24 Zil Hajj – Yaum e Fatah Mubahila

24 Zil Hajj – Yaum e Fatah Mubahila*
*ﻓَﻤَﻦْ ﺣَﺎﺟَّﻚَ ﻓِﻴﻪِ ﻣِﻦ ﺑَﻌْﺪِ ﻣَﺎ ﺟَﺎﺀَﻙَ ﻣِﻦَ ﺍﻟْﻌِﻠْﻢِ ﻓَﻘُﻞْ ﺗَﻌَﺎﻟَﻮْﺍ ﻧَﺪْﻉُ ﺃَﺑْﻨَﺎﺀَﻧَﺎ ﻭَﺃَﺑْﻨَﺎﺀَﻛُﻢْ ﻭَﻧِﺴَﺎﺀَﻧَﺎ ﻭَﻧِﺴَﺎﺀَﻛُﻢْ ﻭَﺃَﻧﻔُﺴَﻨَﺎ ﻭَﺃَﻧﻔُﺴَﻜُﻢْ ﺛُﻢَّ ﻧَﺒْﺘَﻬِﻞْ ﻓَﻨَﺠْﻌَﻞ ﻟَّﻌْﻨَﺖَ ﺍﻟﻠَّﻪِ ﻋَﻠَﻰ ﺍﻟْﻜَﺎﺫِﺑِﻴﻦَ*
[Qur’an : 03 Surah Aal e Imran, Ayat No 61, Aayat e Mubahila] *ﺃَﺑْﻨَﺎﺀَﻧَﺎ ﻭَﺃَﺑْﻨَﺎﺀَﻛُﻢْ*
Hum Apne Beto Ko Late Hain Tum Apne Beto Ko Lao Kehkar Sirf Hazrat Imaam Hasan Aur Hazrat Imaam Hussain Alahimus Salam Ko Pesh Kiya Ja Raha Tha. *ﻭَﻧِﺴَﺎﺀَﻧَﺎ ﻭَﻧِﺴَﺎﺀَﻛُﻢْ*
Hum Apni Aurto’n Ko Late Hain Tum Apni Aurto Ko Lao Kehkar Koi Aur Na Tha Sirf Sayyeda Fatima Zahra Salamullah Alaiha Thi. *ﻭَﺃَﻧﻔُﺴَﻨَﺎ ﻭَﺃَﻧﻔُﺴَﻜُﻢْ*
Hum Apni Jaano Ko Late Hain Tum Apni Jaano Ko Lao Kehkar Ek Jaan Tane Hazrat Muhammad Mustafa ﷺ Aur Dusri Jaan Tane Hazrat Sayyedna Mola Ali Alahis Salam Thi.
📚 *Reference* 📚
*1.* Tafseer Baizavi, Jild 2, Safa 20.
*2.* Kitab ul Waseet, Jild 1, Safa 585.
*3.* Tafseer Jilani, Jild 1, Safa 280.
*4.* Tafseer Mazhari, Jild 2, Safa 64.
*5.* Tafseer ul Khazin, Jild 1, Safa 254.
*6.* Tafseer Darr Al Mansoor, Jild 3, Safa 607.
*7.* Tafseer Tabari, Jild 5, Safa 473.
*8.* Tafseer Qurtabi, Jild 4, Safa 104,105.
*9.* Tafseer Kabeer, Jild 8, Safa 89,90.
*10.* Tafseer Thalabi, Jild 2, Safa 75.
*11.* Tafseer Al Kashaf Zamakhshari, Jild 1, Safa 564,565.
*12.* Tafseer Baghawi, Jild 2, Safa 48.
*13.* Tafseer Ibn Kaseer, Jild 2, Safa 54,55.
*14.* Tafseer Jalalain, Safa 57.
*15.* Al Nukat wa Al A’uyun, Tafseer Al Mawardi Jild 1, Safa 398.
*16.* Tafseer Samarqamdi, Jild 1, Safa 274.
*17.* Tafseer Madarik, Safa 163.

