
देती हैं-
1. दारुन्नदवः की अध्यक्षता—- जहां बड़े-बड़े मामलों के बारे में मश्विरे होते थे और जहां लोग अपनी लड़कियों की शादियां भी करते थे ।
अर-रहीकुल मख़्तूम
2. लिवा-यानी लड़ाई का झंडा कुसई ही के हाथों बांधा जाता था ।
3. ख़ाना काबा की देखभाल- इसका अर्थ यह है कि खाना काबा का द्वार कुसई ही खोलता था और वही खाना काबा की सेवा करता था और उसकी कुंजियां उसी के हाथ में रहती थीं।
4. सक्राया (पानी पिलाना) —इसकी शक्ल यह थी कि कुछ हौज़ में हाजियों के लिए पानी भर दिया जाता था और उसमें कुछ खजूर और किशमिश डाल कर उसे मीठा बना दिया जाता था। जब हाजी लोग मक्का आते थे, तो उसे पीते थे ।
5. रिफ़ादा (हाजियों का आतिथ्य) – इसका अर्थ यह है कि हाजियों के लिए आतिथ्य के रूप में खाना तैयार किया जाता था। इस उद्देश्य के लिए कुसई ने कुरैश पर एक खास रक़म तै कर रखी थी जो हज के मौसम में कुसई के पास जमा की जाती थी। कुसई इस रक़म से हाजियों के लिए खाना तैयार कराता था। जो लोग तंगहाल होते या जिनके पास धन-दौलत न होता, वे यहीं खाना खाते थे। 1
ये सारे पद कुसई को प्राप्त थे। कुसई का पहला बेटा अब्दुद्दार था, पर उसके बजाए दूसरा बेटा अब्दे मुनाफ़ कुसई के जीवन ही में नेतृत्व के स्थान पर पहुंच गया था, इसलिए कुसई ने अब्दुद्दार से कहा कि ये लोग यद्यपि नेतृत्व में तुम पर बाज़ी ले जा चुके हैं, पर मैं तुम्हें इनके बराबर करके रहूंगा, चुनांचे कुसई ने अपने सारे पद और ज़िम्मेदारियों की वसीयत अब्दुद्दार के लिए कर दी अर्थात् दारुन्नदवः की अध्यक्षता, खाना काबा की निगरानी और देखभाल, झंडा बरदारी, पानी पिलाने का काम और हाजियों का सत्कार सब कुछ अब्दुद्दार को दे दिया। चूंकि किसी काम में कुसई का विरोध नहीं किया जाता था और न उसकी कोई बात रद्द की जाती थी, बल्कि उसका हर क़दम, उसके जीवन में भी और उसके मरने के बाद भी, पालन योग्य समझा जाता था, इसलिए उसके मरने के बाद उसके बेटों ने किसी विवाद के बिना उसकी वसीयत बाक़ी रखी। लेकिन जब अब्दे मुनाफ़ का देहान्त हो गया, तो उसके बेटों ने इन पदो के सिलसिले में अपने चचेरे भाइयों अर्थात् अब्दुद्दार की सन्तान से झगड़ना शुरू किया, इसके नतीजे में कुरैश दो गिरोह में बंट गये और क़रीब था कि दोनों में लड़ाई हो जाती, मगर फिर उन्होंने समझौते की आवाज़ उठाई
इब्ने हिशाम 1/130
और इन पदों को आपस में बांट लिया, चुनांचे हाजियों को पानी पिलाने और उनके आतिथ्य के काम बनू अब्दे मुनाफ़ को दिए गए और दारुन्नदवः की अध्यक्षता, झंडा-बरदारी और खाना काबा की निगरानी और देखभाल बनू अब्दुद्दार के हाथ में रही। फिर बनू अब्द मुनाफ़ ने अपने प्राप्त पदों के लिए कुरआ डाला, तो कुरआ हाशिम बिन अब्दे मुनाफ़ के नाम निकला, इसलिए हाशिम ने ही अपनी ज़िंदगी भर पानी पिलाने और हाजियों के आतिथ्य की व्यवस्था की, अलबत्ता जब हाशिम का देहान्त हो गया तो उनके भाई मुत्तलिब ने गद्दी संभाली, पर मुत्तलिब के बाद उनके भतीजे अब्दुल मुत्तलिब बिन हाशिम ने जो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दादा थे- यह पद संभाल लिया और उनके बाद उनकी सन्तान उनकी जानशीं हुई, यहां तक कि जब इस्लाम का युग आया तो हज़रत अब्बास बिन मुत्तलिब इस पद पर आसीन थे।1
इनके अलावा कुछ और पद भी थे, जिन्हें कुरैश ने आपस में बांट रखा था । इन पदों और इन दायित्वों द्वारा कुरैश ने एक छोटा-सा राज्य-बल्कि राज्य प्रशासन—बना रखा था, जिसकी सरकारी संस्थाएं और समितियां कुछ इस ढंग की थीं, जैसे आजकल संसदीय संस्थाएं और समितियां हुआ करती हैं। इन पदों का विवरण नीचे दिया जा रहा है-
