़िल देखकर यहूदियों की ओर से औरतों और बच्चों पर अचानक कोई हमला न हो जाए। लेकिन इस मौक़े पर एक निर्णायक क़दम उठाने की ज़रूरत थी, जिसके ज़रिए दुश्मन के अलग-अलग गिरोहों को एक दूसरे से बे-ताल्लुक़ कर दिया जाए। इस मक़सद के लिए आपने सोचा कि बनू ग़तफ़ान के दोनों सरदारों उऐना बिन हिस्न और हारिस बिन औफ़ से मदीना की एक तिहाई पैदावार पर समझौता कर लें, ताकि ये दोनों सरदार अपने-अपने क़बीले लेकर वापस चले जाएं और मुसलमान अकेले कुरैश पर जिनकी ताक़त का बार-बार अन्दाज़ा लगाया जा चुका था, भारी चोट लगाने के लिए फ़ारिग़ हो जाएं।
इस तज्वीज़ पर कुछ बातें भी हुईं, पर जब आपने हज़रत साद बिन मुआज़ और हज़रत साद बिन उबादा रज़ि० से इस तज्वीज़ के बारे में मश्विरा किया तो उन दोनों ने एक ज़ुबान होकर कहा, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! अगर अल्लाह ने आपको इसका हुक्म दिया है तो तब बिना कुछ कहे-सुने हम इसे मान लेते हैं और अगर आप सिर्फ़ हमारे लिए ऐसा करना चाहते हैं, तो हमें इसकी ज़रूरत नहीं। जब हम लोग और ये लोग दोनों शिर्क और बुतपरस्ती कर रहे थे, तब तो वे लोग मेज़बानी (सत्कार) या क्रय-विक्रय के अलावा किसी और तरीक़े से किसी एक दाने का भी लालच नहीं कर सकते थे, तो भला अब जबकि अल्लाह ने हमें इस्लाम जैसी नेमत दी है और आपके ज़रिए इज़्ज़त बख़्शी है, हम इन्हें अपना माल देंगे? ख़ुदा क़ी क़सम, हम इन्हें सिर्फ़ अपनी तलवार देंगे।
आपने इन दोनों की राय को दुरुस्त पाया और फ़रमाया कि जब मैंने देखा कि सारा अरब एक कमान खींचकर तुम पर पिल पड़ा है, तो केवल तुम्हारे लिए मैंने यह काम करना चाहा था ।
फिर अल्लाह का करना ऐसा हुआ कि दुश्मन में फूट पड़ गई। उनका मोर्चा टूट गया। उनकी धार कुंठित हो गई।
हुआ यह कि बनू ग़तफ़ान के एक साहब, जिनका नाम नुऐम बिन मसऊद बिन आमिर अशजई था, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सेवा में उपस्थित हुए और कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! मैं मुसलमान हो गया हूं, लेकिन मेरी क़ौम को मेरे इस्लाम लाने का पता नहीं है, इसलिए आप मुझे कोई हुक्म फ़रमाइए।
॥ सब्र और सलात ॥ (सब्र, सलात, हिदायत और इमामत का ताल्लुक़)
بسم اللہ الرحمٰن الرحیم و الصلوۃ و السلامُ علٰی سید الانبیاء و المرسلین و علٰی آلہ اجمعین
नीचे सूरह बक़रह की आयत 45 और 153 के स्क्रीनशॉट हैं!
आयत 45 में #अल्लाह बनी इसराईल को नसीहत फरमा रहा है कि “सब्र और सलात से इस्तेआ़नत हासिल करो”, और आगे #सब्र और सलात को उनके लिये “कबीरा” यानी बहुत बड़ा बता रहा है सिवाये उनके जो अल्लाह की #ख़शिय्यत रखने वाले हैं!
