Munkir-e-Wilayat-e-Ali (as) par Azaab E Ilaahi

Munkir-e-Wilayat-e-Ali (as) par Azaab E Ilaahi

Aelan-e-Ghadir ke baare mein Nabi-e-Azam (saww) par shak karne wala munafiq sahabi wahin wasil-e-jahannum ho gaya.

Harith bin Nu’man Fahri ne jab Ghadir-e-Khum ke maidan mein “Man Kuntu Mawla” ka aelan suna, apni oontni par charh kar Rasool-e-Khuda (saww) ke paas aaya aur kahne laga: “Ae Muhammad (saww)! Aapne ‘La ilaha illallah’ kaha aur humne maan liya, aapne khud ko Allah ka Rasool bataya aur humne woh bhi maan liya, aapne namaz, roza, hajj aur zakat ka hukm diya, humne woh bhi qabul kiya. Lekin aap is par bhi raza nahin hue aur jate jate hum par apne bhai Ali ko humara maula banaaye ja rahe hain. Kya yeh hukm haqeeqat mein Khuda ki jaanib se hai ya phir aapne apni jaanib se gutha hai?”

Rasool-e-Khuda (saww) ne farmaya: “Us zati ki qasm jiske siwa koi ma’bud nahin, yeh hukm Parwardigar ki jaanib se hai.”

Harith yeh kahte hue mura ki: “Ae Allah! Agar yeh sach keh rahe hain to abhi ke abhi aasman se patthar barasa ya koi aur azab le aa, tak ki sach zahir ho jaye.”

Uska kahna tha ki aasman se Allah ne ek patthar nazil kiya jo uski khoopri mein laga aur woh wohin wasil-e-jahannum ho gaya.

Isi par yeh ayat nazil hui: “Sa’ala sa’ilun bi-azabin waqi’ lil-kaafirina laysa lahu dafi’un.” (Surah Al-Ma’arij, Ayat 1)

Tarjuma: “Mataliba kiya ek sa’il ne aise azab ka jo ho kar rahega. (Woh sun le yeh taiyar hai) kafaron ke liye, ise koi taalne wala nahin.”

ग़दीर ए ख़ुम में हज़रत मौला अली अलैहिस्सलाम की विलायत (हाकिमियत) का एलान और हक़ीक़त

🕋 *ग़दीर ए ख़ुम में हज़रत मौला अली अलैहिस्सलाम की विलायत (हाकिमियत) का एलान और हक़ीक़त*

  मेरे दीनी भाइयों! हमनें अक्सर देखा है कि शिया हज़रात 18 ज़िल हिज्ज को हर साल ईद ए ग़दीर के नाम से ख़ुशी मनाते हैं और जब उनसे सवाल किया जाता है कि आप लोग यह ईद (ख़ुशी) क्यों मनाते हैं तो उल्टा वह हमसे यह सवाल करने लगते हैं कि आप लोग (अहले सुन्नत) यह ख़ुशी क्यों नहीं मनाते?

  आज हम इसी मौज़ू पर बात करते हैं कि यह माजरा क्या है और इसकी सच्चाई कितनी है?

  शिया हज़रात का कहना है कि इस दिन मतलब 18 ज़िल हिज्ज सन 10 हिजरी को जब रसूल अल्लाह (स) अपने आख़िरी हज को अदा कर के मक्का से वापस मदीना तशरीफ़ ला रहे थे और उनके साथ उनके कम व बेश सवा लाख सहाबा किराम मौजूद थे तो मक्का से तकरीबन 64 किलोमीटर बाद ग़दीर ए ख़ुम नामी जगह पर हुज़ूरे पाक (स) पर हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम अल्लाह तआला की “वही” लेकर तशरीफ़ लाये जो कि सूरए मायदा की आयत नम्बर 67 है:

۞ يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۖ وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ ۚ وَاللَّهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ

