अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 68

बेरे मऊना की दुर्घटना

जिस महीने रजीअ की घटना घटित हुई, ठीक उसी महीने बेरे मऊना की दुर्घटना भी हुई, जो रजीअ की घटना से कहीं ज़यादा संगीन थी।

इस घटना का सार यह है कि अबू बरा आमिर बिन मालिक, जो ‘नेज़ों से खेलने वाला’ की उपाधि से जाना जाता था, हुज़ूर सल्ल० की सेवा में मदीना आया । आपने उसे इस्लाम की दावत दी। उसने इस्लाम तो कुबूल नहीं किया, लेकिन दूरी भी नहीं अपनाई ।

उसने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! अगर आप अपने साथियों को

1. इब्ने हिशाम 2/169-179, जादुल मआद 2/9-10, सहीह बुखारी 2/568, 569, 585

दीन की दावत के लिए नज्द वालों के पास भेजें, तो मुझे उम्मीद है कि वे लोग आपकी दावत कुबूल कर लेंगे।

आपने फ़रमाया, मुझे अपने सहाबियों के बारे में नज्द वालों से ख़तरा है। अबू बरा ने कहा, वे मेरी पनाह में होंगे।

इस पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इब्ने इस्हाक़ के कहने के मुताबिक़ चालीस और सहीह बुखारी की रिवायत के मुताबिक़ सत्तर आदमियों को उसके साथ भेज दिया। सत्तर ही की रिवायत ठीक है।

मंज़िर बिन अम्र को, जो बनू साइदा से ताल्लुक रखते थे और ‘मौत के लिए आगे-आगे’ की उपाधि से मशहूर थे, उनका अमीर बना दिया। ये लोग विद्वान, क़ारी और चुने हुए सहाबा रज़ि० में से थे। दिन में लकड़ियां काट कर उसके बदले सुफ़्फ़ा वालों के लिए अनाज खरीदते और कुरआन पढ़ते-पढ़ाते थे और रात में अल्लाह के हुज़ूर मुनाजात और नमाज़ के लिए खड़े हो जाते थे ।

इस तरह चलते-चलाते मऊना के कुंएं पर जा पहुंचे। यह कुंवां बनू आमिर और हुर्रा बनी सुलैम के बीच एक भू-भाग में स्थित है ।

वहां पड़ाव डालने के बाद इन सहाबा किराम ने उम्मे सुलैम के भाई हराम बिन मलहान को अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का ख़त देकर खुदा के दुश्मन आमिर बिन तुफ़ैल के पास रवाना किया, लेकिन उसने खत को देखा तक नहीं और एक आदमी को इशारा कर दिया, जिसने हज़रत हराम को पीछे से इस ज़ोर का नेज़ा मारा कि वह नेज़ा आर-पार हो गया।

खून देखकर हज़रत हराम रज़ि० ने फ़रमाया, अल्लाहु अक्बर! काबा के रब की क़सम ! मैं कामियाब हो गया।

इसके बाद तुरन्त ही अल्लाह के उस दुश्मन आमिर ने बाक़ी सहाबा पर हमला करने के लिए अपने क़बीले बनू आमिर को आवाज़ दी, मगर उन्होंने अबू बरा की पनाह को देखते हुए उसकी आवाज़ पर कान न धरे। उधर से निराश होकर उस आदमी ने बनू सुलैम को आवाज़ दी। बनू सुलैम के तीन क़बीलों असीया, रअल और ज़कवान ने उस पर लब्बैक कहा और झट आकर इन सहाबा किराम का घेराव कर लिया।

जवाब में सहाबा किराम ने भी लड़ाई की, मगर सबके सब शहीद हो गए, सिर्फ़ हज़रत काब बिन ज़ैद बिन नज्जार रज़ियल्लाहु अन्हु ज़िंदा बचे। उन्हें शहीदों के बीच से घायल हालत में उठा लाया गया और वह खंदक़ की लड़ाई तक ज़िंदा रहे । इनके अलावा दो और सहाबा हज़रत अम्र बिन ज़मरी और हज़रत मुंज़िर

