हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है,उन्होंने कहा:अल्लाह के रसूल स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का इंतेक़ाल मेरी गर्दन और सीने के दरमियान मेरी ही बारी के दिन हुआ, मैंने उस दिन किसी से कुछ भी ज़्यादती नही की, मेरी गौद मैं रसूलअल्लाह अलैहिस्सलाम फौत हुए।फिर मैंने आप अलैहिस्सलाम का सर ए मुबारक तकिया पर रख दिया और *मैं औरतों के साथ मिलकर रोने लगी और अपने चेहरों पर हाथ मारने (मातम करने) लगीं।*
इस मोतबर रिवायत में उम्मुल मोमेनीन हज़रत आएशा रज़ियल्लाहू अन्हु से ख़ुद रिवायत मिलती हैं कि जब रसूलअल्लाह की वफ़ात हो गई तो हज़रत आएशा ने रसूलअल्लाह का सर ए मुबारक को तकिए पर रख दिया *और दूसरी तमाम औरतों के साथ मिलकर रोने लगीं और हुज़ूर से बेपनाह मोहब्बत और लगाव के ग़म की वजह से अपने अपने चेहरों पर हाथ मारकर मातम करती हुई रोने और पीटने लगीं।*
अब अगर मातम पर किसी को फतवा देना है तो सबसे पहले उम्मुल मोमेनिन का अमल भी ध्यान में रखना 🙏
ज़ुहैर इब्ने क़ैन अल बजली कूफा के संभ्रांत लोगों में गिने जाते थे। पेशे से व्यापारी थे और उस वक़्त के अक़ीदे के लिहाज़ से उस्मानी। उस्मानी, यानी वो लोग जो मानते थे कि अली इब्ने अबु तालिब ने अपने से पहले ख़लीफा रहे उस्मान बिन अफ्फन के हत्यारों के साथ ढीलाई बरती और इंसाफ नहीं किया।
बहरहाल, ज़ुहैर हज करके लौट रहे थे। रास्ते में उनका क़ाफिला एक जगह ठहरा। उनसे कुछ ही दूरी पर हुसैन इब्ने अली के परिवार के ख़ेमे लगे थे। हुसैन हज अधूरा छोड़कर कूफा की तरफ निकले थे। अपने भाई मुहम्मद ए हनफिया को लिखे एक पैग़ाम में उन्होंने कहा कि मैं नहीं चाहता कि मक्का या मदीना की ज़मीन पर ख़ूंरेज़ी हो और ये इल्ज़ाम मेरे सिर आए।
बहरहाल, इमाम हुसैन ने अपने साथियों से ज़ुहैर के क़ाफिले के बारे में दरयाफ्त किया। उन्होंने पता करके बताया कि, कूफे का कोई मौअतबर शख़्स है, हज करके लौट रहा है। इमाम हुसैन ने अपने भाई अब्बास इब्ने अली को बुलाया और कहा कि उस क़ाफिले के सालार के पास जाएं और उनसे कहें कि हुसैन बिन अली आपसे मिलना चाहते हैं।
अब्बास बिन अली भाई का पैग़ाम लेकर पहुंचे। ज़ुहैर ने उनसे नाम-पता पूछा और आने का मक़सद दरयाफ्त किया। हुसैन बिन अली का नाम सुना तो ज़ुहैर ने नफरत से मुंह फेर लिया और कहा कि उनसे जाकर कहो कि हमारी कोई इबादत पूरी नहीं होती जबतक हम अली और उनके कुनबे पर लानत न भेज दें।
अब्बास लौट आए और भाई को तमाम अहवाल कह सुनाया। इमाम हुसैन ने उनको दोबारा भेजा और कहलवाया कि बिना किसी से मिले, बिना किसी को जाने नफरत करना अच्छा नहीं है। एक बार मिलकर अपनी शिकायत तो दर्ज कराएं ताकि हमें भी ख़बर हो कि हमसे किसी को इतनी नफरत क्यों है ? इस बार ज़ुहैर ने मिलने से इंकार कर दिया। अब्बास लौटे और भाई को मसला बताया। इमाम हुसैन ने उनको फिर भेजा। इस बार कहलवाया कि चलो लानत ही करना है तो साथ बैठकर करना। आज खाना साथ खाएंगे और नफरत की वजहों पर तब्सरा भी हो जाएगा। अब्बास तीसरी बार आए तो जनाबे ज़ुहैर की अहलिया को बड़ा बोझ महसूस हुआ। उन्होंने कहा कि जब इतना बुला रहे हैं तो मिल क्यों नहीं लेते ?