दूसरी तरफ़ #आयत 153 में ईमान वालों को अल्लाह नसीहत फरमा रहा है कि “सब्र और #सलात से इस्तेआ़नत हासिल करो” और आगे यह फरमाया कि बेशक अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है, यानि यहाँ भी यह बता दिया कि सब्र और सलात कोई मामूली #शै नहीं बल्कि गिरांक़द्र चीज़ है जिससे वाबस्तगी के लिये आपको सब्र ओ तहम्मुल और ख़शिय्यत ए इलाही दरकार है! गोया अल्लाह यहाँ #ईमान वालों को तसल्ली दे रहा है कि मैं सब्र और सलात से इस्तेआ़नत चाहने वाले आली हिम्मत साबिरों के साथ हूँ।
दिलचस्प बात यह है कि सूरह सजदा कि आयत 24 में अल्लाह बनी #इसराईल के बारे में फरमा रहा है कि “हमने उन (बनी इसराईल) में से जब वो सब्र करते रहे तो कुछ #इमाम बनाये जो हमारे हुक्म से हिदायत करते थे…
यानी #मूसा अलैहिस्सलाम के बाद हिदायत का ज़िम्मा मिनजानिबिल्लाह बनी इसराईल के इमामों के सुपुर्द किया गया ना कि मुल्लाओं के।
मालूम हुआ #अंबिया के बाद हिदायत का ज़िम्मा वक़्त के इमाम के सुपुर्द होता है और उनसे #हिदायत सब्र और सलात से वाबस्तगी रखने वालों को बतौर इनाम मिलती है!
अब आप पढ़ते रहिये नमाज़ की हर रकात में कि “ऐ अल्लाह हम तेरी #इबादत करते हैं और तुझ ही से इस्तेआ़नत चाहते हैं तू हमें सिराते #मुस्तक़ीम की हिदायत फरमा”
अल्लाह ने बता दिया कि उससे इस्तेआ़नत सब्र और सलात के ज़रिये हिदायत इमाम ए वक़्त के वास्ते से मिलेगी!
ना मुल्लाजी किसी काम आयेंगे न टाइटलधारी #सहाबा!
क्योंकि अल्लाह की यह नसीहत जिन लोगों को पहुंची वो जमात सहाबियों की थी! और अल्लाह के हबीब सरवरे कायनात ने #ग़दीर ए ख़ुम पर हदीसे #सक़लैन का ऐलाने आम फरमा कर तमाम सहाबा ओ मुस्लिमीन को नसीहत फरमा दी थी कि अल्लाह की #किताब और मेरी इतरत #अहलेबैत से मज़बूती के साथ वाबस्ता रहोगे तो कभी गुमराह नहीं होगे!
वाज़ेह रहे अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम के बाद इमाम बनी इसराईल में से बनाये थे ना कि सहाबा ए मूसा या #उम्मत ए मूसा से!
तो यह मुल्ला बनी #इस्माईल के इमाम सहाबा ए मुस्तफ़ा या उम्मत ए मुस्तफ़ा में कहाँ ढूंढते फिर रहे हैं?
ख़बरदार अल्लाह ने इमामत, #नबुव्वत और किताब आले #इब्राहीम के सालेहीन में रखी है जिन्होंने कभी #शिर्क ओ कुफ्र ना किया हो! और यह शर्फ फक़त आले #मुहम्मद को हासिल है!
मगर यह उम्मत इस #अम्र पर आज तक सब्र ओ तहम्मुल का मुज़ाहिरा करने के बजाये ज़ुल्म ओ जबर का ही मुज़ाहिरा करती रही है!
तो कहाँ से मिलेगी हिदायत? और कहां से मिलेगी मदद ओ इस्तेआ़नत?
तो लौट आओ क़ुरआन ओ अहलेबैत की तरफ़ इसलिये कि 👇
#हक़ ओ हिदायत का बस एक #उसूल! #किताबुल्लाह और आले #रसूल !!