  ऐ रसूल! जो हुक्म तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से तुम पर नाज़िल किया गया है पहुंचा दो और अगर तुमने ऐसा न किया तो (समझ लो कि) तुमने उसका कोई पैग़ाम ही नहीं पहुंचाया और (तुम डरो नहीं) ख़ुदा तुमको लोगों के शर से महफ़ूज़ रखेगा ख़ुदा हरगिज़ काफ़िरों की क़ौम को मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुंचाता।

  इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमा रहा है कि ऐ रसूल! जो हुक्म तुम्हारे परवरदिगार की जानिब से तुम पर नाज़िल किया गया है वह उम्मत तक पहुँचा दीजिए और अगर (अल्लाह ने पूरे क़ुरआन में कहीं भी हुज़ूर पर इतना ज़ोर नहीं दिया) आप ने यह हुक्म नहीं पहुँचाया तो मतलब आप ने अपनी पूरी ज़िंदगी में जो भी तकलीफ़ उठाई हैं अल्लाह के दीन के ख़ातिर वह सब बेकार चली जाएंगी। अल्लाहु अकबर…

  मतलब इस बार जो हुक्म ब शक्ले ‘वही’ नाज़िल किया है वह बहुत ही अहम व आला और ज़रूरी काम है जिससे पूरी कारे रिसालत पर बात आ गई! आख़िर ऐसा कौन सा काम व हुक्म था?

  फिर जब यह आयत नाज़िल हो गई तो अल्लाह के रसूल (स) ने तमाम सहाबा किराम को हुक्म दिया कि सब यहीं रुक जाएँ, एक ज़रूरी एलान करना है, फिर हुज़ूर (स) ने फ़रमाया कि जो लोग आगे निकल गए हैं उन्हें वापस बुलाया जाए और जो अभी यहाँ तक पहुँचे नहीं है उनका इंतेज़ार किया जाए।

  *(आख़िर ऐसा क्या ज़रूरी और ग़ैर मामूली पैग़ाम था जिसके लिए अल्लाह ने भरी धूप में जब कि मक्का से कुछ ही दूर था लोगों को ज़हमत में मुब्तिला होना पड़ा!?)*

  उसके बाद जब सब असहाबे किराम जिनकी तादाद लगभग सवा लाख थी एक जगह जमा हो गए तो फिर हुज़ूर (स) ने फ़रमाया कि मेरे लिए एक मिम्बर तैयार किया जाए अब उस मैदान में मिम्बर कहाँ से आता इसलिए तमाम ऊँटो के कजावा जिसपर बैठा जाता है उनको एक जगह इकट्ठा किया गया और उनके ढेर पर हुज़ूरे पाक (स) जाकर खड़े हो गए और ख़ुत्बा देना शुरू किया और अपने पास हज़रत अली (अ) को खड़ाकर लिया ख़ुत्बे में अल्लाह तआला की हम्द व सना करने के बाद हुज़ूर (स) ने फ़रमाया: “ऐ लोगों! मैं भी इंसान हूं, क़रीब है कि मेरे रब्ब का भेजा हुआ मौत का फ़रिश्ता पैग़ाम ए अजल लाए और मैं क़ुबूल कर लूँ, मैं तुम में दो बड़ी चीज़ें छोड़े जाता हूँ, पहली तो अल्लाह की किताब है और दूसरे मेरे अहलेबैत, मैं तुम्हे अपने अहलेबैत के बारे में अल्लाह का ख़ौफ़ याद दिलाता हूँ, तीन बार यही फ़रमाया। उसके बाद हुज़ूर (स) ने तमाम असहाबे किराम से सवाल किया कि क्या मैं आप सब पर और तमाम मोमिनों पर उनकी नफ़्सों और जानों से ज़ियादा हक़ नहीं रखता? सबने मिलकर फ़रमाया, बिल्कुल! आप हम सब की जानों और नफ़्सों पर हमसे ज़ियादा हक़ रखते हैं। फिर हुज़ूर (स) ने फ़रमाया: “अल्लाह तुम्हारा मौला (सरपरस्त, आक़ा) है, मैं अल्लाह का रसूल तुम्हारा मौला (सरपरस्त, आक़ा) हूँ और जिस जिस का भी मैं मौला हूं उस उस के यह अली भी मौला (सरपरस्त, आक़ा) हैं।” (यह कहते वक़्त हुज़ूर (स) ने हज़रत अली (अ) का हाथ अपने हाथ से बुलन्द फ़रमा दिया) और तमाम असहाबे किराम को हुक्म दिया कि वह सब हज़रत अली (अ) की विलायत की मुबारकबाद पेश करें। तो सबसे पहले हज़रत उमर ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम से इन अल्फ़ाज़ में ख़ुशी का इज़हार किया: “बख़्ख़िन बख़्ख़िन यब्ना अबी अबितालिब” (वाह, वाह! ऐ अबू तालिब के बेटे) आज से आप मेरे और तमाम मोमिनीन के मौला हो गए। फिर एक एक कर के तमाम सहाबा ने मौला अली अलैहिस्सलाम को मुबारकबाद पेश की और यह सिलसिला तीन दिन तक चलता रहा।

