Ali Tumhe 3 Khususiyatain Aysi mili hai.

Hadith Mafhum :

Aqa ﷺ Ne Maula Ali ( علیہ السلام Se Farmaya: Aaye Ali Tumhe 3 Khususiyatain Aysi Mili Hai. Jo Kisi Ko Bhi Nahi Mili Aur Mujhe Bhi Nahi Mili.


1) Apko Mujh Jaisa Ba-Azmat Susar ( Father in law) Mila. Mujhe Nahi Mila.

2) Aapko Meri Beti ( Siddiqa Tu Kubra Syeda Fatimah Tu Zahra سلام اللہ علیہا) jaisi Biwi Mili Hai. Mujhe Nahi Mili.

3) Aapko Hasan Hussain ( علیهما السلام) Bete Mile Hain. Mujhe Nahi.


Lekin Aap Sab Mujhe Se Hain Aur Main Aap Sabse Hoon.

Tasawwuf

Tasawwuf has never been about outer displays of piety — it has always been about the refinement of akhlaaq, the inner character that shapes how a person walks, speaks, reacts, and treats the creation of Allah.
Sufis say that the real “path” begins not on the prayer mat, but in the heart where ego is softened and compassion begins to grow.

The masters of the spiritual path taught a simple truth mentioned in Risala Qushayriyah:

“The one whose character is better, his Tasawwuf will also be better.”

Because spiritual excellence is not measured by how long one prays, but by how gently one carries the Divine light within.

There is a difference between ibaadat and akhlaaq:
Ibaadat is the duty offered to Allah —
but akhlaaq is the mercy offered to His creation.
Ibaadat makes a person a worshipper;
akhlaaq makes a person a source of ease, a lantern in the lives of others.

History gives the clearest example:
When Khwaja Ghareeb Nawaz Moinuddin Hasan Chishti arrived in Hindustan, he did not begin by teaching Qur’an, fiqh, tafsir or hadeeth.
He began with character.
People saw his patience, compassion, humility, and generosity —
and through his character, their hearts opened to the Qur’an and Sunnah.
This is the real Tasawwuf: transforming hearts through purity, not pressure.

Akhlaaq is the doorway.
Tasawwuf is the garden that grows once that doorway is opened.

If this message inspired your heart, save it, share it, and help revive the beauty of akhlaaq in our time.

मेरे दीन पर नहीं मरेगा।

किताब है, “किताबुल जुमल मिन अन्साबिल अशराफ” जिल्द नंबर,5 और सफा नंबर 134 पर बलाज़री सहीह रिवायत लाये हैं।

अम्र बिन आस कहते हैं कि, “मैं रसूलुल्लाह के पास बैठा हुआ था, तभी रसूलुल्लाह ने मुझसे एक बात कही। ए अम्र! इस जगह से, इस कोने से, इस रास्ते से एक ऐसा शख्स आने वाला है जो मेरी उम्मत पर, मेरी मिल्लत पर, मेरी क़ौम पर, मेरे दीन पर नहीं मरेगा।
अम्र बिन आस कहते हैं, “मैं डर गया। मुझे लगा कहीं वह शख्स मेरा बाप न हो! क्योंकि उसी तरफ़ अम्र बिन आस के वालिद मोहतरम वज़ू कर रहे थे।”
“रजुलुन यमूतू अला गैर मिल्लती”
सब के सब इस तजस्सुस में पड़ गए, आखिर कौन है वो शख्स?
फ़-तल्ला मावियाह (तो मावियाह आ गया) यानी मावियाह ज़ाहिर हुआ।

मुआविया के इल्ज़ामात और अली अलैहिस्सलाम के जवाबात

*मुआविया के इल्ज़ामात और अली अलैहिस्सलाम के जवाबात*


1️⃣ मुआविया का पहला इल्ज़ाम:
*“अली ने उस्मान के क़ातिलों की मदद की, और उन्हें सज़ा नहीं दी।”*

*मौला अली अलैहिस्सलाम का जवाब:*
मौला अली अलैहिस्सलाम ने नहजुल बलाग़ा के कई ख़ुत्बों और खतूत में इस इल्ज़ाम का जवाब दिया
उन्होंने फ़रमाया:
*“उस्मान के क़त्ल में मैं न शरीक था, न राज़ी। मगर जब लोगों ने मुझ पर जब्र किया और मुझसे ख़िलाफ़त की बैअत ली, तो उस वक्त हालात ऐसे थे कि बग़ावत का दरवाज़ा खुला हुआ था। अगर मैं तुरंत इंसाफ़ के नाम पर किसी पर हाथ डालता, तो पूरी उम्मत में फसाद फैलता।”*
(नहजुल बलाग़ा – ख़ुत्बा 173, शरह इब्ने अबिल हदीद, जिल्द 3, सफ़ा 207)

उन्होंने आगे फ़रमाया:
*“मुआविया! तू उस्मान का वारिस नहीं है कि उसके क़तिलों से बदला मांगे। अगर इंसाफ़ ही तेरा मक़सद है, तो पहले अपने गुनाहों की जवाबदेही कर।”*
(नहजुल बलाग़ा – खत 14)


2️⃣ *मुआविया का दूसरा इल्ज़ाम:*
“अली ने बग़ावत की आग भड़काई और उस्मान के खिलाफ़ माहौल तैयार किया।”