मौला अली अलैहिस्सलाम ने इसी हक़ीक़त को बहुत पहले बयान फ़रमा दिया था 👇
🔹 फ़रमान-ए-मौला अली अलैहिस्सलाम:
> “इस्लाम सिर्फ़ सजदों और रुकूओं का नाम नहीं, बल्कि अमल, इंसाफ़ और सच्चाई का नाम है।” (ग़ुररुल हिकम, हिकमत 1056)
> “जब लोग दीन को सिर्फ़ ज़बान तक रखेंगे और दुनियावी कामों में झूठ और धोखा आम होगा, तब अल्लाह उनका रुतबा गिरा देगा।” (नहजुल बलाग़ा, ख़ुतबा 131 का मफ़हूम) —
🔹 ज़वाल की असली वजहें:
1. दुनियावी मुआमलात में बेईमानी:
सौदे में धोखा, रिश्वत, झूठ, अमानत में ख़यानत — ये सब मुसलमान को ज़वाल की तरफ़ ले जाते हैं।
मौला अली ने फ़रमाया:
> “जिसने अमानत में ख़यानत की, उसने अपना ईमान खो दिया।” (ग़ुररुल हिकम, हिकमत 3009)
2. इस्लाम को सिर्फ़ इबादत तक सीमित कर देना:
यानी नमाज़ पढ़ी, रोज़ा रखा, लेकिन अख़लाक़, इंसाफ़, और इंसानियत में गिरावट।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
> “जो नमाज़ पढ़े मगर झूठ बोले, धोखा दे, और ज़ुल्म करे — उसकी नमाज़ उसका चेहरा भी नहीं बचाएगी।” (कनज़ुल उम्माल, हदीस 18869)
3. अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से बुग़ज़ (दुश्मनी):
यही तो ईमान की जड़ को काट देता है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
> “अली से मुहब्बत ईमान की निशानी है, और अली से बुग़ज़ (नफ़रत) निफ़ाक़ की निशानी है।” (सहीह मुस्लिम, हदीस 78)
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🌿 ख़ुलासा:
> मुसलमानों का ज़वाल इसलिए है कि उन्होंने दीन को मस्जिद तक महदूद कर दिया, और मौला अली व अहलेबैत की तालीमात को सिर्फ़ महफ़िलों तक सीमित कर दिया। जबकि असल इस्लाम — अमल, इंसाफ़, अमानतदारी और अहलेबैत से मुहब्बत
*हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह की वो रहस्यमयी प्लेट और दरवाजा, जो इतिहास और ईमान को जोड़ती है* 🕌
*कभी आपने हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह के सामने मौजूद जामा’त खाना मस्जिद (खिलजी मस्जिद) के दरवाज़े को ध्यान से देखा है*?
*वहीं लगी हुई है एक गोल धातु की प्लेट*…
*जिस पर अरबी में ऐसे नाम खुदे हैं, जो सिर्फ़ नाम नहीं — बल्कि इस्लामी इतिहास की रूह हैं*
*बीच में लिखा है — “अल्लाह”* *और उसके चारों तरफ़ ये पाक नाम दर्ज हैं*: ☪️ *मुहम्मद* ﷺ ☪️ *अली* ☪️ *फ़ातिमा* ☪️ *हसन* ☪️ *हुसैन* *ये सभी नाम पैगंबर मुहम्मद ﷺ और उनके अहले-बैत से जुड़े हैं* — *यानी नुबूवत, रिसालत, इमान और कुर्बानी का पूरा सिलसिला एक ही प्लेट पर* ✨
*🪔 इतिहास + आस्था + रूहानियत का संगम*
*ये प्लेट सिर्फ़ एक सजावट नहीं है*… *ये इस बात की गवाही है कि* *दिल्ली की सरज़मीन सिर्फ़* *सल्तनतों की नहीं*, *औलिया, सूफिया और इमान *की भी राजधानी रही है* 🕌 *खिलजी दौर की ये मस्जिद* *सिर्फ़ इबादत की जगह नहीं थी*, *बल्कि*:
*दीन की तालीम का मरकज़*
*सूफी तहज़ीब का निशान*
*अहले-बैत से मोहब्बत की मिसाल*
*और इस्लामी पहचान का जीता-जागता सबूत थी* ❤️
*उस दौर में ऐसी निशानियां बनाना* *एक साफ़ पैग़ाम था — 👉 “हमारी पहचान ताक़त से नहीं, आस्था से है*।” 👉 *“हमारी जड़ें सल्तनत में *नहीं, रसूल ﷺ से जुड़ी हैं*।
*ज़्यादातर लोग रोज़ वहाँ से गुज़र जाते हैं*… *लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि* 👉 *ये प्लेट क्या है* 👉 *किस दौर की है* *👉 *और इसका मतलब क्या है* *अगले पोस्ट में बताएँगे — इस प्लेट का ऐतिहासिक रहस्य और किसने इसे बनवाया था*… 👑
*अगर आपके दिल में भी* *अल्लाह, रसूल ﷺ और अहले-बैत से मोहब्बत है*…