
*तरावीह पढ़ना बिदअत है*
*इस्लाम में हर वो चीज़ बिदअत मानी जाती है जो अल्लाह के रसूल हज़रत मोहम्मद स्वल्लल्लाहो अलयहे व आलेही सल्लम ने अन्जाम न दी हो और रसूलअल्लाह के बाद वजूद में आयी हो।*
माहे रमज़ान उल मुबारक में रोज़ रात में पढ़ी जाने वाली नमाज़ जिसको लोग तरावीह की नमाज़ बोलते हैं ये नमाज़ भी एक बिदअत है जिसको रसूलअल्लाह स अ व स ने अपनी हयात ए तैयबा में कभी भी अंजाम नही दिया।खुद इस बात की दलील अहलेसुन्नत की सबसे मोतबर किताब सही बुख़ारी में मौजूद है, मुलाहिज़ा फरमाएँ-
حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ ، قَالَ : حَدَّثَنِي مَالِكٌ ، عَنْ سَعِيدٍ الْمَقْبُرِيِّ ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ ، أَنَّهُ سَأَلَ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا : كَيْفَ كَانَتْ صَلَاةُ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي رَمَضَانَ ؟ فَقَالَتْ : مَا كَانَ يَزِيدُ فِي رَمَضَانَ وَلَا فِي غَيْرِهِ عَلَى إِحْدَى عَشْرَةَ رَكْعَةً ، يُصَلِّي أَرْبَعًا ، فَلَا تَسَلْ عَنْ حُسْنِهِنَّ وَطُولِهِنَّ ، ثُمَّ يُصَلِّي أَرْبَعًا ، فَلَا تَسَلْ عَنْ حُسْنِهِنَّ وَطُولِهِنَّ ، ثُمَّ يُصَلِّي ثَلَاثًا ، فَقُلْتُ : يَا رَسُولَ اللَّهِ ، أَتَنَامُ قَبْلَ أَنْ تُوتِرَ ، قَالَ : يَا عَائِشَةُ ، إِنَّ عَيْنَيَّ تَنَامَانِ وَلَا يَنَامُ قَلْبِي .
Status: صحیح
तर्जुमा👉
सही बुख़ारी शरीफ़ हदीस न 2013
हज़रत आयशा से पूछा गया कि रसूलअल्लाह स अ व स रमज़ान में कितनी रकअतें नमाज़ पढ़ते थे?? तो हज़रत आयशा र अ ने बतलाया कि *रमज़ान हो या कोई और महीना आप अलैहिस्सलाम ग्यारह रकअतों से ज़्यादा नही पढ़ते थे।*
👆यहाँ पर ये बात वाज़ेह तौर पर बयान हुई है कि माहे रमज़ान हो या कोई महीना हो रसूलअल्लाह सिर्फ़ ग्यारह रकअत नमाज़ ही पढ़ते थे(जिसे नमाज़े लैल या तहज्जुद की नमाज़ कहा जाता है) इसके अलावा कोई मुस्तहब या नफ़िल नमाज़ का कोई ज़िक्र नही आया है।
*लोग जिस रिवायत को तरावीह के लिए पेश करते हैं वो ये है*👇
حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ بُكَيْرٍ ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ ، عَنْ عُقَيْلٍ ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ ، أَخْبَرَنِي عُرْوَةُ ، أَنَّ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا أَخْبَرَتْهُ ، أَنّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ خَرَجَ لَيْلَةً مِنْ جَوْفِ اللَّيْلِ فَصَلَّى فِي الْمَسْجِدِ وَصَلَّى رِجَالٌ بِصَلَاتِهِ ، فَأَصْبَحَ النَّاسُ فَتَحَدَّثُوا ، فَاجْتَمَعَ أَكْثَرُ مِنْهُمْ فَصَلَّى فَصَلَّوْا مَعَهُ ، فَأَصْبَحَ النَّاسُ فَتَحَدَّثُوا ، فَكَثُرَ أَهْلُ الْمَسْجِدِ مِنَ اللَّيْلَةِ الثَّالِثَةِ ، فَخَرَجَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ، فَصَلَّى فَصَلَّوْا بِصَلَاتِهِ ، فَلَمَّا كَانَتِ اللَّيْلَةُ الرَّابِعَةُ ، عَجَزَ الْمَسْجِدُ عَنْ أَهْلِهِ حَتَّى خَرَجَ لِصَلَاةِ الصُّبْحِ ، فَلَمَّا قَضَى الْفَجْرَ ، أَقْبَلَ عَلَى النَّاسِ فَتَشَهَّدَ ، ثُمَّ قَالَ : أَمَّا بَعْدُ ، فَإِنَّهُ لَمْ يَخْفَ عَلَيَّ مَكَانُكُمْ ، وَلَكِنِّي خَشِيتُ أَنْ تُفْتَرَضَ عَلَيْكُمْ فَتَعْجِزُوا عَنْهَا ، فَتُوُفِّيَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَالْأَمْرُ عَلَى ذَلِكَ .