  *क्या इस वाक़िये की सनद अहले सुन्नत की किताबों में बिलख़ुसूस सहाह ए सित्ता (हदीस की 6 बड़ी किताबों) में भी मिलती है या यह सिर्फ़ शियों की किताबों में ही पाया जाता है? आईये देखते हैं!*

  मुसनदे अहमद, हदीस नंबर 12306 में:

۔ (۱۲۳۰۶)۔ عَنْ عَبْدِ الرَّحْمٰنِ بْنِ أَبِی لَیْلٰی قَالَ: شَہِدْتُ عَلِیًّا رَضِیَ اللّٰہُ عَنْہُ فِی الرَّحَبَۃِیَنْشُدُ النَّاسَ، أَنْشُدُ اللّٰہَ مَنْ سَمِعَ رَسُولَ اللّٰہِ صَلَّی اللّٰہُ عَلَیْہِ وَسَلَّمَ یَقُولُیَوْمَ غَدِیرِ خُمٍّ: ((مَنْ کُنْتُ مَوْلَاہُ فَعَلِیٌّ مَوْلَاہُ۔)) لَمَا قَامَ فَشَہِدَ قَالَ عَبْدُ الرَّحْمٰنِ: فَقَامَ اثْنَا عَشَرَ بَدْرِیًّا، کَأَنِّی أَنْظُرُ إِلٰی أَحَدِہِمْ فَقَالُوْا: نَشْہَدُ أَنَّا سَمِعْنَا رَسُولَ اللّٰہِ صَلَّی اللّٰہُ عَلَیْہِ وَسَلَّمَ یَقُولُیَوْمَ غَدِیرِ خُمٍّ: ((أَلَسْتُ أَوْلٰی بِالْمُؤْمِنِینَ مِنْ أَنْفُسِہِمْ، وَأَزْوَاجِی أُمَّہَاتُہُمْ؟)) فَقُلْنَا: بَلٰی،یَا رَسُولَ اللّٰہِ!، قَالَ: ((فَمَنْ کُنْتُ مَوْلَاہُ فَعَلِیٌّ مَوْلَاہُ، اللَّہُمَّ وَالِ مَنْ وَالَاہُ، وَعَادِ مَنْ عَادَاہُ۔)) (مسند احمد: ۹۶۱)

