
**बादशाह जहाँगीर और उनके कान छिदवाने का कारण — ख़्वाजा साहब का “कान-छिदा ग़ुलाम” कहलाना**
इस अमुरदाद महीने की 8 तारीख़ को मेरी तबियत में बदलाव महसूस हुआ, और धीरे-धीरे मुझे बुखार और सरदर्द ने घेर लिया। इस डर से कि कहीं मुल्क और ख़ुदा के बंदों को कोई नुक़सान न हो, मैंने इसे अपने क़रीबी और पहचान वालों से ज़्यादातर छुपाए रखा और हकीमों और वैद्य को भी नहीं बताया। कुछ दिन इसी तरह गुज़रे और मैंने सिर्फ़ नूरजहाँ बेगम को ही यह हाल बताया, क्योंकि मुझे नहीं लगता था कि मुझसे ज़्यादा मोहब्बत कोई और करता हो। मैंने भारी खाने से परहेज़ किया और थोड़ा-बहुत हल्का भोजन लेकर रोज़ाना अपनी आदत के अनुसार दीवान-ख़ाना (आम दरबार) में गया, झरोखा और ग़ुसलख़ाना में भी पहले की तरह दाख़िल हुआ, जब तक कि मेरी त्वचा पर कमज़ोरी के निशान नज़र आने लगे।
कुछ उमरा को इसकी ख़बर लगी, और उन्होंने अपने भरोसेमंद हकीम जैसे हकीम मसीब-उज़-ज़माँ, हकीम अबुल क़ासिम, और हकीम अब्दुश-शकूर को बताया। बुखार में कोई बदलाव नहीं आया, और तीन रात तक मैंने अपनी आदत के अनुसार शराब पी, जिससे और कमज़ोरी हो गई। इस बेचैनी और कमज़ोरी के दौरान मैं ख़्वाजा साहब के मज़ार पर गया, और उस मुबारक जगह में ख़ुदा से अपनी सेहत के लिए दुआ की और नज़र और ख़ैरात देने का मन्नत की। अल्लाह तआला के फ़ज़्ल और रहमत से मुझे सेहत की ख़िलअत अता हुई, और धीरे-धीरे मैं ठीक हो गया।
सरदर्द जो बहुत तेज़ था, हकीम अब्दुश-शकूर के इलाज से कम हो गया, और बाइस दिन में मेरी हालत पहले जैसी हो गई। महल के ख़ादिम और पूरे मुल्क के लोग इस बड़ी नेमत के लिए नज़राने लाए। मैंने किसी का नज़राना क़बूल नहीं किया, और हुक्म दिया कि हर शख़्स अपने घर में जो चाहे, ग़रीबों में तक़सीम करे।
10 शाहरीवार को ख़बर आई कि ताज ख़ान अफ़ग़ान, जो ठट्टा का हाकिम था और मुल्क के पुराने उमरा में से था, का इंतिकाल हो गया।
“`बीमारी के दौरान मेरे दिल में यह ख़्याल आया कि जब मैं पूरी तरह ठीक हो जाऊँ, तो चूँकि मैं दिल से ख़्वाजा मुईनुद्दीन का “कान-छिदा ग़ुलाम” हूँ और अपनी ज़िन्दगी का कर्ज़ उन पर है, तो मैं खुले आम अपने कान छिदवाऊँ और उनके कान-छिदा ग़ुलामों में शामिल हो जाऊँ।“`
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गुरुवार, 12 शाहरीवार को, जो माह-ए-रश के मुताबिक़ था, मैंने अपने कान छिदवाए और हर कान में एक चमकता हुआ मोती पहन लिया। जब महल के सेवक (अजमेर मैगज़ीन नया बाज़ार) और मेरे वफ़ादार दोस्तों ने यह देखा, तो जो लोग मेरी मौजूदगी में थे और जो दूर इलाक़ों में थे, सबने शौक़ और उत्साह से अपने कान छिदवाए, और सच्चाई की ख़ूबसूरती को मोतियों और यक़ूत से सजाया, जो ख़ास ख़ज़ाने में मौजूद थे और उन्हें इनाम के तौर पर दिए गए।
तारीख़: तुज़्क-ए-जहाँगीरी, 1614 ईस्वी
जब बादशाह जहाँगीर अजमेर में तीन साल तक क़यामपज़ीर रहे।
सैयद आतिफ़ हुसैन काज़मी चिश्ती, अजमेर शरीफ़


“बादशाह जहाँगीर का सोने का सिक्का जो अजमेर मिंट का है, 1023 हिजरी यानी 1614 ईस्वी का है और जिस पर “या मोईन” तहरीर करवाया गया है, जब बादशाह जहाँगीर अजमेर में ही क़यामपज़ीर थे। यह बादशाह जहाँगीर की ख़्वाजा साहब से अकीदत को दर्शाता है।
सैयद आतिफ़ हुसैन काज़मी चिश्ती