1. ईसार, यानी फ़ालगिरी, भाग्य का पता लगाने के लिए बुतों के पास जो तीर रखे रहते थे, उनकी देखभाल और निगरानी। यह पद बनू जम्ह को प्राप्त था ।
2. अर्थ, यानी बुतों का सान्निध्य प्राप्त करने के लिए जो चढ़ावे और नज़राने चढ़ाए जाते थे, उनका प्रबन्ध करना, साथ ही झगड़ों और मुक़दमों का फ़ैसला करना ! यह काम बनू सम को सौंपा गया था।
बनू असद को प्राप्त था । 4. अशनाक़ यानी दियत और जुर्मानों की व्यवस्था, यह पद बनू तैम को मिला हुआ था।
3. शूरा, यानी सलाहकार समिति, यह पद
5. उक़ाब यानी क़ौमी झंडाबरदारी, यह बनू उमैया का काम था। 6. कुबा यानी फ़ौज की व्यवस्था और घुड़सवारों का नेतृत्व । यह बनू मख्ज़ूम के हिस्से में आया था।
7. सफ़ारत यानी राजदूतत्व, यह बनू अदी का पद था। 2
1. इब्ने हिशाम 1/129-132, 137, 142, 178, 179 2. तारीख अर्जुल कुरआन 2/104, 105, 106, लेकिन सही यह है कि झंडा बरदारी का हक़ बनू अब्दुद्दार का था, बनू उमैया को प्रधान सेनापति होने का अधिकार प्राप्त था।
शेष अरब सरदारियां
हम पीछे क़हतानी और अदनानी क़बीलों के देश-परित्याग का उल्लेख कर चुके हैं और बतला चुके हैं कि पूरा अरब देश इन क़बीलों में बंट गया था। इसके बाद इनकी सरदारियों और सत्ता का स्वरूप कुछ इस तरह बन गया था कि-
जो क़बीले हियरा के आस-पास आबाद थे, उन्हें हियरा राज्य के आधीन माना गया और जो क़बीले बादियतुश-शाम में (शाम के आस-पास) आबाद हो गए थे, उन्हें ग़स्सानी शासकों के आधीन मान लिया गया, पर पराधीनता नाम मात्र थी, व्यवहार में न थी। इन दो जगहों को छोड़कर अरब के भीतरी भाग में क़बीले हर पहलू से स्वतंत्र थे |
इन क़बीलों में सरदारी व्यवस्था चल रही थी। क़बीले खुद अपना सरदार नियुक्त करते थे और इन सरदारों के लिए उनका क़बीला एक छोटा-सा राज्य हुआ करता था। राजनीतिक अस्तित्व और सुरक्षा का आधार, क़बीलेवार इकाई पर आधारित पक्षपात और अपने भू-भाग की रक्षा-सुरक्षा के संयुक्त हित पर स्थापित था ।
क़बीलेवार सरदारों का स्थान अपनी क़ौम में बादशाहों जैसा था। क़बीला लड़ाई और संधि में बहरहाल अपने सरदार के फ़ैसले के आधीन होता था और किसी हाल में उससे अलग-थलग नहीं रह सकता था। सरदार अपने क़बीले का तानाशाह हुआ करता था, यहां तक कि कुछ सरदारों का हाल यह था कि अगर वे बिगड़ जाते, तो हज़ारों तलवारें यह पूछे बिना नंगी चमकने लगतीं कि सरदार के गुस्से की वजह क्या है ? फिर भी चूंकि एक ही कुंबे के चचेरे भाइयों में सरदारी के लिए संघर्ष भी हुआ करता था, इसलिए उसका तक़ाज़ा था कि सरदार अपनी क़बीलेवार जनता के प्रति उदारता दिखाए, खूब माल खर्च करे, सत्कार करे, धैर्य व सहनशीलता से काम ले, वीरता का व्यावहारिक रूप प्रदर्शित करे और सम्मान की रक्षा करे, ताकि लोगों की नज़र में आम तौर से और कवियों की नज़र में खास तौर से गुणों और विशेषताओं का योग बन जाए, (क्योंकि उस युग में कवि क़बीले का मुख हुआ करते थे) और इस तरह सरदार अपने लोगों में सर्वश्रेष्ठ बन जाए।
सरदारों के कुछ विशेष और प्रमुख अधिकार भी हुआ करते थे, जिनका एक कवि ने इस तरह उल्लेख किया है-
लकल मिरबाअ फ़ीना वस्सफ़ाया
व हुक्मु-क वन्नशीततु वल फ़ुज़ूलू
‘हमारे बीच तुम्हारे लिए ग़नीमत के (लड़ाइयों में लूटे गए) माल का चौथाई है और चुनींदा माल है और वह माल है जिसका तुम फ़ैसला कर दो और जो राह चलते हाथ आ जाए और जो बंटने से बच रहे । ‘