अल्लाह सुब्हानहु व तआला और रसूलअल्लाह स्वल्लल्लाहो अलयहे व आलेही व सल्लम की नज़र में सबसे सच्चा कौन ❓*

ये किस्सा 10 हिजरी का है जब अरब मुल्क में मौजूद एक इलाक़ा जिसको नजरान के नाम से जाना जाता है वहाँ के ईसाइयों ने अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम से हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के मुताल्लिक़ बहस की और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का बेटा बताया(माज़ अल्लाह) और हुज़ूर पाक के लाख समझाने के बावजूद की हज़रत ईसा अल्लाह के बेटे नही बल्कि अल्लाह की तरफ से नबी बनाये गए हैं इस बात का इनकार करते रहे जब नजरान के ईसाइयों के बड़े बड़े पादरी भी हुज़ूर की बात को नही मानें बल्कि हुज़ूर पाक को और  दीने इस्लाम को झूठा कहने लगे(माज़ अल्लाह) तो फिर अल्लाह तआला ने सूरए आले इमरान की ये आयत न 61 को नाज़िल फ़रमाया

فَمَنْ حَاجَّكَ فِيهِ مِن بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَكُمْ وَنِسَاءَنَا وَنِسَاءَكُمْ وَأَنفُسَنَا وَأَنفُسَكُمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ فَنَجْعَل لَّعْنَتَ اللَّهِ عَلَى الْكَاذِبِينَ

(अल-ए-इमरान – 61)
*फिर जब तुम्हारे पास इल्म (कुरान) आ चुका उसके बाद भी अगर तुम से कोई (नसरानी) ईसा के बारे में हुज्जत करें तो कहो कि (अच्छा मैदान में) आओ हम अपने बेटों को बुलाएं तुम अपने बेटों को और हम अपनी औरतों को (बुलाएं) और तुम अपनी औरतों को और हम अपनी जानों को बुलाएं ओर तुम अपनी जानों को,उसके बाद हम सब मिलकर (ख़ुदा की बारगाह में) गिड़गिड़ायें और झूटों पर ख़ुदा की लानत करें।*

जब अल्लाह का ये हुक्म नाज़िल हुआ कि अब जब बात झूठ और सच की आ ही गई है तो फिर ए नबी आप इन ईसाइयों के आलिमों से फ़रमा दीजिए कि आओ एक मैदान में *हम अपने बेटों को बुलाएँ* तुम अपने बेटों को बुलाओ,और *हम अपनी औरतों को* और तुम अपनी औरतों को बुलाओ और *हम अपनी जानों(नफ्सों) को बुलाएँ* और तुम अपनी जानों (नफ्सों) को बुलाओ उसके बाद हम सब मिलकर खुदा की बारगाह में दुआ करते हैं कि हम में से *जो झूठा है उस पर अल्लाह की लानत हो।*

जब दिन और वक़्त मुक़र्रर हो गया तो फिर 24 ज़िलहिज्ज् 10 हिजरी को तमाम नजरान के बड़े बड़े आलिम व पादरी जमा हुए अपने पूरे लोगों के साथ और फिर रसूलअल्लाह के आने का इंतज़ार करने लगे थोड़ी देर में वो लोग देखते हैं कि हुज़ूर पाक चले आ रहे हैं लेकिन उनके साथ कोई भीड़ भाड़ नही है ना असहाबे किराम हैं बल्की क़ुरआन में *अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ रसूलअल्लाह के साथ हुक्मे परवरदिगार के मुताबिक बेटों में इमाम हसन अलैहिस्सलाम हुज़ूर पाक की उंगली पकड़े हुए और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम हुज़ूर पाक की गौद मुबारक में* उनके बाद *औरतों में सिर्फ़ एक अकेली इकलौती ख़ातून ए जन्नत की सरदार हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा*(जबकि हुक्म औरतों का हुआ था लेकिन शर्त सच्चा होने की थी जिसने पूरी ज़िन्दगी में झूठ न बोला हो इसलिए तन्हा एक ही ख़ातून) और *रसूल की जान ओ नफ़्स के तौर पर सिर्फ़ हज़रत अली अलैहिस्सलाम(यहाँ पर भी नफ्सों का हुक्म था लेकिन शर्त वही ऐसे इंसान की थी जिसने पूरी ज़िंदगी में कभी भी झूठ न बोला हो वरना वो झूठों पर लानत कैसे कर सकता है जिसने खुद कभी झूठ बोला हो वरना लानत पलट के खुद पर आ जाती)*।जब ईसाइयों के बड़े बड़े पादरियों ने इन पंजेतन पाक की इन नूरानी शख़्सियतों को आते देखा तो अचानक उन पादरियों ने बोलना शुरू किया कि हम ऐसी शख़्सियतों को मैदान में हमारी तरफ़ आते हुए देख रहे हैं कि *अगर ये लोग (पंजेतन पाक) पहाड़ की तरफ इशारा कर दें तो पहाड़ अपनी जगह से हट जायेंगे, और अगर इन्होंने हमारे ऊपर लानत कर दी तो क़यामत तक कोई ईसाई नही आएगा* सब अभी ख़त्म हो जायेंगे।