*अली अलैहिस्सलाम का जवाब:*

*“अगर मैंने लोगों को उस्मान से नाराज़ किया, तो तू ही बता, जब उस्मान पर ज़ुल्म हो रहा था, तू कहाँ था?*
*तू शाम का हाकिम था, और तेरे पास फौजें थीं। क्या तूने उसकी मदद की?”*
(नहजुल बलाग़ा – खत 54)

और फिर अली अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

*“तूने उस्मान की मौत को ज़रिया बना कर हुकूमत की सीढ़ी तैयार की है। ये इंसाफ़ नहीं, ये तेरा तख़्त का लालच है।”*
(शरह नहजुल बलाग़ा – इब्ने अबिल हदीद, जिल्द 4, सफ़ा 121)



3️⃣ *मुआविया का तीसरा इल्ज़ाम:*
“मैं उस्मान का बदला लेने निकला हूँ, इसलिए मैं बाग़ी नहीं।”

*अली अलैहिस्सलाम का जवाब:*

*“तू उस्मान का बदला नहीं, बल्कि अपने बाप अबू सुफ़ियान की दुश्मनी का बदला ले रहा है। तूने उस्मान का नाम ढाल बना लिया है, ताकि हुकूमत तुझ तक पहुँच जाए।”*
(नहजुल बलाग़ा – ख़ुत्बा 33)


फिर फ़रमाया:
*“अगर तुझे इंसाफ पसंद तो है, तो पहले ख़ुद का जायज़ा ले – तू उस उम्मत के खिलाफ़ तलवार उठा रहा है जिसके खिलाफ़ तू पहले कुफ़्फ़ार के साथ खड़ा था।”*
(तारीख़ तबरी, जिल्द 4, सफ़ा 521)



4️⃣ *अली अलैहिस्सलाम का ख़ुत्बा “अल-क़ासिया”:*

इस मशहूर ख़ुत्बे में मौला अली ने मुआविया और बनू उमय्या की हुकूमत की हवस को यूँ बयान किया:

*“मैं जानता हूँ कि वो लोग जो मेरे खिलाफ़ उठे हैं, वो दुनिया के चाहने वाले हैं। उन्होंने हक़ को नहीं, हुकूमत को मक़सद बनाया है। अगर मैं नर्मी दिखाऊँ, तो इस्लाम का निज़ाम ढह जाएगा।”*
(नहजुल बलाग़ा – ख़ुत्बा 192, अल-क़ासिया)



5️⃣ *अली अलैहिस्सलाम की बाद-अज़-जंग तक़रीर:*

*जंग के बाद मौला ने फरमाया:*

*“ख़ुदा की क़सम! अगर मेरे पास इतने सच्चे और सब्र वाले लोग होते जितने मुआविया के पास मक्कार हैं, तो दुनिया में कोई बाग़़ी नहीं बचता।”*
(नहजुल बलाग़ा – ख़ुत्बा 97)



*उलमा के तवारीखी इक़रारात:*

*इमाम तबरी लिखते हैं:*
*“मुआविया ने अली के खिलाफ़ बग़ावत की, और ये फसाद इंसाफ़ के नाम पर सियासत थी।”*
(तारीख़ तबरी, जिल्द 4, सफ़ा 523)

*इब्ने अबिल हदीद:*
*“अली हक़ पर थे, और मुआविया की तलवार सिर्फ़ दुनिया के लिए थी।”*
(शरह नहजुल बलाग़ा, जिल्द 2, सफ़ा 354)



*अल-बलाज़ुरी:*
*“अली के साथ वो थे जो रसूलुल्लाह के साथ रहे, और मुआविया के साथ वो थे जो ताज़ व तख़्त के दीवाने थे।”*
(अंसाबुल अशराफ, जिल्द 3, सफ़ा 111)



*नतीजा*

*मुआविया के तमाम इल्ज़ाम हक़ीक़त में सियासी बहाने थे। उसने इंसाफ़ का नाम लेकर ख़िलाफ़त की बुनियाद हिला दी, उम्मत में फित्ना पैदा किया, और इस्लामी इत्तिहाद को दो हिस्सों में बाँट दिया।*

मौला अली अलैहिस्सलाम के जवाबात और उनके अमल ने साबित कर दिया कि:
*“अली अलैहिस्सलाम हक़ पर थे – उनके साथ ईमान था, उनके खिलाफ़ तलवार उठाने वाला हर गिरोह बाग़ी था, जहन्नम की तरफ बुलाने वाला  था ।”*


1️⃣ मुआविया ने उस्मान के क़त्ल को बहाना बनाया, मगर मक़सद हुकूमत था।

2️⃣ अली अलैहिस्सलाम ने हर इल्ज़ाम का जवाब हिकमत और शरई दलीलों से दिया।

3️⃣ रसूलुल्लाह ﷺ की हदीसें और सहाबा की गवाही – दोनों ने साबित किया कि मुआविया की फौज बाग़ी थी।

4️⃣ जंग-ए-सिफ़्फ़ीन की बुनियाद नफ्स, सियासत और बुग़्ज़-ए-अहले-बैत पर थी, न कि दीनी मक़सद पर।

5️⃣ इस जंग ने आगे चलकर उमय्यद ताग़़ूतियत की राह खोली, जो इस्लामी अद्ल के निज़ाम के खिलाफ़ एक काली शुरुआत थी।