मिरबाअ : ग़नीमत के माल का चौथाई हिस्सा,
सफ़ाया : वह माल, जिसे बंटने से पहले ही सरदार अपने लिए चुन ले, नशीता : वह माल जो असल क़ौम तक पहुंचने से पहले रास्ते ही में सरदार के हाथ लग जाए,
फ़ुज़ूल : वह माल, जो बंटने के बाद बचा रहे और लड़ने वालों की संख्या में बराबर न बंटे, जैसे बंटने से बचे हुए ऊंट-घोड़े आदि ये तमाम प्रकार के माल क़बीला के सरदार का हक़ हुआ करते थे ।
राजनीतिक स्थिति
अरब प्रायद्वीप की सरकारों और शासकों का उल्लेख हो चुका, अनुचित न
होगा कि अब उनकी कुछ राजनीतिक परिस्थितियों का भी उल्लेख कर दिया जाए। अरब प्रायद्वीप के वे तीनों सीमावर्ती क्षेत्र जो विदेशी राज्यों के पडोस में पड़ते थे, उनकी राजनीतिक स्थिति अशान्ति, बिखराव और पतन और गिरावट का शिकार थी। इंसान स्वामी और दास या शासक और शासित दो वर्गों में बंटा हुआ था। सारे लाभ – प्रमुखों, मुख्य रूप से विदेशी प्रमुखों को प्राप्त थे और सारा बोझ दासों के सर पर था। इसे और अधिक स्पष्ट शब्दों में यो कहा जा सकता है कि प्रजा वास्तव में एक खेती थी जो सरकार के लिए टैक्स और आमदनी जुटाती थी और सरकारें उसे अपने मज़े, भोग-विलास, सुख-वैभव और दमन-चक्र के लिए इस्तेमाल करती थीं। जनता अंधेरों में जीने के लिए हाथ पैर मारती रहती थी और उन पर हर ओर से अन्याय और अत्याचार की वर्षा होती रहती थी, पर वे शिकायत का एक शब्द भी अपने मुख पर नहीं ला सकते थे, बल्कि ज़रूरी था कि भांति-भांति का अपमान, अनादर और अत्याचार सहन करें और ज़ुबान बन्द रखें, क्योंकि सरकार दमनकारी थी और मानव-अधिकार नाम की किसी चीज़ का कोई अस्तित्व न था ।
इन क्षेत्रों के पड़ोस में रहने वाले क़बीले अनिश्चितता के शिकार थे। उन्हें स्वार्थ और इच्छाएं इधर से उधर फेंकती रहती थीं, कभी वे इराक़ियों के समर्थक बन जाते थे और कभी शामियों के स्वर में स्वर मिलाते थे |
जो क़बीले अरब के भीतर आबाद थे, उनके भी जोड़ ढीले और बिखरे हुए थे। हर ओर क़बीलागत झगड़ों, नस्ली बिगाड़ और धार्मिक मतभेदों का बाज़ार
गर्म था, जिसमें हर क़बीले के लोग हर हाल में अपने-अपने क़बीलों का साथ देते थे, चाहे वह सही हो या ग़लत। एक कवि इसी भावना को इस तरह व्यक्त करता है—
‘मैं भी तो क़बीला गज़ीया ही का एक व्यक्ति हूं। अगर वह ग़लत राह पर चलेगा, तो मैं भी ग़लत राह पर चलूंगा और अगर वह सही राह पर चलेगा, तो मैं भी सही राह पर चलूंगा।”
अरब के भीतरी भाग में कोई बादशाह न था, जो उनकी आवाज़ को ताक़त पहुंचाता, और न कोई रुजू होने की जगह थी जिसकी ओर परेशानियों में रुजू किया जाता और जिस पर आड़े वक़्तों में भरोसा किया जाता।
हां, हिजाज़ की सरकार को मान-सम्मान की दृष्टि से यक़ीनन देखा जाता था और उसे धर्म-केन्द्र का रखवाला भी माना जाता था। यह सरकार वास्तव में एक तरह से सांसारिक नेतृत्व और धार्मिक अगुवाई का योग थी। इसे अरबों पर धार्मिक नेतृत्व के नाम से प्रभुत्व प्राप्त था और हरम और हरम के आस-पास के क्षेत्रों में उसका विधिवत शासन था। वहीं वह बैतुल्लाह के दर्शकों की ज़रूरतों की व्यवस्था और इब्राहीमी शरीअत के आदेशों को लागू करती थी और उसके पास संसदीय संस्थाओं जैसी संस्थाएं और समितियां भी थीं, लेकिन यह शासन इतना कमज़ोर था कि अरब के भीतरी भाग की ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाने की ताक़त न रखती थी, जैसा कि हब्शियों के हमले के मौक़े पर ज़ाहिर हुआ ।