तर्जुमा👉
सही बुख़ारी शरीफ़ हदीस न 2012
रसूलअल्लाह स अ व स एक बार रमज़ान की आधी रात में मस्जिद तशरीफ़ ले गए और वहाँ नमाज़े लेल (तहज्जुद की नमाज़ को नमाज़े लेल कहा जाता है) पढ़ी। कुछ सहाबा र अ भी आपके साथ नमाज़ में शरीक हो गए , सुबह हुई तो उन्होंने उस का चर्चा किया,चुनाँचे दूसरी रात में लोग पहले से भी ज़्यादा लोग जमा हो गए और आप अलैहिस्सलाम के साथ नमाज़ पढ़ी।दूसरी सुबह को और ज़्यादा चर्चा हुआ और तीसरी रात में उस से भी ज़्यादा लोग जमा हो गए,आप अलैहिस्सलाम ने इस आधी रात में भी नमाज़ पढ़ी और लोगों ने आपकी इक़्तेदा की।चौथी रात को ये आलम था कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ने आने वालों के लिए जगह भी बाक़ी नही रही थी,लेकिन उस रात आप अलैहिस्सलाम मस्जिद नही गए बल्कि सुबह(फ़ज्र)की नमाज़ के लिए तशरीफ़ लाये,जब नमाज़ पढ़ ली तो लोगों की तरफ मुतवज्जेह होकर शहादत के बाद फ़रमाया-अम्मा बाद ! तुम्हारे यहाँ जमा होने का मुझे इल्म था,लेकिन मुझे ख़ौफ़ इस बात का हुआ कि कहीं ये नमाज़(क़यामुल लैल,तहज्जुद की नमाज़) तुम पर फ़र्ज़ न कर दी जाए और फिर तुम उस नमाज़ की अदायगी से आजिज़ हो जाओ,चुनाँचे जब नबी करीम स अ व स की वफ़ात हुई तो यही कैफ़ियत क़ायम रही।
Status: صحیح
👆यहाँ पर ये बात साफ़ साफ़ मौजूद है कि हुज़ूर आधी रात को मस्जिद में नमाज़े लैल मतलब तहज्जुद की नमाज़ अदा करने को माहे रमज़ान में जाते थे (जबकि आज जो तरावीह की नमाज़ लोग पढ़ते हैं वो ईशा की नमाज़ के फौरन बाद पढ़ते हैं आधी रात को नही) और अगर इस नमाज़ को अल्लाह तआला को मुसलमानों को अदा करवानी ही होती तो जिस तरह से फ़र्ज़ नमाज़ों के अलावा एक मुस्तहब नमाज़ जिसको हम तहज्जुद की नमाज़ के नाम से जानते हैं उसका हुक्म क़ुरआन में मौजूद है ठीक उस ही तरह से इस नमाज़े तरावीह का भी हुक्म क़ुरआन में आता,लेकिन पूरे क़ुरआन में इस तरावीह का कहीं भी कोई ज़िक्र नही है।
*तो फिर इस्लाम मेआख़िर ये बिदअत किसके ज़माने मैं और कब से शुरू हुई❓*
इस चीज़ का ज़िक्र भी बुख़ारी शरीफ़ में साफ़ साफ़ बयान हुआ है ये देखिए👇
وَعَنِ ابْنِ شِهَابٍ ، عَنْ عُرْوَةَ بْنِ الزُّبَيْرِ ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ عَبْدٍ الْقَارِيِّ ، أَنَّهُ قَالَ : خَرَجْتُ مَعَ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِرَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ لَيْلَةً فِي رَمَضَانَ إِلَى الْمَسْجِدِ ، فَإِذَا النَّاسُ أَوْزَاعٌ مُتَفَرِّقُونَ ، يُصَلِّي الرَّجُلُ لِنَفْسِهِ ، وَيُصَلِّي الرَّجُلُ فَيُصَلِّي بِصَلَاتِهِ الرَّهْطُ ، فَقَالَ عُمَرُ :إِنِّي أَرَى لَوْ جَمَعْتُ هَؤُلَاءِ عَلَى قَارِئٍ وَاحِدٍ لَكَانَ أَمْثَلَ ، ثُمَّ عَزَمَ فَجَمَعَهُمْ عَلَى أُبَيِّ بْنِ كَعْبٍ ، ثُمَّ خَرَجْتُ مَعَهُ لَيْلَةً أُخْرَى وَالنَّاسُ يُصَلُّونَ بِصَلَاةِ قَارِئِهِمْ ، قَالَ عُمَرُ : نِعْمَ الْبِدْعَةُ هَذِهِ ، وَالَّتِي يَنَامُونَ عَنْهَا أَفْضَلُ مِنَ الَّتِي يَقُومُونَ يُرِيدُ آخِرَ اللَّيْلِ ، وَكَانَ النَّاسُ يَقُومُونَ أَوَّلَهُ .
