अर-रहीकुल मख़्तूम पार्ट 11

सार यह कि सामूहिक दशा कमज़ोरी और बेसूझ-बूझ के गढ़े में गिरी हुई थी. अज्ञान अपनी कमानें ताने हुए था और अंधविश्वास का दौर दौरा था। लोग जानवरों जैसी ज़िंदगी गुज़ार रहे थे। औरत बेची और खरीदी जाती थी और कभी-कभी उससे मिट्टी और पत्थर जैसा व्यवहार किया जाता था । क़ौम के आपसी ताल्लुक़ात कमजोर, बल्कि टूटे हुए थे और राज्यों की सारी गतिविधियां अपनी जनता से खज़ाने भरने या विरोधियों पर हमला कर देने तक सीमित थीं ।

आर्थिक स्थिति

आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्थिति के आधीन थी। इसका अन्दाज़ा अरब के आर्थिक साधनों पर नज़र डालने से हो सकता है कि व्यापार ही उनके नज़दीक जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने का सबसे महत्वपूर्ण साधन था और मालूम है कि व्यापार के लिए आना-जाना देश में शान्ति के बिना संभव नहीं और है अरब प्रायद्वीप का हाल यह था कि हराम महीनों के अलावा शान्ति का कहीं वजूद न था । यही वजह है कि सिर्फ़ हराम महीनों ही में अरब के मशहूर बाज़ार उक़ाज़, ज़िल मजाज़ और मजिन्ना वग़ैरह लगते थे ।

जहां तक उद्योगों का मामला है तो अरब इस मैदान में सारी दुनिया से पीछे थे। कपड़े की बुनाई और चमड़े की सफ़ाई आदि की शक्ल में जो कुछ उद्योग पाए भी जाते थे, वे अधिकतर यमन, हियरा और शाम से मिले हुए क्षेत्रों में थे, अलबत्ता अरब के भीतरी भागों में खेती-बाड़ी और जानवरों के चराने का कुछ रिवाज था। सारी अरब औरतें सूत कातती थीं, लेकिन मुश्किल यह थी कि सारा माल व मता हमेशा लड़ाइयों के निशाने पर रहता था। भुखमरी आम थी और लोग ज़रूरी कपड़ों और पहनावों से भी बड़ी हद तक महरूम रहते थे ।

चरित्र

यह तो अपनी जगह तै है कि अज्ञानता-युग में घटिया और ओछी आदतें और बुद्धि व विवेक के खिलाफ़ बातें पाई जाती थीं, लेकिन उनमें ऐसे पसंदीदा उच्च आचरण भी थे, जिन्हें देखकर इंसान दंग रह जाता है, जैसे-

1. दया भाव और दानशीलता—यह अज्ञानियों की ऐसी विशेषता थी, जिसमें वे एक दूसरे से आगे निकल जाने की कोशिश करते थे और इस पर इस तरह गर्व करते थे कि अरब का आधा काव्य साहित्य उसी की भेंट चढ़ गया है। इस गुण के आधार पर किसी ने खुद अपनी प्रशंसा की है, तो किसी ने किसी
और की। हालत यह थी कि कड़े जाड़े और भूख के ज़माने में किसी के घर कोई मेहमान आता और उसके पास अपनी उस एक ऊंटनी के अलावा कुछ न होता जो उसकी और उसके परिवार का मात्र साधन होती, तो भी—ऐसी संगीन हालत के बावजूद—उस पर दानशीलता छा जाती और उठ कर अपने मेहमान के लिए अपनी ऊंटनी ज़िब्ह कर देता। उनके दया भाव का ही नतीजा था कि वे बड़ी-बड़ी दियत और माली ज़िम्मेदारियां उठा लेते और इस तरह दूसरे रईसों और सरदारों के मुक़ाबले में इंसानों को बर्बादी और खून बहाने से बचाकर एक प्रकार के गर्व का अनुभव करते थे।

इसी दया भाव का नतीजा था कि वे मदिरा पान पर भी गर्व करते थे, इसलिए नहीं कि यह अपने आप में कोई गर्व की बात थी, बल्कि इसलिए कि यह दया भाव और दानशीलता को आसान कर देती थी, क्योंकि नशे की हालत में माल लुटाना मानव-स्वभाव पर बोझ नहीं होता। इसलिए ये लोग अंगूर के पेड़ को करम (दया) और अंगूर की शराब को बिन्तुल करम (दया की बेटी) कहते थे। अज्ञानता युग की काव्य साहित्य पर नज़र डालिए तो यह प्रशंसा और गर्व का एक महत्वपूर्ण अध्याय दिखाई पड़ेगा। अन्तरा बिन शद्दाद अबसी अपने मुअल्लका में कहता है-

