
क़बा पहुंचे
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सोमवार 8 रबीउल अव्वल सन् 14 नबवी यानी सन् 01 हिजरी मुताबिक़ 23 सितम्बर सन् 622 ई० को अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़बा में दाखिल हुए।
हज़रत उर्व: बिन जुबैर रज़ि० का बयान है कि मदीना के मुसलमानों ने मक्का से अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के रवाना होने की खबर सुन ली थी, इसलिए लोग हर दिन सुबह ही सुबह हर्रा की ओर निकल जाते और आपकी राह तकते रहते। जब दोपहर को धूप तेज़ हो जाती तो वापस पलट जाते ।
एक दिन लम्बे इन्तिज़ार के बाद वापस पलट कर लोग अपने-अपने घरों को पहुंच चुके थे कि एक यहूदी अपने किसी टीले पर कुछ देखने के लिए चढ़ा । क्या देखता है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके साथी सफ़ेद कपड़े पहने हुए, जिनसे चांदनी छिटक रही थी, तशरीफ़ ला रहे हैं।
उसने बे-अख्तियार बड़ी ऊंची आवाज़ में कहा, अरब के लोगो ! यह रहा तुम्हारा भाग्य, जिसका तुम इन्तिज़ार कर रहे थे।
ऐसा सुनते ही मुसलमान हथियारों की ओर दौड़ पड़े’ (और हथियार सज-
1. उसदुल ग़ाबा 1/173, इब्ने हिशाम 1/491,
2. सहीह बुखारी, उर्वः बिन जुबैर रज़ि० की रिवायत 1/554 3. रहमतुल लिल आलमीन 1/102। उस दिन नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्र बग़ैर किसी कमी-बेशी के ठीक त्रिपन साल हुई थी और जो लोग आपकी नुबूवत का आरंभ 9 रबीउल अव्वल सन् 41 हाथी वर्ष से मानते हैं, उनके कहने के मुताबिक़ बारह साल पांच महीना अठारह दिन या बाईस दिन हुए थे। 4. सहीह बुखारी 1/555
धज कर स्वागत के लिए उमंड पड़े ।) और हर्रा के पीछे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का स्वागत किया।
इब्ने कय्यिम कहते हैं कि इसके साथ ही बनी अम्र बिन औफ (क़बा के रहने वालों) में शोर उठा और ‘अल्लाहु अक्बर’ के नारे सुने गए।
मुसलमान आपके आने की खुशी में अल्लाहु अक्बर का नारा बुलन्द करते हुए स्वागत के लिए निकल पड़े। फिर आपका अभिनन्दन किया और आपके चारों ओर परवानों की तरह जमा हो गए। उस वक़्त आप शान्त थे और यह वह्य उतर रही थी—
‘अल्लाह आपका मौला है और जिबील और भले ईमान वाले भी और इसके बाद फ़रिश्ते आपके मददगार हैं।”
हज़रत उर्व: बिन जुबैर रजि० का बयान है कि लोगों से मिलने के बाद आप उनके साथ दाहिनी ओर मुड़े और बनी अम्र बिन औफ़ में तशरीफ़ लाए। यह सोमवार का दिन और रबीउल हव्वल का महीना था। अबूबक्र आनेवालों के स्वागत के लिए खड़े थे और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम चुपचाप बैठे थे। अंसार के जो लोग आते, जिन्होंने अल्लाह के रसूल सल्ल० को देखा न था, वे सीधे अबूबक्र रज़ि० को सलाम करते, यहां तक कि रसूलुल्लाह सल्ल० पर धूप आ गई और अबूबक्र रज़ि० ने चादर तानकर आप पर साया किया। तब लोगों ने पहचाना कि यह रसूलुल्लाह सल्ल० हैं । 2
आपके स्वागत और दर्शन के लिए सारा मदीना उमंड पड़ा था। यह एक ऐतिहासिक दिन था, जिसकी नज़ीर मदीना की धरती ने कभी न देखी थी। आज यहूदियों ने भी हबकूक़ नबी की उस खुशखबरी का मतलब देख लिया था कि
‘अल्लाह दक्षिण से और वह जो कुद्दूस है, फ़ारान की चोटी से आया । “
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने क़बा में बदम (और कहा जाता है कि साद बिन खैसमा) के मकान में निवास किया। कुलसूम बिन पहला कथन ज़्यादा मज़बूत है।
इधर हज़रत अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु ने मक्का में तीन दिन रहकर और लोगों की जो अमानतें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास थीं, उन्हें अदा करके पैदल ही मदीने का रुख किया और क़बा में अल्लाह
1. जादुल मआद 2/54 2. सहीह बुखारी 1/555 3. किताब बाइबिल, सहीफा हबकूक 303
के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से आ मिले और कुलसूम बिन बदम के यहां निवास किया।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़बा में कुल चार दिन (सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार) या दस से ज़्यादा दिन या पहुंच और रवानगी के अलावा 24 दिन ठहरे। इसी दौरान मस्जिदे क़बा की बुनियाद रखी ‘और उसमें नमाज़ भी पढ़ी।
यह आपकी रखी गई। नुबूवत के बाद पहली मस्जिद है जिसकी बुनियाद तक्वा पर