  अहले सुन्नत की मशहूर किताब मुसनदे अहमद शरीफ़ में 12306 नम्बर हदीस में मिलता है कि अब्दुर्रहमान से मरवी है, वह कहते हैं: मैं रहबा में सैयदना अली रज़ियल्लाहु अन्हू की ख़िदमत में हाज़िर था, सैयदना अली लोगों को अल्लाह का वास्ता देकर कह रहे थे: “मैं उस आदमी को अल्लाह का वास्ता देकर कहता हूँ जिसने ग़दीर वाले दिन रसूल अल्लाह (स) को यह फ़रमाते हुए सुना है: “मैं जिस जिस का मौला हूँ अली भी उस उस के मौला हैं! वह उठकर गवाही दे, यह सुनकर बारह बदरी सहाबा खड़े हुए, वह मंज़र मेरी आँखों के सामने है, गोया मैं उन में से हर एक को देख रहा हूँ, उन सब ने कहा हम गवाही देते हैं कि हमने ग़दीर ए ख़ुम के दिन रसूल अल्लाह (स) को यह फ़रमाते हुए सुना! क्या मैं मोमिनों पर उनकी जानों से ज़ियादा हक़ नहीं रखता? और क्या मेरी अज़वाज उनकी माएँ नहीं हैं? हमने कहा! ऐ अल्लाह के रसूल! बिल्कुल बात ऐसी ही है। फिर आप अलैहिस्सलाम ने यह फ़रमाया: मैं जिस जिस का मौला हूँ अली भी उस उस के मौला हैं, ऐ अल्लाह! तू उस आदमी को दोस्त रख जो अली को दोस्त रखता हो और जो अली से दुश्मनी रखे, ऐ अल्लाह तू भी उस शख़्स से दुश्मनी रख।

  यहाँ पर यह बात बता देना भी ज़रूरी है कि क्या मौला अली (अ) की विलायत क़ुरआन से भी साबित है? आईये देखते हैं:

إِنَّمَا وَلِيُّكُمُ اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَالَّذِينَ آمَنُوا الَّذِينَ يُقِيمُونَ الصَّلَاةَ وَيُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَهُمْ رَاكِعُونَ

  सूरए माइदा, आयत 55 में: (ऐ ईमानवालों) तुम्हारे मालिक सरपरस्त तो बस यही हैं ख़ुदा और उसका रसूल और वह मोमिनीन जो पाबन्दी से नमाज़ अदा करते हैं और हालते रुकूअ में ज़कात देते हैं।

  अहले सुन्नत के मशहूर आलिम अल्लामा जलालुद्दीन सियूती अपनी किताब “तफ़सीर ए दुर्रे मंसूर” में फ़रमाते हैं कि इस आयत का शाने नुज़ूल यह है कि एक वक़्त जब मस्जिद में सब लोग नमाज़ पढ़ रहे थे उसी वक़्त एक साइल (माँगने वाला) वहाँ आया और अल्लाह के नाम पर माँगा, जब किसी ने उस पर तवज्जो नहीं दी तो वह जाने लगा, लेकिन फिर उसकी नज़र हज़रत अली (अ) पर पड़ी जो वहीं नमाज़ अदा कर रहे थे और हालते रुकूअ में थे जिन्होंने उंगली से इशारा किया कि मेरी यह अँगूठी लेजा और माँगने वाले ने उनके हाथ की उँगली से वह अँगूठी उतार ली तो अल्लाह तआला को हज़रत अली (अ) की यह अदा इतनी पसंद आई कि उसने यह सरपरस्ती वाली आयत हज़रत अली (अ) की शान में उतार दी।

  क़ुरआने पाक की इस आयत से यह भी साबित हो गया कि ईमानवालों का मालिक व सरपरस्त अल्लाह और उसके रसूल (स) के अलावा हज़रत अली (अ) भी हैं।

  अब कुतुब ए अहले सुन्नत से मुख़्तसर से वक़्फ़े में कुछ और रिवायात व अहादीस देख लेते हैं ग़दीर ए ख़ुम के हवाले से…

  मुसनदे अहमद, हदीस 12303 में:

