अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 72 ग़ज़वा अहज़ाब पार्ट 1

ग़ज़वा अहज़ाब

एक साल से ज़्यादा अर्से की लगातार फ़ौजी महिमों और कार्रवाइयों के बाद अरब प्रायद्वीप पर शान्ति छा गई थी और हर ओर सुख-शान्ति का दौर-दौरा था, पर यहूदियों को, जो अपनी दुष्टाओं, षड्यंत्रों और विद्वेष भावनाओं के नतीजे में तरह-तरह के अपमान और रुसवाई का मज़ा चख चुके थे, अब भी होश नहीं आया था। उन्होंने धोखादेही, चालें और षड्यंत्र के अप्रिय परिणामों से कोई सबक़ नहीं सीखा था, चुनांचे ख़ैबर चले जाने के बाद पहले तो उन्होंने यह इन्तिज़ार किया कि देखें मुसलमानों और बुतपरस्तों में जो सैनिक संघर्ष चल रहा है, उसका नतीजा क्या होता है, लेकिन जब देखा कि मुसलमानों के लिए हालात उनके पक्ष में जा रहे हैं, वे फैल रहे हैं, बढ़ रहे हैं और उनका प्रभाव दूर-दूर तक फैल गया है, तो उन्हें जलन हुई।

उन्होंने नए सिरे से साज़िश की और मुसलमानों पर एक करारी चोट लगाने की तैयारी में लग गए, ताकि मुसलमान हमेशा के लिए ख़त्म कर दिए जाएं, लेकिन उन्हें मुसलमानों से सीधे-सीधे टकराने का साहस नहीं था, इसलिए इस मक़सद के लिए एक बड़ी ही भयानक योजना बनाई ।

इसका विवरण यह है कि बनू नज़ीर के बीस सरदार और नेता मक्का में कुरैश के पास हाज़िर हुए और उन्हें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के खिलाफ़ लड़ाई पर उभारते हुए अपनी मदद का यक़ीन दिलाया। कुरैश ने उनकी बात मान ली। चूंकि वे उहुद के दिन बद्र के मैदान में मुसलमानों के खिलाफ़ मैदान में आने का एलान और वायदा करके उसके विरुद्ध काम कर चुके थे, इसलिए उनका विचार था कि अब इस प्रस्तावित लड़ाई द्वारा वे अपनी ख्याति भी वापस ले आएंगे और अपनी कही हुई बात भी पूरी कर देंगे ।

इसके बाद यहूदियों की यह टोली बनू ग़तफ़ान के पास गई और कुरैश ही की तरह उन्हें भी लड़ाई पर तैयार किया। वे भी तैयार हो गए। फिर इस मंडली ने अरब के बाक़ी क़बीलों में घूम-घूम कर लोगों को लड़ाई पर उभारा और इन क़बीलों के भी बहुत से लोग तैयार हो गए।

ग़रज़ इस तरह यहूदी सियासतकारों (कूटनीतिज्ञों) ने पूरी कामियाबी के साथ कुन के ताम बड़े-बड़े जत्थों और गिरोहों को नबी सल्ल० और आपकी दावत और मुसलमानों के खिलाफ भड़का कर लड़ाई के लिए तैयार कर लिया।

इसके बाद तैशुदा प्रोग्राम के मुताबिक़ दक्षिण से कुरैश, किनाना और तिहामा
में आबाद दूसरे मित्र क़बीलों ने मदीने की ओर कूच किया। इन सबका प्रधान सेनापति अबू सुफ़ियान था और उनकी तायदाद चार हज़ार थी। यह फ़ौज मर्रज़्ज़हरान पहुंची तो बनू सुलैम भी उसमें आ शामिल हुए।
कूच उधर उसी वक़्त पूरब की ओर से ग़तफ़ानी क़बीले फ़ज़ारा, मुर्रा और अशजअ ने किया। फ़ज़ारा का सेनापति उऐना बिन हिस्न था, बनू मुर्रा का हारिस बिन औफ़ और बनू अशजअ का मिसअर बिन रखीला। इनके अलावा बनू असद और दूसरे क़बीलों के बहुत से लोग भी आए थे।