पांचवें दिन (या बारहवें दिन या छब्बीसवें दिन शुक्रवार को आप अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ सवार हुए। हज़रत अबूबक्र रज़ि० आपके पीछे थे। आपने बनू नज्जार को जो आपके मामुओं का क़बीला था, सूचना भेज दी थी, चुनांवे वे तलवारें लटकाए हाज़िर थे। आपने (उनके साथ) मदीने का रुख किया।
बनू सालिम बिन औफ़ की आबादी में पहुंचे तो जुमा का वक़्त आ गया। आपने बीच घाटी में उस जगह जुमा पढ़ी, जहां अब मस्जिद है। कुल एक सौ आदमी थे। 3
मदीना में दाख़िला
जुमा के बाद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मदीना तशरीफ़ ले गए और उसी दिन से इस शहर का नाम यसरिब के बजाए मदीनतुर्रसूल (रसूल का शहर) पड़ गया जिसे संक्षेप में मदीना कहा जाता है।
यह अतिप्रमुख ऐतिहासिक दिन था। गली-गली, कूचे-कूचे में अल्लाह के
1. जादुल मआद 2/54, इब्ने हिशाम 1/493,
2. यह इब्ने इस्हाक़ की रिवायत है। देखिए इब्ने हिशाम 1/494। सहीह बुखारी की एक रिवायत है कि आपने क़बा में 24 रात निवास किया (1/61) मगर एक और रिवायत में दस दिन से कुछ ज़्यादा (1/555) और एक तीसरी रिवायत में चौदह रात (1/560) बताया गया है। इब्ने कय्यिम ने इसी आखिरी रिवायत को अपनाया है, मगर खुद इब्ने कय्यिम ने स्पष्ट किया है कि आप क़बा में सोमवार को पहुंचे थे और वहां से जुमा को रवाना हुए थे। (जादुल मआद 2/54-55) और मालूम है कि सोमवार और शुक्रवार को अलग-अलग सप्ताहों का लिया जाए तो पहुंच और रवानगी का दिन छोड़कर कुल मुद्दत दस दिन की होती है और रवानगी का दिन शामिल करके 12 दिन होती है, इसलिए कुल मुद्दत 14 दिन कैसे हो सकेगी ? इब्ने हिशाम 1/494,
3. सहीह बुखारी 1/555-560, जादुल मआद 2/55,
इधर हज़रत असद बिन ज़रारह रज़ियल्लाहु अन्हु ने आकर ऊंटनी की नकेल
पदों का यह अनुवाद अल्लामा मंसूरपुरी ने किया है। अल्लामा इब्ने क़य्यिम ने लिखा है कि ये पद तबूक से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की वापसी पर पढ़े गए थे और जो यह कहता है कि मदीना में आपके दाखिले के मौक़े पर पढ़े गए थे, उसे भ्रम हुआ। (जादुल मआद 3/10 लेकिन अल्लामा इब्ने क़य्यिम ने इसके भ्रम होने का कोई सन्तोषजनक तर्क नहीं दिया है। इसके विपरीत अल्लामा मंसूरपुरी ने इस बात को प्रमुखता दी है कि ये पद मदीने में दाखिले के वक़्त पढ़े गए। उन्होंने सुहुफ़े बनी इस्राईल के इशारों और व्याख्याओं से यह नतीजा निकाला है (देखिए रहमतुल्लिल आलमीन 1/106) संभव है ये पद दोनों अवसरों पर पढ़े गए हों।
गुणों का बखान हो रहा था और अंसार की बच्चियां खुशी-खुशी गीत गा रही थीं-
‘इन पहाड़ों से जो हैं दक्षिण तरफ़, चौदहवीं का चांद है हम पर चढ़ा।’ कैसा उम्दा दीन और तालीम है, शुक्र वाजिब है हमें अल्लाह का । है इताअत फ़र्ज़ तेरे हुक्म की, भेजने वाला है तेरा किबिया ।1
अंसार अगरचे बड़े धनी न थे, लेकिन हर एक की यही आरज़ू थी कि अल्लाह के रसूल सल्ल० उसके यहां निवास करें। चुनांचे आप अंसार के जिस मकान या मुहल्ले से गुज़रते, वहां के लोग आपकी ऊंटनी की नकेल पकड़ लेते और अर्ज करते कि तायदाद व सामान और हथियार और हिफ़ाज़त आपका इन्तिज़ार कर रहे हैं, तशरीफ़ लाइए। मगर आप फ़रमाते कि ऊंटनी की राह छोड दो। यह अल्लाह की ओर से नियुक्त है।
चुनांचे ऊंटनी लगातार चलती रही और वहां पहुंचकर बैठी जहां आज मस्जिदे नबवी है, लेकिन आप नीचे नहीं उतरे, यहां तक कि वह उठकर थोड़ी दूर गई, फिर मुड़कर देखने के बाद पलट आई और अपनी पहली जगह बैठ गई । इसके बाद आप नीचे तशरीफ़ लाए। यह आपके ननिहाल वालों यानी बनू नज्जार का मुहल्ला था और यह ऊंटनी के लिए सिर्फ़ ख़ुदा की तौफ़ीक़ थी, क्योंकि आप ननिहाल में निवास करके उनकी इज्जत बढ़ाना चाहते थे।
अब बनूं नज्जार के लोगों ने अपने-अपने घर ले जाने के लिए रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कहना शुरू किया, लेकिन अबू अय्यूब अंसारी रज़ियल्लाहु ने लपक कर कजावा उठा लिया और अपने घर लेकर चले गए। इस पर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फ़रमाने लगे- ‘आदमी अपने कजावे के साथ है।’
पकड़ ली। चुनांचे यह ऊंटनी उन्हीं के पास रही। सहीह बुखारी में हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबो सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया, हमारे किस आदमी का घर ज़्यादा क़रीब है ?