۔ (۱۲۳۰۳)۔ عَنْ مَیْمُونٍ أَبِی عَبْدِ اللّٰہِ قَالَ: قَالَ زَیْدُ بْنُ أَرْقَمَ وَأَنَا أَسْمَعُ: نَزَلْنَا مَعَ رَسُولِ اللّٰہِ ‌صلی ‌اللہ ‌علیہ ‌وآلہ ‌وسلم  بِوَادٍ یُقَالُ لَہُ وَادِی خُمٍّ، فَأَمَرَ بِالصَّلَاۃِ فَصَلَّاہَا بِہَجِیرٍ، قَالَ: فَخَطَبَنَا وَظُلِّلَ لِرَسُولِ اللّٰہِ ‌صلی ‌اللہ ‌علیہ ‌وآلہ ‌وسلم  بِثَوْبٍ عَلٰی شَجَرَۃِ سَمُرَۃٍ مِنَ الشَّمْسِ، فَقَالَ: ((أَلَسْتُمْ تَعْلَمُونَ أَوَلَسْتُمْ تَشْہَدُونَ أَنِّی أَوْلٰی بِکُلِّ مُؤْمِنٍ مِنْ نَفْسِہِ۔)) قَالُوا: بَلٰی، قَالَ: ((فَمَنْ کُنْتُ مَوْلَاہُ فَإِنَّ عَلِیًّا مَوْلَاہُ، اَللّٰہُمَّ عَادِ مَنْ عَادَاہُ وَوَالِ مَنْ وَالَاہُ۔))(مسند احمد: ۱۹۵۴۰)

  मुसनद अहमद हदीस नम्बर 12303 में बयान हुआ है: सैयदना ज़ैद बिन अरक़म से मरवी है कि वह कहते हैं: हम नबी ए करीम (स) के साथ एक वादी में उतरे, उस को वादिये ख़ुम कहते थे, फिर आप अलैहिस्सलाम ने नमाज़ का हुक्म दिया और सख़्त गर्मी में ज़ोहर की नमाज़ पढ़ाई, फिर आप अलैहिस्सलाम ने ख़ुत्बा दिया और धूप से बचाने के लिए कीकर के दरख़्त पर कपड़ा डालकर आप अलैहिस्सलाम पर साया किया गया, फिर आप (स) ने फ़रमाया: क्या तुम जानते नहीं हो या क्या तुम यह गवाही नहीं देते कि मैं हर मोमिन के उसके नफ़्स से भी ज़ियादा क़रीब हूं? सहाबा ने कहा: जी! क्यों नहीं, फिर आप अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: “मैं जिस का मौला हूँ अली भी उस के मौला है।”

قَالَ صلی اللہ علیہ وسلم : مَنْ كُنْتُ مَوْلَاهُ فَعَلِيٌّ مَوْلَاهُ، اللهُمَّ وَالِ مَنْ وَّالَاهُ وَعَادِ مَنْ عَادَاهُ . ورد من حدیث…

  अहले सुन्नत की एक और मशहूर किताब ‘अल सिलसिल’तुस सहीह’ की रिवायात नम्बर 3589 में बयान हुआ है कि आप (स) ने फ़रमाया: जिसका मैं मौला हूँ अली भी उस के मौला है…”

  जामेअ तिरमिज़ी, हदीस नंबर 3713 में:

حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ جَعْفَرٍ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ سَلَمَةَ بْنِ كُهَيْلٍ، قَال:‏‏‏‏ سَمِعْتُ أَبَا الطُّفَيْلِ يُحَدِّثُ، ‏‏‏‏‏‏عَنْ أَبِي سَرِيحَةَ أَوْ زَيْدِ بْنِ أَرْقَمَ،‏‏‏‏ عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ:‏‏‏‏ مَنْ كُنْتُ مَوْلَاهُ فَعَلِيٌّ مَوْلَاهُ… قَالَ أَبُو عِيسَى:‏‏‏‏ هَذَا حَسَنٌ صَحِيحٌ غَرِيبٌ، ‏‏‏‏‏‏وَقَدْ رَوَى شُعْبَةُ هَذَا الْحَدِيثَ، ‏‏‏‏‏‏عَنْ مَيْمُونٍ أَبِي عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ زَيْدِ بْنِ أَرْقَمَ، عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ نَحْوَهُ وَأَبُو سَرِيحَةَ هُوَ حُذَيْفَةُ بْنُ أَسِيدٍ الْغِفَارِيُّ صَاحِبُ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ.