इसलिए उन पादरियों ने हुज़ूर से हार मानली और बिना मुबाहिला किये ही लौटने का फ़ैसला कर लिया और जज़िया भी देना मन्ज़ूर कर लिया।

अहलेसुन्नत की मशहूर किताब मुसनद अहमद में हदीस नम्बर 12320 में इस वाक़ये का ज़िक्र आया है—


Musnad Ahmed Hadees # 12320

۔ (۱۲۳۲۰)۔ وَعَنْ سَعْدِ بْنِ اَبِیْ وَقَّاصٍ، قَالَ: وَسَمِعْتُہُ یَقُولُیَوْمَ خَیْبَرَ: ((لَأُعْطِیَنَّ الرَّایَۃَ رَجُلًا یُحِبُّ اللّٰہَ وَرَسُولَہُ، وَیُحِبُّہُ اللّٰہُ وَرَسُولُہُ۔)) فَتَطَاوَلْنَا لَہَا فَقَالَ: ((ادْعُوا لِی عَلِیًّا۔)) فَأُتِیَبِہِ أَرْمَدَ فَبَصَقَ فِی عَیْنِہِ وَدَفَعَ الرَّایَۃَ إِلَیْہِ فَفَتَحَ اللّٰہُ عَلَیْہِ، وَلَمَّا نَزَلَتْ ہٰذِہِ الْآیَۃُ {نَدْعُ أَبْنَائَ نَا وَأَبْنَائَ کُمْ} [آل عمران: ۶۱] دَعَا رَسُولُ اللّٰہِ صَلَّی اللّٰہُ عَلَیْہِ وَسَلَّمَ عَلِیًّا وَفَاطِمَۃَ وَحَسَنًا وَحُسَیْنًا، فَقَالَ: ((اَللّٰہُمَّ ھٰوُلَائِ اَھْلِیْ۔)) (مسند احمد: ۱۶۰۸)

तर्जुमा–सैय्यदना साद बिन अबी वकास रज़ियल्लाहु अन्हू से रिवायात है, वो कहते हैं : जब ये आयत ➡️

*فَمَنْ حَاجَّكَ فِيهِ مِن بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَكُمْ وَنِسَاءَنَا وَنِسَاءَكُمْ وَأَنفُسَنَا وَأَنفُسَكُمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ فَنَجْعَل لَّعْنَتَ اللَّهِ عَلَى الْكَاذِبِينَ*

(अल-ए-इमरान – 61)
*फिर जब तुम्हारे पास इल्म (कुरान) आ चुका उसके बाद भी अगर तुम से कोई (नसरानी) ईसा के बारे में हुज्जत करें तो कहो कि (अच्छा मैदान में) आओ हम अपने बेटों को बुलाएं तुम अपने बेटों को और हम अपनी औरतों को (बुलाएं) और तुम अपनी औरतों को और हम अपनी जानों को बुलाएं ओर तुम अपनी जानों को,उसके बाद हम सब मिलकर (ख़ुदा की बारगाह में) गिड़गिड़ायें और झूटों पर ख़ुदा की लानत करें।*

*जब 👆आयत नाज़िल हुई तो रसूलअल्लाह स्वल्लल्लाहो अलयहे व आलेही व सल्लम ने सैय्यदना अली अलैहिस्सलाम, सय्यदा फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा, सैय्यदना इमाम हसन और सैय्यदना इमाम हुसैन को बुलाया और फ़रमाया या अल्लाह!ये मेरे अहलेबैत हैं।*