बीवी ने ज़्यादा इसरार किया तो ज़ुहैर मान गए। लेकिन वो इस शर्त पर जाने को राज़ी हुए कि अली के बेटे से मिल आएंगे लेकिन कोई बात नहीं करेंगे। ज़ुहैर ख़यामे हुसैनी में गए तो निगाहें फेरकर, मानो बस चले आए। लेकिन जब लौटे तो मिज़ाज बदला हुआ था। किसी को ख़बर नहीं उनके और हुसैन के दरमियान क्या बात हुई। लोगों के क़यास हैं। कोई लिखता है हुसैन ने ज़ुहैर के किसी ख़्वाब का तज़करा किया जो उन्होंने बचपन में अपनी मां से बयान किया था। कोई कहता है हुसैन से मिलकर ज़ुहैर ने अपने दिल की सब बातें कह डालीं। मगर जब हुसैन बोले तो ज़ुहैर की नफरतें उनके अख़लाक़ के वज़न में दम तोड़ गईं और उनके दाल का मैल धुल गया।
सुबह का बदतरीन दुश्मन शाम को बेहतरीन दोस्त था। उन्होंने अपनी बीवी से कहा कि आजतक इतने अच्छे अख़लाक़ का दूसरा इंसान नहीं देखा जैसे हुसैन हैं। ज़ुहैर वहां से कभी लौटकर अपने घर नहीं गए। कूफा की जगह कर्बला पहुंचे। आशूर के रोज़ ज़ुहैर सबसे पहले शहीद होने वाले असहाब में थे।
एक और मौजज़ा आशूर के रोज़ हुआ। इब्ने साद की फौज से उसका एक सिपाहसालार आगे बढ़ा। लोगों को लगा ललकारने जाता है। मगर वो पलट कर नहीं आया। पीछे-पीछे उसका बेटा चला और वो भी न पलटा। अपने बेटे के साथ उस हुर ने पाला बदल लिया। हुर भी कूफा के बाशिंदे थे। वो हुसैन को क़सीदिया से घेरकर करबला लाए थे लेकिन जब इब्ने साद ने पानी पर पहरा बैठाया तो हैरानो-परेशान हुए। उनको याद आया कि जब हुसैन से उनका पहली बार सामना हुआ तो उन्होंने कैसे उनके लश्कर को पानी पिलाया था। लेकिन अब हुसैन पर पानी बंद था तो हुर पशोपेश में थे। उसको लगा था मामला बातचीत से सुलझ जाएगा। वो बार-बार इब्ने साद से पूछते कि लड़ाई टल तो जाएगी न ? मगर जब यक़ीन हो गया कि शाम और कूफा की फौजें क़त्ले हुसैन पर आमादा हैं तो लरज़ गए। वो क़त्ले हुसैन में शरीक नहीं होना चाहते थे। अपने गुनाह का कफ्फारा उन्होंने अपनी और अपने बेटे की जान देकर चुकाया।
लोग कहते हैं हुसैन ने हुर का मुक़द्दर संवार दिया। मगर हुर दुश्मन की फौज में ज़रूर थे लेकिन उनका ज़मीर ज़िंदा था। हक़, नाहक़ की समझ थी। जबतक लड़ाई पर बात न आई तब तक पूरी ड्यूटी निभाई, जब हक़ की बात आई तो सब छोड़कर मौत को गले लगा लिया। मुक़द्दर मगर ज़ुहैर का ज़रूर संवर गया था। उन्होंने कर्बला से पहले कोई जंग नहीं लड़ी। कारोबारी थे, फौज से भला क्या लेना-देना। इमाम हुसैन से न उनके अक़ायद मिलते थे, न मिज़ाज, और न सोच। मगर हुसैन इब्ने अली से मिले तो उन्हीं के होकर रह गए।
कर्बला के दर्स में अख़लाक़ और नफ्स भी अहम हैं।
अख़लाक़ की बिना पर इमाम हुसैन (अस) ने अपने बदतरीन दुश्मन को दोस्त बनाया और ऐसा दोस्त बनाया जिसने उनपर अपनी जान, माल, रुतबा, सब दांव पर लगा दिए। इसी तरह हुर ज़मीर के ज़िंदा होने की दलील हैं। अगर इंसान को वक़्त पर ग़लत-सही का अंदाज़ हो जाए तो बड़े से बड़े गुनाह से बच जाता है। ज़मीर ज़िंदा हो तो बदतरीन लोगों की सोहबत से निकल कर हक़ की राह पर आ जाता है।
कर्बला हक़ और नाहक़ का मीज़ान ऐसे ही नहीं कही जाती। यहां हर चरित्र अनूठा है और अपने आप में एक सबक़ है…