इन सारे क़बीलों ने एक निश्चित समय और निश्चित प्रोग्राम के मुताबिक़ मदीने का रुख किया था, इसलिए कुछ दिन के अन्दर अन्दर मदीने के पास दस हज़ार फ़ौजियों की एक सेना जमा हो गयी। यह इतनी बड़ी सेना थी कि शायद मदीना की पूरी आबादी (औरतों, बच्चों, बूढ़ों और जवानों को मिलाकर भी) इसके बराबर न थी ।

अगर हमलावरों का यह ठाठें मारता समुद्र मदीना की चारदीवारी तक अचानक पहुंच जाता, तो मुसलमानों के लिए सख्त खतरनाक साबित होता । कुछ असंभव नहीं, उनकी जड़ कट जाती और उनका पूरा सफाया हो जाता, लेकिन मदीने का नेतृत्व बड़ा चौकस और मुस्तैद नेतृत्व था। उसकी उंगलियां हमेशा हालात की नब्ज़ पर रहती थीं, और वह परिस्थिति का विश्लेषण करके आने वाली घटनाओं का ठीक-ठीक अन्दाज़ा भी लगाता था और उनसे निमटने के लिए सर्वथा उचित क़दम भी उठाता था, चुनांचे कुफ़्फ़ार की भारी फ़ौज ज्यों ही अपनी जगह से हरकत में आई, मदीने के मुख्बिरों ने अपने नेतृत्व को इसकी सूचना दे दी।

सूचना मिलते ही रसूलुल्लाह सल्ल० ने हाई कमान की मज्लिसे शूरा बुला ली और प्रतिरक्षात्मक योजनाओं पर सलाह-मश्विरा किया।

मज्लिसे शूरा ने सोच-विचार के बाद हज़रत सलमान फ़ारसी रज़ि० का एक प्रस्ताव पूर्ण सहमति से मंजूर कर लिया। यह प्रस्ताव हज़रत सलमान फ़ारसी रज़ि० ने इन शब्दों में पेश किया था कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! फ़ारस में जब हमारा घेराव किया जाता था, तो हम अपने चारों ओर खाई खोद लेते थे ।

यह बड़ी हिक्मत भरी प्रतिरक्षात्मक चाल थी। अरब के लोग इसे जानते न थे। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस प्रस्ताव को तुरन्त अमली जामा पहनाते हुए हर दस आदमी को चालीस हाथ खाई खोदने का काम सौंप दिया और मुसलमानों ने पूरा दिल लगाकर भरपूर मेहनत के साथ खाई खोदनी शुरू कर दी।

प्यारे नबी सल्ल० इस काम पर उभारते भी थे और अमली तौर पर इस काम में पूरी तरह शरीक भी रहते थे। चुनांचे सहीह बुखारी में हज़रत सहल बिन साद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हम लोग रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ खाई में थे, लोग खोद रहे थे और हम कंधों पर मिट्टी ढो रहे थे कि (इस बीच) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया—

‘ऐ अल्लाह ! ज़िंदगी तो बस आखिरत की ज़िंदगी है, पस मुहाजिरों और अंसार को बख्श दे। “

एक दूसरी रिवायत में हज़रत अनस रज़ि० फ़रमाते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम खंदक (खाई) की ओर तशरीफ़ लाए तो देखा कि मुहाजिरीन व अंसार एक ठंडी सुबह में खोदने का काम कर रहे थे, उनके पास गुलाम न थे कि उनके बजाए ये काम ग़ुलाम कर देते। आपने उनकी मेहनत और भूख देखकर फ़रमाया-

‘ऐ अल्लाह ! ज़िंदगी तो बस आखिरत की ज़िंदगी है, पस मुहाजिरों और अंसार को बख्श दे।’

अंसार और मुहाजिरों ने उसके जवाब में कहा-

‘हम वह है कि हमने हमेशा के लिए, जब तक कि बाक़ी रहें, मुहम्मद सल्ल० से जिहाद पर बैअत की है। 2