‘मैंने दोपहर की तेजी रुकने के बाद एक पीले रंग के धारीदार बिल्लोरी जाम से, जो बाईं ओर रखे हुए चमकदार और मुंहबंद जग के साथ था, निशान लगी हुई पाक चमकदार शराब पी और जब मैं पी लेता हूं तो अपना माल लुटा डालता हूं, लेकिन मेरी आबरू भरपूर रहती है, उस पर कोई चोट नहीं आती। और जब मैं होश में आता हूं, तब भी दानशीलता में कोताही नहीं करता और मेरा चरित्र व आचरण जैसा कुछ है, तुम्हें मालूम है।’

उनके दया भाव ही का नतीजा था कि वे जुआ खेलते थे। उनका विचार था कि यह भी दानशीलता का एक रास्ता है, क्योंकि उन्हें जो लाभ मिलता या लाभ प्राप्त करने वालों के हिस्से से जो कुछ ज़्यादा बचा रहता, उसे मिस्कीनों (दीन-दुखियों) को दे देते थे। इसीलिए कुरआन ने शराब और जुए के लाभ का इंकार नहीं किया, बल्कि यह फ़रमाया कि

‘इन दोनों का गुनाह उनके लाभ से बढ़कर है।’

(2:219)

2. वचन का पालन-यह भी अज्ञानता-युग के उच्च चरित्र में से है। वचन को उनके नज़दीक दीन (धर्म) की हैसियत हासिल थी, जिससे वे बहरहाल चिमटे रहते थे और इस राह में अपनी औलाद का खून और अपने घर-बार की ताबही को भी कुछ नहीं समझते थे। इसे समझने के लिए हानी बिन मस्ऊद

समवाल बिन आदिया और हाजिब बिन ज़रारा की घटनाएं पर्याप्त हैं।

3. स्वाभिमान—स्वाभिमान पर स्थिर रहना और ज़ुल्म और जब सहन न करना भी अज्ञानता के जाने-पहचाने चरित्र में से था। इसका नतीजा यह था कि उनकी वीरता और स्वाभिमान सीमा से बढ़ा हुआ था। वे तुरन्त भड़क उठते थे और छोटी-छोटी बात पर, जिससे अपमान की गंध आती, तलवारें खींच लेते और बड़ी ही खूनी लड़ाई छेड़ देते। उन्हें इस राह में अपनी जान की कदापि परवाह न रहती ।

4. जो कह देते, वह कर बैठते-अज्ञानियों की विशेषता यह भी थी कि जब वे किसी काम को अपनी बड़ाई का ज़रिया समझकर अंजाम देने पर तुल जाते, तो फिर कोई रुकावट उन्हें रोक न सकती थी, वे अपनी जान पर खेल कर उस काम को अंजाम दे डालते थे ।

5. सहनशीलता और गम्भीरता — यह भी अज्ञानता-युग के लोगों के नज़दीक एक बड़ा गुण था, पर यह उनकी हद से बढ़ी हुई वीरता और लड़ाई के लिए हर वक़्त तैयार रहने की आदत की वजह से कम पाया जाता था।

6. बदवी सादगी—यानी सभ्यता की गन्दगियों और दांव-पेंच का न जानना और उनसे दूरी। इसका नतीजा यह था कि उनमें सच्चाई और अमानतदारी पाई जाती थी। वे धोखाधड़ी और वायदों के पूरा न करने से दूर रहते और इन चीज़ों से नफ़रत करते थे ।

हानी बिन मस्ऊद की घटना हियरा की बादशाही के तहत गुज़र चुकी है। समवाल की घटना यह है कि इमरउल क़ैस ने उसके पास कुछ ज़िरहें अमानत के तौर पर रख छोड़ी थीं। हारिस बिन अबी शिम्र गुस्सानी ने उन्हें उससे लेना चाहा। उसने इंकार कर दिया और तीमा में अपने महल के अन्दर क़िला बन्द हो गया। समवाल का एक बेटा क़िला से बाहर रह गया था। हारिस ने उसे गिरफ़्तार कर लिया और ज़िरहें न देने की शक्ल में क़त्ल की धमकी दी, पर समवाल इंकार पर अड़ा रहा। आखिर हारिस ने उसके बेटे को उसकी आंखों के सामने क़त्ल कर दिया।

हाजिब की घटना यह है कि उसके इलाक़े में अकाल पड़ा। उसने किसरा से उसकी अमलदारी की सीमा में अपनी क़ौम को ठहरने की इजाज़त चाही। किसरा को उनके फ़साद का डर हुआ, इसलिए ज़मानत के बग़ैर मंजूर न किया। हाजिब ने अपनी कमान रेहन रख दी और वायदे के मुताबिक़ अकाल समाप्त होने पर अपनी क़ौम को वापस ले गया और उनके बेटे हज़रत अतारिद बिन हाजिब रज़ियल्लाहु अन्हु ने किसरा के पास जाकर बाप की अमानत वापस तलब की, जिसे किसरा ने उनकी वफ़ादारी को देखते हुए वापस कर दहम समझते हैं कि अरब प्रायद्वीप को सारी दुनिया से जो भौगोलिक संबंध था, उसके अलावा यही वे मूल्यवान गुण थे, जिनकी वजह से अरबों को मानव-जाति का नेतृत्व करने और आम लोगों के लिए रिसालत का बोझ उठाने के लिए चुना गया, क्योंकि ये चरित्र यद्यपि कभी-कभी फ़साद और बिगाड़ का कारण बन जाते थे और इनकी वजह से दुखद घटनाएं घट जाती थीं, लेकिन ये अपने आप में बड़े मूल्यवान गुण थे, जो थोड़ा सा सुधरने के बाद मानव-समाज के लिए बड़े ही उपयोगी बन सकते थे और यही काम इस्लाम ने अंजाम दिना ।