बिन उक़्बा बिन आमिर रज़ि० ऊंट चरा रहे थे। उन्होंने घटना-स्थल पर चिड़ियों को मंडलाते देखा, तो सीधे घटना-स्थल पर पहुंचे।

हुए फिर हज़रत मुंज़िर तो अपने साथियों के साथ मिलकर मुश्किों से लड़ते शहीद हो गए और हज़रत अम्र बिन उमैया जुमरी को क़ैद कर लिया गया, लेकिन जब बताया गया कि उनका ताल्लुक़ क़बीला मुज़र से है तो आमिर ने उनके माथे के बाल कटवा कर अपनी मां की ओर से, जिस पर एक गरदन आज़ाद कराने की नज्र थी, आज़ाद कर दिया।

हज़रत अम्र बिन उमैया जुमरी रज़ि० इस दर्दनाक दुर्घटना की खबर लेकर मदीना पहुंचे। सत्तर ‘बड़े’ मुसलमानों की शहादत का यह हादसा, जिसने उहुद की लड़ाई का चरका ताज़ा कर दिया और वह भी इस अन्तर के साथ कि उहुद के शहीद तो एक खुली हुई और आमने-सामने की लड़ाई में मारे गए थे, मगर ये बेचारे एक शर्मनाक ग़द्दारी की भेंट चढ़ गए।

हज़रत अम्र बिन उमैया जुमरी वापसी में क़नात घाटी पर स्थित जगह क़रक़रा पहुंचे तो एक पेड़ के साए में उतर पड़े। वहीं बनू किलाब के दो आदमी भी आकर उतर गए। जब वे बेखबर सो रहे तो हज़रत अम्र बिन उमैया ने उन दोनों का अन्त कर दिया। उनका विचार था कि वह अपने साथियों का बदला ले रहे हैं, हालांकि उन दोनों के पास अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का समझौता था, पर हज़रत अम्र जानते न थे ।

चुनांचे जब मदीना आकर उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्ल० को अपनी इस कार्रवाई की ख़बर दी, तो आपने फ़रमाया कि तुमने ऐसे दो आदमियों को क़त्ल किया है, जिनकी दियत मुझे अनिवार्य रूप से देनी होगी।

इसके बाद आप मुसलमानों और उनके यहूदी मित्रों से दियत वसूल करने में लग गए और यही ग़ज़वा बनी नज़ीर की वजह बना, जैसा कि आगे आ रहा है। अल्लाह के रसूल सल्ल० को मऊना और रजीअ की इन दुखद घटनाओं से, जो कुछ ही दिनों में आगे-पीछे घटी थीं?, इतना दुख पहुंचा और आप इतने दुखी और बेचैन हुए कि जिन क़ौमों और क़बीलों ने इन सहाबा किराम के साथ द्रोह

1. देखिए इब्ने हिशाम 2/183-188, जादुल मआद 2/109-110, सहीह बुखारी 2/584, 586

2. इब्ने साद ने लिखा है कि रजीअ और मअना दोनों घटनाओं की ख़बर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को एक ही रात में मिली थी। (2/53) 3. इब्ने साद ने हज़रत अनस रज़ि० से रिवायत की है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु

और हत्या का यह दुर्व्यवहार किया था, आपने उन पर एक महीने तक बद-दुआ फ़रमाई ।

चुनांचे सहीह बुखारी में हज़रत अनस रज़ि० से रिवायत मिलती है कि जिन लोगों ने आपके सहाबा को बेरे मऊना पर शहीद किया था, आपने उन पर तीस दिन तक बद-दुआ की। आप फज्र की नमाज़ में राल, ज़कवान, लह्यान और उसैया के लिए बद-दुआ करते थे और फ़रमाते थे कि असीमा ने अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी की। अल्लाह ने इस बारे में अपने नबी पर क़ुरआन उतारा, जो बाद में निरस्त हो गया, वह कुरआन यह था, हमारी क़ौम को यह बतला दो कि अपने रब से मिले, तो वह हमसे राज़ी है और हम उससे राज़ी हैं।’ इसके बाद अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अपनी यह दुआ छोड़ दी। 1

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