सहीह बुखारी ही में एक रिवायत हज़रत बरा बिन आज़िब रज़ि० की भी मिलती है कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को देखा कि आप खंदक़ से मिट्टी ढो रहे थे, यहां तक कि धूल ने आपके पेट की खाल ढांक दी थी। आपके बाल बहुत ज़्यादा थे। मैंने (इसी हालत में) आपको अब्दुल्लाह बिन रवाहा के जोशीले पदों को पढ़ते सुना । आप मिट्टी ढोते जाते थे और यह कहते जाते थे-

‘ऐ अल्लाह ! अगर तू न होता तो हम हिदायत न पाते, न सदक़ा देते, न नमाज़ पढ़ते, पस हम पर सन्तोष उतार और अगर टकराव हो जाए, तो हमारे क़दम जमाए रख। उन्होंने हमारे खिलाफ़ लोगों को भड़काया है। अगर उन्होंने कोई फ़िना चाहा, तो हम हरगिज़ सर न झुकाएंगे।’

हज़रत बरा फ़रमाते हैं कि अन्तिम शब्द खींच कर कहते थे।

1. सहीह बुखारी बाब ग़ज़वतुल खंदक, 2/588 2. सहीह बुखारी 1/397, 2/588

एक रिवायत में अन्तिम पद इस तरह है-

‘उन्होंने हम पर ज़ुल्म किया है और अगर वे हमें फ़िले में डालना चाहेंगे, तो हम हरगिज़ सर न झुकाएंगे। “

मुसलमान एक ओर इस उत्साह के साथ काम कर रहे थे, तो दूसरी ओर इतने ज़ोर की भूख सहन कर रहे थे कि उसे सोच कर ही कलेजा मुंह को आता है।

चुनांचे हज़रत अनस रजि० का बयान है कि (खंदक खोदने वालों) के पास दो पसर जौ लाया जाता था और उसे हीक देती हुई चिकनाई के साथ बनाकर लोगों के सामने रख दिया जाता था, लोग भूखे होते थे, इसलिए हलक़ के नीचे उतार लेते हैं हालांकि वह बे-लज़्ज़त होता था। इससे महक फूटती रहती थी।

अबू तलहा कहते हैं कि हमने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से भूख की शिकायत की और अपने पेट खोलकर एक-एक पत्थर दिखाए, तो रसूल सल्ल० ने अपना पेट खोलकर दो पत्थर दिखलाया । 3

खंदक़ की खुदाई के दौरान नुबूवत की नई निशानियां भी सामने आईं। सहीह बुखारी की रिवायत है कि हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रजि० ने नबी सल्ल० के अन्दर कड़ी भूख की निशानियां देखीं, तो बकरी का एक बच्चा ज़िब्ह किया और उनकी बीवी ने एक साअ (लगभग ढाई किलो) जौ पीसा, फिर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने राज़दारी के साथ खुफ़िया तौर पर गुज़ारिश की कि अपने कुछ साथियों के साथ तशरीफ़ लाएं, लेकिन नबी सल्ल० तमाम खंदक वालों को जिनकी तायदाद एक हज़ार थी, साथ लेकर चल पड़े ।

सब लोगों ने उसी थोड़े से खाने को पेट भरकर खाया, फिर भी गोश्त की हांडी अपनी हालत पर बाक़ी रही और भरी की भरी जोश मारती रही और गूंधा हुआ आटा अपनी हालत पर बाक़ी रहा। उससे रोटी पकाई जाती रही ।

हज़रत नोमान बिन बशीर की बहन खंदक़ के पास दो पसर खजूर लेकर आईं कि उनके भाई और मामूं खा लेंगे, लेकिन रसूलुल्लाह सल्ल० के पास से गुज़रीं तो आपने उनसे वह खजूर मांग ली और एक कपड़े के ऊपर बिखेर दी, फिर खंदक़ वालों को दावत दी। खंदक़ वाले उसे खाते गए और वह बढ़ती गई, यहां तक कि सारे खंदक़ वाले खा-खाकर चले गए और खजूर थी कि कपड़ों के किनारों से बाहर गिर रही थी।

, 2/589 वही 2/588 3. जामेअ तिर्मिज़ी, मिश्कातुल मसाबीह 2/448 यह घटना सहीह बुखारी में रिवायत की गई है, देखिए 2/588, 589

1. सहीह बुखारी

Leave a comment