ताज़िए शरीफ़ किसके नज़दीक जायज़ है किसके नज़दीक हराम है और ताज़िया दारी किस किस ने कि थी और आज कौन कौन करता हैं इस पोस्ट को ध्यान से पुरा पढ़े ⁉️
जो लोग कहते हैं कि अहले सुन्नत मे ताजियादारी_हराम है ! तो क्या ये सब सिलसिले अहले सुन्नत के नहीं है⁉️ जिन सिलसिलो मे ताजियादारी जायज़ है वो ये भारत के बहुत मशहूर सिलसिले हैं और इन्हीं सिलसिलों के बुजुर्गो ने भारत में इस्लाम फहलाया है ग़ौर से पढ़ो प्यारे सुन्नी मुसलमान भाईयों सिलसिला ए मदारिया में ताज़िया दारी जायज़ है सिलसिला_ए_कादरिया मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_रिफाइया मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_चिश्तिया मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_सोहरवरदिया मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_नक्शबंदिया मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_कुतुबी मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_फरीदी मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_साबरिया मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_निजामिया मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_कलंदरिया मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_अशरफिया मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_वारसिया मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_नियाज़ी मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_हमदानिया मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_बंदानवाज़ मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_चहेलशाही मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_शाज़लिया मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_गाज़रोनिया मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_तेफुरिया मे ताजियादारी जायज़ है ! सिलसिला_ए_बरकातिया मे ताजियादारी जायज़ है !
( सिलसिला ए बरकातिया से ही मौलाना अहमद रज़ा खान बरेलवी को खिलाफत मिली है ) जब मौलाना अहमद रज़ा खान बरेलवी के पीर ( सययद अब्दुल हुसैन अहमद नूरी ) के आस्ताने पर ताजियारी होती हैं तो फिर रज़वी (रज़ा वाले) बरेलवी क्यो नही करते ताजियारी ???
फकत सिलसिला ए रिज़वीया यानी बरेलवी मे ताजियारी हराम है 🤔 और देवबंदियो मे भी ताजियारी हराम है देवबंदियो को अहले बैत से मोहब्बत नही है और तो क्या फिर सिलसिला ए रिज़वीया बरेलवियों को भी अहले बैत से मोहब्बत नही है ??
बाकी सिलसिले वाले सब के सब अहले बैत आले नबी औलाद ए अली से है मौला हुसैन पाक से है इसलिए हमारे यहाँ ताजियारी जायज़ है और रहेगी ताजियादारी जारी इंशाअल्लाह !!
Important_Sentence💯
1200,800-900 साल पुराने कद़ीम सिलसिलों की पैरवी करोगे या 100 साल पुराना सिलसिला बरेलवी देवबंदी वाहबी की पैरवी करो गे फ़ैसला आप को करना है प्यारे सुन्नी मुसलमान भाईयों⁉️ हक़ मौला हुसैन अलैहिस्सलाम हुसैनियत ज़िंदाबाद ताज़िए शरीफ़ ज़िंदाबाद ताज़िया दार ज़िंदाबाद यज़ीदियत मुर्दाबाद मुर्दाबाद 1200 साल पुरानी ख़ानक़ाह ए आलिया मदारिया मकनपुर शरीफ़ कानपुर नगर युपी इंडिया के ताज़िए शरीफ़ की ज़ियारत करें विडियो में