हज़रत अबू अय्यूब अंसारी रज़ि० ने कहा, मेरा, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! यह रहा मेरा मकान और यह रहा मेरा दरवाज़ा।
आपने फ़रमाया, जाओ और हमारे लिए आराम की जगह तैयार कर दो।
उन्होंने अर्ज़ किया, आप दोनों तशरीफ़ ले चलें। अल्लाह बरकत दे 12 कुछ दिनों बाद आपकी बीवी उम्मुल मोमिनीन हज़रत सौदा रज़ि० और आपकी दोनों बेटियां हज़रत फ़ातिमा रज़ि० और उम्मे कुलसूम रज़ि० और हज़रत उसामा बिन ज़ैद और उम्मे ऐमन भी आ गईं। इन सबको हज़रत अब्दुल्लाह बिन अबूबक्र रज़ि० अपने घर वालों के साथ, जिनमें हज़रत आइशा रज़ि० भी थीं, लेकर आए थे, अलबत्ता नबी सल्ल० की एक बेटी, हज़रत ज़ैनब, हज़रत अबुल आस के पास बाक़ी रह गईं। उन्होंने आने नहीं दिया और वह बद्र की लड़ाई के बाद तशरीफ़ ला सकीं। 3
हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा कहती हैं कि हम मदीना आए तो यह अल्लाह की ज़मीन में सबसे ज़्यादा बीमारियों वाली जगह थी। बतहान घाटी सड़े हुए पानी से बहती थी। उनका यह भी बयान है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मदीना तशरीफ़ लाए तो हज़रत अबूबक्र और हज़रत बिलाल रज़ि० को बुखार आ गया। मैंने उनकी खिदमत में हाज़िर होकर मालूम किया कि अब्बा जान ! आपका क्या हाल है ? और ऐ बिलाल ! आपका क्या हाल है ?
वह फ़रमाती हैं कि जब हज़रत अबूबक्र रज़ि० को बुखार आता तो यह पद पढ़ते-
‘हर व्यक्ति से उसके अहल (घर) के अन्दर बखैर कहा जाता है, हालांकि मौत उसके जूते के फीते से भी ज़्यादा क़रीब है।’
और हज़रत बिलाल रजि० की हालत कुछ संभलती, तो वह अपनी दर्दनाक आवाज़ ऊंची करते और कहते-
1. जादुल मआद 2/55, इब्ने हिशाम 1/494-496
2. सहीह बुखारी 1/556
3. जादुल मआद 2/55
‘काश, मैं जानता कि कोई रात घाटी (मक्का) में बिता सकूंगा और मेरे आस-पास इज़खर और जलील (घासें) होंगी और क्या किसी दिन मजना के सोते पर आ सकूंगा और मुझे शामा और तफ़ील (पहाड़) दिखलाई पड़ेंगे।’
हज़रत आइशा रज़ि० कहती हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की खिदमत में हाज़िर होकर उसकी ख़बर दी तो आपने फ़रमाया-
‘ऐ अल्लाह ! हमारे नज़दीक मदीना को वैसे ही प्रिय कर दे जैसे मक्का प्रिय था या उससे भी ज़्यादा और मदीना की फ़िज़ा सेहत बख्श बना दे और इसके साअ और मुद्द (अनाज के पैमानों) में बरकत दे और इसका बुखार यहां से हटाकर जोहफ़ा पहुंचा दे।”-
अल्लाह ने आपकी दुआ सुन ली, चुनांचे आपको सपने में दिखाया गया कि एक बिखरे बालों वाली काली औरत मदीना से निकली और जहीआ यानी जोहफ़ा में जा उतरी। इसका स्वप्न फल यह था कि मदीना की वबा (बीमारी) जोहफ़ा मुंतक़िल कर दी गई और इस तरह मुहाजिरों को मदीना की आब व हवा की सख्ती से राहत मिल कई ।
नोट : यहां तक आपकी पाक ज़िंदगी की एक क़िस्म और इस्लामी दावत का एक दौर (यानी मक्की दौर) पूरा हो जाता है। आगे संक्षेप में मदनी दौर पेश किया जा रहा है। व बिल्लाहित्तौफ़ीक़
1. सहीह बुखारी 1/588-589