Status: صحیح
तर्जुमा👉
सही बुख़ारी शरीफ़ हदीस न 2010
में उमर बिन ख़त्ताब र अ के साथ रमज़ान की एक रात को मस्जिद में गया, सब लोग मुतफररिक और मुन्तशिर(अलग अलग पहले हुए) थे।कोई अकेला नमाज़ पढ़ रहा था, और कुछ किसी के पीछे खड़े हुए थे।इस पर उमर र अ ने फरमाया ,मेरा ख़्याल है कि अगर में तमाम लोगों को एक क़ारी के पीछे जमा करदूँ तो ज़्यादा अच्छा होगा,चुनाँचे आपने यही ठान कर अबी इब्ने काब र अ को उन सबका इमाम बना दिया।फिर एक रात जो में उनके साथ निकला तो देखा कि लोग अपने इमाम के पीछे नमाज़े तरावीह पढ़ रहे हैं, ये देख कर ह उमर ने फ़रमाया “ये कितनी अच्छी बिदअत(नमाज़े तरावीह का नया तरीक़ा) है। और रात का वो हिस्सा जिसमे ये लोग सो जाते हैं इस हिस्से से बेहतर और अफ़ज़ल है जिसमें ये नमाज़ पढ़ते हैं।आप की मुराद रात के आख़री हिस्से की फ़ज़ीलत से थी,क्योंकि लोग ये नमाज़ रात के शुरू ही में पढ़ लेते थे।
👆इस रिवायत में बयान हुआ कि एक रात माहे रमज़ान में जब एक मस्जिद में हज़रत उमर र अ का गुज़र हुआ तो उन्होंने कुछ लोगों को अपनी अपनी नमाज़ें पढ़ता हुआ देखा, जो फुरादा मतलब अकेले अकेले और अपनी अपनी पढ़ रहे थे(यहाँ एक बात ख़ास तौर से वाज़ेह करता चलूँ के अगर तरावीह की नमाज़ माहे रमज़ान में रसूलअल्लाह स अ व स के ज़माने से हो रही होती तो फिर ये सब लोग मस्जिद में इस तरह से अलग अलग अपनी अपनी नमाज़ें नही पढ़ रहे होते बल्कि वो सब पहले से ही तरावीह पढ़ रहे होते) जब हज़रत उमर ने उन सबको अलहदा अपनी अपनी नमाजें पढ़ता हुआ देखा तो उन सब के लिए एक इमाम मुन्तख़ब कर दिया और जब अगली बार उनका वहाँ वापस गुज़र हुआ तो वो उन सबको एक जमाअत में नमाज़ पढ़ता हुआ देख कर ख़ुश हुए और उन्होंने ख़ुद फ़रमाया के ये कितनी अच्छी बिदअत है।
*अब फ़ैसला आप सब लोगों पर छोड़ा के क्या अब भी वो एक बिदअत को अंजाम देते रहेंगे, और वैसे भी तरावीह पढ़ने में इंसान ख़ुद को ज़हमत में डालता है जबकि हुज़ूर पाक अलैहिस्सलाम ने अपनी उम्मत की आसानी के लिए काम अंजाम दिए हैं ना कि मुश्किल व परेशानी में मुब्तिला करने के लिए।वस्सलाम*
*🖋️अबु मोहम्मद*👳♂️