हर्श के रोज़ अहले बैत अलैहिस्सलाम की मोवददत मोहब्बत काम आएगी नाके किसी मुल्ला जी की क्यूं के मौला हसन मौला हुसैन अलैहिस्सलाम जन्नत के सरदार हैं कोई मुल्ला नहीं जनाब⁉️
हिन्दुस्तान की 3 ख़ानकाह शरीफ ऐसी है जो सबसे कद़ीम ख़ानकाह शरीफ है उन तीनो खानकाहो मे भी ताजियारी होती हैं ! 1) ख़ानकाहे मदारिया मकनपुर शरीफ ( 1200 साल क़दीम खानकाह शरीफ़ ) 2) ख़ानकाहे चिश्तिया अजमेर शरीफ ( 853 साल क़दीम खानकाह शरीफ ) 3) ख़ानकाहे रिफाइया बड़ी गादी मुबारक सूरत शरीफ ( 840 साल क़दीम खानकाह शरीफ )
गुलाम_ए_अहले बैत अलैहिस्सलाम ज़िंदाबाद ये हमारी बात याद रखना सुन्नी मुसलमान भाईयों ताज़िए शरीफ़ जायज़ है हलालियों के लिए ताज़िए शरीफ़ हराम है हरामियों के लिए
✋ *अहले बैत से मुखालिफत करने वाला शैतान की जमात से है सहिह उल इस्नाद हदीस*👊
हजरत अब्दुल्ला बिन अब्बास (राजी अल्लाह अन्हुमा) फरमाते है: रसूल अल्लाह (सलअल्लाहु अलैहे वआलेही वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया: सितारे जमीन वालों के लिए डूबने से बचाव (का सबब) है और मेरे *अहले बैत* मेरी उम्मत को इख्तीलाफ से बचाने का सबब है, *अरब का कोई कबीला अगर उनकी मुखालिफत करेगा तो वो शैतान की जमात करार पाएगा,,*
: इस हदीस के मद्दे नज़र में तमाम लोगों से पूछना चाहता हूं के क्या ये फरमान रसूल अल्लाह saws ने यूं ही बेवजह बोल दिया था या उनको इस बात का इल्म था के मेरे इस दुनिया से जाने के बाद मेरे अहलेबेत (हज़रत अली,हज़रत फातिमा ,इमाम हसन,इमाम हुसैन अलैहिमुस्सलाम अजमइन) से अलग अलग वक्त इख्तलाफ करने और जंग करने भी कुछ लोग आयेंगे ??
मेरा तो ये अकीदा है की अल्लाह के रसूल saws कोई भी कलाम बेवजह नही करते बल्कि वो को भी बोलते हैं वो हुक्म ऐ खुदा होता है।
अब अगर ये बात खुद नबी saws ने बयान फरमाई है तो फिर जो जो भी इंसान इन अहलेबेत अलेहिस्सलाम के मुकाबले में आया और इन हज़रात को ज़हनी या जिस्मानी नुकसान पहुंचाया या तकलीफ पहुंचाई वो सब लोग नबी saws के हुक्म के मुताबिक़ *शैतान की जमात* क़रार पाएंगे।
अब आप लोग ख़ुद तहकीक की जिए के हज़रत अली अलैहिस्सलाम के मुक़ाबले कौन आया ??
🔥 इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को खत लिखकर बुलाने वाला ईमाम बुखारी के नजदीक सहाबी ए रसूल है..🔥
✍️ इमाम इब्ने असीर जजरी ने उस्दुल गाबा और तारीख ए कामिल में, सिब्त इब्ने ज़ौजी ने तजकिरातुल ख्वास में, इमाम अब्दुल बर्र ने अल इसतियाब में, इमाम इब्ने हज़र अस्क़लानी ने ‘अल इसाबा फी तम्यीजुस्सहाबा’ में और इसके अलावा तारीख ए आसम कूफी वगैरह में है कि हुसैन अलैहिस्सलाम को खत लिखकर बुलाने वालों में सुलेमान बिन सुर्द मशहूर था और इसी के घर पर लोगों ने मीटिंग करके उपाय निकाला कि किस तरह से हुसैन अलैहिस्सलाम को यहां बुलाया जाए.?? जैसे कि उस्दुल गाबा में इसके बारे में है कि “ये उन लोगों में है जिन्होंने हुसैन बिन अली अलैहिस्सलाम को माविया की वफात के बाद कूफा में बुलाया था और जब वो कूफा में आए तो उनके साथ होकर ना लड़े।” सिब्त इब्ने ज़ौजी ने तजकिरातुल हुफ्फाज़ में और इमाम इब्ने असीर जजरी ने तारीख ए कामिल में लिखा है कि “खत लिखने वालों में सुलेमान बिन सुर्द प्रमुख था और इसके बाद कूफा के बड़े