एक और जगह सुनने इब्ने माजा में हदीस नम्बर 120 में आया है कि➡️

Sunnan e Ibn e Maja Hadees # 120

حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْمَاعِيل الرَّازِيُّ، ‏‏‏‏‏‏حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُوسَى، ‏‏‏‏‏‏أَنْبَأَنَا الْعَلَاءُ بْنُ صَالِحٍ، ‏‏‏‏‏‏عَنْ الْمِنْهَالِ، ‏‏‏‏‏‏عَنْ عَبَّادِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، ‏‏‏‏‏‏قَالَ، ‏‏‏‏‏‏قَالَ عَلِيٌّ:‏‏‏‏   أَنَا عَبْدُ اللَّهِ، ‏‏‏‏‏‏وَأَخُو رَسُولِهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، ‏‏‏‏‏‏وَأَنَا الصِّدِّيقُ الأَكْبَرُ لا يَقُولُهَا بَعْدِي إِلا كَذَّابٌ، ‏‏‏‏‏‏صَلَّيْتُ قَبْلَ النَّاسِ بِسَبْعِ سِنِينَ  .

*तर्जुमा–हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं कि: में अल्लाह का बन्दा और उसके रसूल स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का भाई हूँ, और में सिद्दिके अकबर (सबसे बड़ा सच्चा) हूँ मेरे बाद इस फ़ज़ीलत का दावा झूठा शख़्स ही करेगा,मैंने सब लोगों से सात बरस पहले नमाज़ पढ़ी।*


इन्ही अहलेबैत अलैहिस्सलाम की फ़ज़ीलत बयान करने के लिए ये एक हदीस ही काफ़ी है कि अहलेसुन्नत की बड़ी किताब जामये तिर्मिज़ी शरीफ़ में आया है कि➡️

Jam e Tirmazi Hadees # 3733

حَدَّثَنَا نَصْرُ بْنُ عَلِيٍّ الْجَهْضَمِيُّ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدِ بْنِ عَلِيٍّ، أَخْبَرَنِي أَخِي مُوسَى بْنُ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدٍ، عَنْ أَبِيهِ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدٍ، عَنْ أَبِيهِ مُحَمَّدِ بْنِ عَلِيٍّ، عَنْ أَبِيهِ عَلِيِّ بْنِ الْحُسَيْنِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَخَذَ بِيَدِ حَسَنٍ،‏‏‏‏ وَحُسَيْنٍ،‏‏‏‏ فَقَالَ:‏‏‏‏    مَنْ أَحَبَّنِي وَأَحَبَّ هَذَيْنِ،‏‏‏‏ وَأَبَاهُمَا،‏‏‏‏ وَأُمَّهُمَا كَانَ مَعِي فِي دَرَجَتِي يَوْمَ الْقِيَامَةِ   . قَالَ أَبُو عِيسَى:‏‏‏‏ هَذَا حَسَنٌ غَرِيبٌ، ‏‏‏‏‏‏لَا نَعْرِفُهُ مِنْ حَدِيثِ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدٍ إِلَّا مِنْ هَذَا الْوَجْهِ.

*तर्जुमा–रसूलअल्लाह अलैहिस्सलाम ने इमाम हसन और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का हाथ पकड़ा और फ़रमाया:”जो मुझसे मोहब्बत करे,और इन दोनों से,और इनदोनों के बाप (हज़रत अली अलैहिस्सलाम) और इन दोनों की माँ (हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहे) से मोहब्बत करे,तो वो क़यामत के दिन मेरे साथ मेरे दर्जे में होगा”!*

ऊपर दी हुई क़ुरआन और अहादीस की तमाम मोतबर रिवायतों से एक बात तो समझ में आ गई के *तमाम आलमीन मैं पंजेतन पाक से बढ़कर कोई भी सच्चा व सिद्दिके अकबर नही है, क्योंकि अगर ऐसा कोई और होता तो हुज़ूर अल्लाह के हुक्म से उसको भी अपने साथ ईसाइयों के सामने मुबाहिला के लिए अपने साथ उनको भी ले जाते।*
और इस्लाम की ईसाइयों पर इस बिना हथियार से लड़ी गई जंग में जीत की खुशी को ईद की ख़ुशी में कई तरह आलमे इस्लाम को हर साल मनाना चाहिए।

*तमाम आलमे इस्लाम को 24 ज़िलहिज्ज् की इस ईद(ख़ुशी) की बहुत बहुत मुबारकबाद*

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