शायद इन गुणों में भी वायदों का पूरा करना, उसके बाद स्वाभिमान और ‘जो कह देते वह कर बैठते’ सरीखे गुण सबसे ज़्यादा मूल्यवान गुण थे, क्योंकि महान शक्ति और दृढ़ संकल्प के बिना बिगाड़ और फ़साद का अन्त और न्यायव्यवस्था की स्थापना संभव नहीं ।

अज्ञानता-युग के लोगों के कुछ और भी अच्छे गुण थे, लेकिन यहां सबका उल्लेख करना आवश्यक नहीं है

अनपढ़ सैयद अफज़ल है या गैर सैयद आलिम

अनपढ़ सैयद अफज़ल है या गैर सैयद आलिम

खातिमुल मुहक्किीन इमाम शैख इब्ने हज्र अस्कलानी (852 हि०) के फतावा में है, उनसे पूछा गया कि अनपढ़ सैयद अफज़ल है या गैर सैयद आलिम? और अगर यह दोनों किसी जगह इकट्ठे मौजूद हों तो उनमें से ज़्यादा इज्ज़त और एहतराम का मुस्तहिक पहले किसको समझा जाए ? मसलन अगर ऐसी मेहफिल में चाय, काफी या कोई और चीज़ पेश करनी हो तो पहले किस से की जाए? या ऐसी मेहफिल में कोई शख़्स अगर हाथ चूमना चाहता है या पेशानी को बोसा देना चाहता है तो आगाज़ किससे किया जाए ? इमाम इब्ने हजर असकलानी जवाब में फरमाते हैं: इन दोनों को अल्लाह तआला ने बहुत बड़ी फ़ज़ीलत बख़्शी है मगर सैयद में क्योंकि लायक तकरीम गोशा-ए-रसूलुल्लाह के खून की निस्बत है जिसकी बराबरी दुनिया की कोई चीज़ नहीं कर सकती इसी लिहाज़ से बाज़ उलमा किराम ने कहा है:

” हम जिगर गोश-ए-रसूलुल्लाह को दुनिया की किसी चीज़ से भी बराबरी की निस्बत नहीं दे सकते।’ “

बाकी रहा बाअमल आलिमे दीन का किस्सा तो चूंकि उसकी जात मुसलमानों के लिए नफा बख़्श, गुमराहों के लिए राहे हिदायत है और यह कि उलमा-ए-इस्लाम रसूले अकरम के नाइब व जानशीन और उनके उलूम व मआरिफ के वारिस और इल्मबर्दार हैं इसलिए अल्लाह तआला की तरफ से तौफीक याफ्ता लोगों से हमें यह तवक्को है कि वह सादात किराम और उलमाए किराम की इज़्ज़त एहतराम और ताज़ीम करने में उनकी हक़ तलफ़ी नहीं करेंगे।

+ के इस ऐसी महफ़िलों में मज़कूरा बाला लायके एहतराम हस्तियों के यक्जा होने पर किसी चीज़ के देने या ताज़ीम के आदाब बजा लाने के सिलसिले में आगाज़ करने के लिए हमें नबी अकरम कौल मुबारक को पेशे नज़र रखना चाहिए कि ( इज़्ज़त व एहतराम और मेहमान नवाजी वग़ैरा में एहले कुरैश को मुकद्दम रखिए) और फिर मज़कूर बाला सूरत में तो एक शख्स को जिगर गोशा -ए-रसूलुल्लाह की निस्बत भी हासिल है ।” (ज़ैनुल बरकात)

SAMUEL Alahissalam

SAMUEL

After gaining hold of the new territory, Bani Israel were governed by the clergy in accordance with the laws laid down by Moses in the Torah. After a while they started to dream about a kingdom of their own, just as other people around them had. God appointed Samuel prophet to Bani Israel. Samuel was a descendant of Ephraim (a son of Joseph).

1) their kit The people made Saul (Taalut) their king. However, Saul was unable to govern the people well and was not obedient to Samuel. God took the kingdom away from Saul and gave it to David (Da ud).

Samuel is not named in the Qur’an, but a reference is made in Sura Baqarah without his name. Taalut is known as Saul in Torah.