बड़े लोगों ने भी खत लिखे और इसके बाद कूफा से खत कसरत से लिखे जाने लगे।” इस कमीने सुलेमान बिन सुर्द से बुखारी ने सही बुखारी में पांच जगहों पर रिवायत लिया है और इमाम बुखारी ने ‘अल आदाब उल मुफरद’ में इसे अस्हाबुन्नबी (नबी का सहाबी) कहा है। इमाम इब्ने जरीर तबरी ने तारीख ए तबरी के 60 हिजरी के बयान में लिखा है कि जब हुसैन अलैहिस्सलाम कूफा पहुंचे तो एक भला शख्स मिला जिसने कहा कि – “हम आपको खुदा की कसम देते हैं कि अपनी जान का और अपने अहले बैत का ख्याल कीजिए कि इसी जगह से पलट जाएं। कूफा में ना कोई आपका यार-ओ-मददगार है और ना आपके शिया ही.., बल्कि हमें तो खौफ इस बात का है कि वो लोग आपकी मुखालिफत ना करें।”
तबरी ने अम्र बिन साद के खत को नकल किया है जिसमें उसने हुसैन अलैहिस्सलाम से वफा करने और साथ देने का वादा किया मगर जब कर्बला में जंग का आगाज हुआ तो सबसे पहला तीर इसी ने चलाया- अफसोस कि ये भी अहले सुन्नत के नजदीक सहाबी है। पता चला कि जिस तरह आज मुसलमान के भेष में मुनाफिक छिपे हुए हैं उसी तरह उस समय भी मुनाफिकों ने शियाने-अली का लिबास ओढ़कर हुसैन अलैहिस्सलाम को धोखे से बुलाया और गद्दारी की। ऐसा नहीं है कि कूफा में सभी एक जैसे थे मगर हुसैन अलैहिस्सलाम का साथ देने वाले बहुत थोड़े से लोग थे जिन्होंने हुसैन अलैहिस्सलाम का साथ देकर अपने शिया होने का हक अदा किया। वाक्या कर्बला के बाद एक यजीदी सिपाही ने यजीद को शहादते हुसैन का मुबारकबाद देते हुए कहता है- أَبْشِرْ يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ بِفَتْحِ اللَّهِ عَلَيْكَ وَنَصْرِهِ، وَرَدَ عَلَيْنَا الْحُسَيْنُ بْنُ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ وَثَمَانِيَةَ عَشَرَ مِنْ أَهْلِ بَيْتِهِ، 🔹وَسِتُّونَ رَجُلًا مِنْ شِيعَتِهِ🔹 👆यह बात इमाम इब्ने कसीर ने अल बिदाया वन निहाया के ग्यारहवीं जिल्द के सफा 556 पर लिखा है, यानि- “ए यजीद आपको मुबारक हो, आपको फत्ह मिली है। हमने हुसैन को और इनके अहल में से अट्ठारह बंदों को कत्ल किया है और وَسِتُّونَ رَجُلًا مِنْ شِيعَتِهِ उनके साथ उनके शिया भी कत्ल हुएं।”
इसी तरह कूफा के बारे में एक शाफाई आलिमे दीन ‘मुहम्मद बिन उमर शाफाई’ (محمد بن عمر بن مبارك الحميري الحضرمي الشافعي) अपनी एक किताब में लिखते हैं कि- وكان آئمة علماء الکوفة الذي صحبوا عمر وعليا كعلقمة والاسود وشریح القاضی وغیرھم ، یرجعون قول عمر علی قول علي.
(الحسام المسلول على منتقصي أصحاب الرسول ,ص 38) यानि, ‘कूफा में बड़े बड़े फुक्हा रहते थे हजरत उमर की सोहबत में, और हजरत अली की सोहबत में अलकमह, असवद और काजी सुरेह और इसके अलावा अन्य लोग थे लेकिन [वहां के लोग] हज़रत उमर के कौल को हज़रत अली अलैहिस्सलाम के कौल पर तरजीह (वरीयता, प्रमुखता) देते थे।”
निष्कर्ष यह निकलता है कि पहले कूफा में जो भी लोग थे उनमें से कुछ लोग अली अलैहिस्सलाम के पैरोकार थे तो कुछ हजरत उमर रदी0 को मानने वाले थे मगर वहां की अक्सरियत हजरत उमर के कौल को अली अलैहिस्सलाम के कौल पर प्रमुखता देते थे..इस तरह वहां के शिया का अकीदा था। किताब के सफे का लिंक 👇 https://archive.org/details/0407-pdf_202101/page/n37/mode/1up?view=theater