  अहले सुन्नत की एक और मशहूर किताब ‘जामे तिरमिज़ी’ में हदीस नम्बर 3713 में भी बयान हुआ है कि नबी ए करीम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: “मन कुंतो मौला हु फ़ अलिउन मौला हु”…

  सुनन इब्ने माजा, हदीस नंबर 116 में:

حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، ‏‏‏‏‏‏حَدَّثَنَا أَبُو الْحُسَيْنِ، ‏‏‏‏‏‏أَخْبَرَنِي حَمَّادُ بْنُ سَلَمَةَ، ‏‏‏‏‏‏عَنْ عَلِيِّ بْنِ زَيْدِ بْنِ جُدْعَانَ، ‏‏‏‏‏‏عَنْ عَدِيِّ بْنِ ثَابِتٍ، ‏‏‏‏‏‏عَنِ الْبَرَاءِ بْنِ عَازِبٍ، ‏‏‏‏‏‏قَالَ:‏‏‏‏ أَقْبَلْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي حَجَّتِهِ الَّتِي حَجَّ، ‏‏‏‏‏‏فَنَزَلَ فِي بَعْضِ الطَّرِيقِ فَأَمَرَ الصَّلَاةَ جَامِعَةً، ‏‏‏‏‏‏فَأَخَذَ بِيَدِ عَلِيٍّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، ‏‏‏‏‏‏فَقَالَ:‏‏‏‏   أَلَسْتُ أَوْلَى بِالْمُؤْمِنِينَ مِنْ أَنْفُسِهِمْ؟   قَالُوا:‏‏‏‏ بَلَى، ‏‏‏‏‏‏قَالَ:‏‏‏‏   أَلَسْتُ أَوْلَى بِكُلِّ مُؤْمِنٍ مِنْ نَفْسِهِ؟   قَالُوا:‏‏‏‏ بَلَى، ‏‏‏‏‏‏قَالَ:‏‏‏‏   فَهَذَا وَلِيُّ مَنْ أَنَا مَوْلَاهُ، ‏‏‏‏‏‏اللَّهُمَّ وَالِ مَنْ وَالَاهُ، ‏‏‏‏‏‏اللَّهُمَّ عَادِ مَنْ عَادَاهُ  .

  अहले सुन्नत की बहुत ही मारूफ़ किताब ‘सुनन इब्ने माजा’ की हदीस नम्बर 116 में भी बयान हुआ है कि हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: मनकुंतो मौला हु फ़हाज़ा अलिउन मौला हु (जिस जिस का भी मैं मौला व आक़ा व सरदार हूं उन सब का भी यह अली आक़ा व सरदार है।)

  *ख़ुलासा:*

  वक़्त की कमी और पोस्ट ज़ियादा लम्बी न हो जाये इसलिए इस बात को तमाम करते हैं कि (18 ज़िल हिज्ज) ग़दीर ए ख़ुम के दिन की ख़ुशी मनाना और हज़रत मौला अली अलैहिस्सलाम की विलायत की एक दूसरे को मुबारकबाद पेश करना सुन्नत भी है और सहाबा किराम से साबित भी है और इसे किसी एक फ़िरके से मनसूब करना भी जायज़ नहीं है बल्कि यह तो तमाम आलमे इस्लाम के लिए बिलख़ुसूस मोमिनीन व मुस्लिमीन के लिए ईद व मसर्रत व ख़ुशी का दिन है और कुफ़्फ़ार व मुनाफ़िक़ीन और नासिबी ख़बीसों के लिए मायूसी का दिन हैं…

🌹 *ईदे अकबर, ईदे ग़दीर मुबारक*

🤲 *अल्लाह हुम्मा अज्जिल ले वलियेकल फ़रज…*